पुस्तक : भारतीय साहित्य के निर्माता : शैलेंद्र प्रकाशक : साहित्य अकादमी, नई दिल्ली
लेखक : इंद्रजीत सिंह कुल पृष्ठ : 96 आईएसबीएन : 978-93-5548-545-8 मूल्य : 50 रुपए मात्र
समीक्षक
सूर्यकांत शर्मा
साहित्य अकादमी उन गिने-चुने सरकारी संस्थानों में से एक है जो साहित्य,सिनेमा और संस्कृति के सेतु को पूरी तरह से आज के आत्मनिर्भर होते परंतु युवा भारत से परिचित कराने हेतु प्रयास रत है।उनकी मोनोग्राफ श्रृंखला यथा आधुनिक भारत की निर्माता में गीतों के राजकुमार स्वर्गीय शैलेंद्र पर केंद्रित पुस्तक इस ओर एक सकारात्मक सुंदर और वस्तुपरक कदम है।कुल छियानवे पृष्ठों में शैलेंद्र के जन कवि गीतकार के विराट व्यक्तित्व और कृतित्व को समेटना सागर को गागर ‘में समेटना जैसा पुनीत यज्ञ प्रतीत होता है।
लेखक डॉक्टर इंद्रजीत सिंह ने अपने दमदार और शानदार अंदाज़ ए बंया से इसे सृजित कर दिखाया है। खौफनाक कोरोना महामारी का सामना करते और उसे अपनी वैज्ञानिक क्षमता और राजनैतिक इच्छा शक्ति से लड़ कर पछाड़ते युवा भारत के पाठकों की पसंद अब ग्लोकल से ग्लोबल हो गई है।आज का पाठक संक्षिप्त,तथ्यात्मक और सटीक पुस्तकों ,पत्रिकाओं या समाचार को अपनी सुविधा से पढ़ना चाहता है।अतः समीक्षित पुस्तक समय के साथ कदमताल करती लोकप्रिय पुस्तक श्रेणी में आती है।
लेखक शैलेंद्र पर कई पुस्तकें लिख चुके हैं और इस पुस्तक में कुल चार अध्यायों में शैलेंद्र के बहुआयामी व्यक्तित्व और उनके कार्यों,उनके समीचीन कवियों, गीतकारों, सिने-लेखकों,साहित्यकारों के साथ साथ,उस समय को अपने शब्दों से सृजित कर पाने में सक्षम हैं।लेखन की यह बानगी होती है कि शब्दों से बीते समय,वर्तमान और भविष्य का खाका पाठकों के सामने प्रस्तुत कर रोचकता और कौतूहल के पुट से पाठकों को पठनीयता के आनंद से सराबोर कर दे। यही सब इस पुस्तक के पाठक को पढ़ने को मिलता है।
जनकवि शैलेंद्र की जीवन यात्रा से आरंभ होता पुस्तक का प्रथम अध्याय पाठकों को अविभाजित भारत के वृतांत से आज़ाद भारत के मथुरा में ले आता है । जनकवि के आरंभिक जीवन का ब्यौरा असली नाम शंकर दास राव स्कूली जीवन मित्र विनय कुमार जैन और कविता लेखन के आरंभ को बताता,आगे ले जाता हैं।नौकरी,शादी ,राजकपूर से मिलना,पत्नी को प्रथम प्रसव हेतु उसके मायके भेजने की धन व्यवस्था हेतु प्रसिद्ध अभिनेता राजकपूर के पास जाना।फिल्म के लिए गीत की पेशगी के तौर पर उनसे पांच सौ रुपए ले लेना।आज के दौर में यह एक लाख रुपए की धनराशि के बराबर होगी।आगे चलकर यही जोड़ी बहुत से कालजयी शाहकार और हिंदी सिने जगत को नई दिशा और ऊंचाइयों पर ले गई।
इसी जुगलबंदी की बदौलत राजकपूर देश और वैश्विक पटल पर छा गए ,खासतौर पर उन दिनों के सोवियत संघ पर।पुस्तक के इस अध्याय शैलेंद्र का रूस जाना,पाब्लो नेरुदा से मुलाकात,पुश्किन, गौर्की, और अन्य पसंदीदा विभूतियों का संदर्भ, सर्वहारा वर्ग के लिए लिखी मशहूर कविता का मुखड़ा यथा ‘हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है,’,,उनकी सुंदर हस्तलिपि पर स्वर साम्राज्ञी स्वर्गीय लता मंगेशकर जी के उद्गार,फिल्म फेयर अवार्ड का मिलना,तीसरी कसम फिल्म की भूली बिसरी यादें और तथ्य-कथ्य, आत्महंता होने की दुर्घटना,समीचीन गीतकारों, साहित्यकारों और नामचीन हस्तियों यथा साहिर लुधियानवी,अली सरदार जाफरी, ख़्वाजा अहमद अब्बास,मजरूह सुल्तानपुरी, नरेंद्र शर्मा,भरत व्यास,शकील बदायूंनी,राजेंद्र सिंह बेदी,कृष्ण चंदर,इंदीवर, प्रख्यात नागार्जुन(उनकी शैलेंद्र की असमय रूखसती पर रचना),भारत भूषण अग्रवाल, राजकमल चौधरी, भरत व्यास, अनजान (गोदान फिल्म के गीतकार)भगवत रावत इत्यादि।यह अध्याय पाठक को शैलेंद्र जी के जीवन का पूरे का पूरा ब्यौरा सटीक अंदाज़ से पेश करता है।
जनकवि शैलेंद्र अध्याय में उनका एक अलग ही रूप यथा वृहद जनकवि को लेखक ने तर्कसंगत अंदाज़ में सफलता पूर्वक उकेरा है। महात्मा गांधी, मुंशी प्रेमचंद,वर्ड्सवर्थ,पंत,एलियट,मुक्तिबोध की विशेषताओं को बताते हुए और जोड़ते हुए शैलेंद्र को इश्क,इंकलाब और इंसानियत के कवि के तौर पर प्रस्तुत किया गया है।लेखक के अनुसार,शैलेंद्र की रचनाओं को कबीर के दोहों,तुलसी की चौपाइयों,मीरा और गुरु नानक के पदों और ग़ालिब के शेरों की तरह से सुनी और सुनाई जाती है।आज भी शैलेंद्र अपने कृतित्व या रचना धर्मिता के कारण, आम जन जीवन में मुहावरों और लोकोक्ति की मानिंद बसते हैं।शैलेंद्र ने कमल के समान जीवन (मात्र चवालीस वर्ष में ,इस दुनिया से चले जाना) जिया और इस अल्प काल में आठ सौ कालजयी गीत, साठ से अधिक कविताएं और फणीश्वर नाथ रेणु की मार्मिक प्रेम कहानी ‘तीसरी कसम ‘अर्थात ‘मारे गए गुलफाम ‘पर आधारित तीसरी कसम फिल्म का निर्माण कर अपनी अस्तित्व को अमर कर दिया।
लेखक ने शैलेंद्र की समस्त कविताओं को तीन श्रेणियां में रखा है यथा रूमानी कविताएं,प्रगतिवादी जन कविताएं और देश प्रेम पर आधारित कविताएं। इस रचना विभाजन से उन्होंने लेखक ने शैलेंद्र की कविताओं के उदाहरण भी यथासंभव यथा स्थान पर दिए हैं। उनकी कविताओं खासकर रूमानी कविताओं में छायावाद का अक्स दिखाई पड़ता है।प्रगतिवादी और जनवादी कविताओं में कार्ल मार्क्स, एंगल्स, और लेनिन का प्रभाव दृष्टि गोचर होता है। देशभक्ति की कविताओं में तो शैलेंद्र अपना सानी नहीं रखते उदाहरण के तौर पर जलता है पंजाब और भगत सिंह पर केंद्रित स्वतंत्रता पूर्व की कविताएं तथा बाद के समय में भारत की ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ संस्कृति उनकी रचनाओं में अपनी इंद्रधनुषी छटा बिखेरती हुई नज़र आती है। बेहद संक्षेप में यदि कहना हो तो शैलेंद्र की कविताओं में संवेदना और सृजन का राग है,प्रतिरोध और प्रतिबद्धता की आग है तथा समानता स्वतंत्रता और मनुष्यता से परिपूर्ण सुख में समाज का हसीं ख़्वाब है।
पुस्तक का तीसरा अध्याय गीतों के जादूगर शैलेंद्र विशेष रूप से केंद्रित है क्योंकि इसमें भारतीय सिनेमा में शैलेंद्र के गीतों की चमक दमक और धमक को प्रभावपूर्ण ढंग से बताया गया है। शैलेंद्र की अपनी रचनाओं से जर्मनी की हिंदी विद्वान लोठार लुटसे सिनेमा को भारत का पांचवा वेद मानते हैं।यूं भी भारत में सिनेमा का फलक साहित्य से बहुत बड़ा है क्योंकि सदियों से यहां निरक्षरता और गरीबी के कारण करोड़ों लोग साहित्य से कोसों दूर रहे और हिंदुस्तानी सिनेमा एक प्रभावी और व्यावहारिक माध्यम रहा जिससे साहित्य और संस्कृति को लोगों में रचाने बसाने और उन्हें संवेदनशील बनाने में बेहद मदद मिली।
लेखक ने शैलेंद्र की प्रशंसा और आलोचना दोनों को पुस्तक में स्थान दिया है यथा गीत -‘पतली कमर है तिरछी नजर है’, साहित्यकारों इस गीत पर उंगली उठाई और प्रसिद्ध आलोचक रामविलास शर्मा ने शैलेंद्र की बड़ी खिंचाई की।उन्होंने कहा ‘हर जोर जुल्म की टक्कर में हड़ताल हमारा नारा है’ जैसे लोकप्रिय और क्रांतिकारी गीत के रचयिता से इस प्रकार के गीत की आशा नहीं थी।यहीं पर साहिर लुधियानवी का कथन, ‘फिल्मी गीतकार को वह स्वतंत्रता प्राप्त नहीं होती जो की एक साहित्यिक कवि को मिलती है’।
एक और दिलचस्प वाकया कि गाना रमैया वस्तावैया, मैंने दिल तुझको दिया, कैसे बना? इस मुखड़े के पीछे, एक छोटा सा किस्सा है कि किसी ढाबे पर शंकर जी ने तेलुगु भाषा में रमैया नाम के व्यक्ति को अपनी ओर बुलाया और कहा, रमैया वस्तावैया (रमैया इधर आओ) शंकर जी ने रमैया को दोबारा कहा रमैया वस्तावैया।वस्तावैया का हिंदी में अर्थ होता है ‘इधर आओ’।पास में शैलेंद्र जी बैठे थे,उन्होंने शंकर के इन्हीं चार शब्द को तुरंत जोड़कर एक अमर जीत का मुखड़ा रच दिया। इसी प्रकार के किसी प्रकार के बेहद रोचक रोचक और गुदगुदाने वाले प्रसंग जो गीतों, रचनाओं और कविताओं के बारे में वर्णित किए गए हैं।पाठक पढ़कर उस काल के फिल्म- निर्माताओं,निर्देशकों, गीतकारों, साहित्यकारों को और निकट से जान पाएंगे।
पुस्तक का चौथा और आखिरी हिस्सा जो की सिनेमा के आकाश में साहित्य का चांद तीसरी कसम के बारे में है इस पुस्तक का केंद्र कहा जा सकता है। अध्याय में तीसरी कसम फिल्म से संबंधित लेखक प्रकाशक पटकथा लेखक फिल्म निर्देशक फिल्म के नायक नायिका व अन्य सभी घटकों के बारे में बेबस टिप्पणियां और बेलौस बातें बंया की गई हैं।
शैलेंद्र जी के परम मित्र राज कपूर जो उसे समय के शीर्षक नायकों में से एक थे उन्होंने भले ही अपनी फीस ₹1ली हो तथापि वह अपनी पहली रंगीन फिल्म संगम की शूटिंग में व्यस्त थे और अपने व्यस्त समय से शैलेंद्र जी को वांछित डेट्स नहीं दे पाए।फिल्म की नायिका वहीदा रहमान और अन्य कलाकारों के साथ भी कमोबेश यही स्थिति रही।फिल्म का गीत संगीतआज भी उतना ही लोकप्रिय है जितना की उस समय था।
फिल्म के अंत पर भी लेखक फणीश्वर नाथ रेणु और शैलेंद्र जी एकमत थे परंतु फिल्म के वितरक और कमर्शियल समीकरण से जुड़े लोग फिल्म को दुखांत की बजाय सुखांत दिखाना चाहते थे अर्थात नायक और नायिका का मिलन।जबकि यह फिल्म के शीर्षक और कहानी की आत्मा के विरुद्ध था।अंततः फिल्म का अंत दुखांत ही रखा गया।इसी उहापोह में फिल्म लेट हुई और लगभग बिना पब्लिसिटी के किसी तरह चुनिंदा सिनेमाघरों में रिलीज हुई और बॉक्स ऑफिस कलेक्शन के मैदान में प्रभावी नहीं रही।नतीजा शैलेंद्र जी का आत्महंता होना रहा।ये बात अलग है कि बाद में फिल्म को अनेक पुरस्कार मिले।
यहीं पर लेखक ने इस जनकवि के आत्महंता होने और उसके बाद की स्थिति का मार्मिक चित्रण करते हुए,राष्ट्रीय फिल्म विकास निगम सरीखी संस्थाओं का वर्णन करते हुए सही कहा है कि यदि ऐसी व्यवस्था शैलेंद्र जी के समय रही होती तो भारतीय सिनेमा जगत को एक सशक्त जन कवि और गीतों के राजकुमार को यूं खोना ना पड़ता।
पुस्तक के लेखक और प्रकाशक दोनों ही बधाई के पात्र हैं।साहित्य अकादमी को ऐसे प्रयास जारी रखने चाहिएं ताकि वर्तमान कवियों, गीतकारों, साहित्यकारों,फिल्मकारों के बारे में आने वाला भारत जान सके।आज के समय में पुस्तक का मूल्य पचास रुपए होना,पाठकों को सुखद आश्चर्य से परिपूर्ण कर देता है।आगामी नई दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में समुचित विज्ञापन, प्रसार और मार्केटिंग से शैलेंद्र एक फिर से समूचे देश के आम जन से रू ब रू हो सकते हैं।

2 टिप्पणी

  1. भाई सूर्य कांत जी आपने हमारे प्रिय गीतकार शैलेन्द्र पर भाई इंद्रजीत सिंह द्वारा लिखी गई पुस्तक की ख़ूबसूरत समीक्षा की है। पुरवाई के लिये यह समीक्षा महत्वपूर्ण है। हार्दिक आभार।

    • जी ,आदरणीय ,आपका हृदय से आभार !संभवतः यही शब्द मानव के शब्द कोष में अभी तक सृजित हुए हैं। आदरणीय शैलेंद्र जी ,मेरे लिए ,मेरे जीवन में विशेष स्थान रखते हैं।
      मुझ और आप सरीखा दुघर्ष संघर्ष करने वाले श्रम सेवी या ऐसे ही वंचित शैलेंद्र को अपना रोल मॉडल मानते हैं।
      किसी कवि की पंक्तियां हैं
      मानव की भाषा में अभी इतनी जान नहीं
      मानव की भाषा को अभी इतना ज्ञान नहीं
      की व्यक्त कर सके ,
      मन के भावों को ,सच्चाई से गहराई से।
      आपका पुनः आभार।

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