राजनारायण बोहरे की कलम से 'कोई खुशबू उदास करती है' की समीक्षा 5
पुस्तक-कोई खुशबू उदास करती है (कहानी संग्रह), लेखिका-नीलिमा शर्मा
प्रकाशक-शिवना प्रकाशन सीहोर, पृष्ठ-144, मूल्य-150₹
नीलिमा शर्मा एक लंबे अरसे से कहानियां लिख रही हैं और उनकी लिखी कहानियों के आधार पर पाठकों में उनकी ऐसी छवि बनी हैं कि वे एक परिपक्व और सशक्त कथाकर हैं।  उनके द्वारा लिखी गई कहानियां विभिन्न पत्रिकाओं, फेसबुक, मातृभारती सहित सोशल मीडिया और इंटरनेट पत्रिकाओं में प्रायः पढ़ने को मिल जाती हैं । कुछ अन्य लेखिकाओं के साथ साझा रूप से लिखे हुए उनके उपन्यास ने भी पाठकों को आश्वस्त किया है। अपना पहला कथा संग्रह “कोई खुशबू उदास करती है” लेकर नीलिमा शर्मा पिछले दिनोंहिन्दी कथा साहित्य के पाठकों के समक्ष आए हैं,  जिसे शिवना प्रकाशन ने प्रकाशित किया है । इस संग्रह  में लेखिका की ग्यारह कहानियां सम्मिलित हैं, इन ग्यारह कहानियों के विषय अलग-अलग हैं तो उनकी शैली भी जुदा-जुदा है।
इन कहानियों में शीर्षक कहानी “कोई खुशबू उदास करती है”  के कथानक में  इशिता अपनी मौसेरी बहन की शादी में दूल्हे के भाई अभिनव को दिल दे बैठी है, जबकि अभिनव तो पहले से अपनी एक क्लास फेलो से प्यार करता है। एन शादी के कुछ दिनों पहले यह रहस्य खुलता  है तो इसका के पिता इस ताकि मौसेरी बहन के परिवार से बड़े तंज में रिश्ता तोड़ देते हैं और अपने एक दोस्त के बेटे से बेटी इशिता की शादी कर लेते हैं। बरसों बाद जब   इशिता  का बेटा और बेटी बाहर पढ़ रहे हैं , इशिता अपनी छोटी बेटी को डेंगू होने पर उसकी देखरेख के वास्ते अस्पताल में लगीहै तब उसे अचानक रेनू नाम की एक महिला नाम लेकर बुलाती है तो वह चौकती है। रेणु पूछती है कि क्या वह शेखर को जानती है? तो प्रथम दृष्टया इशिता  को याद नहीं रहता फिर बाद में उसे पता लगता है कि शेखर इसी अस्पताल में लाइलाज रोग कैंसर के कारण भर्ती है और वह चंद दिनों का मेहमान है ।कुछ घंटों के लिए शेखर की देखभाल का जिम्मा सौंप कर गई रेनू जल्दी ही लौट आती है क्योंकि शेखर की हालत खराब है। शेखर को आईसीयू में शिफ्ट करती रेनू एक डायरी इशिता  को दे जाती है जिसमें शेखर की तरफ से  इशिता  के प्रति आकर्षण का जिक्र करते हुए  इशिता  की  मौसेरी बहन की शादी से लेकर वर्तमान तक के अपने उद्गार व्यक्त करता हुआ मिलता है । शेखर के देहावसान के बाद उसके घर जाकर रेनू के पास एक खास दोस्त की तरह बैठी इशिता को दुःख व्यक्त करने आया अभिनव दिखाई देता है तो वह गुस्से में मुंह फेर लेती है ।
इस कहानी में लोक संस्कृति और लोकगीतों व ब्याह के रीति रिवाजों का अच्छा वर्णन है ।दूल्हा जब मंडप में प्रवेश करता है तो सालियां उसके प्रवेश के पहले उसे रोक लेती हैं और अपना नेग मानती हैं । इस अवसर की तकरार बहुत शानदार है , जहां बारातियों की तरफ से शामिल युवक ” एक पर एक फ्री” का नारा उछालते हैं तो दुल्हन की बहनें और सहेलियां कहती हैं “हुक्के पे हुक्का दूल्हे का भाई  भुक्खा “आ! इस कहानी में पंजाबी लोकगीत के एक एक अंतरे कहानी को गहराई प्रदान करते हैं। शेखर द्वारा अपने मोबाइल में सेव किए गए पत्नी के लिए “माय वाइफ” और प्रेमीका इशिता  के लिए “माय लाइफ” जैसे सम्बोधन पाठक को प्रभावित करते हैं। लेखिका ने एलिजाबेथ परफ्यूम और बलबगरी  सेंट जैसे ब्रांड नेम  ब्रांड नेम कहानी में प्रयोग किए हैं।
    एक कहानी “टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी” अपने तरह की अलग कहानी है । इसमें कोरोना है, क्वॉरेंटाइन पीरियड है तो घर में काम करने वाली एक किशोरी नौकरानी के अपने उच्छ्वा हैं, अपनी कल्पनाएं हैं और अपनी छिपी हुई मस्ती भी है । उर्वशी  दुबई से भारत एयरपोर्ट पर वापस आई है, पर कोरोना के चलते उसे क्वारंटाइन पीरियड में  चौदह दिन के लिए एक होटल में ठहरा दिया जाता है। वह बड़ी चिंतित है और अपनी नौकरानी नसीम से कहती है कि वह निडर रहते हुए अकेली ही घर में रहे, घर की साफ सफाई और खुद के लिए खाना बनाती रहे। एक दिन वह उर्वशी के बाथरूम को प्रयोग करते समय अचानक उर्वशी के  सुकोमल मुलायम और आकर्षक अंतर्वस्त्र देखकर खुद को रोक नहीं पाती और पहन लेती है। वह खुद को बड़ा हल्का और कुछ अलग सा महसूस करती है। बाद में वह उर्वशी के कपड़े भी वह पहन लेती है । उधर उर्वशी मन बहलाने के लिए जब वाई फाई से जुड़े अपने घर के सीसीटीवी कैमरे देखती है तो पाती है  कि नैस इन दिनों बहुत खुश है, वह उसके सारे कपड़े एक-एक कर प्रयोग कर चुकी है । घर लौट कर उर्वशी अपने आप को मृत्यु के द्वार से वापस आया हुआ जानकर मन के सारे गुस्सा , नफरत और क्षोभ के भाव त्याग देती है। नसीम से कहती है तो बोलो इन कपड़ों में तुम्हें क्या पसंद है , जो पसंद हो वह ले लो । नसीम हतवाक है, वह मांगना तो यह चाहती है कि दीदी फिर क्वॉरेंटाइन में चली जाएं ! कहानी यहां समाप्त हो जाती है।
इस कहानी की भाषा पर लेखिका ने खास तौर पर ध्यान दिया है । इसमें जगह-जगह मेडिकल शब्दावली प्रयोग की गई है।  मनोवैज्ञानिक रूप से उचित होने योग्य  एक किशोरी की चाहत को शब्द दिए गए हैं । ऐसी विपन्न किशोरी, जिसको कि अपनी मर्जी के अंतर्वस्त्र भी पहनने को नहीं मिलते , बल्कि मोटे और कड़क वस्त्र पहनने पर मजबूर होती है।  लेखिका ने “सलाद विद ऑलिव वेडिंग” के शब्द को प्रयोग किया है तो लोक संस्कृति के गीतों के रूप में “वे तू लॉन्ग वे मैं लाची …तेरे पीछे  आ गवाची ” (पृष्ठ 21) गीत गाते हुए नसरीन को  नाचते हुए दिखाया है  वहीं “लब पे आए हैं दुआ तमन्ना बनके तेरी” और “लगदी लाहौर की ” “डीजे वाले बाबू मेरा गाना  बजा दो ” (पृष्ठ 21) जैसे गीत युवाओं के मन में पलते संगीत के प्रति प्रेम और नृत्य को उत्सुक शरीर की संभावित प्रकृति प्रकट करते हैं।
इस कहानी में केवल दो पात्र हैं उर्वशी और नसरीन। नसरीन जो एक अनाथ लड़की थी और चाचा के पास रहती थी , वहां से चाचा के बेटे की नियत खराब होने के कारण दिल्ली भेज दी गई है और वह उर्वशी के यहां होममेड का काम करती है ।  नसरीन खुद पर जब ध्यान देती है तो महसूस करती है कि वह मलाईका अरोरा और माहिरा खान से न तो कम सुंदर है , न कम गोरी है , न कम आर्टिस्ट है। लेखिका समकालीन फिल्म स्टारों और उन फिल्म स्टारों की छवियों का भरपूर प्रयोग करते हुए अपने पात्रों और कथानक की समकालीनता को अनायास प्रकट करती हैं तो “मुन्नी बदनाम हुई “गाना गाते समय मलाईका अरोरा से  भी “ज्यादा मटकती हुई कमर” की बात करना यह दर्शाता है कि नसरीन भले होममेड हो पर उसके जीवन में अभिनेत्रियां और मीडिया की बड़ी स्टार मन मस्तिष्क में असर करती है ।
कहानी “कोई रिश्ता ना होगा तब” एक ऐसी मां सुमन की कहानी है, जिसके गर्भ में लड़की के रूप में दूसरी बेटी पल रही है । वह बार-बार सपनों में जाकर भयभीत होती है। आज वह अपने पति का इंतजार कर रही है। सुमन एक स्कूल टीचर है, उसकी एक संतान रुचि पहले से है,  पति और सास की जिद के कारण गर्भस्थ भ्रूण की जांच की करा चुकी है, पता लग चुका है कि उसकी बच्ची ही गर्भ में है, सास और पति की जिद है कि गर्भपात करा दिया जाए।
सुमन थकी हुई होती है लेकिन पति समागम के लिए उद्यत है, तब वह कहती है, “हां हां! तुम नोचो इसी तरह देह को, तुम्हारे मनोरंजन का साधन ही तो हैं हम। तुम थके हो तो तुम को स्त्री शरीर  चाहिए। तुम खुश हो तो तुम को स्त्री    चाहिए। तुम हर परिस्थिति में एक देह में अपना सारा पुरुषत्व निचोड़कर खुद को विजेता समझते हो।” (पृष्ठ 35) भाषा की दृष्टि से ऐसे वाक्य लेखिका की भाषाई मेहनत को प्रकट करते हैं। अपने सन्देश को संकेत से कहने हेतु बहुत सारी नई जिंगल और नए तरीके पाठकों को देखने को मिलते हैं। जब सुमन को अपने पति को यह संदेश देना है कि वह गर्भवती है तो वह बार्बी डॉल के पेट में रुई बांधकर ऊपर से उसकी कुर्ती को फैलाकर गर्भवती की तरह बनाकर उसे लिटा देती है ।  एक जिंगल भी  है । सुमन एक कार्ड पर लिखती है “काली रेल काली रेल वो तो काली काली है, राजीव आप पापा और आपकी सुम्मी मां बनने वाली है”।
पहाड़ों का स्थानीय सौन्दर्य, पहाड़ी मौसम और वातावरण का लेखिका ने बहुत सशक्त चित्रण किया है । इस कहानी में व्हाट्सएप पर प्रायः प आने वाले संदेशों  से झुंझलाहट  बताई गई है ,जो आज हर दूसरे व्यक्ति के मन में अनावश्यक संदेशों को देखकर होती है । “भोजन माता” का नया शब्द पाठक को सुनने को मिलता है । पहाड़ों में भोजन माता का अर्थ होता है मिड डे मील बनाने वाली कर्मचारी। पहाड़ी लोगों ने बड़ा पवित्र नाम  दिया है इस पवित्र कर्मचारी के लिए। अपने देश, काल और वातावरण से पाठक को जोड़ती हुई यह कहानी  स्त्री भ्रूण से गुस्सा होकर उसे गिरवा देने वाले पुरुषों और स्त्रियों की भी कहानी है ,तो सुमन जैसी उस  निश्चयशील  स्त्री की भी कहानी है जो यह तय करती है कि अगर राजीव और उसकी मां नहीं माने, तो वह पहाड़ों में रहने वाली बूढ़ी मां से ऐसी जड़ी बूटी लेकर खा लेगी इसके बाद कोई स्त्री की कोख बंजर हो जाती है,जिससे  आगे न वह बेटा जन सके, न बेटी। यह कहानी पाठक को भीतर तक प्रभावित करती है  ।
एक कहानी है “अंतिम यात्रा या अंतर यात्रा ” । इस कहानी में लोकगीत खूब आए हैं । नैरेटर जब शारदा को किसी ब्याह में गया हुआ देखता था तो छुपकर सुनता था कि वह अपने प्रति अत्याचार  के खिलाफ गीतों में तो कुछ कहेगी, लेकिन वह गाती है-
“चन किथहा गुजारी हई रात वे, मेरा जी दलीला दे बात वे…असां  बनायिया मेंडिया वे माही किसी बहाने देख भला।”(पृष्ठ 90) यह तो एक नायिका द्वारा अपने नायक के इंतजार का संगीत है । शारदा के गम में दुःखी बच्ची पिता से कहती है “पापा मम्मी को रोक लेना मत जाने देना !”(पृष्ठ 86) अपनी पत्नी पर हुए अत्याचार को जिक्र करता हुआ , याद करता हुआ नैरेटर कहता है “मेरी मां, बहन और भाई भाभियां जब चाहे उसे कुछ भी कह देते। यहां तक कि बहू में बेटे भी उसको बहुत कुछ सुना जाते थे। मैं उसको यही कहता गलती होगी कोई तुम्हारी तभी कहा गया ना… कम तो तुम भी नहीं हो। ( पृष्ठ 87) यह संवाद हमारे समाज के हर पुरुष द्वारा अपनी सीधी और घर संभालने वाली  पत्नी को अवश्य ही सुनाया जाता है , जबकि नैरेटर के घर की हालत यह थी कि ” बच्चे क्या पढ़ेगे ?  कौन रिश्तेदार बना रहेगा? किसके साथ रिश्ता तोड़ देना है ?यह सब नहीं तो निश्चित करता रहा। (पृष्ठ 87)  पति पत्नी के बीच के मनोवैज्ञानिक रिश्ते को प्रकट करती यह अनुभूति कितनी सशक्त है कि पति के मन में आई हर छोटी बड़ी इच्छा पत्नी पहले ही जान जाती थी । इस कहानी में भी पंजाबी लोक संस्कृति और नेग-जोग  का उल्लेख आया है। ‘नान छक’  एक रस्म आई है, इस रस्म में मायके से बेटी के घर सामान आता है, तो ब्याह में लोक गीत गाए गए हैं स्वांग रचे गए हैं । ऐसे में स्त्रियां अपनी दबी हुई इच्छा, गुस्सा और हंसी, खेल प्रकट करती हैं।
कहानी “मायका” की बात करें तो इस कहानी के संवाद कम हैं, लेकिन खूब ताकतवर है । वातावरण सर्दी के दिनों का है, जब लोग धूप में बैठते हैं या रजाइयों में भीतर पड़े रहते हैं। दिसंबर का पहला हफ्ता था बाहर कोहरे के साथ शीतलहर चल रही थी (पृष्ठ- 68 )बाहर कोहरा घना होता जा रहा था (पृष्ठ 80)जब किसी महिला के मन की बात जानना हो तो उसको बहुत ही अपनेपन का एहसास देना होता है यह मनोविज्ञान कहानी की पात्र निशा जानती है, स्त्री के इस मनोविज्ञान को लेखिका ने बहुत ही कलात्मक तरीके से लिखा है-  निशा ने तिल  का तेल गुनगुना गर्म किया और दीदी के पास जाकर बोली “दीदी आपके बालों की चमक खत्म हो रही है,उठकर आइए न नारियल  तेल लगा देती हूँ।(पृष्ठ 80)  हालांकि एक विशिष्ट बात पाठक की नजर में यहां आती है कि निशा तिल का तेल गर्म कर रही है और रेखा से कह रही है कि आइए नारियल का तेल लगा देते हैं तो आखिर तेल कौन सा लगाया जा रहा है ?इस कहानी में खास तौर पर मायके  की ओर पाठक का ध्यान जाता है। समाज का सत्य है कि मायका एक तरफ बेटी को ससुराल में इज्जत दिलाता है वही विपत्ति में आशा भी देता है। मां बाप के बूढ़े होते ही भैया भाभी इतना ध्यान नहीं देते वही पिता की संपत्ति में हिस्से की बात करना हमारे समाज में अभी प्रचलन में नहीं आया है।
 कहानी “मन का कोना” एक युवती की आत्मकथा जैसी है। नैरेटर एक लड़की है जो अपने भ्रूण में आने पर समाज में हुई प्रतिक्रियाओं घर की प्रतिक्रियाओं से लेकर खुद के जन्म छोटे भाई के जन्म और युवा होने, तक की बातें याद करती है। पहला गर्भ ठहरते ही (इस युवती  के गर्भ  में आते ही) बेटा के रूप में  पैदा होने की कामना से मां को नारियल की मीगिया खिलाई जाती है , भभूत  दी जाती है, गंडा बांधा जाता है और ऐसे तमाम टोने टोटके किए जाते हैं। लेकिन जब लड़की का जन्म होता है तो मां को छोड़कर सब इसे नॉर्मल ही लेते हैं।  अगले साल फिर से गर्भ ठहर जाता है, फिर से वही सारे टोटके आजमा जाते हैं लेकिन इस बार लड़का हो जाता है ।सब कहते हैं काका आ गया। काके के आने के साथ पहली लड़की यानी सुर को धीरे धीरे कम महत्व दिया जाने लगता है। ननिहाल जाने से लेकर कपड़े खिलौने खरीदने तक काके का ध्यान रखा जाता है । सुर मन ही मन इस बदले हुए बर्ताव पर गुस्सा होती है और जब विवाहयोग्य होती है और उसके रिश्ते के लिए लड़का देखा जाने लगता है तो वह तय करती है कि “अब मेरी जिंदगी में एक और लड़का नहीं जो मुझ पर हुकूमत करें । विवाह और संतान के बिना भी एक स्त्री का अस्तित्व होता है मुझे अपने पैरों पर खड़ा होना है। यह जिंदगी मेरी है और मैं… बस अपने तरीके से जियूँगी… हमेशा हमेशा के लिए। (प्रष्ठ 117) इस कहानी के मुख्य पात्रों में नैरेटर सुर है जो उन  लड़कियों की प्रतीक है जो अनचाहे ही मां-बाप के यहां जन्म ले चुकी है,। निम्मो बुआ है जिसे ससुराल से निष्कासित कर दिया गया है और वही सुर को संभालती है। मम्मा है जो लड़की के जन्म पर नाराज होती हैं, जबकि सारा परिवार इस बात को बहुत नारमली लेता है । पापा, दादी, दादा सब खुश हैं कि लड़की है, लेकिन लड़के के जन्म के बाद उन सब के बर्ताव बदल जाते हैं और काके ना होते हुए भी ऐसा चरित्र  है जो पुरुष बालक का प्रतीक है जिसके आते ही लड़कियों से हाथ में दोभांत होने लगती है ।
इस कहानी के संवाद बड़े अच्छे बन पड़े हैं । सहज रूप से भाभियाँ अपनी ननदो को ताना मारती है, इसमें सुर की मामी कहती हैं “क्या आप मां और बेटियों के घर बेटे के जन्म का रिवाज ही नहीं है ।(पृष्ठ 114) वह यह भी बोलती है, “संतोष अगर इसी तरह तुम सब बहने लड़कियां पैदा करती रही तो तुम्हारा एकलौता भाई तो इनकी शादी पर सड़क पर कटोरा लेकर बैठ जाएगा। हमारे बस का नहीं है इनके ब्याह में छक (भात) लेकर आना।” (पृष्ठ 114) इससे प्रतीत होता है कि जब बहन बेटियों के घर शादी में होती हैं तो मामा के लिए खर्चीला क्षण होता है, वह अपनी हैसियत को देखे बिना जाने बिना छक ले कर आता है और ना देने पर समाज उसे शर्मिंदा करता है। इस कारण मायके की  महिलाएं जो इस विषय में पहले से चेतन रहती हैं, वे इस तरह के उलहाने भी मारती है। सुर खुद के लिए बड़ा शानदार चिंतन करती है-  मैं वो रानी हो गई थी जो देश पर राज करने के बाद निर्वासन भोग रही थी ।(पृष्ठ  116) यह संवाद  बड़ा प्रभावशाली बन गया है अपनी तुलना रानी हो जाने के बाद निर्वासन भोगने वाली उस स्त्री की तरह कल्पना करती है जोकि काके के जन्म के बाद  निर्वासन जैसा ही भोग रही थी।  इस कहानी की खासियत यह है कि इसमें पता चलता है कि गर्भवती स्त्री को कैसे कैसे टोने-टोटके करवाए जाते हैं जिससे लड़का हो, तो इस प्रथा का भी पता लगता है कि बच्चे के जन्म के बाद उसे पहली घुट्टी देना भी एक नेग होता है जिसे प्रायः बुआ देती हैं। बदलते समाज में अब पिता माता दादा-दादी या कोई और ऐसा व्यक्ति भी घुट्टी पहली घुट्टी दे सकता है जो अपने जैसा बच्चे को बनाना चाहता है । निम्मो बुआ को लड़की होने के कारण पहली रोटी देने से रोक दिया गया है । तो बच्चे के जन्म के बाद मामा और मामी पंजीरी देने आते हैं। भांजी की शादी में मामा छक देता है, ऐसे तमाम नेग-जोग  रीति -रिवाज संस्कृति के प्रतीक के रूप में इस कहानी में आए हैं ।
एक कहानी है “उधार प्रेम की कैसी है” जो संग्रह की अंतिम कहानी है। इसका कथानक प्रेम में डूबा हुआ है। शुरू से आखिर तक प्रेम ही प्रेम इस कहानी में छाया हुआ है। शीरीं जो कहानी  की नायिका है वह  हर उस स्त्री की तरह है जिसे पहला प्रेम हमेशा याद रहता है ।  अन्य पात्रों में सबा, नानी अम्मा ,नाना,मामा हैं तो नूर फहीम की बीवी है वे महत्वपूर्ण नहीं है। शीरीं आम भारतीय स्त्रियों की प्रतिनिधि है ,जो अपने दिल की अनुभूतियों को प्रकट नहीं कर पाती और पिता के तय किए लड़के से ब्याही जाकर जीवन बिता देती हैं। उसके मन की भीतरी परतों में अपने प्रेमी के प्रति चाहत अभी भी जिंदा है   वह फहीम को रुमाल का  सेट खरीदती  है । इस कहानी में यह तथ्य पूरी ताकत से आया है कि विवाह और संतान हो जाने के बाद भी स्त्री ताउम्र अपने प्यार और प्रेमी से प्यार करती ही रहती है और दबे ढंग से उस प्यार को प्रकट भी करती है। हालांकि वह दैहिक रूप से  कुछ नहीं चाहती क्योंकि अब ना वह उम्र है और ना समाज के अनुकूल यह उचित होगा। इस कहानी में यह तस्वीर तथ्य भी आया है कि भारतीयों के दुबई में बसे बच्चे आज भी भारत आकर पढ़ना चाहते हैं ,शायद इसके पीछे कारण यह है जैसा कि सबा कहती है वह भारत में अपने सिंगिंग के फैशन को पूरा कर लेगी ,यानी कि अरब देशों में अभी भी गाने या संगीत पर उतना खुलापन नहीं है।  इस कहानी में पंजाबी लोक संस्कृति और लोक गीत पूरी क्षमता के साथ विद्यमान है।
“जेबा गिद्दा डालती लड़कियों के साथ खुश थी।( पृष्ठ 132)
 कहानी की शुरुआत में ही शीरीं को यह गीत याद आता है –
“साडा चिड़ियां दा चंबा वे बाबल अस्सा उड़ जाना,साड़ी लम्बी उड़ारी वे अस्सा तेरे बेड़े नहियो आना।” (&&133)
शीरीं को याद आता है कि नानी गाती थी-
हीर आखदी वे जोगिया झूठ बोले
वे कौन रूठड़े यार मनावंदा ई
वे ऐसा  कोई ना मिलिया भी मैं ढूंढ थकी हां.. (प्रश्न 133)
पंजाबी और उर्दू के कुछ और शब्द मम्मी और मुमानी , सब्जी सालन, परांदा, फुलकारी, अफसुर्दा ,पंगे पैना, अज़ीयत ऐसे शब्द हैं जो पढ़ते समय पहले तो अजनबी और कठिन से लगते हैं , लेकिन  जब संदर्भों के साथ पढ़े जाते हैं तो अपना अर्थ प्रकट कर देते हैं ।  समाज के बहुत सारे प्रचलित काम काज और वाक्य सहज रूप से इस कहानी में आए हैं जो पाठक को खूब मजा देते हैं। टप्पे और बोलियां पाने के साथ गिद्दा पानी में मम्मी और मुमानी का भी कोई जोड़ ही नहीं था ।(प्रष्ठ 135)
पात्रों को जीवन्त करने के वास्ते इस कहानी में शीरीं को खूबसूरत बताने के लिए लेखिका ने इस तरह के शिल्प का प्रयोग किया है जो उनकी सराहना करने के लिए विवश करता है। शीरीं सबा में खुद को देखती है, वही रूप रंग वह दर्पण में सबा को देखते हुए पाती है कि- सफेद संगमरमर सी रंगत, मुलायम त्वचा, गुलाबी होंठ, पतली सी सुतवां  नाक, नुकीली सी ठुड्डी, लंबी गर्दन और दूबला शरीर।(पृष्ठ137) यह शीरीं की हमशक्ल सबा का रूप है यानी शीरीं भी ऐसी ही थी। खूबसूरत पंजाबी स्त्रियों की सुंदरता को बताती लेखिका  समकालीन  युवतियो के रोल मॉडल की चर्चा करना भी नहीं भूलती , वह शीरीं  को माधुरी दीक्षित जैसी बताती है (पृष्ठ 138)शुरू से आखिर तक प्यार में डूबी यह कहानी क्लासिक किस्सों की याद दिलाती है। अंतिम दृश्य पड़ा प्रभावी बन पड़ा है , जहां फहीम का हाथ चूमती हुई शीरीं अपने आंसू भी उस जगह गिराती है और फहीम भी उस जगह को चूम कर भारतीय पुरातन फिल्मों  के प्रणय दृश्य  याद दिला देती है, जहां फ़िल्म निर्देशक नायक नायिका के आज के लंबे किसिंग एयर हग दृश्य की जगह प्रकारान्तर  से किस या आलिंगन के दृश्य दिखाते थे। दिल्ली से चंडीगढ़ के मार्ग की विश्वसनीयता  सड़क पर पड़ने  वाले होटल रेस्तरां के नाम लेकर बड़े प्रमाणित रुप से लेखिका ने दी है ,करनाल के पास स्थित ‘हवेली रेस्टोरेंट’है  जहांशीरीं व सबा रुक  कर भोजन करते ने है। जिन लोगों ने करनाल का हवेली रेस्टोरेंट देखा है वह जानते हैं कि एक ऊंचे आकार के हाथी की प्रतिमा इस रेस्टोरेंट के बाहर लगी हुई है और इसके भीतर बड़ा स्वादिष्ट खाना मिलता है ,यहां से परिवार के साथ निकलने वाले लोग यहां रुककर नाश्ता या खाना जरूर लेते हैं ।
संग्रह की अन्य कहानियां उत्सव, इत्ती-सी खुशी,  लम्हों ने खता की, मन का कोना, आखिर तुम हो कौन वगैरह  की कथा  स्त्री और उससे जुड़े दर्द, पीड़ा, भावनाओं और अनुभूतियों को प्रकट करती हैं।इस सँग्रह  में खड़े किए गए चरित्र बड़े विश्वसनीय चरित्र है,वे कल्पित   नहीं लगते, बल्कि हमारे इर्द-गिर्द प्रायः दिखाई देते हैं। चाहे फहीम हो या राजीव, या सुमन,या मैं के पापा हों सारे पुरुष स्त्रियों को अभी भी दोयम दर्जे के रूप में देखते हैं । तो स्त्रियां न केवल संवेदनशील हैं, बल्कि वे सदा ही सहते रहने के बाद अब अपना पक्ष प्रकट करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार हैं ,चाहे खुद को बंजर कर देने का हौसला रखने वाली सुमन हो या टुकड़ा टुकड़ा जिंदगी की नसरीन हो  या फिर मायका की निशा या  मन का कोना की नायिका।  इस सँग्रह की कहानियों में शादी ,ब्याह ,लोक त्योहारों का उल्लेख है, तो गीत भी खूब आए। लेखिका का बैकग्राउंड पंजाब है, इस कारण पंजाबी लोकगीत इसमें बहुलता से आए हैं ,तो शादी ब्याह के समय के पंजाब में प्रचलित  नेग -जोग और रीति-रिवाज भी विस्तार से समयोचित आये हैं , जिन्हें हिंदी का पाठक न केवल आसानी से ग्रहण करता है, बल्कि नए-नए रीति रिवाज से परिचित होकर अपने संस्कृतिज्ञान  को समृद्ध करता है। इस सँग्रह की कथाओं के अधिकांश पात्रों में खिलंदड़ापन है। अपने प्यार को बिछड़ने के बाद वे रोती भी बिसुरती नहीं है , सुमन अपनी दूसरी संतान को गिरवा देने का निर्णय हो जाने के बाद भी रोने वाली  महिला नहीं है बल्कि वह खुद को बंजर कर देने तक का साहस  करती है। इशिता का प्यार खत्म हो जाने के बाद भी अपनी जिंदगी अपने तरीके से जीती है , उर्वशी यह देखने के बाद भी उसके कपड़े उसकी नौकरानी पहन रही है, कोई गुस्सा नहीं होती , उल्टी  खुश होती है, तो अंतिम यात्रा अंतरयात्रा के नायक की बेटियां भी मां की आस्था से दुखी तो हैं लेकिन अपने तरीके से दिनचर्या चला रही हैं । निशा मायके से निराश हो जाने के बाद भी खुद हौसले मंद है, औरों  को भी हौसला देती है।  मन का कोना की सुर भी तमाम अत्याचारों के बाद भी या लड़कियों के प्रति भेदभाव बरतने के बाद भी  कभी भी गुस्सा नहीं होती बल्कि वह मन में निर्णय लेती है कि मैं विवाह ही नहीं करूंगी । इन कहानियों का एक और विशिष्ट पक्ष यह है  कि जब भी पति पत्नी के निजी दृश्यों को दर्शाने का मौका मिलता है,लेखिका ने बेहिचक ऐसे अंतरिम क्षण  दर्शाए हैं, हां ऐसे दृश्यों में कोई अश्लीलता ना होकर श्रृंगार की मादकता और पवित्रता बरकरार रहती है। पंजाबी गीतों की लेखिका को गहरी जानकारी है, तो पंजाबी भाषा पर भी उनका अधिकार है, इसलिए इस संग्रह की हर कहानी में पंजाबियत से भरी हुई हिंदी भाषा है। इस संग्रह में प्रेम में डूबी स्त्रियां हैं , जिनको भले ही व्यवस्था में प्रेम न मिला हो , पर उनके जीवन में कहीं ना कहीं याद  के रूप में प्रेम मौजूद है । लेखिका ने कहानियों के संवाद कथानको के निर्वाह और भाषा पर खासा ध्यान दिया है। समकालीन फिल्मी चरित्रों तैमूर, सैफ, करीना, माधुरी दीक्षित, मलाइका अरोरा, माहिरा खान को भी सहज रूप से अपनी कहानियों में प्रस्तुत करती हैं ,जिनके मार्फत कहानी का न केवल समय निर्धारित होता है ,बल्कि ऐसे फिल्मी चरित्रों के बारे में आम लोगों की धारणा प्रकट होती है।  ऐसे चरित्रों से खुद की तुलना, सुंदरता के पैमाने तय करना, कलात्मकता का अंदाज और कलात्मकता का पैमाना ऐसे चरित्रों से समाज में प्रचलित होता रहा है । इस कारण इस तरह के प्रयोग और उल्लेख कहानियों को प्रमाणित बनाते हैं । व्हाट्सएप पर आते संदेश या मैसेज और सोशल मीडिया का इन कहानियों में उल्लेख, इन्हें आधुनिक युग की कहानियों सिद्ध करता है।
यह कहानियां संग्रह में आने के पहले विभिन्न स्थानों पर पाठकों के समक्ष आ चुकी हैं फिर भी इस संग्रह में शामिल करने के पहले उन्होंने इन पर अच्छा खासा ध्यान दिया है । अतएव और ज्यादा प्रभावशाली व सशक्त हो गयी हैं।

राजनारायण बोहरे की कलम से 'कोई खुशबू उदास करती है' की समीक्षा 6

राजनारायण बोहरे
89 ओल्ड हाउसिंग बोर्ड कॉलोनी
बस स्टेण्ड दतिया 475661

6 टिप्पणी

  1. नीलिमा जी की कहानियाँ वास्तव में मन को छूती हैं l पात्रों के मन के अंदर वो सहज प्रवेश कर लेती हैं और बोली-बानी के सहज प्रयोग से उनके पात्र पन्नों पर जीवंत हो जाते हैं l मैंने भी इस संग्रह को पढ़ा और दिल से सराहा है l आपने एक-एक कहानी पर बहुत विस्तृत टिप्पणी की है l जिससे संग्रह पर विस्तृत दृष्टि उपलब्ध हुई l आप दोनों को हार्दिक बधाई व शुभकामनाएँ l

  2. बहुत अच्छी विस्तृत समीक्षा। मैंने नीलिमा जी की कुछ कहानियाँ पढ़ी हैं। बहुत अच्छा लिखती है। लेखक नीलिमा जी और राजनारायण जी को खूब बधाई व शुभकामनाएं

  3. नीलिमा जी की कहानियाँ औरत के मन के कोनों में झांकते हुए बुनी गई हैं ၊ सभी कहानियाँ आस पास बिखरा हुआ सच बयान करती हैं ၊ हृदय को छूती भी हैं और सोचने को भी विवश करती हैं ၊ न विमर्शों के बोझ तले दबी हैं न उलझाव परोसती हैं ၊ बस अपनी बात हम तक पहुंचाती हुई आगे बढ़ जाती हैं ၊
    नीलिमा जी को इस संग्रह के लिए बधाई और शुभकामनाएँ ၊ समीक्षा बहुत अच्छी लिखी गई है ၊

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