वरिष्ठ साहित्यकार एवं रंगकर्मी केवल सूद की सद्य प्रकाशित पुस्तक “केवल सूद की चर्चित कहानियां” और सूद जी पर केंद्रित बरनाला अंतरराष्ट्रीय अंक “कालका मेल” का लोकार्पण समारोह  विद्यानगरी, मुंबई विश्वविद्यालय, कालिना, स्थित जे.पी. नाईक भवन सभागार में बड़े ही उत्साह पूर्ण वातावरण में ‘शोधावरी’ एवं ‘श्रुति संवाद’ के संयुक्त तत्वावधान में सम्पन्न हुआ। साथ ही “केवल सूद-व्यक्तित्व एवं कृतित्व” पर सारगर्भित चर्चा भी हुई जिसमें 12 रचना कर्मियों ने सूद जी के विविध पहलूओं पर और उनके पुस्तकों की चर्चा की। अंतरराष्ट्रीय ख्याति के कलाकार सैय्यद साहिल ‘आगा’ ने दास्तानगोई के तहत बेहतरीन अंदाज में कुछ कहानियां प्रस्तुत की जिसकी श्रोताओं ने काफी सराहना की। 
समारोह की अध्यक्षता भू-मित्र के सम्पादक एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ. रंजन जैदी ने की। बतौर प्रमुख अतिथि पत्रकार ईश्वर भट्टी, दास्तानगोई फेम सैय्यद साहिल ‘आगा’ उपस्थित थे और उन्होंने भी अपने विचार व्यक्त किए। अन्य मान्यवरों में वरिष्ठ कहानीकार, पत्रकार हरीश पाठक, थिएटर अकादमी के प्रो. डॉ. मंगेश बनसोड, साहित्यकार डॉ. अवधेश राय, डॉ.कृष्ण कुमार मिश्र, लीना जैदी आदि उपस्थित थे। प्रस्तावना प्रो. डॉ. हूबनाथ पांडे और सूत्र संचालन तथा आभार डॉ. रमेश यादव ने किया। प्रारम्भ में कुसुम तिवारी ने सुरीले अंदाज में सरस्वती वंदना प्रस्तुत करते हुए समां बाँध दिया। 
केवल सूद द्वारा की गई दिल्ली से कन्याकुमारी तक की ‘रंग यात्रा’ को 25 वर्ष पूरे होने के उपलक्ष्य में जोरदार करतल ध्वनि से श्रोताओं ने उनका स्वागत एवं अभिनंदन किया। सूद जी पर आधारित लेखों का पाठ क्रमशः शोभा स्वप्निल, प्रतिमा प्रीतम, नीलिमा पांडे, आभा दवे, उषा साहू, रोहित, कुसुम तिवारी ने किया। इसमें कालका मेल के सम्पादक जनार्दन मिश्र, वरिष्ठ साहित्यकार विभांशु दिव्याल, डॉ. हरीश नवल, डॉ.श्याम सिंह ‘शशि’, लालित्य ललित, डॉ. दिविक रमेश, डॉ. प्रेम जनमेजय, डॉ. रंजन जैदी, विनोद अनिकेत आदि के लेखों का समावेश था।  
आयोजन के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए 87 वर्षीय केवल सूद और चर्चित उपन्यास ‘मुर्गीखाना’ के लेखक ने कहा कि जिस मुंबई शहर से निराश होकर मैं दिल्ली चला गया उसी शहर में मेरा स्वागत-सत्कार हो रहा है इसे देखकर मैं बड़ा भावुक हो रहा हूँ। दरअसल इस शहर में मैं फिल्म इंडस्ट्री में किस्मत आजमाने आया था मगर असफलता के बाद लेखक बन गया।  समारोह के अध्यक्ष डॉ. रंजन जैदी ने कहा कि निरंतर प्रयास करते रहना सूद का स्थायी भाव है इसलिए मान-सम्मान की चिंता न करते हुए वे लगातार हिंदी, पंजाबी, अंग्रेजी में समांतर लिखते रहे और थिएटर से जुड़े रहे। डॉ. हूबनाथ पांडे ने कहा कि आज हम केवल सूद पर कार्यक्रम नहीं कर रहे बल्कि उनकी दीर्घ रचना यात्रा के प्रति कृतज्ञता व्यक्त कर रहे हैं। साहित्यकार हरीश पाठक ने कहा कि ‘मुर्गीखाना’ समय से पहले लिखा गया समलैंगिकता पर आधारित वो उपन्यास है जिसके कुछ अंश अमृता प्रीतम ने पंजाबी की पत्रिका ‘नागमणि’ में प्रकाशित किया। डॉ. रमेश यादव ने कहा कि सूद जी ने हमेशा धारा से हटकर लिखने का प्रयास किया इसलिए चर्चा के पात्र बने रहे। उनकी दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हैं। कुछ कहानियों का देशी – विदेशी भाषाओं में अनुवाद भी हुआ है।          

1 टिप्पणी

  1. आदरणीय केवल सूद जी को बहुत-बहुत बधाइयाँ एवं शुभकामनाएँ।
    पढ़वाने के लिए पुरवाई का आभार।

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