अर्चना पैन्यूली की कलम से - यदि हम परिस्थिति नहीं बदल सकते तो अपनी जीवन-दृष्टि बदलें 3
उत्तराखंड माटी की सौंधी सुगंध लिए सुधा जुगरान की कहानियों में देवभूमि उत्तराखंड का आँचलिक सौन्दर्य दृष्टिगोचर होता है। पाठक उत्तराखंड की संस्कृति की विशिष्टता, वहाँ की पहाड़ियों और घाटियों में प्रकृति और जीवन की छटा और उसके श्वेत और स्याह पक्ष से तो रूबरू होते ही हैं, लेखिका की सामाजिक, भौगोलिक और जीवनदृष्टि से भी परिचित होते हैं।  रोजमर्रा की जिन्दगी और सामाजिक सरोकारों से सम्बन्धित उनकी सरलसहज कहानियाँ दिल में छाप छोड़ती हैं। पारिवारिक और सामाजिक मसलों को लेकर चलने वाली कहानियों  में जगजीवन के विविध रंग बिखरे हुए हैं। जीवन के खट्टेमीठे अनुभव, सुखदुख, सामाजिक परम्पराओंविडम्बनाओं का तानाबाना, बदलते समाज के बदलते मूल्यों की कशमकश उनकी कहानियाँ उजागर करती हैं। विशेषकर वे दो पीढ़ियों के बीच के मतभेदों और अन्तर्द्वन्द्व को दर्शाती हैं।
हिंदी साहित्य के विशाल क्षेत्र में स्वयं को स्थापित करती सुधा जुगरान का मुखरित मौनदूसरा कहानी संकलन है। यह संकलन सदियों से दबी, सहमी, घुटी स्त्री के मौन को मुखरित करने का प्रयास है। कहानियों के केन्द्र में स्त्री है। स्त्री के कई विमर्शों को छूती हुई कहानियाँ मुख्यतः स्त्री की पारिवारिकसामाजिक स्थिति की पड़ताल ही नहीं करती बल्कि कुछेक सामाजिककानूनी मुद्दों पर भी अपना दृष्टिकोण रखने की पहल करती हैं। समय के साथ परिस्थितियों और पारिवारिक मूल्यों में जो परिवर्तन आया है, उसमें आम स्त्री स्वयं को कहाँ पर देखती है। उसकी आकांक्षाओंचुनौतियों और उससे परिवार की अपेक्षाओं के बीच उत्पन्न हुई कशमकश को दर्शाती कहानियां पाठक की सोच को सकारात्मक रूप से प्रभावित करती हैं, बदलते परिदृश्य को स्वीकार करने का संदेश देती हैं।
समाज के अनगिनत समूहों में परिवार ही एक ऐसी संस्था है जो प्राथमिक, निश्चित एवं दीर्घकालिक होती है। लेखिका ने परिवार को धुरी बना कर उसके इर्दगिर्द  कहानियाँ लिखी हैं। भारतीय परिवारों में व्याप्त कई उन ज्वलंत मुद्दों को उठाया गया है जो स्त्रियों को प्रभावित करते हैं। संकलन में विविध परिवेशों में जीवन व्यतीत कर रहीं महिलाएँ मौजूद हैं, जिनकी अपनीअपनी समस्याएँ, व्यथाएँ और चाहतें हैं। कारणअकारण स्त्री को लेकर हमारा समाज तंग सोच का रहा है। इसका बहुआयामी प्रभाव उसकी पारिवारिक स्थिति पर पड़ा। अस्तित्व से लेकर वर्चस्व तक की इस लड़ाई में स्त्रियों का अपनाअपना कालखंड है, अपनेअपने मोर्चे हैं और अपनीअपनी उपलब्धियाँ हैं।
लेकिन एक बात जो निस्संकोच कही जा सकती है, वह है कि स्त्री की स्थिति को लेकर हम अभी आश्वस्त नहीं हुए हैं। उसके पारिवारिक, सामाजिक और कानूनी अधिकारों के मुद्दे दूसरों की सदाशयता के मोहताज लगते हैं। उनको अभी अच्छे से परिभाषित किया जाना है। इसी धुँधलेपन को लेखिका ने सरोकारों का रूप दिया और अपनी कहानियों का विषय बनाया। कहानी में समस्या है तो हल भी है, नहीं तो आगे बढ़ कर निकल जाने का दृष्टिकोण है। यही बात संकलन को विशेष बनाती है। जरूरी नहीं है कि हर समस्या का हम कोई त्वरित हल ढूँढ़ ले, हो सकता है कि फिलहाल कुछ सूझ ही रहा हो लेकिन अपनी सोच और नजरिये से बहुतकुछ थाम सकते हैं।
संकलन मेंमेरे अपने में महानगरीय जीवनशैली की विवशताओं और बूढ़ी माँ की देखभाल के दायित्व बोध के बीच फँसे अपने बेटे को चिंतामुक्त करती माँ का जीवनअनुभव है। वह अपने बेटे के साथ मुंबई जाने के लिए मना कर देती है और कहती है कि अभी वह इतनी सक्षम है कि अकेले रह सकती है। यह उस पीढ़ी का जीवन के प्रति विश्वास का भाव दिखाता है जिन्होंने जाने कितने टेढ़ेमेढ़े रास्तों के बीच अपनी राह बनाई है। बुझती आँखों का अधूरा सपनामें बेटी का विवाह करके अपनी जिम्मेदारी से यथाशीघ्र निवृत्त होने वाले  माँबाप की बेटी से शैक्षिक उपाधियाँ हासिल करने की अपेक्षा बीते और नए दौर के संधि स्थल पर झूल रही पीढ़ी का चित्र उपस्थित करती है।एक पाती पिता के नाम में पुत्री का पिता की सम्पत्ति पर समान अधिकार के सुगबुगाते सवाल को उठाया गया है। कहानी की नायिका पिता की वसीयत में अपना नाम देख कर सवाल उठाती है, असहमति व्यक्त करती हैप्रतिवाद करती है। यह कहानी उन भारतीय परिवारों को ललकारती है जो अपने घरों की बेटियोंबहनों को अकारण ही पिता की सम्पत्ति से बेदखल कर देते हैं।  
मंजिल राही दो में गरीब निम्न जाति की, सर्वेंट क्वाटर में पलीबड़ी इंदिरा कैसे आईइएस की परीक्षा उत्तीर्ण करयूथ आइकनबनती है और जिन्दगी में जो मुकाम हासिल करती है, उसका बड़ा सजीव चित्रण है। छोटीछोटी बातों को महत्व दिया है। वस्तुतः वे बातें इतनी छोटी होती नहीं है क्योंकि जो बात सामान्तया छोटी समझ कर हम नजरअंदाज करने की भूल किया करते हैं, वही बातें बाल मनोविज्ञान और समाज के मनोविज्ञान पर गहरा नकारात्मक असर डालती हैं, जैसे हैसियत अलगअलग होने से एक ही स्कूल और कक्षा में पढ़ने के बावजूद विवेक और इंदिरा का अपनेअपने ढंग से स्कूल जाना हमको भले ही कोई खास बात लगती हो लेकिन बच्चों में हीनता और उच्चता की गाँठ बना देती है।
यह संकलन की एक बहुत ही प्रभावशाली कहानी है। आरक्षण का मुद्दा और जातिगत मसला बड़ी शिद्दत से उभरा है। इससे समाज में जो समस्या उत्पन्न हो रही है उसका चित्रण ही नहीं किया, निवारण का विकल्प भी प्रस्तुत है। लेखिका ने यह बात बड़ी सटीक कही कि आरक्षण विद्यार्थियों के लिए बैसाखी है, सीढ़ी नहीं, और युवाओं के मन में जातिगत भावना को बढ़ावा देती है। वहीं यह मुद्दा पिछड़ी जाति के मेधावी छात्रों के लिए उपहास और कटाक्ष का कारण भी बन जाता है। कई वाक्य सीधे हृदय पर प्रहार करते हैं। मेहनती और मेधावी इंदिरा का सहपाठी विवेक उससे कहता है, ‘तुम्हें इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत? आरक्षण के बल पर तुम अपना मुकाम हासिल कर लोगी।आरक्षण एक संवेदनशील सामाजिककानूनी मुद्दा है, इसके कई आयाम हैं। लेखिका ने बड़ी कुशलता से इसके दोनों पक्ष प्रस्तुत किये हैं। जातपात के दायरे से ऊपर उठे आरती और सुरेन्द्र की इंदिरा  के परिवार के प्रति उदारता और उनका प्रगतिशील दृष्टिकोण मन में एक मीठी आस दिलाते हैं। मगर इतने उदार वे भी नहीं बन पाते कि जातपात की सामाजिक बेड़ियों को तोड़ अपने बेटे की शादी इंदिरा से कर दें। यह बात सामाजिक रूढ़ियों की ओर ध्यान खींचती है और सोचने के लिए विवश करती है।  
संकलन की शीर्षक कहानी मुखरित मौन नये अंदाज की संवेदनशील और शिक्षाप्रद कहानी है। कहानी का सार यह है कि समय बदल रहा है, रिश्तों के मापदंड बदल रहे हैं। आवश्यकता है कि पुरानी पीढ़ी नई पीढ़ी के संघर्ष और विचार समझे।क्या कूल है येको इसी की विस्तार कहानी कह सकते हैं, बस थोड़ा हल्के अंदाज में मातापिता अपने बेटेबहू के पास भारत से दुबई घूमने जाते हैं। दुबई की चकाचौंध, भव्यता  और इन्फ्रास्ट्रक्चर से नायिका प्रभावित होती है, साथ ही बेटेबहू की बिंदास जिन्दगी से उसका जीवन के प्रति दृष्टिकोण बदलता है। उसे लगता है कि उनकी पीढ़ी ने नाहक ही कई चिंताएं पाली हुई थी।
सहारे की तलाश कहानी पहले वाक्यआज फिर दिल दिमाग से विद्रोह कर बैठासे ही दिल में उत्सुकता जगा देती है।  इस कहानी के कई वाक्य दिल को झकझोरते हैं। वैभवी के पिता की बीमारी पर उसका पति उसका साथ नहीं देता, किन्तु अपने पिता की अस्वस्थता पर उससे उम्मीद करता है कि वह उसके पिता की सेवा करे वैभवी भी दुविधा  की स्थिति में है एक तरफ उसके मन में आक्रोश फूट रहा है वहजैसे को तैसाउक्ति को चरितार्थ करना चाहती है, किन्तु उसके मन में जगते मानवीय भावों से वह इस नकारात्मकता से बच जाती  है साथ ही, लेखिका  ने इस तथ्य को भी बेबाकी से रखा है कि अधिकार के साथसाथ कर्तव्यों का भी समान वितरण होना न्यायसंगत होगा। 
पिघलते पल तलाकशुदा युगल की कहानी है जो पतिपत्नी के सम्बन्धों की कटुताओं और विद्रूपताओं का चित्रण करती है। इसमें पिसते बच्चों की व्यथा है कहानी का अंत कई भाव जगाता है और और दिल द्रवित हो उठता है। 
कहानी परिवर्तनमें परिवार की हर उम्मीद पर स्वयं को उलझाते हुए गृहिणी का मानसिक तनाव बहुत सही तरह से दिखाया है। अपनी छोटीछोटी खुशियों के लिए परिवार के लोगों की उदासीनता उसके दिल को दुख पहुंचती है। लेकिन जब वह बीमार पड़ती है घर के सभी सदस्य उसकी सेवा में जुट जाते हैं तो उसकी सारी शिकायतें दूर हो जाती हैं। बहुत सुंदर कहानी जिसमें सभी की सकारात्मक सोच नजर आती है। मानवीय गुणोंअवगुणों और सम्बन्धों के भीतर सुगबुगाती क्रियाप्रतिक्रियाओं को सुधा जुगरान सहृदयतापूर्वक प्रस्तुत की क्षमता रखती हैं।  
स्टेपनीकहानी में स्टेपनी एक रूपक है। उस स्त्री का रूपक जो हर जगह और हर परिस्थिति में समर्पण –  कभी जरूरी, कभी गैर जरूरीका मनोविज्ञान ओढ़े है और दोयम दर्जे की हो कर रह जाती है। देवभूमि उत्तराखंड के आँचलिक सौन्दर्य की पृष्ठभूमि में रचितफ्योंली के फूलमें रोजगार की समस्या से जूझती युवाशक्ति के पहाड़ों से पलायन के ज्वलंत मुद्दे को उठाया गया है। साथ ही पति के बाहर चले जाने पर पीछे छूटीं विरहिनों की कोमलकरुण दशा का भी हृदयस्पर्शी चित्रण किया है। कहानी में नायिका जया  जो पेशे से एक अध्यापिका है,का तबादला शहर से पहाड़ी गाँव में होता है वह काफी सालों बाद पहाड़ में रहने आती है उसे पहाड़ बहुत बदले लगते हैं परिवर्तन प्रकति का शाश्वत नियम है, कोई भी स्थल  इससे अछूता नहीं रह सकता ग्रामीण लोगों में  कस्बाईपन गया था सोच में भी बदलाव आया –  कुछ रुचिकर तो कुछ अरुचिकर  पहाड़ी गाँवों के युवा रोजीरोटी के लिए गाँव से पलायन कर दूर शहरों में कमाने निकलते हैं शहरों में कुक, ड्राइवर बने हैं, या फिर  फ़ौज में भर्ती हैं वे युवतियां जो यौवन के उफान पर हैं, गाँव में बिन पति के एकाकी जीवनयापन करने को मजबूर हैं यह बात मन में टीस  उत्पन्न करती है जया उन सुंदर, बेबस लड़कियों की तुलना पहाड़ियों में बसंत ऋतु में खिलने वाले पीले रंग के फ्यूँली के फूलों से करती है।  
संकलन की अन्य कहानियाँ भी, इसी प्रकार भारतीय समाज में स्त्री से जुड़े विभिन्न मुद्दों को लेकर बुनी हुई हैं। हर कहानी कुछ कहती है। लेखिका ने बड़ी स्पष्टता से उन विषयों को अपनी लेखनी की प्राणशक्ति दी है जिन पर विचार की दृष्टि से हमारा परिवार और हमारा समाज बिखरा हुआ है। जिन पर किसी प्रकार की चर्चा से पहले ही इतने अगरमगर लग जाते हैं कि कभी कोई सार्थक बहस नहीं हो पाती, निर्णय की बात तो क्या करें। जितनी स्पष्टता से लेखिका ने विचारबिन्दुओं को सम्मुख रखा है, उतनी ही स्वच्छता से उनका निर्वाह भी किया है। यही कारण है कि सीधीसरल शैली में लिखी कहानियाँ अपना यथोचित प्रभाव छोड़ने का सामर्थ्य रखती हैं। वस्तुतः कहानियों में जो जीवनसत्य है, उसको जाननेसमझने और बताने के लिए किसी आडम्बर की आवश्यकता है भी नहीं। भाषा सरल और प्रभावपूर्ण है। प्रसंगानुसार वक्रोक्ति का प्रहार विषय में प्राण फूँक देता है।
आरक्षण के परिप्रेक्ष्य में नायक की यह उक्तियह बैसाखी है, सीढ़ी नहीं, आरक्षण जैसे सामाजिक मुद्दे पर एक स्वच्छ वार्ता करने के लिए आमंत्रित करती है। कहानी में जातिप्रथा को लेकर समाज की हठधर्मिता की ओर भी संकेत किया है। पुरानी और नई पीढ़ी का अंतर और संघर्ष हर समाज में थोड़ी बहुत मात्रा में सदैव रहता है, मगर भारत में लोग अभी संक्रमण काल में हैं। आधुनिक, प्रगतिशील विचारों को अपनाते हुए भी कई बार अपनी दकियानूसी, पारम्परिक सोच और मान्यताओं से भी चिपके रहते हैं, जिससे संभ्रम की स्थिति उत्पन्न हो जाती है।
कहानियों में भले ही अलगअलग परिवेश में नारी की स्थिति और संघर्षों की कथाव्यथा है, लेकिन जो बात इस विमर्श को विशेष बनाती है, वह है कि परिस्थिति चाहे जो भी हो, लेखिका ने स्त्रियोचित गुणों और मानवीय मूल्यों पर आँच नहीं आने दी, हर कीमत पर इनको सर्वोपरि रखा। यह आग्रह आज के दिशाभ्रम की स्थिति में बहुत मायने रखता है। अधिकतर कहानियों में समस्या है तो समाधान भी है। वास्तव में व्यावहारिक जीवन में समाधान इतने सरल नहीं होते। कहींकहीं समाधान प्रस्तुत करने के फेर में कहानी उपदेशात्मक हो जाती है जो धार को कम कर देती है।                
कुल मिला कर यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि मुखरित मौन में जीवन को अर्थपूर्ण तरीके से जीने का दर्शन है। वास्तव में यह अहम है कि यदि हम परिस्थिति नहीं बदल सकते तो अपनी जीवनदृष्टि बदलें किसी भी घटना से बड़ा होता है जीवन। जीवन की कोई भी अप्रिय घटना जीवन का अवसान नहीं होती लेखिका की सुंदर, सरल, सहज और प्रभावपूर्ण भाषाशैली से कहानी दिल को छूती चली जाती है। अपना अपेक्षित प्रभाव छोड़ती है। सोचने के लिए प्रेरित करती है। 
प्रकाशक: समय साक्ष्य, देहरादून

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.