लेखक- जवाहर कर्नावट
प्रकाशक- निदेशक, राष्ट्रीय पुस्तक न्यास
प्रकाशन वर्ष- पहला संस्करण 2024
लिखित दस्तावेज़ों की प्रामाणिकता सर्वमान्य है। हिंदी की वैश्विक उपस्थिति पर महत्वपूर्ण दस्तावेजों का शोध करनेवाले ऐसे एक जिज्ञासू विद्वान डॉ. श्री जवाहर कर्नावट हैं। राष्ट्रीय पुस्तक न्यास द्वारा प्रकाशित इनकी पुस्तक, ‘विदेश में हिंदी पत्रकारिता- 27 देशों की हिंदी पत्रकारिता का सिंहावलोकन’, वैश्विक हिंदी पत्रकारिता का आज तक का समग्र अध्ययन प्रस्तुत करता है और एक अभूतपूर्व, मौलिक एवं ऐतिहासिक ग्रंथ बन जाता है।
डॉ. कर्नावट द्वारा इस पुस्तक में 27 देशों की हिंदी पत्रकारिता के लगभग 118 वर्षों के इतिहास का सिंहावलोकन किया गया है। 294 पृष्ठों की इस पुस्तक को चार भौगोलिक क्षेत्रों में विभाजित किया गया है, फिर अध्य्यन की सुविधा के लिए उस भौगोलिक क्षेत्र के देशों को 22 अध्यायों में विभाजित किया गया है। तत्पश्चात प्रत्येक देश की हिंदी पत्रकारिता से संबंधित साक्ष्य और जानकारियाँ दी गई हैं। यथा-गिरमिटिया देशों में पत्रकारिता के अंतर्गत मॉरीशस, दक्षिण अफ्रीका, फीजी, सूरीनाम, गयाना तथा त्रिनिदाद-टुबैगो देशों में हिंदी पत्रकारिता पर प्रकाश डाला है। उत्तरी अमेरिका और ऑस्ट्रेलिया महाद्वीप के देशों में अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया तथा न्यूज़ीलैंड की हिंदी पत्रकारिता के विषय में जानकारी दी गई है। यूरोप महाद्वीप के देशों में ब्रिटेन, नीदरलैंड, जर्मनी, नॉर्वे, हंगरी, बुल्गेरिया तथा रूस की हिंदी पत्रकारिता की चर्चा की गई है तथा एशिया महाद्वीप के देशों के अंतर्गत जापान, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत, कतर, चीन, तिब्बत, सिंगापुर, म्यांमार, श्रीलंका, थाईलैंड तथा नेपाल की हिंदी पत्रकारिता को उद्घाटित किया गया है। पुस्तक के मध्य में पृ. 162 के पश्चातसाक्ष्य रूप में 16 पृष्ठ विभिन्न देशों में प्रकाशित होनेवाले कुछ पत्र-पत्रिकाओं के चित्र पुस्तक को रोचकता और प्रामाणिकता प्रदान करते है
भौगोलिक क्षेत्रों के आधार पर विश्व में हिंदी पत्रकारिता का विभाजन पाठक को उस भौगोलिक क्षेत्र की तत्कालीन सामाजिक स्थितियों एवं वातावरण से अवगत कराता चलता है साथ ही, पाठक को वर्तमान से तुलना करने का अवसर प्रदान करता है। प्रत्येक देश की जनसंख्या और उसमें भारतीयों की जनसंख्या के आँकड़े दिए गए है, इसी प्रकार उन देशों में हिंदी तथा अन्य भाषा भाषियों के बोलनेवालों की संख्या के आँकड़े भी दिए गए हैं। वहाँ से प्रकाशित होनेवाले पत्र-पत्रिकाओं, व्यक्तियों और संस्थाओं के विषय में क्रमवार जानकारी दी गई है। इस पुस्तक में आवश्यकतानुसार, किसी देश की हिंदी पत्रकारिता का विस्तृत वर्णन है तो किसी देश की हिंदी पत्रकारिता का संक्षिप्त ब्यौरा। जैसे, कतर में प्रथम डिजिटल समाचार पत्र 2020 में आरंभ हुआ। इसलिए अध्यायों में विस्तार अधिक है, तो कुछ में कम। पुस्तक के अंत में विदेशों में सामग्री उपलब्ध करानेवाले सभी महानुभावों और संस्थाओं का नामोल्लेख है। इस प्रकार का सुविभाजन और तथ्य इसकी प्रामाणिकता को पुष्ट करते हैं पुस्तक को सुग्राह्य बनाते हैं।
म्यांमार पर अंग्रेज़ों के आधिपत्य की तिथि संभवतः टायपिंग की त्रुटिवश 1986 छप गई है (वास्तविक 1886),इसे अगले संस्करण में संशोधित कर लिया जाएगा, यह अपेक्षा है।
औपनिवेशिक साम्राज्य का विस्तार करने अंग्रेज़ जिन-जिन देशों में गए, वहाँ के निवासियों को किसी न किसी भूमिका में अपने साथ अन्य उपनिवेशों में ले गए और अपने कार्य हेतु वहाँ उनकी सेवाएँ लीं। आधुनिक युग में भारतीयों के प्रवासन का एक प्रमुख कारण भी अंग्रेज़ी शासन था। जहाँ एक ओर 19वीं शताब्दी में गिरमिटिया देशों में लोग अमानवीय परिस्थितियों में रहने को मजबूर थे, वहीं दूसरी ओर सूचना प्रौद्योगिकी के विकास, और भूमंडलीकरण के पश्चात हुए प्रवासन में उच्च-शिक्षित व्यवसायी, डॉक्टर, इंजीनियर आए, ये संपन्न थे इन्हें आर्थिक कष्ट न था। ये लोग बेहतर जीवन और रोज़ी-रोटी की तलाश में स्वेच्छा से आए थे। 1990 से भूमंडलीकरण और 2000 के पश्चात सूचना प्रौद्योगिकी के विस्फोट ने इस आवागमन और सूचना संचार में अभूतपूर्व त्वरा से विभिन्न देशों में आवागमन में भी त्वरा उत्पन्न हुई। अतः अभाव और संपन्नता में प्रकाशित पत्र -पत्रिकाओं में अंतर देखा जा सकता है। विभिन्न देशों में प्रवासियों के पत्र-पत्रिका प्रकाशन की प्रेरणा, उद्देश्य, काल वातावरण भिन्न थे। अतः विषय सामग्री भिन्न होना स्वाभाविक था। किंतु कुछ कारण समान हैं – जैसे एकजुट होना, अपनी भाषा और संस्कृति को जीवित रखना और स्वयं को अभिव्यक्त करने की गहन इच्छा होना और अपने देश से जुड़े रहना। ब्रिटेन के संबंध में वे लिखते हैं, ‘छठे दशक में ब्रिटेन के खुले निमंत्रण पर बहुत बड़ी संख्या में भारतीयों का आप्रवासन इंग्लैंड में हुआ। इस दौरान अनेक भारतीय संस्थाएँ बनी। सामाजिक एवं सांस्कृतिक आधार के साथ उनका मुख्य लक्ष्य था भारतीयों की एकजुटता।…. धीरे-धीरे स्वतंत्र अभिव्यक्ति के द्वार खुलने भी लगे। अंततः यह महसूस किया गया कि भारत से जुड़े रहने के लिए और विदेश में भी अपने आधार को मजबूत बनाने के लिए यह नितांत आवश्यक है कि स्वयं को उस सांस्कृतिक भावभूमि से अलग न किया जाए, जो उनके वर्चस्व की शक्ति है, उनकी अपनी पहचान है। अपनी भाषा को उन्होंनेइसका एक महत्त्वपूर्ण योजक तत्व माना। यह सोच ही हिंदी पत्र-पत्रिकाओं की आधार-भूमि बनी। यही कारण है कि आज विश्व में जहाँ-जहाँ भारतीय मूल के लोग बसे हैं, वहाँ-वहाँ हिंदी की उपस्थिति किसी न किसी रूप में अवश्य है। प्रवास के कारण भले ही भिन्न रहे हों, लेकिन नये परिवेश में हिंदी भाषा और भारतीय संस्कृति ने सबको जोड़कर रखा। उन्होंने धार्मिक ग्रंथों के अध्य्यन, तीज-त्योहारों का आयोजन, गीत-संगीत, गायन, नृत्य, वादन और लेखन के माध्यम से स्वयं को जिलाए और भारत से जोड़े रखा।
डॉ. कर्नावट आजीवन वाणिज्य के क्षेत्र से संबद्ध रहे, लेकिन हिंदी के प्रचार-प्रसार और प्रयोग से संबद्ध गतिविधियों में वे सदा सक्रिय रहे। आप बैंक में कार्यरत रहते हुए भारत के विभिन्न प्रमुख हिंदी समाचार पत्र जैसे, ‘नई दुनिया’,‘दैनिक भास्कर’ और पत्रिकाओं में निरंतर लिखते रहे। आपकी पुस्तक ‘आधुनिक भारतीय बैंकिंग:सिद्धांत एवम् व्यवहार’, मानव संसाधन विकास मंत्रालय विकास मंत्रालय द्वारा पुरस्कृत की गई है। 1999 में लंदन के हिंदी विश्व सम्मेलन में भाग लेने आए डॉ. कर्नावट को कुछ अन्य देशों की हिंदी पत्रकारिता के विषय में जानकारी मिली और इस विषय में उनकी रुचि कुछ इस तरह जाग्रत हुई कि फिर वे रुके नहीं। लगभग 20 वर्षों तक विभिन्न देशों की सतत यात्राएँ, अथक परिश्रम और गहन अध्ययन। 2019 में बैंक ऑफ़ बड़ौदा की कार्पोरेट शाखा से महाप्रबंधक के रूप में सेवानिवृत्त होते ही संकलित सामग्री के चयन की प्रक्रिया आरंभ हो गई। यह कार्य सरल न था। चयनित सामग्री में से ‘क्या रखूँ क्या छोड़ू’ की दुविधा और कुछ सामग्री के न मिल पाने के दुख के पश्चात भी उपलब्ध सामग्री में से ‘सार-सार को गहि लेय’ की रीति से परिणति इस पुस्तक के रूप में हुई और 2024 में ‘विदेश में हिंदी पत्रकारिता ( 27 देशों की हिंदी पत्रकारिता का सिंहावलोकन)’, पाठकों से सम्मुख आई।
प्रामाणिक जानकारी एकत्रित करने हेतु डॉ. कर्नावट ने 20 वर्षों तक पाँच महाद्वीपों के अनेक देशों की अनेक यात्राएँ की, लोगों से मिले, जानकारी एकत्रित की। जिससे पुस्तक में प्रामाणिकता के साथ-साथ रोचकता का संचार हुआ है। यात्रा संस्मरण के छौंक के साथ इतिहास के गलियारों की यात्रा एक कल्पनाशील पाठक को एक नये संसार में ले जाता है, जहाँ से एक ओर उन भारतीयों के संघर्षों और पीड़ाओं को देखता है तो दूसरी और उसकी सुखद परिणति के अनुभव से आनंदित होता है। बैंकिग-सेवा का प्रभाव भी इस पुस्तक में स्पष्ट द्रष्टव्य है, कि वे खोजी प्रवृत्ति के तलस्पर्शी चिंतक हैं और गहरे पानी से मोती निकालकर लाने में, ‘आँखिन देखी’ में विश्वास रखते हैं। शोध प्रविधि के अनुरुप तटस्थता औऱ तथ्यात्मकता का आद्योपंत निर्वाह इस पुस्तक का वैशिष्ट्य है।
पाठकों के लिए यह पुस्तक आँखें खोलने का कार्य करती है, डॉ. कर्नावट के शब्दों में, ‘ये दस्तावेज हिंदी के वैश्विक आंदोलन को न केवल दिशा देते हैं बल्कि आत्मबल और आत्म-गौरव का विजयी अस्त्र भी प्रदान करते हैं’। गिरमिटिया देशों की पत्रकारिता के संदर्भ में उनका यह वक्तव्य हिंदी की शक्ति को उद्घाटित करता है। ‘कि भारत के विविध प्रांतों के गिरमिटियाओं द्वारा संपर्क भाषा के रूप में हिंदी का ही प्रयोग होता था। ‘इनमें अधिकतर भोजपूरी बोलनेवाले थे। इस कारण अवधी, बांग्ला, उड़िया, तेलुगू, तमिल और मराठी गिरमिटियों को भी भोजपुरी सीखनी और बोलनी पड़ती थी। भोजपुरी ने गिरमिटियों के बीच संपर्क भाषा का रूप धारण कर लिया था। धीरे-धीरे भोजपुरी के स्थान पर खड़ी बोली के रूप में मानक हिंदी का प्रयोग बढ़ने लगा’। ये गिरमिटिया अत्यंत विषम परिस्थितियों में भाषा के भेद भुलाकर परदेस में एकजुट रह कर ही, आज प्रगति के मार्ग पर निरंतर अग्रसर हो रहे हैं। यह बात वर्तमान में भाषा को मुद्दा बनाकर विवाद खड़ा करने अवसरवादी भारतीय राजनेताओं के लिए महत्त्वपूर्ण सीख है।
मॉरीशस के संदर्भ में लेखक का यह कथन कि, ‘हिंदी पत्रकारिता अपने अस्तित्व की रक्षा और विकास के लिए निरंतर संघर्षरत है’ वर्तमान वैश्विक हिंदी पत्रकारिता के विषय में काफी हद तक सही है, हालाँकि सूचना प्रौद्योगिकी के वर्तमान युग में विविध देशों से प्रकाशित होनेवाली ऑनलाईन पत्र-पत्रिकाओं ने इस कमी को कुछ हद तक पूरा किया है किंतु निश्चित ही विदेशों में हिंदी पत्रकारिता का संघर्ष चिंता का विषय है। इस संबंध में नॉर्वे की हिंदी पत्रिका आप्रवासी टाईम्स के 2004 के एक अंक में आप्रवासी भारतीयों की चिंताओं को व्यक्त करती संपादक सिद्धार्थ जोशी की एक अत्यंत महत्वपूर्ण टिप्पणी उल्लेखनीय है। जिसमें उन्होंने भारत की सांस्कृतिक कूटनीति पर प्रश्न उठाया है और लिखा है कि, ‘दुनिया के लगभग डेढ़ सौ देशों में जहाँ भारतीय दूतावास कार्यरत हैं, वहाँ केवल 15 भारतीय सांस्कृतिक केंद्रों का होना ऊँट के मुँह में जीरा के समान है’। इंटरनेट पर भारत सरकार की वेबसाइट पर प्रकाशित 11.1.2024 तक की नवीनतम जानकारी के अनुसार यह संख्या 37 हो चुकी है, किंतु आज जहाँ विश्व के लगभग 160 देशों में प्रवासी भारतीय रहते हैं, भूमंडलीकरण और सूचना क्रांति के उपरांत 20 वर्षों में मात्र 17 नये केंद्रों का खुलना कुछ प्रश्न खड़े करता है। ‘बूंद-बूंद से घट भरै’, प्रवासी भारतीय तो अपना कार्य अपने दायित्व का निर्वाह कर रहे हैं किंतु विदेशों में हिंदी संबंधित गतिविधियों को भारत सरकार का सहयोग अपेक्षित है।
सुप्रतिष्ठ विद्वान पत्रकार, इतिहासकार पद्मश्री विजयदत्त श्रीधर ने प्रस्तावना में इंगित किया है कि आनेवाले समय में अनुसंधित्सु इस विषय को और विस्तार देंगे। 27 देशों में हिंदी पत्रकारिता का अध्य्यन कर के डॉ. कर्नावट ने तो शोधकर्ताओं के लिए एक ऐसा नया द्वार दिखाया है, जो शोध की अंनत संभावनाओं से भरा है इससे अन्य देशों में भी हिंदी पत्रकारिता पर शोध अध्य्यन की कई संभावनाएँ उदित होती हैं। इस पुस्तक का एक-एक अध्याय, वे महानुभाव जो विदेशों में हिंदी पत्रकारिता को जीवित रख सके, वे संस्थाएँ, जिन्होंने हिंदी संबंधी गतिविधियों को कभी परिस्थिति की माँग तो कभी अपने जुनून के कारण विषम परिस्थितियों में भी जारी रखा, यह सब विस्तृत और गहन अध्य्यन की अपेक्षा रखता है। मुझे विश्वास है सरल हिंदी भाषा में लिखी इस पुस्तक का लाभ, शोधार्थी ही नहीं, अपितु हिंदी के वैश्विक विस्तार को समझने के लिए जिज्ञासु पाठक भी ले सकेंगे।
डॉ. वंदना मुकेश
35 ब्रुकहाउस रोड
वॉलसॉल, यू.के
जवाहर कर्नावट जी की पुस्तक ” विदेश में हिंदी पत्रकारिता (27 देशों की हिंदी पत्रकारिता का सिंहावलोकन)”पर डॉ. वंदना मुकेश की समीक्षा पढ़कर महसूस हुआ कि इस पुस्तक को लिखने में आदरणीय कर्नावट जी ने काफ़ी मेहनत की है।यह परिश्रम काबिले तारीफ़ है।
वंदना जी आपने भी बेहतरीन समीक्षा की, हिन्दी के प्रचार-प्रसार,व उत्थान के लिये यह एक श्रमसाध्य प्रयास था। लेख बेहद महत्वपूर्ण भी है। हम इसमें भिन्न-भिन्न प्रकार से विभिन्न संदर्भों में प्रयुक्त गिरमिटिया शब्द को नहीं समझ पाए। एक बेहतरीन समीक्षा में यह शब्द व्यक्तिगत रूप से खटका। बेहतरीन समीक्षा के लिए आपको बहुत-बहुत बधाई। आदरणीय कर्नावट जी को शुभकामनाएँ।
नीलिमा जी धन्यवाद- सहमत । हर कोई गिरमिटिया शब्द का अर्थ जाने, यह आवश्यक नहीं। गिरमिटिया” शब्द एक ऐतिहासिक शब्द है, जिसका संबंध औपनिवेशिक काल (British colonial period) से है। यह शब्द “Agreement” (एग्रीमेंट) से बना है — जब भारतीय मजदूरों को ब्रिटिश उपनिवेशों (जैसे फिजी, मॉरीशस, त्रिनिदाद, गुयाना, सूरीनाम, दक्षिण अफ्रीका आदि) में काम करने के लिए अनुबंध (agreement) पर भेजा जाता था। इन अनुबंधित श्रमिकों को गिरमिटिया कहा जाता है।