Sunday, April 19, 2026
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डॉ. अतुला भास्कर की कलम से – प्रवासी साहित्यकारों के ‘सुनेहे’ (अनुवाद एवं संपादन – डॉ. किरण खन्ना)

अनुवाद विभिन्न भाषाओं के बीच विचारों और सूचनाओं के आदान- प्रदान को सक्षम  ही नहीं बनाता है बल्कि संस्कृतियों के  प्रति समझ और संबध को भी प्रश्रय प्रदान करता है। किसी भी भाषा में कही अथवा लिखी गई बात का दूसरी भाषा में सार्थक परिवर्तन अनुवाद कहलाता है। अनंग प्रकाशन, दिल्ली से वर्ष 2024 में प्रकाशित पुस्तक ‘सुनेहे’  एक अनुवाद संकलन है।  जिसमें कथा यूके, लंदन के प्रतिष्ठित छह कथाकारों की ग्यारह कहानियों को 183 पृष्ठों में संजो कर बहुत  ही मनोयोगपूर्वक कुशलता से प्रस्तुत  किया गया है।  
अनुवाद एक जटिल प्रक्रिया है। जिसमें स्रोत भाषा के कथ्य को भलीभांति समझ कर लक्ष्य भाषा में अनुवादित किया जाता है। विश्लेषण, भाषांतरण, पुनर्गठन और समायोजन आदि मूल कथ्य के भाव, अर्थ, संरचना और  संदर्भ  को यथासंभव बनाए रखने के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। प्रस्तुत पुस्तक की  कहानियों की मूल भाषा हिंदी है जिन्हें डॉ. किरण खन्ना ने पंजाबी भाषा में अनुदित किया है। 
प्रवासी साहित्य में प्रवासी चेतना को आधार बनाकर कहानी लिखने वाले पंजाब के हिंदी प्रवासी लेखकों का प्रमुख योगदान है। निःसंदेह राष्ट्र भाषा हिंदी भारत में अनेक चुनौतियों का सामना कर रही है। पर भारतीय मूल के विदेश में बसे हिंदी साहित्यकारों की अनवरत सृजनशीलता ने हिंदी को विश्व भाषा का गौरव प्राप्त कराने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। 
प्रवासी साहित्य हिंदी साहित्य  को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान दिलवा रहा है। प्रवासी साहित्यकार किसी भी देश में रच बस गए हो पर भारतीय संस्कृति, भाषा, संस्कार, परंपरा और रीति रिवाजों के  प्रति उनकी आसक्ति कभी भी धूमिल नहीं हुई। इसके साथ ही उनके साहित्य में जिस देश में वे रह रहे हैं उसकी जीवन शैली की झलक भी इनकी सृजनात्मकता में परिलक्षित होती है।
पंजाबी भाषा का शब्द ‘सुनेहे’ जिसे हिंदी में ‘संदेशे’ कहा जाता है, अनूदित कहानी संकलन का शीर्षक है। वास्तव में ये प्रवासी कहानीकारों के संदेशे हैं जो अपने देशवासियों को प्रेषित किए गए हैं। 
विवेच्य पुस्तक में ज़किया ज़ुबैरी द्वारा रचित तीन कहानियों में पहली कहानी ‘और… ब्लॉसम सूख गए’ में जहाँ कोरोना महामारी, लाकडॉउन, सोशल डिस्टेंसिंग आदि का जिक्र है, वहीं कहानी की नायिका ‘जीना’ एक मजबूत औरत बनकर जीना चाहती है। वह मानती है कि सहानुभूति इंसान को कायर बना देती है। ‘दोनों आसमानों के रंग…’  कहानी में हिन्दुस्तान और  पाकिस्तान की आपसी रंजिश को पेश करते हुए   परस्पर भाईचारे की भावना को स्थापित किया गया है। जकिया ज़ुबैरी की तीसरी कहानी ‘सांकल’ में पीढ़ी के अंतराल के साथ-साथ स्त्री मनोदशा और संवेदनशीलता को दर्शाया गया है।
नीना पाल की कहानी ‘घर बेघर’ में  मौजूदा दौर की दुखदायी त्रासदी व्यक्त की गई है कि घर के बुजुर्ग अपने ही घर में बेघर हो गए हैं। 
महेद्र दवेसर की ‘पुष्प दहन’ कहानी नस्लवाद, बाल मजदूरी, यौन शोषण, केयर सेंटर्स के घिनौने सच, मासूम बच्चों की पीडा़ और हुकूमतों के जु़ल्म को उजागर करती है।  
लेखिका जय वर्मा की कहानी गुलमोहर लालची संतान और ममतामयी मां के निःस्वार्थ प्रेम की दास्तान बयान करती है। 
वंदना मुकेश शर्मा की कहानी अजनबी शहर में विदेशी धरती पर अनजान लोगों के बीच अचानक अपनी भाषा बोलने वाला मिल जाने पर अंधकारमय जीवन में प्रकाश भर जाने की अनिर्वचनीय अनुभूति को वाणी दी गई है।
सुविख्यात प्रवासी कथाकार तेजेन्द्र शर्मा की चार कहानियों में पहली कहानी है ‘मौत…एक मध्यान्तर…!’ यह कहानी मृत्यु शैय्या पर पड़े, कैंसर से जूझते नायक हरजीत की पीडा़ और जीने की इच्छा के संघर्ष से पाठकों को रुबरु करवाती है। ‘संदिग्ध’ कहानी पति पत्नी के रिश्ते में विश्वास के धागे के तार-तार होने की कसक इस कदर बयान करती है कि कथा सूत्र पाठकों को बरबस ही अपने आप में बांध लेते हैं। ‘शव-यात्रा’ कहानी सोशल मीडिया की कड़वी सच्चाई व्यक्त करती है। ‘ज़मीन भुरभुरी क्यों है…?’ प्रवासी भारतीय स्त्री के संघर्ष की कहानी है। इसके साथ ही यह कहानी विदेशी जेलों में बंद अपराधियों / कैदियों को मुख्यधारा में लाने के लिए किए गए सार्थक प्रयास को भी दर्शाती है। 
संक्षेप में कहा जा सकता है कि कथाकारों की कहानियों के अनुवाद के इस प्रयास से विदशों में बसे भारतीय मूल के साहित्यकारों के लेखन को भारत ही नहीं अपितु समस्त विश्व के भारतीय पाठकों तक पहुंचाने का यह उद्यम  श्लाघनीय है। इतना ही नहीं प्रवासी साहित्य पर शोध करने वाले शोधार्थियों के लिए भी यह सहायक एवं सार्थक सिद्ध होगा।
डॉ. अतुला भास्कर
विभागाध्यक्ष हिंदी,
एस. एन. कालेज, अमृतसर
ईमेल : [email protected] 
 


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