Wednesday, April 8, 2026
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बेचैन कण्डियाल की ग़ज़लें

(एक)
बुतों से बोलने की आस करते हो
रेगिस्तान में पानी तलाश करते हो।
इस शहर की खाक में सुबहो शाम
किसी गुमनाम की तलाश करते हो।
तुमको देखा नहीं कभी काम पर मैंने
तुम शायद काम कोई खास करते हो।
वफा की उम्मीदें, वो भी दोस्तों से
किस जमाने की बात करते हो।
ज़िन्दों से नहीं, मुर्दों को पूछिये
क्या तुम भी अहसास करते हो।
(दो)
मैं तैयार हूँ यूं भी साथ चलने को
तुम ज़िद न करो राह बदलने को।
ग़मों का वास्ता मत दे, छलिया कोई
हर मोड़ पे बैठा है प्यार छलने को।
गिरना फ़ितरत ही थी तो क्या करिये
यूं तो मौके बहुत मिले संभलने को।
दिन के उजालों को देखकर मत डर
वक़्त बहुत है अभी साँझ ढलने को।
अंधेरों की फ़िक्र को छोड़ दे ‘बेचैन’
दिल पड़ा है अभी बहुत जलने को।
(तीन)
मैं परेशां, तू परेशां, दिख रहे हैं सब परेशां
सब्र है किस जिगर में, सब परेशां हैं यहाँ।
मर रहे बेमौत हर दिन, मौत की क्या पूछ है
बन गया है अर्थियों का कफ़स अब ये जहां।
किसको फुरसत है कुछ तदबीर कोई सोच ले
हर बसर दामे-वफा में फंस रखा है यहाँ।
खामोश हैं लब, जिस्म संग से जड़ चुके हैं
दिन-व-दिन पेशे-नजर हयात होती उर्रियाँ।
‘बेचैन’ सब हैं बेखबर कब कयामत आ ढले
ढेर पर बारूद के, टिक रखा हर आशियाँ।
(चार)
यहाँ खुदा से नहीं, बंदों से डरिये लोगों
वेवजह न किसी के हाथों, मरिये लोगों।
कौन, कब, किसको, किस घड़ी कर दे विदा
अपनों से गले मिलकर सड़कों पे उतरिये लोगो।
माना कि जगह न थी तुम्हारे घर में, लेकिन
मेहमान को इस तरह न बेदखल करिये लोगों।
आज माझी की नीयत कुछ खराब लगती है
नाव डूबती है मंझधार में खुद तरिये लोगों।
चैन आराम पसंद नहीं फिक्र नहीं जान की
नींद अपनी खोइये, तिजोरियां भरिये लोगों।
बेचैन कण्डियाल
देहरादून, उत्तराखंड
मोबाइल – +91 94105 25099
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