भाषा - काव्यभाषा की अवधारणाओं का पुनरावलोकन : संभव होने की अजस्र धारा 3
मानव सभ्यता के विकास में भाषा का स्थान अपरिमेय रहा है।भाषा वैज्ञानिकों ने मनुष्य की संप्रेषण शैली तथा उसके विचारों के प्रवाह को लेकर अत्यंत सूक्ष्म एवं विस्तृत चिंतन किया है।भाषा मानव – मस्तिष्क की उर्वर भूमि में अंकुरित,पल्लवित और विकसित होती है ।उसकी अविराम संचरणशीलता एवं  निरंतर गतिमयता में ही उसका स्वरूप  संवरता रहता है।
इसी तथ्य की वैज्ञानिक दृष्टि से पुनरावलोकन करते हुए भाषा  – काव्यभाषा के प्रागैतिहासिक काल से लेकर  आधुनिक युग की यात्रा को रेखांकित करती हंस प्रकाशन से डॉ. पवन माथुर की सद्यःप्रकाशित पुस्तक ‘ संभव होने की अजस्र धारा ‘ आयी है।
     पुस्तक  प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक प्रचलित भाषा में आए परिवर्तन को  भाषा के ‘जैविक आधार ‘ , और इस आधार की प्रगैतिहासिकता की राह को टटोलती है । भाषा के विकास और प्रयोग के लिए कौन -सी जैविक परिस्थितियां जिम्मेदार हैं,मस्तिष्क में भाषा का निर्माण कैसे होता है,भाषा क्षमता कैसे प्राप्त होती है,भाषा के पीछे कौन – सी स्नायविक प्रक्रिया कार्य करती है,मानव जाति में भाषा का विकास कैसे हुआ?,भाषा व्यवहार क्या है?,मनुष्य समाज में भाषा व्यवहार करने से पहले उसकी  मानसिक स्थिति क्या होती है?,मस्तिष्क में भाषा व्यवस्था के नियम कैसे काम करते हैं?,भाषा से संबंधित दोष(भाषा -विकार) क्या है?  आदि प्रश्नों को सैद्धांतिक -वैज्ञानिक दृष्टिकोण से परखते हुए भाषा के प्रारूप का पुनरावलोकन करती है। इस पुनरावलोकन में यह पुस्तक प्रश्न,लेखकीय – विचार,निष्कर्ष,प्रस्ताव गूंथते हुए पूछती है कि” क्या हम किसी जैविक भाषा की परिधि में कैद हैं? ‘ भाषा ‘ की मूल ईप्सा क्या है?क्या भाषा ‘काल – ध्वंस’ का कारण बनती ? या वह ‘स्व – ध्वंस’ में भी लिप्त हो रही है?इस ‘स्व -ध्वंस’ की गरज समाज को कैसे छिन्न – भिन्न कर रही है इसको भी संकेतित करती है।”(पृष्ठ -6) विभिन्न शोध प्रसंगों एवं उदाहरणों के द्वारा  भाषा सीखने के संबंध में ” जब तक कि हमें शब्द/स्वर का ज्ञान बाहर से निवेशित नहीं किया जाता ,तब तक हम  ‘भाषा’  सीख नहीं पाते … अतः भाषा के लिए बाह्य – उद्दीपक,और जैव – भाषा – तंत्र दोनो ही आवश्यक है।”(पृष्ठ – 31,32) ‘
             आज से लगभग चालीस हज़ार वर्ष पूर्व भाषा की सबसे कच्ची छाप एवं आगे उसके सभ्य,संस्कृत होने के साथ -साथ सृजनात्मकता नए प्रारूपों की असीम संभावनाओं को व्यक्त करती यह पुस्तक भाषा एवं काव्यभाषा पर अलग -अलग लिखे तेरह लेखों का संग्रह है। जो भाषा के निर्माण और विकास की यात्रा को लेकर लिखे गए — ‘भाषा की कच्ची छाप ‘ , ‘ भाषा की जैविक परिधि ‘ , ‘भाषा का मस्तिष्क में प्रारूप ‘ , ‘भाषा की आंतरिक ईप्सा: काल ध्वंस’, ‘वाक् और काल ‘ ,  और ‘भाषा के खेल ‘ शीर्षक से है। जिसमें डॉ.माथुर भारतीय एवं पाश्चात्य विद्वानों के विभिन्न भाषागत मतों को अपने अध्ययन – विवेचन  का आधार बनाकर,अपने मत की पुष्टि करते हुए  भाषा के निर्माण,संरचना,जैविकी,मस्तिष्क -रचना , व्याकरण का मस्तिष्क से संबध आदि पर विस्तार से चिंतन करते हैं।
                सहस्राब्दियों की यात्रा कर भाषा अपनी कच्ची छाप  से आगे बढ़कर  भावाभिव्यक्ति का सशक्त माध्यम बनी। मानव —  मस्तिष्क का इस सृष्टि में अगर सबसे पहला  कोई आविष्कार था — तो वह शब्द ही कहा जा सकता है।भाषा का लिखित रूप हो अथवा मौखिक ‘भाषा ‘ में जीवन और जगत की गतिविधियों को पूर्णतः प्रतिबिंबित किया जा सकता है। हालांकि लेखक का प्रस्ताव यह है कि “यथार्थ का पुनर्सृजन मस्तिष्क में किन्ही जैविक प्रणालियों द्वारा होता है,और हम जिस भाषा में अभिव्यक्ति करते हैं,वह इसी पुनर्सृजन पर आधारित है। इन अर्थों में हम जैविक भाषा की परिधि में कैद हैं (पृष्ठ -32- 33)” अमूमन यह माना जाता है कि भाषा में समय -समय पर जो बदलाव या विकास होते हैं वह मनीषियों के चिंतन -मनन का ही परिणाम है। चिन्तन के स्वरूप के बदलाव के साथ ही भाषा में भी बदलाव आने लगता है। किंतु लेखकीय प्रस्ताव यह है कि प्रत्यय या अवधारणाएं , ‘भाषा ‘ में ही जन्म लेती हैं; यहां तक कि ‘ भाषा ‘ की ‘कालबद्घता’ नए चिंतन – विचार के लिए बाधा भी बन जाती है। पुस्तक, विज्ञान के इतिहास से उदाहरण देते हुए यह प्रस्तावित करती है कि ‘ अरस्तू ‘ अपने समय की ‘भौतिकी की भाषा ‘ के आधार पर जिस ‘ प्रयोग ‘ को एक दृष्टि से देखता है, उसी प्रयोग को कई शताब्दियों बाद ‘गैलिलियो’ एक नई दृष्टि से इसलिए देख पाता है, चूंकि ‘गैलिलियो’ को अलजबरा एवं ज्यामिति के सम्मिलन से ‘ भौतिकी की नई भाषा ‘ उपलब्ध थी। अतः ‘भाषा ‘ के परिवर्तन से नए चिंतन की संभावना बढ़ जाती है।(पृष्ठ -66-67)
       लेखक भाषा की काव्यभाषा तक की इस छलाँग को–‘ रूमानवाद से उत्तर आधुनिक बोध तक ‘ ,’संभव होने की अजस्र धारा: काव्य भाषा’ नामक आलेखों में सफलतापूर्वक प्रस्तुत करते हैं।   यह पुस्तक भाषा – काव्यभाषा पर भारतीय एवं यूरोपीय चिंतन की मूल अवधारणाओं को रेखांकित करने के साथ काव्य -भाषा की रागात्मकता,संकेतिकता तथा बहुल ध्वन्यात्मकता के महत्व को भी अनावृत करने का प्रयास करती है।
     ‘रूमानवाद से उत्तर आधुनिक बोध तक ‘ में
यूरोपियन औद्योगिक क्रांति से पड़े प्रभाव को  वहाँ के दार्शनिक चिंतकों , स्वच्छंदतावादी विचारकों – साहित्य के द्वारा  विश्लेषित करते हुए पवन माथुर जी ने ‘वर्डवस्थ’ ,’ चार्ल्स बादलेयर ‘ ,स्टीफन मलार्मे ‘, ‘टी. एस. इलियट ‘ के कविताओं का जो  हिंदी अनुवाद रूप में प्रस्तुत किया है वह अनुपमेय है। सहज – सरल भाषा में इन कवियों की कविताओं को पढ़ते हुए,उनमें एक गहन शोधकर्ता के साथ-साथ  सफल अनुवादक देखने को मिलता है।
        ‘संभव होने की अजस्र :काव्यभाषा ‘ अंतर्गत स्विस -भाषाविद् ‘सास्युर ‘, ‘डेनिश भाषाशास्त्री ‘लुई – जैल्मेव’ की अवधारणाओं ‘कि भाषा संकेतो का एक तंत्र है जिसके माध्यम से हम विचारों को अभिव्यक्ति देते हैं तथा हर संकेत किसी ‘संकेतक’ एवं ‘संकेतित’ के जुड़वा आधार पर ही कार्यशील होता है।….भाषा दो स्तरों पर कार्यरत है, एक स्तर ‘ध्वन्यात्मक ‘ है तो दूसरा अर्थात्मक को मान्यता देते हुए अंत में यह प्रस्तावित कर देते हैं कि ‘…. काव्यभाषा में संकेतित की अपेक्षा  संकेतिकों का प्रभुत्व रहता है।’संकेतक -शब्द की ध्वन्यार्थकता’ तथा ‘वाक्यों की विशिष्ट बुनावट’  को काव्य अपनी तरह से ही उपयोग में लाता है।” (पृष्ठ -128 – 137) इसे लेखक सर्वेश्वर दयाल सक्सेना  की कविता ‘रात-भर’ की कुछ पंक्तियों के उदाहरण एवं विश्लेषण से पुष्ट कर देता है।
       ‘संज्ञा, सांकेतिकता तथा बहुल -ध्वन्यात्मकता ‘ नामक आलेख में सन् साठ -सत्तर के दशक में सामाजिक – राजनीतिक तंत्र की नाकामयाबियों, मोहभंग एवं निजी संदर्भों, कष्टों को उकेरते रहे विभिन्न कवियों , जैसे– गंगा प्रसाद विमल,नरेंद्र मोहन,बलदेव वंशी,सर्वेश्वर दयाल सक्सेना,रघुवीर सहाय,केदारनाथ सिंह, अशोक वाजपई,रामदरश मिश्र,श्रीकांत वर्मा,कैलाश वाजपेई तथा धूमिल के काव्यांशों के माध्यम से नई कविता के रूप – वैविध्य को विभिन्न प्रश्नों द्वारा जानने का प्रयास किया है।
      अंतिम चार आलेख शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध,गिरिजाकुमार माथुर और अज्ञेय  की काव्य – यात्रा, भाषा – तकनीक  की बारीकियों पर अलग से विचार करते हुए पवन माथुर   उनके काव्य -स्वरूप -अभिव्यक्ति को नई उद्भनाओं ,नए संदर्भ के साथ अर्थ – विस्तार  देते हैं।
             प्रसिद्ध आलोचक – विचारक श्री गिरधर राठी जी की इस मान्यता से सहमत ही हुआ जा सकता है कि ‘प्रस्तुत पुस्तक  में ‘ देश -विदेश के जैविक,भौतिक,गणितीय आदि और भारतीय एवं पाश्चात्य दार्शनिक विवेचनों , उन के विकास क्रम के ज्ञानानुशासनों का वर्णन सरलता से हुआ है वह  अचंभित करता है तथा डॉ. माथुर की ‘जिज्ञासा,खोजबीन,ज्ञात – अज्ञात के बीच लगभग अदृश्य संबंध -सूत्रों को जोड़ने का हुनर अनोखा है।’     पुस्तक न केवल भाषा – काव्यभाषा के अदृश्य संबंधों का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करती है बल्कि पाठकों के समक्ष  संदर्भ- ग्रंथ  के रूप में ज्ञान के अपार खज़ाना  द्वार भी खोलती है। अंततः यही कहा जा सकता है कि पाठको, शोधकर्ताओं,अध्यापकों, सभी वर्ग के ज्ञानार्जन के लिए  एक उपयोगी एवं संग्रहणीय पुस्तक है ‘संभव होने की  अजस्र धारा’!
पुस्तक  : ‘संभव होने की अजस्र धारा’
लेखक  : डॉ. पवन माथुर
प्रकाशक  : हंस प्रकाशन, नई दिल्ली
संस्करण  :  2022,
पृष्ठ         :  230
मूल्य       :  695

1 टिप्पणी

  1. सादर नमन. लेख अच्छा होगा. पर इसे दुबारा लिखा जाए. छोटे- छोटे वाक्यों में. तो पठनीयता बढ़ जाएगी. हम बड़े से बड़ा, गंभीर से गंभीर विमर्श बहुत सरल भाषा में प्रस्तुत कर सकते हैं. भाषा का प्रयोजन ही संप्रेषण है. लंबे वाक्य इस प्रयोजन को विफल करते हैं.
    अत: लेखिका से निवेदन है. इसे कृपया और सरल लिखें.
    धृष्टता के लिए क्षमा चाहता हूँ.

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