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डॉ. रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य – सुप्रसिद्ध साहित्यकार सम्मान समारोह

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एक सरकारी शिक्षक कुछ साहित्य-साधना भी करते थे। नहीं-नहीं, बात इतनी-सी नहीं है। दरअसल वे पूर्णकालिक काम तो साहित्य-साधना का ही करते थे, लेकिन तनख्वाह लेते थे सरकारी शिक्षक की। सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के हलके में भी सुप्रसिद्ध साहित्यकार गिने जाते थे। 
उनको सम्मानित करने के लिए दूसरे नगर के कुछ अन्य सुप्रसिद्ध साहित्कारों ने आमंत्रित किया। यह उन सुप्रसिद्ध साहित्यकारों का पारस्परिक अलिखित विधान था। वे एक-दूसरे को आमंत्रित करके सम्मानित करते, अध्यक्षीय भाषण सुनते, अगले समारोह की जगह निर्धारित करते, समारोह के अंत में चाय-समोसे का अल्पाहार ग्रहण करते और सुप्रसिद्ध होने का उत्सव मनाते। 
तो हमारे सुप्रसिद्ध साहित्यकार महोदय ऐसे ही समारोह में सम्मानित होने के लिए अपने नगर से दूसरे नगर जा रहे थे। चूंकि समय कम था, इसलिए रेलगाड़ी में कन्फर्म्ड टिकट नहीं मिल पायी। वैसे भी कुल जमा चार घंटे का सफर। सम्मानित होने का लोभ संवरण न कर पाने के कारण वे राम का नाम लेकर, केवल अपनी सुप्रसिद्धि की पूँजी के दम पर ही चल पड़े। 
ट्रेन में उन्होंने टीसी या टीटी जो भी कहें, उनसे यह कहकर टिप्पस भिड़ाई कि देखिए, हम सुप्रसिद्ध साहित्यकार हैं और हमें सम्मानित करने के लिए आमंत्रित किया गया है। इसलिए आप कृपया हमारी टिकट कन्फर्म कर दीजिए। टीसी ने उनका नाम न सुना था, न पढ़ा था। किन्तु केवल सौजन्यवश उन्हें अपनी बर्थ पर बिठा दिया और खुद टिकटें जाँचने निकल पड़े। घंटे भर बाद टीसी महोदय लौटे और सुप्रसिद्ध साहित्यकार महोदय से मुखातिब हुए- “हाँ, तो आप कह रहे थे कि आप सुप्रसिद्ध हैं। किन्तु हमने तो आपका नाम कभी नहीं सुना।”
“हें-हें-हें… नहीं सुना होगा। बहुत संभव है न सुना हो। दरअसल बात यह है न कि हम साहित्यकारों में सुप्रसिद्ध हैं। जिन लोगों ने हमें आमंत्रित किया है वे सब भी सुप्रसिद्ध लोग हैं। अब आप तो जानते ही हैं कि कोई सुप्रसिद्ध साहित्यकार ही दूसरे सुप्रसिद्ध साहित्यकार को जान-पहचान सकता है… जैसे आप यदि सुप्रसिद्ध टीसी हैं तो दूसरे सुप्रसिद्ध टीसी आपको जानते होंगे… हें-हें..।” टीसी ने बड़े अनमने भाव से उनकी बात सुनी और ऐसे पकाऊ आदमी से अपनी जान छुड़ाने के लिए इधर-उधर से खोजबीन कर एक सीट उन्हें आवंटित कर दी। 
गंतव्य नगर में उतरकर सुप्रसिद्ध महोदय ने एक रिक्शा पकड़ा। उन्होंने क्या पकड़ा, बल्कि रिक्शेवाले ने ही उन्हें पकड़ लिया- “बाबूजी, आइए बाबूजी.. कहाँ चलिएगा बाबूजी?”
सुप्रसिद्ध साहित्यकार को यह ‘बाबूजी’ वाला संबोधन कुछ खास जंचा नहीं। दरअसल अपने घर से निकलते समय से वे लगातार सुप्रसिद्ध साहित्यकार की मनोदशा में ऊभचूभ हो रहे थे। ट्रेन में भी उन्होंने टीसी को अपना यही परिचय दिया था। और यह रिक्शे वाला उन्हें सुप्रसिद्ध साहित्यकार से एक मामूली बाबू बनाए डाल रहा था। खैर.. उन्होंने किसी तरह इस सदमे को झेला और रिक्शे वाले को अपने गंतव्य का नाम बताया। साथ ही यह भी जड़ना नहीं भूले कि वहाँ आज हमारा यानी सुप्रसिद्ध साहित्यकार का सम्मान होना है। 
रिक्शे वाले के पल्ले कुछ नहीं पड़ा। उसे उलझन में देख सुप्रसिद्ध महोदय ने वह निमंत्रण कार्ड निकाला, जिसमें समारोह  का सारा विवरण छपा था। “बाबूजी, अब हम कोई पढ़े-लिखे तो हैं नहीं। इसलिए इस कार्ड में क्या लिखा है, हम क्या जानें!” 
सुप्रसिद्ध महोदय का हृदय क्षोभ से भर गया। उन्होंने सरकार और पूरी व्यवस्था को मन ही मन कोसा कि क्यों नहीं वह देश के सभी लोगों को बढ़िया से पढ़ाने-लिखाने पर ध्यान देती। अचानक उन्हें ध्यान आया कि अरे, मैं खुद भी तो पेशे से शिक्षक हूँ। किन्तु बच्चों को पढ़ाने के बजाय मैं साहित्य रचता रहता हूँ और आज सुप्रसिद्ध साहित्यकार सम्मान समारोह में भाग लेने जा रहा हूँ। ऐसे में बच्चे अनपढ़ रह जाएं तो इसमें उनका क्या दोष? खैर.. किसी तरह रिक्शा पटाकर सुप्रसिद्ध महोदय, समारोह में पहुँचे।
नगर  के बीस-पच्चीस लोग जुटे थे। कुछ छोटे बच्चे और घरेलू महिलाएँ भी। लगभग उतने ही लोग सम्मानित किए जाने के लिए आमंत्रित  थे। सुप्रसिद्ध महोदय ने अपना आसन ग्रहण किया। मंच पर बैनर तना था, जिसपर कुछ प्रायोजकों के लोगो व नाम छपे थे। कार्यक्रम का मुख्य प्रायोजक उस राज्य का संस्कृति व कला मंत्रालय था।
ज़ाहिर-सी बात है, सुप्रसिद्ध साहित्यकार संघ को वहाँ से कई लाख रुपये का वार्षिक अनुदान मिलता था, जिसे खपाने का यही सबसे उपयुक्त तरीका निकाला गया था। यानी सुप्रसिद्ध साहित्यकारों को सम्मानित करने का तरीका। और इसमें एक प्रच्छन्न लाभ भी था। जिन-जिन सुप्रसिद्ध साहित्यकारों को आमंत्रित किया गया था, वे भी अपने-अपने कार्यक्रमों में यहाँ के साहित्यकारों को आमंत्रित करेंगे। यही परंपरा अनेक दशकों से चली आती थी। 
किसी को भी सुप्रसिद्ध साहित्यकार बता देना और सम्मानित कर देना सबसे निरापद है। अगर किसी को शंका हो तो आयोजक बड़े मज़े में उसे बुद्धू सिद्ध कर सकते हैं- “क्या बात करते हैं! आपने अमुक-अमुक का नाम नहीं सुना?” इससे सिद्ध हो जाता है कि शंका करने वाला कुछ पढ़ता-लिखता नहीं है। यानी महा-अज्ञानी है। और आज के समय में स्वयं को अज्ञानी कौन सिद्ध करना चाहता है? इसलिए वह भी झख मारकर सहमत हो जाता है- “अच्छा-अच्छा, वे.. अमुक-अमुक.. क्या जबर्दस्त लिखते हैं.. बहुत बढ़िया… तो इस वर्ष आप उनका सम्मान कर रहे हैं… भई, वाह! जरूर कीजिए…।” बस इससे अधिक तो न कोई सुनना चाहता है, न कहना। अपना पिण्ड छूटा और व्हाट्सऐप, फेसबुक में घुसे।
सम्मान समारोह में भाग लेने के लिए स्थानीय सुप्रसिद्ध साहित्यकारों के साथ-साथ उनके परिवार के अन्य लोग और कुछ बच्चे भी पधारते हैं। ज़ाहिर है उन्हें केवल एक व्यक्ति को पुरस्कृत होते देखना होता है। बाकी समय वे या तो आपस में बातें करते हैं या बरामदे में सजी नाश्ते की टेबलों पर निगाह जमाए रखते हैं। 
लिहाज़ा अपने सुप्रसिद्ध साहित्यकार जी ने बाकायदा चादर ओढ़ी, नारियल और रामचरितमानस की पोथी ग्रहण की, अपना प्रशस्तिपत्र लिया, सम्मान लेते समय और बाद में मंच पर चढ़कर मुख्य अतिथि व आयोजकों के साथ कुछ तस्वीरें खिंचवायीं, दस-बारह अन्य सुप्रसिद्ध साहित्यकारों से मिलकर उनकी हाल ही में प्रकाशित पुस्तकें पाकर झोले के हवाले कीं, बर्फी-चाय-समोसे का नाश्ता किया, आयोजकों को झुक-झुककर धन्यवाद दिया, उन्हें अपने किसी आगामी आयोजन में पधारने का मौखिक निमंत्रण दिया और खुशी-खुशी वापस हो लिए।

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