Monday, August 10, 2026
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अंग्रेज़ी में भी बिंदी होती है… (आई जे… आई जे…)

हिंदी दिवस आने को होता है और पूरे भारत में हिंदी की बिंदी की चर्चा होने लगती है। मंचों पर हिंदी के गीत गाए जाते हैं और सोशल मीडिया पर तो हिंदी की आंधी-सी आ जाती है। कुछ दिनों में यह तूफ़ान थम जाता है और फिर एक साल बाद वही बातें बार-बार दोहराई जाती हैं। मज़ा तो तब आता है, जब हिंदी की वैश्विक स्थिति पर सेमिनार होने लगते हैं, जबकि भारत में हिंदी की क्या स्थिति है, इस पर सब चुप्पी साधे रहते हैं।

कुछ चीज़ों के हम इतने आदी हो जाते हैं कि उनके बारे में कुछ सोचते ही नहीं हैं… बस उनका इस्तेमाल करते चले जाते हैं। हमें ग़लतफ़हमी यह रहती है कि हमारा ज्ञान असीमित है, मगर सच्चाई तो यह है कि जीवन के कुछ ऐसे पहलू या वस्तुएँ हैं, जिनका हम इस्तेमाल तो करते हैं, मगर उनके बारे में हमें तनिक भी जानकारी नहीं होती। दरअसल, हमें कभी आवश्यकता ही महसूस नहीं होती कि उनके बारे में जानकारी हासिल की जाए।

मगर ‘पुरवाई’ के पाठकों ने अपने संपादक पर एक अतिरिक्त ज़िम्मेदारी डाल रखी है- “भाई संपादक जी, हमें तो हर हफ़्ते आपसे हफ़्ता वसूल करना ही है। आप हमें हर हफ़्ते किसी नए विषय पर जानकारी उपलब्ध करवाएँ। यदि हमारा स्नेह निरंतर पाना चाहते हैं, तो इस अपेक्षा पर खरे उतरिए…!”

तो मित्रो! हमारी खोजी नज़र ने सोचना शुरू किया और एक नई जानकारी पकड़ ही ली। यह जानकारी भी बिंदी से जुड़ी हुई है, मगर यह बिंदी हिंदी की नहीं, बल्कि अंग्रेज़ी भाषा की है। इस बिंदी को हम बचपन से देखते आए हैं। उसका इस्तेमाल करते हैं, मगर हिंदी की बिंदी की तरह उसके बारे में चर्चा नहीं करते। अंग्रेज़ी में यह बिंदी आई और जे पर लगाई जाती है। आपने अवश्य देखा होगा कि अंग्रेज़ी में कैपिटल लेटर और स्मॉल लेटर होते हैं। स्मॉल ‘आई’ और ‘जे’ के ऊपर एक बिंदी लगाई जाती है, जैसे- i और j

अब आप सोचने लगे होंगे कि भाई, इसमें कौन-सी तोप चला दी आपने! यह तो हम बचपन से देखते, पढ़ते और लिखते आ रहे हैं। इस पर मेरा सवाल होगा कि यदि आप इसका इस्तेमाल करते आ रहे हैं, तो क्या आप जानते हैं कि इन्हें क्या कहा जाता है? पड़ गए न सोच में?….. तो आज हम इन्हीं बिंदियों के बारे में बात करेंगे। इन बिंदियों को टिटल‘ (tittle) कहा जाता है। अंग्रेज़ी में इस शब्द की वर्तनी tittle होती है। यह एक ऐसा चिह्न है, जो किसी अक्षर को उसके आसपास के टेक्स्ट से अलग पहचान देने के लिए लगाया जाता है।

टिटल (tittle) शब्द का प्रयोग बहुत कम किया जाता है। इसका एक उल्लेखनीय उदाहरण किंग जेम्स बाइबिल के मैथ्यू 5:18 में मिलता है-

“क्योंकि मैं तुम से सच कहता हूँ, जब तक आकाश और पृथ्वी टल न जाएँ, तब तक व्यवस्था में से एक ‘जॉट’ या एक ‘टिटल’ भी किसी रीति से नहीं टलेगा, जब तक कि सब कुछ पूरा न हो जाए।”

इस उद्धरण में जॉट और टिटल का उपयोग ‘व्यवस्था’ के अत्यंत सूक्ष्म लिखित विवरणों के उदाहरण के रूप में किया गया है, जो संभवतः तोराह (यहूदियों का धर्मग्रंथ) के हिब्रू पाठ की ओर संकेत करता है। अंग्रेज़ी में जॉट एंड टिटल‘ (jot and tittle) वाक्यांश का अर्थ है कि किसी कार्य या दस्तावेज़ के हर छोटे-से-छोटे विवरण पर भी पूरा ध्यान दिया गया है।

टिटल’ शब्द लैटिन शब्द टिटलस’ (titulus) से आया है, जिसका अर्थ है शीर्षक” या अभिलेख”। यह 11वीं शताब्दी के लैटिन ग्रंथों में दिखाई देता है और हस्तलेखन में अक्षरों (विशेष रूप से ‘i’) के बीच अंतर करने के लिए इसका उपयोग किया जाता था।

जब पहली बार मैंने यह शब्द पढ़ा, तो एक ही रौ में इसे टाइटल’ पढ़ गया। फिर जब ध्यान से देखा, तो पता चला कि मैं पढ़ने के स्थान पर केवल देख रहा था। आँखें देख कुछ रही थीं और पढ़ कुछ और रही थीं। मैंने हमेशा कहा है कि कुछ नया सीखने की कोई आयु-सीमा नहीं होती। मेरी रुचि इस विषय में बढ़ती जा रही थी और मैं ऐसी तमाम वेबसाइटें खोज रहा था, जहाँ से मुझे कुछ अतिरिक्त जानकारी मिल सके, जिसे मैं आप सबके साथ साझा कर सकूँ।

मैंने देखा कि लोअर-केस ‘i’ पर हमेशा उसकी बिंदी नहीं होती थी। शुरुआती रोमन लिपियों में यह अक्षर केवल एक साधारण, छोटी ऊर्ध्वाधर रेखा हुआ करता था। लेकिन जैसे-जैसे हस्तलेखन 11वीं शताब्दी की सघन गॉथिक मिनुस्क्यूल शैली (Dense Gothic Minuscule) में विकसित हुआ, एक महत्वपूर्ण समस्या उभरकर सामने आई।

लिपिकार एक अत्यंत सघन शैली का उपयोग करते थे, जिसमें लगभग हर अक्षर एक जैसी ऊर्ध्वाधर रेखाओं से बना होता था। इन रेखाओं को मिनिम्स (minims) कहा जाता था। ऐसे में ‘i’, ‘n’ या ‘u’ के एक हिस्से जैसा दिखाई देता था। उदाहरण के लिए, ‘filii’ (लैटिन में पुत्र शब्द का बहुवचन) एक जैसी रेखाओं के गुच्छे जैसा प्रतीत होता था। एक और उदाहरण ‘minimum’ शब्द था, जो लगातार पंद्रह एक जैसी ऊर्ध्वाधर रेखाओं (ııııııııııııııı) जैसा दिखाई देता था।

इस समस्या को हल करने के लिए लिपिकारों ने ‘i’ के ऊपर एक छोटी तिरछी रेखा जोड़नी शुरू की, ताकि उसे अन्य ऊर्ध्वाधर रेखाओं से अलग पहचाना जा सके। अगली कुछ सदियों में यही तिरछी रेखा परिवर्तित होकर आज के परिचित छोटे बिंदु का रूप ले गई। इस सुधार से पाठकों को बहुत सुविधा मिली और वे पाठ को अधिक स्पष्ट तथा सही ढंग से पढ़ने लगे।

अक्षर ‘j’ की अपनी अलग उत्पत्ति की कहानी है। वास्तव में ‘j’, ‘i’ का ही एक विकसित रूप है, जिसकी पूँछ नीचे की ओर बढ़ा दी गई थी। इसलिए यह वर्णमाला का एकमात्र ऐसा अक्षर माना जाता है, जिसे अपनी स्वतंत्र ध्वनि मिलने से पहले केवल सौंदर्य और लेखन-सुविधा की दृष्टि से विकसित किया गया था। लिपिकार शब्दों के अंत में या रोमन अंकों की श्रृंखला के अंतिम अक्षर के रूप में एक लंबे ‘i’ (जो ‘j’ जैसा दिखाई देता था) का उपयोग करते थे। ‘j’ ने अपना टिटल’ (ऊपर का बिंदु) ‘i’ से ही विरासत में पाया, क्योंकि मूलतः वह उसी का परिवर्तित रूप था।

16वीं शताब्दी तक विद्वानों ने ‘i’ और ‘j’ को अलग-अलग ध्वनियों वाले स्वतंत्र अक्षरों के रूप में स्वीकार नहीं किया था। बाद में यह निर्धारित किया गया कि ‘i’ एक स्वर ध्वनि का प्रतिनिधित्व करेगा, जबकि ‘j’ एक व्यंजन होगा, जिसकी ध्वनि मुलायम जी’ (अंग्रेज़ी के soft g के समान) होगी।

अंग्रेज़ी में कैपिटल लेटर्स को अपर-केस (Upper Case) और स्मॉल लेटर्स को लोअर-केस (Lower Case) कहा जाता है। इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है। जीवन में कोई भी चीज़ बिना किसी कारण के नहीं होती। कई बार कारण अकादमिक या साहित्यिक नहीं, बल्कि पूरी तरह व्यावहारिक होता है।

इन शब्दों की उत्पत्ति उस समय हुई, जब छपाई गर्म धातु (हॉट मेटल) के प्रिंटिंग प्रेस से की जाती थी। प्रत्येक अक्षर को केस’ कहलाने वाले लकड़ी या धातु के बक्सों में रखा जाता था। बड़े अक्षर (मेजस्क्यूल/कैपिटल लेटर्स) ऊपर वाले केस में और छोटे अक्षर (मिनुस्क्यूल) नीचे वाले केस में रखे जाते थे। इसी कारण ‘अपर केस’ और ‘लोअर केस’ शब्द प्रचलित हो गए।

हमें पूरा विश्वास है कि आज के इस संपादकीय के माध्यम से आप सबको एक ऐसे रोचक विषय को जानने और समझने का अवसर मिला है, जिस पर शायद आपने आज से पहले कभी विचार नहीं किया होगा।

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64 टिप्पणी

  1. आज का आई और जे से संबंधित आपका लेख निश्चित ही बिल्कुल नई जानकारी वाला है। इसके लिए आपने बहुत शोध और चिंतन किया है। यह हम सबके लिए प्रेरक है।धन्यवाद

  2. अंग्रेजी की बिंदी शानदार व महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने।बहुत बहुत आभार हमारे ज्ञान को समृद्ध करने के लिये।

  3. आज का ये संपादकीय कई मायनों में महत्वपूर्ण है। हिंदी को अपनी बिंदी पर बहुत गर्व है पर इस लेख के बाद ये एकाधिकार टूटता नजर आया।
    कई नई बातों की तरफ भी आपने ध्यान दिलाया। कुल मिलाकर बहुत बढ़िया।

  4. आदरणीय संपादक जी
    पुरवाई के संपादकीय ज्ञानवर्धक और रोचक होते हैं।अनेक समसामयिक मुद्दों के साथ ही रूढ़ियों और परंपराओं पर विमर्श भी आप अपने संपादकीय माध्यम से प्रकारांतर से करते रहते हैं। आज का पुरवाई का यह संपादकीय भी अत्यंत ज्ञानवर्धक है। अंग्रेजी में बिंदियों की पड़ताल करता रोचक और ज्ञान वर्धक संपादकीय।
    अनेकानेक साधुवाद।

    • भाई रामशंकर जी पुरवाई के संपादकीयों के साथ स्नेह बनाए रखें। हार्दिक धन्यवाद।

  5. रोचक जानकारी, अब जब भी अंग्रेजी की बिंदी देखूँगा तो टिटल याद आएगा और निश्चय ही आपका संपादकीय।

  6. इस बार का संपादकीय भाषा विज्ञान पर केंद्रित है। इसमें रोमन लिपि के अक्षर i और j के इतिहास पर गहन दृष्टि डाली गई है। भाषा विज्ञान में रुचि रखने वालों के लिए यह विषय ज्ञानवर्धक के साथ-साथ रुचि पूर्ण भी है।
    हर भाषा में लिपियों का अपना इतिहास रहा है। मानव ने अपनी सुविधानुसार वर्णमाला में नए-नए अक्षरों को जोड़ा और घटाया है।
    रोमन लिपि के i और j वर्णों में बिंदी क्यों लगाई गई और कब यह कार्य पूर्ण हुआ, संपादकीय लेख में ऐतिहासिकता के साथ-साथ, गहन विवेचना भी देखने को मिली।
    यह जानकर आश्चर्य हुआ कि j अक्षर वर्णमाला में बाद में एड किया गया है। मैं अंग्रेजी वर्णमाला की रिदम को मन ही मन दोहराता हूं और j को छोड़ देता हूं तो उसका रिदम बिगड़ जाता है। कहते हैं कि इस सृष्टि में हर कोई पूर्ण होना चाहता है। यह वर्णमाला भी j अक्षर के साथ पूर्णता को प्राप्त कर गई।
    सर, यह संपादकीय आपको ‘भाषा विज्ञानी’ के रूप में प्रतिष्ठित करता है। गहन शोध और विश्लेषण इसकी तस्दीक करता है।
    संपादक जी की इस बात से सहमत हूं कि पुरवाई का पाठक अब गंभीर और नए विषयों का आदी हो चुका है। संपादकीय जितने परिश्रम से लिखा जाता है, टिप्पणियां भी उसी श्रम के आस-पास घूमती है। पुरवाई की रचनाओं पर की गई समीक्षा/ टिप्पणियां इसका सबूत हैं।
    बढ़िया संपादकीय के लिए आपको बधाई सर

    • भाई लखन लाल पाल जी संपादकीय के लिए जितना शोध और मेहनत की जाती है, आप उतनी ही मेहनत टिप्पणी लिखने में करते हैं। आपकी टिप्पणी की प्रतीक्षा रहती है।

  7. नमस्कार
    सम्पादक जी जिन छात्रों को भारत से बाहर पढ़ने हेतु एडमिशन लेना होता है उन्हें (ख़ास तौर पर UK में ) English Language क्वालीफाई करना होता है ।
    भाषा विज्ञान को जानना उसके सूक्ष्मतर को समझना कठिन कार्य है
    साधुवाद
    Dr Prabha mishra

  8. अच्छी खोजबीन की है
    एक और तथ्य भी बताना जरूरी है , प्रिंटिंग टेक्नोलॉजी के उद्भव के साथ कंपोजिंग को सहज बनाने के लिए अंग्रेजी भाषा में मात्राएँ उड़ा दी गईं आज भी साबुन हम्माम में m के ऊपर शिरोरेखा का इस्तेमाल हो रहा है जो पुरानी रवायत की याद दिलाता है

  9. iऔर j की बिंदी की खोज की यात्रा वास्तव में रोचक रही। इसलिए भी कि ये दोनों बिंदियां जाने कब से साथ साथ बिंदास चल रही हैं इन्हें तनिक भी परवाह नहीं कौन उन्हें देख रहा है कौन नहीं। लेकिन ‘सर जी आपकी सूक्ष्म दृष्टि ने इन्हें पकड़ कर मानो कटघरे में ला खड़ा किया! किसके समक्ष ? हिंदी की उस बिंदी के समक्ष जो इंतजार में ही रहती है कि कोई तो उसे देखे और समझे कि ये कोई ‘साज सज्जा ‘नहीं बल्कि प्रतिबद्धता है देश और विदेश में भी अभिव्यक्ति के लिए।
    आपको बधाई सर

  10. “हिंदी दिवस “ शब्द से “पुरवाई “ के इस सम्पादकीय की शुरुआत करते हुए सम्पादक श्री तेजेंद्र शर्मा अंग्रेज़ी लिपि के बिन्दी वाले 2 वर्णों की ओर हमारा ध्यान आकृष्ट करते हैं । वास्तव में यह नयी बात है कि हिन्दी की तरह अंग्रेज़ी के – iऔर j पर भी बिंदी है जिसे हमेशा देखा और लिखा- पढ़ा जाता है । इस लिपि की उत्पत्ति,11वीं सदी तथा 16वीं सदी में इसके विकास क्रम पर भाषावैज्ञानिक दृष्टि सम विवेचन किया गया है । जिससे सम्पादक की बहुज्ञता झलकती है ।
    वैसे हिन्दी दिवस निकल जाने के बाद अगले हिन्दी दिवस तक के बीच का अन्तराल हिन्दी भाषा और लिपि के विकास – विस्तार की दिशा में विचारणीय है । इसी मनोभाव को व्यक्त करते हुए संपादक ने “पुरवाई” के इस अंक को प्रेरक बना दिया है ।
    अंक के अन्य खंड भी पठनीय हैं ।
    बहुत बधाई ।

    मीनकेतन प्रधान
    भारत

    • प्रिय भाई मीनकेतन जी, आपने संपादकीय को गहराई से पढ़ा और सारगर्भित टिप्पणी लिखी… आपकी टिप्पणी पुरवाई पत्रिका के लिए महत्वपूर्ण होती है।

  11. अभिवादन सर
    आपका हर संपादकीय निश्चित रूप से ज्ञान का भंडार लिए होता है । ऐसी जानकारी जिन्हें हमने सोचा ही नहीं । अद्भुत
    इतने ज्ञानवर्धक संपादकीय के लिए ह्रदय से आभार
    रेणुका श्रीवास्तव

    • रेणुका जी आपको पुरवाई के संपादकीय पसंद आते हैं, हार्दिक धन्यवाद। स्नेह बनाए रखें।

  12. सही कहा आपने सीखने की कोई आयु सीमा नहीं होती और आप कुछ ना कुछ सीखते सिखाते रहते हैं। बढ़िया संपादकीय के लिए बहुत-बहुत हार्दिक आभार

  13. हिन्दी की बिंदी से शुरू होकर अंग्रेजी की बिंदी पर बहुत गहन जानकारी दी है।इसे टिटल कहते हैं यह तो मुझे ज्ञात था पर उसके पीछे की कहानी अभी ज्ञात हुई। कई लोग … के बारे में भी नहीं जानते। इसे एलप्सिस कहते हैं जो तीन ही होते हैं। कई लेखक इसकी संख्याओं में वृद्धि कर देते हैं।
    बहुत अच्छी जानकारी देने के लिए आदरणीय तेजेन्द्र शर्मा जी को धन्यवाद

    • पद्मा आपने ‘एलिप्सिस’ के बारे में बता कर हमारे पाठकों की जानकारी में वृद्धि की है। हार्दिक धन्यवाद।

  14. सादर नमस्कार सर…
    बहुत ही सुंदर संपादकीय है… मेरे लिए अत्यंत महत्वपूर्ण भी… मुझे i और j की यह कहानी बहुत पसंद आई… मैं यह कहानी मेरे बच्चों को भी सुनाऊँगी…..
    साधुवाद सर……
    ऐसे ही नए विषयों पर आपके संपादकीय पढ़ने की प्रतीक्षा रहेगी….

    • अनिमा जी, संपादकीय को लेकर आपके उत्साह ने हमारा मनोबल ऊंचा किया है। हार्दिक धन्यवाद।

  15. सबसे पहले हिंदी की स्थिति पर जो बात कही वो सोलहों आने सही कहीं।सितंबर माह से पहले ही हिंदी के बिंदिया लगाकर राज भाषा वाले ,पढ़ने वाले,पत्रकारिता वाले और आयोजन करने वाले बाजार की तर्ज़ पर अपनी आमद दर्ज़ करने और कराने लगते हैं। हिंदी के लिख्खाड़ अपने पुराने लेखों आलेखों,संस्मरणों और हिंदी के समारोहों में बुलाये जाने वाले अपनी अपनी डफली और अपना राग अलापने शुरू हो जाते हैं। गोया,बड़ी माफ़ी के साथ,श्राद्ध पक्ष के पंडितों और महापंडितों के अंदाज़ में हिंदी का जनेऊ पहन कर पैसा और नाम कमाने निकल पड़ते हैं । इस पर सभी को सोचना चाहिए।
    हिंदी भाषा में बिंदी से अंग्रेजी भाषा की बिंदियों और i और j पर भाषा विज्ञान की टिप्पणियां सहज और सरल हैं और दोनों भाषाओं का क्लासिक ज्ञान सहज ही देती हैं।
    इसके लिए संपादक महोदय को बधाई ।

    • भाई सूर्य कांत जी आपने हिंदी के श्राद्ध पक्ष और जनेऊ के बारे में जो व्यंग्य किया है, बेहतरीन है। आपने संपादकीय के विषय पर जो टिप्पणी की है, हमारे लिए महत्वपूर्ण है।

  16. हमेशा की तरह इस बार भी सम्पादकीय में नई जानकारी है। कभी विचार ही नहीं आया कि आई और जे पर बिंदी क्यों लगती है; लेकिन आपकी शोधपरक दृष्टि ने खोजकर पूरा इतिहास ही बता दिया है। रोचक और ज्ञानवर्धक जानकारी देने के लिए साधुवाद तेजेंद्र जी।

  17. बिंदियों का मसला अंग्रेजी में भी है, यह पता तो था परन्तु इसका एक इतिहास भी है, यह नई बात लगी। जानकारी भी एकदम नई थी। इस जानकारी को बांटने के लिए धन्यवाद।

  18. सादर नमस्कार तेजेन्द्र जी,
    आजतक हम हिंदी दिवस पर हिन्दी की बिंदी के नीरसता की हद तक गुणगान सुनते चले आ रहे हैं ,पहली बार अंग्रेजी बिंदी की ओर आपने ध्यान दिलाया है।शायद इसके पीछे हमारी यह मानसिकता रही होगी कि बिन्दी ,सिंदूर, चूड़ी तो केवल हमारे पास है।आपने हमारी दृष्टि को व्यापक किया है।
    टाइटल शब्द बिन्दी का substitute है , यह हमारे लिए नई जानकारी है।
    सर्वाधिक रोचक रहा minimum शब्द, सैकड़ो बार प्रयोग करने पर भी उसके structure ,यानि रेखाओं पर ध्यान नहीं गया।
    इस शोधपरक संपादकीय के लिए धन्यवाद।

    • सुमन जी, आपकी पार्टी टिप्पणी हमारे लिए उत्साहवर्धक है। हार्दिक धन्यवाद।

  19. 52 साल पहले इंग्लिश लिटरेचर में ओनर्स डिग्री लेने के बाद आज फिर कुछ नया सीखा।

  20. अंग्रेजी के i और j लेटर की बिंदी तथा इनकी उत्तप्ति के साथ के साथ आपने अंग्रेजी के कैपिटल लेटर्स को अपर-केस तथा स्मॉल लेटर्स को लोअर केस की उत्तप्ति के बारे में अच्छी जानकारी दी है।
    आपका यह कहना एकदम उचित प्रतीत होता है कि कुछ चीज़ों के हम इतने आदी हो जाते हैं कि उनके बारे में कुछ सोचते ही नहीं हैं। हम इस गलतफहमी का शिकार होते हैं कि हमारा ज्ञान असीमित है शायद इसी कारण हम उनके बारे में सोचते ही नहीं हैं। अगर सोचें तो पाएंगे कि जीवन में कोई भी चीज़ बिना किसी कारण के नहीं होती। इसकी वजह अनेक बार अकादमिक या साहित्यिक नहीं, बल्कि पूरी तरह व्यावहारिक होती है।
    आपको आपके शोधपरक संपादकीय अंग्रेजी में बिंदी के लिए हार्दिक बधाई।

    • सुधा, आपको संपादकीय पसंद आया और अंग्रेज़ी की बिंदी का शोध अच्छा लगा… इसके लिये दिल से शुक्रिया। स्नेह बनाए रखेंं।

  21. जितेन्द्र भाई: इस बार का आपका सम्पादकीय बहुत मस्ती वाला लगा और इसके लिए बहुत बहुत साधुवाद। माना कि शुरू शुरू में बिना किसी पहचान का “j” अक्षर केवल सौंदर्य और लेखन-सुविधा की दृष्टि से विकसित किया गया था लेकिन 16वीं शताब्दी के बाद जब इस अक्षर को अपनी अलग ध्वनि (अंग्रेज़ी के soft ‘g’ के समान) के साथ साथ ‘व्यंजन’ उपाधी से भी सम्मानित किया गया तो फिर इसके सिर पर जो बिन्दु (टिटल) को बैठे रहने दिया वो क्यों? जब इस नए अक्षर को पायजेब पहना दी या फिर पूंछ लगा दी तो फ़िर तो इसकी अपनी ही पहचान केवल बिना बिन्दु के होनी चाहिए थी।

    मुझे ऐसा लगता है कि जिस समय की हम बात कर रहे हैं उस समय (ज) ध्वनि का कोई अक्षर अंग्रेज़ी वर्णमाला में नहीं था इसीलिए (ज) ध्वनि के लिए सदा “G” अक्षर की शरण लेनी पड़ती थी। वैसे “j” के इस नामकरण के बाद “G” अक्षर ने भी ठणडी सांस ली होगी क्योंकि जब जब भी भी ‘ज’ ध्वनि की ज़रूरत हुई वहाँ बेचारी ‘G’ को जाना पड़ता था। जैसे यदि किसी को जेल भेजना हो तो उसकी मन्ज़िल GAOL होती थी। एसे ही जॅर्ज नामक सब बच्चे अपना नाम GEORGE लिखते थे। ‘j” की इस काया पलट के बाद Gaol तो Jail हो गया लेकिन George बेचारा अभी भी सोच रहा है कि मैं ने क्या गुनाह किया था जो मेरा नाम अभी भी पुराने ढ़र्रे पर चल रहा है। वैसे ढ़ूण्डने पर ऐसे बहुत से उदहारण आपको मिल जाएंगे।

    • विजय भाई आपकी टिप्पणी की मस्ती तो शब्दों से बाहर उछल-उछल कर गिर रही है… ज़बरदस्तम…

  22. मेरे विचार

    तेजेन्द्र शर्मा का संपादकीय “अंग्रेज़ी में भी बिंदी होती है… (आई जे… आई जे…)” अपनी मौलिक विषय-वस्तु, शोधपरक दृष्टि और रोचक प्रस्तुति के कारण पाठक का विशेष ध्यान आकर्षित करता है। लेखक ने अंग्रेज़ी के i और j पर लगी छोटी-सी बिंदी जैसे सामान्य विषय को भाषा-विज्ञान, इतिहास, मुद्रण-कला और शब्द-व्युत्पत्ति से जोड़कर अत्यंत सहज, रोचक एवं ज्ञानवर्धक ढंग से प्रस्तुत किया है। यह लेख केवल तथ्य नहीं बताता, बल्कि पाठक की जिज्ञासा को निरंतर जागृत रखता है और उसे सामान्य दिखने वाली बातों के पीछे छिपे गहरे अर्थों को खोजने के लिए प्रेरित करता है।

    संपादकीय की भाषा सरल, प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी है, जिससे पाठक आरंभ से अंत तक जुड़ा रहता है। ऐतिहासिक संदर्भ, प्रमाणिक तथ्य और सहज उदाहरण लेख को विश्वसनीयता प्रदान करते हैं। विशेष रूप से लेखक का यह संदेश कि सीखने की कोई आयु-सीमा नहीं होती, पूरे आलेख को प्रेरणादायी स्वर प्रदान करता है। ज्ञान, शोध, भाषा-सौंदर्य और पठनीयता का संतुलित समन्वय इस संपादकीय को एक उत्कृष्ट, संग्रहणीय और विचारोत्तेजक रचना बनाता है।

    डॉ प्रीति समकित सुराना

    • प्रीति जी आपने लिखा है कि – यह लेख केवल तथ्य नहीं बताता, बल्कि पाठक की जिज्ञासा को निरंतर जागृत रखता है और उसे सामान्य दिखने वाली बातों के पीछे छिपे गहरे अर्थों को खोजने के लिए प्रेरित करता है। – आप इसे युवा पीढ़ी के लिये अवश्य प्रेषित कीजियेगा… आपका हार्दिक धन्यवाद।

  23. नमस्कार जी,
    धन्य है आपकी प्रखर दृष्टि को l एक छोटी- सी बिंदी को आपने जमीं से उठाकर फलक पर बैठा दिया l

    हिन्दी में इसका कितना महत्व है ये तो सभी जानते हैं l कैसे चिंता से चिता या पंक से पक बन जाता है l परंतु अंग्रेजी में इनकी महत्ता को, आज का संपादकीय पढ़कर ही जान सके l पुरवाई के हरएक संपादकीय से हमारे ज्ञान में निरंतर वृद्धि होती है l आपको अनेकों प्रणाम l

    सबसे बड़ा लाभ तो ये है कि बिना किसी मेहनत के हमें सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त हो जाती है l आप इतना श्रम करते हैं, इतनी सारी पुस्तकें रिफर करते हैं, गूगल में छान-बीन करते हैं , और पुरवाई के पाठकों को सब तैयार साम्रगी मिल जाती है l इसके लिए हम आपके तहेदिल से शुक्रगुजार हैं l आपके श्रम, सच्ची लगन और समर्पण को सलाम है l

    हमारे देश में एक और बिंदी है, सुहागन महिला के माथे की बिंदी, इसके बिना सुहाग अधूरा है l माथे पर बिंदी लगाने और न लगाने में कितना बड़ा फर्क़ है, ये तो सभी जानते ही हैं l

    आपने अँग्रेजी में बिंदी का महत्व औरबिंदी की उत्तपत्ति , अपर केस, लोअर केस आदि की बहुत अच्छी जानकारी दी है
    धन्यवाद

    • उषा जी आपने तो कमाल कर दिया… हिंदी की बिंदी को सुहागन की बिंदी से मिला दिया… जय हो…

  24. सचमुच एक नयी जानकारी। भाषाविदों के लिये बहुत महत्वपूर्ण भी। ऐसी ही नयी जानकारियों से उपकृत करते रहें।

  25. आदरणीय,सूक्ष्म दृष्टि और भाषाई तथ्यों से परिपूर्ण आपका यह संपादकीय पाठकों से प्रवाहपूर्ण और संवादधर्मी भाषा के माध्यम से विषय की नवीनता और रोचकता प्रस्तुत करता है।जिस शोधपरकता,तार्किक विवेचन व सटीक विश्लेषण से आपने भाषा विज्ञान विषय के महत्वपूर्ण पक्ष की गहनता को स्पष्ट किया है वह वास्तव में श्लाघनीय है।पुन:विचारोत्तेजक और ज्ञानवर्धक एवं शोधपरक संपादकीय के लिए आपको हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ

  26. विचारोत्तेजक ज्ञानवर्धक और शोधपरक संपादकीय से कई जानकारी हासिल हुई।
    अब तक हिंदी की बिंदी ही सालाना जश्न मनाती थी, बहस, चर्चा, व्यंग्य का हिस्सा थी।
    अब अंग्रेजी भी होगी।
    इस उम्र में भी आपकी खोजी प्रवृत्ति और सक्रियता अद्भुत है।

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