हिंदी दिवस आने को होता है और पूरे भारत में हिंदी की बिंदी की चर्चा होने लगती है। मंचों पर हिंदी के गीत गाए जाते हैं और सोशल मीडिया पर तो हिंदी की आंधी-सी आ जाती है। कुछ दिनों में यह तूफ़ान थम जाता है और फिर एक साल बाद वही बातें बार-बार दोहराई जाती हैं। मज़ा तो तब आता है, जब हिंदी की वैश्विक स्थिति पर सेमिनार होने लगते हैं, जबकि भारत में हिंदी की क्या स्थिति है, इस पर सब चुप्पी साधे रहते हैं।
कुछ चीज़ों के हम इतने आदी हो जाते हैं कि उनके बारे में कुछ सोचते ही नहीं हैं… बस उनका इस्तेमाल करते चले जाते हैं। हमें ग़लतफ़हमी यह रहती है कि हमारा ज्ञान असीमित है, मगर सच्चाई तो यह है कि जीवन के कुछ ऐसे पहलू या वस्तुएँ हैं, जिनका हम इस्तेमाल तो करते हैं, मगर उनके बारे में हमें तनिक भी जानकारी नहीं होती। दरअसल, हमें कभी आवश्यकता ही महसूस नहीं होती कि उनके बारे में जानकारी हासिल की जाए।
मगर ‘पुरवाई’ के पाठकों ने अपने संपादक पर एक अतिरिक्त ज़िम्मेदारी डाल रखी है- “भाई संपादक जी, हमें तो हर हफ़्ते आपसे हफ़्ता वसूल करना ही है। आप हमें हर हफ़्ते किसी नए विषय पर जानकारी उपलब्ध करवाएँ। यदि हमारा स्नेह निरंतर पाना चाहते हैं, तो इस अपेक्षा पर खरे उतरिए…!”
तो मित्रो! हमारी खोजी नज़र ने सोचना शुरू किया और एक नई जानकारी पकड़ ही ली। यह जानकारी भी बिंदी से जुड़ी हुई है, मगर यह बिंदी हिंदी की नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी भाषा की है। इस बिंदी को हम बचपन से देखते आए हैं। उसका इस्तेमाल करते हैं, मगर हिंदी की बिंदी की तरह उसके बारे में चर्चा नहीं करते। अंग्रेज़ी में यह बिंदी ‘आई‘ और ‘जे‘ पर लगाई जाती है। आपने अवश्य देखा होगा कि अंग्रेज़ी में कैपिटल लेटर और स्मॉल लेटर होते हैं। स्मॉल ‘आई’ और ‘जे’ के ऊपर एक बिंदी लगाई जाती है, जैसे- i और j ।

अब आप सोचने लगे होंगे कि भाई, इसमें कौन-सी तोप चला दी आपने! यह तो हम बचपन से देखते, पढ़ते और लिखते आ रहे हैं। इस पर मेरा सवाल होगा कि यदि आप इसका इस्तेमाल करते आ रहे हैं, तो क्या आप जानते हैं कि इन्हें क्या कहा जाता है? पड़ गए न सोच में?….. तो आज हम इन्हीं बिंदियों के बारे में बात करेंगे। इन बिंदियों को ‘टिटल‘ (tittle) कहा जाता है। अंग्रेज़ी में इस शब्द की वर्तनी tittle होती है। यह एक ऐसा चिह्न है, जो किसी अक्षर को उसके आसपास के टेक्स्ट से अलग पहचान देने के लिए लगाया जाता है।
टिटल (tittle) शब्द का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण किंग जेम्स बाइबिल के मैथ्यू 5:18 में मिलता है-
“क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था में से एक ‘जॉट’ या एक ‘टिटल’ भी किसी रीति से नहीं टलेगा, जब तक कि सब कुछ पूरा न हो जाए।”
इस उद्धरण में ‘जॉट‘ और ‘टिटल‘ का उपयोग ‘व्यवस्था’ के अत्यंत सूक्ष्म लिखित विवरणों के उदाहरण के रूप में किया गया है, जो संभवतः तोराह (यहूदियों का धर्मग्रंथ) के हिब्रू पाठ की ओर संकेत करता है। अंग्रेज़ी में ‘जॉट एंड टिटल‘ (jot and tittle) वाक्यांश का अर्थ है कि किसी कार्य या दस्तावेज़ के हर छोटे-से-छोटे विवरण पर भी पूरा ध्यान दिया गया है।
‘टिटल’ शब्द लैटिन शब्द ‘टिटलस’ (titulus) से आया है, जिसका अर्थ है “शीर्षक” या “अभिलेख”। यह 11वीं शताब्दी के लैटिन ग्रंथों में दिखाई देता है और हस्तलेखन में अक्षरों (विशेष रूप से ‘i’) के बीच अंतर करने के लिए इसका उपयोग किया जाता था।
जब पहली बार मैंने यह शब्द पढ़ा, तो एक ही रौ में इसे ‘टाइटल’ पढ़ गया। फिर जब ध्यान से देखा, तो पता चला कि मैं पढ़ने के स्थान पर केवल देख रहा था। आँखें देख कुछ रही थीं और पढ़ कुछ और रही थीं। मैंने हमेशा कहा है कि कुछ नया सीखने की कोई आयु-सीमा नहीं होती। मेरी रुचि इस विषय में बढ़ती जा रही थी और मैं ऐसी तमाम वेबसाइटें खोज रहा था, जहाँ से मुझे कुछ अतिरिक्त जानकारी मिल सके, जिसे मैं आप सबके साथ साझा कर सकूँ।
मैंने देखा कि लोअर-केस ‘i’ पर हमेशा उसकी बिंदी नहीं होती थी। शुरुआती रोमन लिपियों में यह अक्षर केवल एक साधारण, छोटी ऊर्ध्वाधर रेखा हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे हस्तलेखन 11वीं शताब्दी की सघन गॉथिक मिनुस्क्यूल शैली (Dense Gothic Minuscule) में विकसित हुआ, एक महत्वपूर्ण समस्या उभरकर सामने आई।
लिपिकार एक अत्यंत सघन शैली का उपयोग करते थे, जिसमें लगभग हर अक्षर एक जैसी ऊर्ध्वाधर रेखाओं से बना होता था। इन रेखाओं को मिनिम्स (minims) कहा जाता था। ऐसे में ‘i’, ‘n’ या ‘u’ के एक हिस्से जैसा दिखाई देता था। उदाहरण के लिए, ‘filii’ (लैटिन में पुत्र शब्द का बहुवचन) एक जैसी रेखाओं के गुच्छे जैसा प्रतीत होता था। एक और उदाहरण ‘minimum’ शब्द था, जो लगातार पंद्रह एक जैसी ऊर्ध्वाधर रेखाओं (ııııııııııııııı) जैसा दिखाई देता था।
इस समस्या को हल करने के लिए लिपिकारों ने ‘i’ के ऊपर एक छोटी तिरछी रेखा जोड़नी शुरू की, ताकि उसे अन्य ऊर्ध्वाधर रेखाओं से अलग पहचाना जा सके। अगली कुछ सदियों में यही तिरछी रेखा परिवर्तित होकर आज के परिचित छोटे बिंदु का रूप ले गई। इस सुधार से पाठकों को बहुत सुविधा मिली और वे पाठ को अधिक स्पष्ट तथा सही ढंग से पढ़ने लगे।
अक्षर ‘j’ की अपनी अलग उत्पत्ति की कहानी है। वास्तव में ‘j’, ‘i’ का ही एक विकसित रूप है, जिसकी पूँछ नीचे की ओर बढ़ा दी गई थी। इसलिए यह वर्णमाला का एकमात्र ऐसा अक्षर माना जाता है, जिसे अपनी स्वतंत्र ध्वनि मिलने से पहले केवल सौंदर्य और लेखन-सुविधा की दृष्टि से विकसित किया गया था। लिपिकार शब्दों के अंत में या रोमन अंकों की श्रृंखला के अंतिम अक्षर के रूप में एक लंबे ‘i’ (जो ‘j’ जैसा दिखाई देता था) का उपयोग करते थे। ‘j’ ने अपना ‘टिटल’ (ऊपर का बिंदु) ‘i’ से ही विरासत में पाया, क्योंकि मूलतः वह उसी का परिवर्तित रूप था।
16वीं शताब्दी तक विद्वानों ने ‘i’ और ‘j’ को अलग-अलग ध्वनियों वाले स्वतंत्र अक्षरों के रूप में स्वीकार नहीं किया था। बाद में यह निर्धारित किया गया कि ‘i’ एक स्वर ध्वनि का प्रतिनिधित्व करेगा, जबकि ‘j’ एक व्यंजन होगा, जिसकी ध्वनि मुलायम ‘जी’ (अंग्रेज़ी के soft ‘g’ के समान) होगी।
अंग्रेज़ी में कैपिटल लेटर्स को अपर-केस (Upper Case) और स्मॉल लेटर्स को लोअर-केस (Lower Case) कहा जाता है। इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है। जीवन में कोई भी चीज़ बिना किसी कारण के नहीं होती। कई बार कारण अकादमिक या साहित्यिक नहीं, बल्कि पूरी तरह व्यावहारिक होता है।
इन शब्दों की उत्पत्ति उस समय हुई, जब छपाई गर्म धातु (हॉट मेटल) के प्रिंटिंग प्रेस से की जाती थी। प्रत्येक अक्षर को ‘केस’ कहलाने वाले लकड़ी या धातु के बक्सों में रखा जाता था। बड़े अक्षर (मेजस्क्यूल/कैपिटल लेटर्स) ऊपर वाले केस में और छोटे अक्षर (मिनुस्क्यूल) नीचे वाले केस में रखे जाते थे। इसी कारण ‘अपर केस’ और ‘लोअर केस’ शब्द प्रचलित हो गए।
हमें पूरा विश्वास है कि आज के इस संपादकीय के माध्यम से आप सबको एक ऐसे रोचक विषय को जानने और समझने का अवसर मिला है, जिस पर शायद आपने आज से पहले कभी विचार नहीं किया होगा।

आज का आई और जे से संबंधित आपका लेख निश्चित ही बिल्कुल नई जानकारी वाला है। इसके लिए आपने बहुत शोध और चिंतन किया है। यह हम सबके लिए प्रेरक है।धन्यवाद
वेद भाई इस त्वरित टिप्पणी के लिए हार्दिक धन्यवाद
वाकई नई और अद्भुत जानकारी दी आपने, धन्यवाद
धन्यवाद आलोक भाई।
अंग्रेजी की बिंदी शानदार व महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने।बहुत बहुत आभार हमारे ज्ञान को समृद्ध करने के लिये।
सुषमा जी, हार्दिक धन्यवाद।
आज का ये संपादकीय कई मायनों में महत्वपूर्ण है। हिंदी को अपनी बिंदी पर बहुत गर्व है पर इस लेख के बाद ये एकाधिकार टूटता नजर आया।
कई नई बातों की तरफ भी आपने ध्यान दिलाया। कुल मिलाकर बहुत बढ़िया।
रीता जी हमारा प्रयास सफल हुआ। धन्यवाद।
आदरणीय संपादक जी
पुरवाई के संपादकीय ज्ञानवर्धक और रोचक होते हैं।अनेक समसामयिक मुद्दों के साथ ही रूढ़ियों और परंपराओं पर विमर्श भी आप अपने संपादकीय माध्यम से प्रकारांतर से करते रहते हैं। आज का पुरवाई का यह संपादकीय भी अत्यंत ज्ञानवर्धक है। अंग्रेजी में बिंदियों की पड़ताल करता रोचक और ज्ञान वर्धक संपादकीय।
अनेकानेक साधुवाद।
भाई रामशंकर जी पुरवाई के संपादकीयों के साथ स्नेह बनाए रखें। हार्दिक धन्यवाद।
रोचक जानकारी, अब जब भी अंग्रेजी की बिंदी देखूँगा तो टिटल याद आएगा और निश्चय ही आपका संपादकीय।
स्नेहाशीष जया। बहुत शुक्रिया।
इस बार का संपादकीय भाषा विज्ञान पर केंद्रित है। इसमें रोमन लिपि के अक्षर i और j के इतिहास पर गहन दृष्टि डाली गई है। भाषा विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह विषय ज्ञानवर्धक के साथ-साथ रुचि पूर्ण भी है।
हर भाषा में लिपियों का अपना इतिहास रहा है। मानव ने अपनी सुविधानुसार वर्णमाला में नए-नए अक्षरों को जोड़ा और घटाया है।
रोमन लिपि के i और j वर्णों में बिंदी क्यों लगाई गई और कब यह कार्य पूर्ण हुआ, संपादकीय लेख में ऐतिहासिकता के साथ-साथ, गहन विवेचना भी देखने को मिली।
यह जानकर आश्चर्य हुआ कि j अक्षर वर्णमाला में बाद में एड किया गया है। मैं अंग्रेजी वर्णमाला की रिदम को मन ही मन दोहराता हूं और j को छोड़ देता हूं तो उसका रिदम बिगड़ जाता है। कहते हैं कि इस सृष्टि में हर कोई पूर्ण होना चाहता है। यह वर्णमाला भी j अक्षर के साथ पूर्णता को प्राप्त कर गई।
सर, यह संपादकीय आपको ‘भाषा विज्ञानी’ के रूप में प्रतिष्ठित करता है। गहन शोध और विश्लेषण इसकी तस्दीक करता है।
संपादक जी की इस बात से सहमत हूं कि पुरवाई का पाठक अब गंभीर और नए विषयों का आदी हो चुका है। संपादकीय जितने परिश्रम से लिखा जाता है, टिप्पणियां भी उसी श्रम के आस-पास घूमती है। पुरवाई की रचनाओं पर की गई समीक्षा/ टिप्पणियां इसका सबूत हैं।
बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बधाई सर
भाई लखन लाल पाल जी संपादकीय के लिए जितना शोध और मेहनत की जाती है, आप उतनी ही मेहनत टिप्पणी लिखने में करते हैं। आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है।
नमस्कार
सम्पादक जी जिन छात्रों को भारत से बाहर पढ़ने हेतु एडमिशन लेना होता है उन्हें (ख़ास तौर पर UK में ) English Language क्वालीफाई करना होता है ।
भाषा विज्ञान को जानना उसके सूक्ष्मतर को समझना कठिन कार्य है
साधुवाद
Dr Prabha mishra
हार्दिक धन्यवाद प्रभा जी।
अच्छी खोजबीन की है
एक और तथ्य भी बताना जरूरी है , प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के उद्भव के साथ कंपोजिंग को सहज बनाने के लिए अंग्रेजी भाषा में मात्राएँ उड़ा दी गईं आज भी साबुन हम्माम में m के ऊपर शिरोरेखा का इस्तेमाल हो रहा है जो पुरानी रवायत की याद दिलाता है
धन्यवाद प्रदीप भाई।
बहुत अच्छी जानकारी मिली। खूब शुभकामनाएं तेजेंद्रजी
हार्दिक धन्यवाद प्रगति।
iऔर j की बिंदी की खोज की यात्रा वास्तव में रोचक रही। इसलिए भी कि ये दोनों बिंदियां जाने कब से साथ साथ बिंदास चल रही हैं इन्हें तनिक भी परवाह नहीं कौन उन्हें देख रहा है कौन नहीं। लेकिन ‘सर जी आपकी सूक्ष्म दृष्टि ने इन्हें पकड़ कर मानो कटघरे में ला खड़ा किया! किसके समक्ष ? हिंदी की उस बिंदी के समक्ष जो इंतजार में ही रहती है कि कोई तो उसे देखे और समझे कि ये कोई ‘साज सज्जा ‘नहीं बल्कि प्रतिबद्धता है देश और विदेश में भी अभिव्यक्ति के लिए।
आपको बधाई सर