मन के किसी गहरे कोष्ठ में
रची है एक निजी चित्रशाला।
नए-पुराने पोट्रेट टंगे हैं
दीवारों पर –
तैलरंगो से अंकित
कुछ कैनवस
कुछ जलरंगों में नहाये अपने,
और कुछ यूं ही
पेंसिल की नोक से खुदे
किन्ही खास  बिछड़ों के
सुरमई रेखाचित्र। 
यादों की पकड़ से
कहीं दूर जा खड़े
धूमिल हुए कुछ चेहरे
और कुछ
आईने में उभरे प्रतिबिंब से
ठहरे-ठिठके, टिकटिकी लगाए। 
अकेले में कभी बरबस
उतर जाता हूँ
अपने मन की फिसलन भरी
संकरी सीढ़ियाँ
उनसे मिलने।
कदमों की आहट पे
धुँधलाई आँखों के छोर से
मानो घुसपैठिए का आभास पा
अपने मायावी अस्तित्व
को और समेट
मुंह फेर लेते हैं सब
शिकायत सी करते। 
कभी बहुत अपने रहे उन सबसे
बारी-बारी मिलता हूँ
कुछ अपनी कहता;
कुछ उनकी सुनता। 
रूठ-मनुहार की गांठें सुलझा
आगे बता  हूँ
कोई आवाज़ देता है पीछे से
तो कोई अभी भी आँख चुरा
है छिपता।  
जीवन के बिखरे पन्नों से
पश्चाताप के संधर्भ मिटा
मानो अपना इतिहास बदल,
सांकल लगा
अतीत और वर्तमान
के इस संसर्ग से प्रफुल्लित,
तोषण से भरा,
लौट आता हूँ फिर से
अपने इस एकल
अस्तित्व में।
नवंबर 1954 में दिल्ली में जन्मे बिमल सहगल, आई एफ एस (सेवानिवृत्त) ने दिल्ली विश्वविद्यालय से शिक्षा प्राप्त की। अंग्रेजी साहित्य में ऑनर्स के साथ स्नातक होने के बाद, वह विदेश मंत्रालय में मुख्यालय और विदेशों में स्तिथ विभिन्न भारतीय राजदूतवासों में एक राजनयिक के रूप में सेवा करने के लिए शामिल हो गए। ओमान में भारत के उप राजदूत के रूप में सेवानिवृत्त होने के बाद, उन्होंने जुलाई, 2021 तक विदेश मंत्रालय को परामर्श सेवाएं प्रदान करना जारी रखा। कॉलेज के दिनों से ही लेखन के प्रति रुझान होने से, उन्होंने 1973-74 में छात्र संवाददाता के रूप में दिल्ली प्रेस ग्रुप ऑफ पब्लिकेशन्स में शामिल होकर ‘मुक्ता’ नामक पत्रिका में 'विश्वविद्यालयों के प्रांगण से' कॉलम के लिए रिपोर्टिंग की। अखबारों और पत्रिकाओं के साथ लगभग 50 वर्षों के जुड़ाव के साथ, उन्होंने भारत और विदेशों में प्रमुख प्रकाशन गृहों में महत्वपूर्ण योगदान दिया है और भारत व विदेशों में उनकी सैकड़ों रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। अंत में, 2014-17 के दौरान ओमान ऑब्जर्वर अखबार के लिए एक साप्ताहिक कॉलम लिखा। संपर्क - bimalsaigal@hotmail.com

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