पुस्तक समीक्षा - नयी वाली हिंदी को दिशा देता उपन्यास 3
  • पीयूष द्विवेदी

नीलोत्पल मृणाल का उपन्यास ‘औघड़’ आकार के मामले में तो नयी वाली हिंदी के उपन्यासों में सर्वाधिक वजनी किताब है ही, वस्तु-विधान के स्तर पर भी अलग है। इसे नयी वाली हिंदी का पहला गंभीर ग्रामीण उपन्यास कह सकते हैं, जिसमें व्यंग्य का भी भरपूर पुट है। यूँ तो गत वर्ष आए अजीत भारती के उपन्यास ‘घरवापसी’ की पृष्ठभूमि भी ग्रामीण थी, लेकिन उसमें ग्राम्य-जीवन के गंभीर रेखांकन की बजाय केन्द्रीय पात्र की बाल-कथा के माध्यम से गाँव के प्रति लेखक का नोस्टाल्जिक आलाप ही अधिक था। परिणामतः उपन्यास का परिवेश ग्रामीण होने के बावजूद कथानक में गाँव की कोई भूमिका नजर नहीं आई थी। ‘औघड़’ इस तरह की दिक्कत में नहीं फँसी है। इसमें मलखानपुर के रूप में लेखक ने न केवल गाँव का परिवेश रचा है, बल्कि उस गाँव की एक यथार्थपरक और रोचक कहानी कहने की भी कोशिश की है।
भाषा-के मामले में उपन्यास मजबूत है। शब्द-चयन सरल और वाक्य स्पष्ट हैं, जिसे समझने में अधिक कठिनाई नहीं होती। व्यंग्यात्मकता इस उपन्यास की बड़ी ताकत है। कुछ उदाहरण देखिये, ‘सच्ची सामाजिक समरसता तो हिन्दुस्तान के गाँव में ही दिखती थी, जहां एक ही चिलम से पूरा गाँव गांजा पी लेता था’, ‘वो चूंकि वामपंथ के सबसे बड़े गढ़ के रूप में पहचाने जाने वाले कैम्पस का छात्र था…तो यहीं उसने जाना कि आजाद होकर जीना क्या है! उसने धीरे-धीरे आजाद होने की प्रक्रिया पकड़ी। शुरुआत सिगरेट पीने से हुई। यानी कि आरम्भ ही धुआं-धुआं कर दिया था शेखर ने।’ कथानक के अधिकांश हिस्से में इस प्रकार की व्यंग्यात्मक भाषा-शैली का कमोबेश प्रभाव बना रहा है, जो कि उपन्यास की पठनीयता में वृद्धि करने वाला है।
समाज और सियासत उपन्यास के दो मुख्य सिरे हैं, जिनके बीच पूरी कहानी का तानाबाना बुना गया है। इस तानेबाने की बुनावट में धर्म, जाति, वर्ग, विचारधारा आदि से जुड़े विविध प्रश्नों, समस्याओं और विरोधाभासों को दिलचस्प ढंग से पिरोया गया है। फिर चाहें हिन्दू-मुस्लिम के बीच लगाव-टकराव का विषय हो या जातिगत भेदभाव की समस्या हो अथवा विचारधाराओं के विरोधाभास हों, छोटी-बड़ी घटनाओं के माध्यम से इन सबका रोचक रेखांकन उपन्यास में हुआ है। भारतीय गांवों में आए सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक बदलावों का भी चित्रण उपन्यास में प्रमुखता से हुआ है।   
परिवेश विशेष पर केन्द्रित कथा-साहित्य में पात्र-निर्माण की चुनौती अधिक होती है। लेखक को एक निर्धारित दायरे के भीतर ही पात्र गढ़ने होते हैं। परिवेशानुकूल पात्रों का गठन और चरित्र-चित्रण ही कथानक को तार्किक और प्रभावी बनाता है। इस कसौटी पर ‘औघड़’ लगभग-लगभग खरी साबित होती है। सामान्य ग्रामीण मनई के पहनाव-पोशाक, बोलचाल, सोच-विचार से लेकर बिंदास अंदाज तक को लेखक ने बारीकी से पकड़ा है, लिहाजा उपन्यास के ज्यादातर पात्र एक हद तक स्वाभाविक लगते हैं। ग्राम्य-जीवन को जी चुके लोगों को उपन्यास के अनेक पात्र परिचित और अपने-से लग सकते हैं। हालांकि कुछेक जगहों पर पात्रों की विशेषताओं का वर्णन अतिरंजना का शिकार भी हुआ है, मगर ऐसे वृहद् उपन्यास में इतनी छूट लेखक को दी जा सकती है।
वामपंथ के विरोधाभासों और पाखंडों की उपन्यास में खूब खबर ली गयी है। परन्तु, ऐसा करते वक़्त लेखक की दृष्टि एक निर्मम आलोचक की नहीं, वरन अपने प्रिय किन्तु पथभ्रष्ट बच्चे को उलाहना देते अभिभावक की रही है। वे वामपंथ की विसंगतियों से क्षुब्ध तो हैं, मगर उसमें संभावना देखने से भी नहीं चूकते। यही कारण है कि उपन्यास के मुख्य पात्र बिरंची की वैचारिकता में कहीं न कहीं वामपंथ का प्रभाव नजर आता है। फूंकन सिंह के घर की दीवार गिरा देने से होने वाले लाभ बताते हुए बिरंची कहता है, ‘दीवार गिरा देने से गाँव की भूखी बकरी को प्रधान जी के गार्डेन का हरा घास मिल जाएगा खाने, आम और अमरूद का हरा पत्ता मिल जाएगा खाने… लगना महतो के भूखल भैंस को पुआल मिल जाएगा खाने जो फूंकन सिंह के हाता में पड़ल सड़ता रहता है। चमरटोली की मुनिया और चंदवा जैसी छोटकी बचिया के बेला और गेंदा का फूल मिल जाएगा बाल में लगाने के लिए। फाटल पैंट पहन गुल्ली-डंडा खेलते बच्चों को आम मिल जाएगा…’ बिरंची का ये कथन कहीं न कहीं ‘संपत्ति के समान विभाजन’ की वामपंथी अवधारणा से प्रेरित प्रतीत होता हैं। परन्तु, जिस तरह से ये अवधारणा यथार्थ के धरातल पर अव्यावहारिक और कोरी किताबी बात लगती है, उसी तरह बिरंची का उक्त कथन भी किसी तार्किक चिंतन से अभिप्रेरित होने की बजाय केवल भावनाओं का अतिरेक ही प्रतीत होता है। यानी कि बिरंची के कथन और वामपंथ की समान संपत्ति विभाजन की अवधारणा, दोनों में वैचारिक साम्यता भी है और व्यवहार में लाने पर दोनों की विफलता भी स्पष्ट है।
दूसरी चीज कि बिरंची द्वारा फूंकन सिंह का राजनीतिक विरोध करते हुए जिस तरह से पैसे बाँटने, जाति आधारित वोट बैंक सेट करने जैसे हथकंडों को अपनाया जाता है, इसके जरिये लेखक ने क्या सन्देश देना चाहा है. बुराई का प्रतिरोध यदि बुराई से ही किया जाए तो उस प्रतिरोध का क्या मतलब है? यह ठीक है कि यथार्थ का स्वरूप ऐसा हो सकता है, परन्तु साहित्य यथार्थ का कोरा चित्रण तो होता नहीं है, उसमें लेखक की अंतर्दृष्टि भी होती है, जिसके जरिये वो विषय को नया आयाम देता है। परन्तु, वो अंतर्दृष्टि यहाँ नदारद है। इस कारण बिरंची का चरित्र एक हद तक स्वाभाविक लगने के बावजूद बहुत ज्यादा प्रभावित नहीं कर पाता।
इस कथा का सन्देश यह हो सकता था कि गरीब का उद्धार अमीर की संपत्ति पर हक जमाने में नहीं, वरन अपने लिए संपत्ति का सृजन करने और स्वयं को समर्थ बनाने में है। परन्तु, उपन्यास इस तरह का सन्देश देते-देते अंत में आकर चूक गया है। इसका जो अति-नाटकीय अंत लेखक ने किया है, वो बेहद कमजोर और निराश करने वाला है। अंत में उपन्यास के एक प्रमुख पात्र पबित्तर दास के विषय में, बगैर किसी पूर्व संकेत के, जो खुलासे होते हैं और उसका जो आकस्मिक चरित्र-परिवर्तन होता है, वो उपन्यास को एकता कपूर के धारावाहिकों के स्तर पर ला खड़ा करता है। जो पबित्तर दास दलितों-शोषितों के सशक्तिकरण व उत्थान का प्रतिनिधि पात्र बन सकता था, वो अंत में उनकी बेहद नकारात्मक छवि पेश कर जाता है। पबित्तर के फूंकन सिंह के पाले में जाने तक पर भी अगर बात रुक गयी होती तो गनीमत रहती, मगर पबित्तर की कमाई का जो इतिहास लेखक ने खोला है, उसने अंत को तो एकदम प्रभावहीन और हल्का तो किया ही है, पूरे उपन्यास के आधार को भी कमजोर कर दिया है। कह सकते हैं कि नयी वाली हिंदी सहित वर्तमान समय के अधिकांश लेखक अपने उपन्यासों में अंत की जिस समस्या से जूझते दिख रहे हैं, ‘औघड़’ भी उससे पार नहीं पा सकी है।
बहरहाल, कुल मिलाकर समग्र हिंदी साहित्य के परिप्रेक्ष्य में ‘औघड़’ बहुत कुछ नया या अलग कहती नजर नहीं आती, मगर नयी वाली हिंदी को दिशा देने का काम अवश्य करती है। नयी वाली हिंदी में प्यार-दोस्ती-हँसी-मजाक-खिलंदड़ेपन जैसी चीजों को लेकर एक ही तरह के ‘पैटर्न’ पर आधारित उपन्यासों के कारण जो रचनात्मक दुहराव या रिक्तता दिखाई दे रही थी, ‘औघड़’ उसे खत्म कर एक उम्मीद जगाती है। उम्मीद ये कि अब नयी हिंदी के लेखक अपना दायरा बढ़ाएंगे। सिर्फ शहर तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि गांव की ओर भी गहरी नजरों से देखने की जहमत उठाएंगे। सिर्फ प्यार की कथा नहीं कहेंगे, बल्कि ‘पॉलिटिक्स’ की बारीकियों को टटोलने की भी हिम्मत दिखाएंगे। सिर्फ सेक्स को ही समझने-समझाने में नहीं लगे रहेंगे, बल्कि समाज को भी समझने की कोशिश करेंगे। नयी वाली हिंदी को यदि लम्बे समय तक टिके रहना है, तो उसे ‘औघड़’ से प्रेरणा लेते हुए अपने विषयों के विन्यास को बदलने की दिशा में बढ़ना होगा।

पुस्तक – औघड़ (उपन्यास)

लेखक – नीलोत्पल मृणाल

प्रकाशक – हिन्द युग्म, दिल्ली

मूल्य – 200 रुपये

पीयूष द्विवेदी
लेखक स्वतंत्र टिप्पणीकार हैं. देश की प्रमुख पत्र-पत्रिकाओं में सियासत और साहित्य के विषयों पर निरंतर रूप से लिखते रहते हैं. मूलतः देवरिया जिले से हैं, फिलहाल नोएडा में निवास है. संपर्क - 8750960603

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