बेचैन कण्डियाल की ग़ज़लें
बुतों से बोलने की आस करते हो
इस शहर की खाक में सुबहो शाम
तुमको देखा नहीं कभी काम पर मैंने
वफा की उम्मीदें, वो भी दोस्तों से
ज़िन्दों से नहीं, मुर्दों को पूछिये
मैं तैयार हूँ यूं भी साथ चलने को
ग़मों का वास्ता मत दे, छलिया कोई
गिरना फ़ितरत ही थी तो क्या करिये
दिन के उजालों को देखकर मत डर
अंधेरों की फ़िक्र को छोड़ दे ‘बेचैन’
मैं परेशां, तू परेशां, दिख रहे हैं सब परेशां
मर रहे बेमौत हर दिन, मौत की क्या पूछ है
किसको फुरसत है कुछ तदबीर कोई सोच ले
खामोश हैं लब, जिस्म संग से जड़ चुके हैं
‘बेचैन’ सब हैं बेखबर कब कयामत आ ढले
यहाँ खुदा से नहीं, बंदों से डरिये लोगों
कौन, कब, किसको, किस घड़ी कर दे विदा
माना कि जगह न थी तुम्हारे घर में, लेकिन
आज माझी की नीयत कुछ खराब लगती है
चैन आराम पसंद नहीं फिक्र नहीं जान की
बेचैन कण्डियाल
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