गिरिजा नरवरिया द्वारा पं दामोदर शर्मा के खंडकाव्य 'सूली ऊपर सेज पिया की' की समीक्षा 3
समीक्षक
गिरिजा नरवरिया
‘सूली ऊपर सेज पिया की’ गीतकार पंडित दामोदर शर्मा द्वारा लिखा गया  भक्त कालीन मीराबाई की जीवन गाथा को व्यक्त करता खंडकाव्य साहित्य जगत में महत्वपूर्ण स्थान रखता है| पंडित दामोदर शर्मा गीतकार होने के साथ-साथ होम्योपैथिक चिकित्सक के रूप में स्वयं के क्लीनिक का संचालन करते हुए जन सेवा में भी अपना अमूल्य समय देते रहे| हिंदी सेवा और जन सेवा करना ही उनके जीवन का लक्ष्य रहा| पंडित दामोदर जी को यह खंडकाव्य लिखने की प्रेरणा मां और मौसी से ही मिली |भक्ति और प्रेम को समेटे हुए यह खंडकाव्य अपने आप में अद्भुत है | कबीर की भांति पंडित दामोदर शर्मा ने भी जीव और ब्रह्म के मिलन हेतु छंदकाव्य  रूप में अपने भाव व्यक्त करते हुए कहते हैं–
” द्वापर की राधा हो या कलयुग की मीराबाई,  मानव सेवा  का व्रत ले दोनों धरती पर आई | द्वापर में राधा ने जनजीवन की पीर घटाई , मीरा ने कलयुग में धर्म ध्वजा फहराई ।। “
कहा जाता है कि द्वापर में राधा और कृष्ण का संयोग न हो पाने के कारण  राधा वियोग की अग्नि में जलते हुए सदा – सदा के लिए मौन व्रत धारण कर लेती हैं और अपना समस्त जीवन जन सेवा में लगा देती है स्वांतःसुखाय के लिए राधा ने जन सेवा करके दीन दुखियों की पीड़ा को कम किया । गीतकार पंडित दामोदर जी का मीराबाई के संबंध में कथन है-
” कभी सोचता हूं मीरा थी कौन और कहां से आयी ? राधा की अतृप्त आत्मा थी क्या मीराबाई  । यह कैसा संयोग कि दोनों का प्रियतम गिरधारी , यह कैसा संयोग की दोनों रही विरह की मारी ।।”
गीतकार पंडित दामोदर शर्मा की दृष्टि में राधा ही अपने अनकहे दर्द को व्यक्त करने के लिए इस धरती पर बार-बार जन्म लेकर विरह मिलन की आश एवं शाश्वत प्रेम और इस प्रेम के साथ जुड़ी अनंत पीड़ा को मीराबाई के स्वरों  में गुंजित करना चाहती हैं । गीतकार पंडित दामोदर शर्मा ने इस खंडकाव्य में मीराबाई के हृदय पीड़ा का यथार्थ वर्णन किया है । मीराबाई के पदों का गायन तो सभी करते हैं लेकिन मीराबाई के पदों में जो दर्द, संघर्ष, बेचैनी है उसका मनोवैज्ञानिक सजीव चित्रण पंडित दामोदर शर्मा ने किया है । इस खंडकाव्य को पंडित दामोदर शर्मा ने तीन  खंडों में विभक्त किया है ‘ पूर्वा ‘, ‘ छंद ‘,और गाथा ।
पंडित दामोदर शर्मा मूलतः राजस्थानवासी एवं कर्मभूमि मालवा क्षेत्र होने की वजह से इनकी भाषा में राजस्थानी एवं मालवी भाषा का पुट मिलता है । इनकी भाषा सरल एवं सहज है। खंडकाव्य में श्लेष  , अनुप्रास एवं रूपक अलंकार का प्रयोग कर काव्य में सौंदर्यता आ गई हैं ।इसके साथ ही वात्सल्य  रस ,भक्ति  रस, वीर रस, श्रंगार रस के संयोग ,वियोग  का प्रयोग कर खंडकाव्य  ‘सूली ऊपर सेज पिया की ‘ प्रत्यक्ष घटनाओं का साक्षी लगता है ।पूर्वा- इसमें गीतकार पंडित दामोदर शर्मा ने काव्य सृजन की पृष्ठभूमि का उल्लेख किया है यह खंडकाव्य मेड़ता और चित्तौड़ की भूमि के साथ द्वारिका के रणछोड़ मंदिर तक विस्तृत हुआ है।
“पूछा करता मैं तब माता से, मौसी से, गाते गाते तुम क्यों रोने लग जाती हो| जो गीत आंसुओं की झड़ी लगाते हो, बतलाओ ऐसे गीतों को क्यों गाती हो||  कवि का  जन्म भले  ही मऊ मध्य प्रदेश में हुआ लेकिन पैतृक निवास राजस्थान होने की वजह से पूरा परिवार  मीरामय  रहा| बचपन में कभी अपनी मां और मौसी से पूछता था कि तुम ऐसे गीतों को क्यों गाती हो कि  तुम्हारे आंसू आ जाते है मां और मौसी मीराबाई के गीतों में इतनी भाव विभोर हो जाती थी कि उन्हें भी मेरा के दर्द का अहसास होने लगता था |तब मौसी ने मुझे समझाया कि यह कोई साधारण  गीत नहीं है यह तो ईश्वर का बंधन पूजन है ,और हमारे आंसू कोई साधारण आंसू नहीं है यह तो गंगाजल से भी पावन है जिस दिन तुम इन  गीतो का अर्थ समझ लोगे उस दिन तुम मेरे आंसुओं की कीमत पहचान लोगे | हम नारियों का  जीवन कितना  कठिन होता है |एक बार जब तुम  मीरा की जीवनी पढ़ोगे तब तुम्हें समझ में आएगा| मौसी के आशीर्वाद के फल स्वरुप मैंने मीराबाई के पदों को पढ़ा और गाया भी मीराबाई को ही अपना इष्ट देव मानते हुए कवि कहता है संकल्प विकल्पों की दुनिया को छोड़ दिया मीराबाई  को अपना सबकुछ मान लिया ,जब मूर्त मेड़ता में देखी मैंने उनकी लगता था मैंने राधा को पहचान लिया| कवि के लिए राधा और मीरा एक ही नाम है दोनों ही ब्रह्म की  वेदना में तड़पती थी इसीलिए  कवि ने मीराबाई के रूप में राधा के दर्शन पा  लिए है |
छंद: इसमें कवि पंडित दामोदर शर्मा ने राधा और मीरा के जन्म जन्मांतर संबंधों को उजागर किया है |मीरा की भक्तिमय  जीवन धारा किन किन आपदाओं को झेलती हुई अपने आराध्य को पाने की लालसा आजीवन करती रही | मीराबाई ने अपने आराध्य को पाने के लिए राज महल की सुरक्षा एवं भौतिक साधनों का भी त्याग कर दिया था |कवि कहता है  मीरा ने तो दुख बोया था और उसी को काटा, पूर्व जन्म से पुनर्जन्म तक की खाई को पाटा| सीमाहीन दर्द का जब वह भार नहीं ढो पाती, पूर्व जन्म की खुशियों को अपने गीतों में गाती|| मीराबाई जब भी अपने दुख एवं पीड़ा का स्मरण करती तो उसकी आंखों से आंसुओं की धारा बह निकलती और न जाने कितनी पीडाओं का उसने जहर पिया है|| जब दुख की अति हो जाती तो वह अपने पूर्व जन्म की खुशियों को याद करते हुए गाने लगती  ‘नाम तुम्हारा लेकर बड़े बड़े पापी तर जाते ,गीध, अजामिल, गणिका जैसे नाम अमर कर जाते| मीराबाई अपने ईश्वर से प्रार्थना करती हूं कहती है हे प्रभु! तुमने न जाने कितने पापियों का उद्धार किया है तुम्हारी दया दृष्टि मुझ पर ना जाने क्यों नहीं पड़ती? मेरा मन सोचता है कि जोगन बन कर तेरा पता लगाऊं या फिर गले में कंठी माला धारण करके तेरे नाम का अलग घर-घर अलख जगाऊं | रात दिन में तो तुम्हारी चरण वंदना किया करती हूं, तुम्हारा रास्ता निहारा करती हूं, लेकिन तुम निष्ठुर हो गए हो मुझसे मिलने क्यो नहीं आती हो? मीराबाई का हृदय  पीड़ा से व्यथित हो जाता है तो कृष्ण से कहती है ‘ पत्थर कब सुनता है किसी की पीड़ा | अंत में गिरधारी को मनाते हुए कहती हैं ‘ जन्म जन्म के बंधन अपने बोलो कैसे टूटे?
गाथा: इसमें  कवि ने मीरा बाई से संबंधित ऐतिहासिक घटनाओं पर प्रकाश डाला है पंडित दामोदर शर्मा विगत 50 वर्षों से हिंदी काव्य मंच पर सुमधुर गीतकार के रूप में अपनी पहचान स्थापित कर चुके हैं| उनके इस खंडकाव्य को पढ़ते समय वास्तव में ऐसी अनुभूति होती है कि मीराबाई का सारा घटनाक्रम हमारी  आंखों के सामने दिखाई सा देता है |पाठक को शुरू से लेकर अंत तक बांधने की सामर्थ है पंडित दामोदर जी के खंडकाव्य में गाथा में पंडित दामोदर शर्मा ने मीरा के बचपन से लेकर द्वारका में रणछोड़  को खोजने की कथा का मार्मिक वर्णन किया है| मीराबाई के पिता  राव दूदा  के चौथे पुत्र रतन सिंह थे |उनका ज्यादातर समय युद्ध में ही बीता इसलिए  मीरा बाई  को समय नहीं दे पाते थे|
बिन मां की बच्ची को पालना उनके लिए कठिन कार्य था |इसी कारण उन्होंने मीराबाई को बाबा  राव दूदा के पास मेड़ता भेज दिया |मेड़ता में मीराबाई के ताऊ वीरमदेव पिता समतुल्य थे , मां से बढ़कर ताई का लाड प्यार मिला बाबा के साथ सुबह-शाम मंदिर में गिरधारी के दर्शन करती और उनके मुख से सुनती थी गीता का पाठ |एक बार राधा ने बारात को आते हुए देखा तो ताई जी से कहा कि मां मेरा भी विवाह  करा दो, कर दो कहीं सगाई |ताई ने मजाक करते हुए कहा ‘तेरा दूल्हा तो आएगा कृष्ण सरीका काला ‘तेरे हाथों से डलवाएंगे उसको वरमाला |मीराबाई ने सहज भाव से पूछा मां सबसे बड़ा कौन है ?संसार में ,मां बोली मोहन से बड़ा इस जग में कोई नहीं |मीरा ने मन ही मन संकल्प ले लिया मोहन से विवाह करूंगी और रात दिन उनके चरणों में अपना ध्यान लगाऊंगी |ताई ने मीराबाई के ह्रदय में  कृष्ण को पाने का बीज बो दिया था एक दिन एक संत मेड़ता में प्रवचन सुनाने आते हैं |
मीराबाई बाबा के साथ उनके प्रवचन को सुनने जाती थी तभी  राव दूदा ने प्रेम भाव से उस संत को  भोजन के लिए अपने घर बुलाया| संत महल में आया सबसे पहले उसने प्रतिमा की पूजा की और फिर भोग लगाया |प्रतिमा के प्रति ऐसी श्रद्धा देखकर मीरा को बहुत आश्चर्य हुआ |तभी वह संत बोला ‘बेटी ले प्रसाद यह सारे जग का स्वामी ,सबके मन की बात जानता है यह अंतर्यामी| जब संत विदा लेता है तो मीराबाई उससे प्रतिमा लेने की मांग कर बैठती है मेरा भाई को भी उस प्रतिमा से प्रेम हो जाता है| वह जानती है कि मैं जिसे मंदिरों में खोज रही हूं वह तो यही है| यही मेरा प्रियतम है| साधु ने मेरा को  प्रतिमा देते हुए मन ही मन शीश झुकाया |क्योंकि मीराबाई के रूप में राधा के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ था |मीराबाई का बचपन उस प्रतिमा के साथ नित्य क्रियाओं को करते हुए गुजर गया |अब समय आ गया था  मीरा के लायक  वर को ढूंढने का |तभी राणा सांगा का संदेश आया  “हम सिसोदियों, मेड़तियों के हैं संबंध पुराने, पीढ़ी दर पीढ़ी आपस में है जाने पहचाने| भोजराज के लिए चाहिए मुझको मीराबाई ,यह संदेश मेड़ता पहुंचा घर घर बजी बधाई || वीरमदेव राणा सांगा के इस संदेश को आदर सम्मान के साथ स्वीकार कर लेते हैं और मीराबाई की सगाई भोज राज के साथ बड़े ठाठ बाट से हो जाती है| इसके बाद शुभ मुहूर्त आ गया था विवाह के अलौकिक  पल का जिसका सभी को बहुत दिनों से इंतजार था|  मीराबाई के मन में दोहरी स्थिति पैदा हो जाती है कि माता-पिता सामान ताई और ताऊ की इज्जत के साथ ससुर का मान भी रखना है तभी मीराबाई अपनी उस प्रतिमा के सामने जी भर कर रोती हुई कहती है “एकमात्र  पति है गिरधारी किसको शीश झुकाऊं, हे मेरे आराध्य बताओ कैसे धर्म निभाऊं तुझे छोड़कर किस राजा की रानी मै  कहलाऊं,तेरा द्वारा छोड़कर किस के रंग महल में जाऊं |तुझ से कुछ भी नहीं छुपा है मैं हूं दुखिया नारी |
अब तो तू ही लाज बचा ले गोवर्धन गिरधारी |तभी मीरा को लगा मोहन उसके हृदय में बोल रहा है और जीवन के पथ पर आगे बढ़ने के लिए कह रहा है  मीरा का हृदय कहता है ‘छोड़ो यह सब रोना-धोना मैं भी साथ चलूंगा, कोई दिवस नहीं होगा जब तुम से नहीं मिलूंगा| मीराबाई की सखियां उसको मंडप में लेकर आती हैं पावन मंत्रों एवं सात फेरों में भी मीरा प्रतिमा को साथ ही रखती है  मीरा का वैवाहिक जीवन हंसी खुशी बीत रहा था लेकिन काल की गति को कौन जानता है  काल ने  भोजराज को अपना ग्रास बना लिया सारा चित्तौड़ शोक में डूब गया| राणा सांगा का  कुल दीपक बुझ गया इसी के साथ मीरा का जीवन भी अंधेरे में डूब जाता है | मीराबाई को इस  शोक  से निकलने का एक ही रास्ता था वह था गिरधारी का मंदिर जहां जाकर  मीरा कभी नाचती तो कभी गाती ऐसा करने पर लोग उसे कृष्ण की दीवानी कहने लगे| राणा सांगा का उत्तराधिकारी विक्रमादित्य  ने मीराबाई को मंत्री बीजा बरगी के कहने पर अनेक तरह की यंत्रणा और  पीड़ाऍ दी | उसने मीराबाई को मारने के लिए कई बार सांप भेजे तो कई बार जहर का प्याला भेजा लेकिन यह सब मीराबाई मे के लिए अमृत और मालाएं बन जाते थे |इन सब से मीरा का हृदय बहुत दुखी रहने लगा अब मीराबाई अपने इष्ट देव की खोज में द्वारिका का लंबा रास्ता अपनाती है  | मीराबाई को भी  आभास हो गया था कि गिरधारी अब वृंदावन में नहीं मिलेंगे इसलिए उनसे मिलने के लिए वह द्वारका पहुंच जाती है  | मीराबाई ने चित्तौड़ मेड़ता दोनों से नाता तोड़ कर केवल रणछोड़ से नाता जोड़ लिया था और अपने पूरे मन से उन से यही प्रार्थना करती है हे
 प्रियतम¡ मुझको भी इस बंधन से मुक्ति दिला दो मुझे भी अपने चरणों में जगह दे दो मेरी इस अंतिम अभिलाषा को पूरी कर दो | मीरा के जीवन भर की कठिन परीक्षाओं का अंत हुआ और परम ब्रह्म ने उनकी अंतिम अभिलाषा को पूरा कर दिया “हाथ बढ़ाकर गिरधारी ने कहा कि मेरा आओ पूर्ण हो गई आयु तुम्हारी अब मुझ में मिल जाओ| इसी दिवस की बरसों से करता रहा प्रतीक्षा ,आज  हमारे महामिलन की पूर्ण हो गई इच्छा|| मीराबाई को लगा उनके प्रियतम के मुख्य मंडल पर मुस्कान के कमल खिले हुए थे आज मानो पूर्व जन्म की बिछड़ी हुई राधा का मिलन हो रहा है| “सुनते ही मीरा के प्राणों ने शरीर को छोड़ा ,परम ज्योति में ज्योति मिल गई जग से नाता तोड़ा| वहां खड़े भक्तों के मन में हा हाकार मचा था ,मंदिर में जाकर देखा तो कुछ भी नहीं बचा था|| समकालीन चेतना से संप्रकट यह खंडकाव्य आधुनिक युग के गीत काव्य की अनुपम उपलब्धि है| हिंदी के वरिष्ठ गीतकार पंडित दामोदर शर्मा जी के गीतों की भाषा का प्रभाह किसी नदी के शीतल मधुर जल की लहरों के समान है हर गीत में एक राग है, एक रागिनी है ,सुमधुर संगीत है, लय हैं, नाद है शब्दों की मधुर झंकार है |लोक भाषा के मुहावरे भी कहीं-कहीं गीतों में लालित्य उत्पन्न कर देते हैं |गीतों के छंदों  में खड़ी बोली हिंदी के साथ-साथ संस्कृत ,उर्दू ,अंग्रेजी, ब्रज एवं बुंदेली का भी मिश्रण मिलता है |कुल मिलाकर निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि गीतकार पंडित दामोदर शर्मा हिंदी गीत विधा के महान शिल्पी हैं | उनके गीतों में व्यंजित भाव धारा इन्हें अपनी युगीन गीत साहित्य का ‘गीत पुरुष’ सिद्ध करती है|
सहायक प्राध्यापक हिंदी शासकीय महाविद्यालय महगांव भिंड संपर्क - girijanarwaria82@gmail.com

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