Wednesday, June 12, 2024
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विजय कुमार तिवारी की कलम से – डॉ मधु संधु का प्रवासी महिला उपन्यासकारों की समीक्षाओं पर चिन्तन

समीक्षित कृति – “इक्कीसवीं शती का हिन्दी उपन्यास और प्रवासी महिला उपन्यासकार”
लेखक – डा० मधु संधु
मूल्य – रु 350/-
प्रकाशक – अमन प्रकाशन,कानपुर
‘डा० मधु संधु’ मेरे लिए नया नाम है। यह मेरा ही दुर्भाग्य है,मैं बहुत से नामचीन साहित्यकारों के बारे में,उनके लेखन के बारे में नहीं जानता या बहुत कम जानता हूँ। डा० मधु संधु वैसी ही चर्चित, नामचीन महिला साहित्यकार हैं। उनका जन्म अमृतसर,पंजाब में हुआ,वहीं उनकी शिक्षा-दीक्षा हुई और वहीं के गुरु नानक देव विश्वविद्यालय के हिन्दी विभागाध्यक्ष पद से सेवा-निवृत्त होकर स्वतन्त्र लेखन कर रही हैं। कहानी,कविता,गद्य और आलोचना-समीक्षा के उनके अनेक संग्रह छप चुके हैं। उनका सतत सृजन,लेखन चल रहा है और मैं उन्हें हार्दिक बधाई देता हूँ।
डा० मधु संधु की समीक्षा-आलोचना की महत्वपूर्ण पुस्तक “इक्कीसवीं शती का हिन्दी उपन्यास और प्रवासी महिला उपन्यासकार” मेरे सामने है। पुस्तक के शीर्षक से स्पष्ट है,इसमें इक्कीसवीं सती के उपन्यासों पर चिन्तन किया गया है। महत्वपूर्ण यह भी है,इन उपन्यासों के सभी उपन्यासकार प्रवासी महिलाएं हैं और समीक्षक डा० मधु संधु भी महिला ही हैं। हमें इन सुखद संयोगों का स्वागत करना चाहिए।
अपने ‘प्राक्कथन’ में डा० मधु संधु ने उपन्यास  के बारे में लिखा है,”उपन्यास गद्य साहित्य की विशिष्ट महाकाव्यात्मक विधा है।” प्रवासी हिन्दी उपन्यास  के सन्दर्भ में उनका चिन्तन है,”प्रवासी हिन्दी उपन्यास में उपलब्धियों का उल्लास और दसों अंगुलियों से पल-पल छूट रहे,अतीत हो रहे लाइफ स्टाइल की वेदना, आधुनिक होने का गर्व और परम्परा निभाने की मूल्यवत्ता,कठिन जीवन संघर्ष के बाद मिली सफलता और दोयम होने की पीड़ा,स्थानीय संस्कृति को अपनाने और हर देश में मिनी भारत गढ़ने की चेष्टा एक साथ दिखाई दे रही है।” वे लिखती हैं,’इक्कीसवीं शती उपन्यास में समाये कथा वैविध्य,परिपक्व कथ्य और विवादों से उपर उठकर सृजन करने की शती है। अब व्यक्ति में विस्थापन की वेदना कम और संघर्ष,जीवट तथा स्थापन का प्रभुत्व अधिक है।” डा० मधु संधु महत्वपूर्ण बात करती हैं,”इन लेखिकाओं का जन्म भारत का है। भारत को उनके दिल से निकाला नहीं जा सकता। यहाँ का जीवन,जीवन मूल्य,इतिहास-भूगोल,समस्याएं,उपलब्धियाँ,किस्से-कहानियाँ उनके मन-मस्तिष्क में रचे-बसे हैं और लगभग यही स्थिति उनके पात्रों की भी है।” उन्होंने दूसरी स्थिति की चर्चा की है,लिखती हैं,”अब अपने देश की याद के स्वर वहाँ के जीवन को अपनाने के जीवट में बदल चुके हैं। यहाँ वैश्विक स्तर पर व्यक्ति की दुखती रगों को पकड़ने के प्रयास हैं,तो समय की रफ्तार के साथ चलने-भागने के उपक्रम भी। हर रचना एक समुद्र है-गहरी,जीवन्त और चुनौती भरे जीवन का समुच्चय।
डा० मधु संधु ने अपनी पुस्तक में 12 प्रवासी लेखिकाओं के कुल 18 उपन्यासों पर लिखी अपनी समीक्षाओं को शामिल किया है जिनके नाम हैं- अर्चना पेन्यूली,अनिल प्रभा कुमार,इला प्रसाद,उषा प्रियम्बदा,कादम्बरी मेहरा,दिव्या माथुर,नीना पाल,सुदर्शन प्रियदर्शिनी,सुधा ओम ढींगरा,सुषम बेदी, स्वदेश राणा और डा० हंसा दीप।
डा० मधु संधु के द्वारा चयनित ये उपन्यास किसी कालक्रम में नहीं हैं,चयन का कोई विशेष मानदण्ड नहीं है और ना ही कोई विशेष दावा है। बस इतना ही है,उपन्यास लिखे गये,डा० मधु ने मनोयोग से पढ़ा,समीक्षाएं कर डाली और इस संग्रह में संग्रहित करके पाठकों के सामने रख दीं। एक आधार तो जरुर है इनके पीछे,इन उपन्यासों में नारी विमर्श है,नारी की दशा-दुर्दशा,वेदना, संघर्ष और उपलब्धियाँ हैं। दूसरा आधार यह है,ये सभी उपन्यास प्रवासी भारतीय महिलाओं ने लिखे हैं। मेरे लिए सुखद है, इसी बहाने प्रवासी भारतीय महिलाओं के द्वारा लिखे जा रहे उपन्यासों,उनके कथ्य-कथानक,चित्रित चरित्र व समाज,देश-काल-परिस्थितियाँ और उनमें उपलब्ध साहित्य के बारे में देखने,समझने का अवसर मिला है। समीक्षा स्वयं ही दुरुह कृत्य है और समीक्षा की समीक्षा सर्वाधिक जटिल और गम्भीर। तब यह और गम्भीर व जटिल हो जाता है जब डा० मधु संधु जैसी बहुचर्चित,समर्थ और प्रतिष्ठित समीक्षक हों। शायद यह मेरी धृष्टता ही मानी जायेगी। ये समीक्षाएं पत्र-पत्रिकाओं में छपकर जन-मानस तक पहुँच चुकी हैं और पाठक उनका लाभ और आनंद ले चुके हैं।
स्वदेश राणा के उपन्यास “कोठेवाली” की समीक्षात्मक विवेचना ‘पुरुष सत्ताक में कोठेवाली’ में डा० मधु संधु ने पूरी कहानी को समझाने का प्रयास किया है जिसका काल खण्ड 1930 से 1970 तक फैला है। उपन्यास में तत्कालीन जीवन,आपसी सम्बन्ध,आर्थिक परिस्थितियाँ यथार्थतः चित्रित हुई हैं। देश काल परिस्थिति के अनुसार कोई भी रचना तय होती है,तत्कालीन समाज में व्याप्त शौक,सम्पन्नता, मानवीय गुण-दुर्गुण,प्रेम-वासना आदि के दृश्य उनकी दृष्टि में है। उपन्यास में वर्णित अन्तर्जातीय और अन्तर्मजहबी शादियों, नैतिक-अनैतिक सम्बन्धों को भी रेखांकित किया है। डॉ० संधु ने उपन्यास के महत्वपूर्ण भाव-विचारों को अपनी समीक्षा में उदाहरण सहित उल्लेख किया है जैसे नब्ज टटोल कर सार-वस्तु ग्रहण कर लिया हो। दुख,पीड़ा के साथ प्रेम-रोमांस दोनों उभरे हैं उनकी समीक्षा में।  पात्रों के नाम,उनकी वेशभूषा,व्रत-त्योहार,आपसी तालमेल,भाषा-शैली आदि का उल्लेख करते हुए मधु संधु लिखती हैं-उपन्यास न सुखांत है और न दुखांत। नारी विमर्श तब खुलकर समीक्षा में उभरता है जब ताहिरा की सोच को रेखांकित करती हैं।
उषा प्रियम्वदा हिन्दी की बहुचर्चित लेखिका हैं,परिचय देते हुए संधु ने उन्हें अप्रतिम कहा है।  यहाँ अपने संग्रह में उन्होंने उनके दो उपन्यासों की समीक्षाओं को शामिल किया है-‘भया कबीर उदास’ और ‘नदी’। दोनों की विषय-वस्तु भिन्न है और दोनों उपन्यास नारी जीवन की त्रासदियों को उजागर करते हैं। ‘भया कबीर उदास’ के केन्द्र में कैंसर पीड़िता युवती लिली पाण्डेय/स्वीटी/यमन है। संधु लिखती हैं,”शुरु से लेकर आखिर तक उपन्यास इसी सवाल से जूझता है कि क्या सौन्दर्य के प्रचलित मानदंडों और समाज की रूढ़ दृष्टि के अनुसार एक अधूरे शरीर को उन सब इच्छाओं को पालने का अधिकार है जो स्वस्थ और सम्पूर्ण देह वाले व्यक्ति के लिए स्वाभाविक होती है।” उनकी समीक्षा में उपन्यास के कथ्य-कथानक,स्त्री की पीड़ा,वेदना-संवेदना और प्रश्न का सम्यक उल्लेख है। पीड़िता की जिजीविषा निर्णय लेने का सम्बल देती है-अतीत का पृष्ठ बदल दो,वर्तमान में रहो,भविष्य को देखो। डा० संधु ने लेखिका की सम्पूर्ण भावनाओं को व्यक्त  किया है ताकि उपन्यास के प्रति पाठकों की रुचि जाग सके। कहीं-कहीं प्रवासी जीवन की समस्याओं की जानकारी देती हैं जैसे वेशभूषा,पहनावा,खानपान, नस्लभेद या संस्कृति भेद और अंधविश्वास को भी उन्होंने उजागर किया है जो पात्रों की सोच में दिखता है। वैसे ही ‘नदी’ उपन्यास की अच्छी समीक्षा डा० संधु ने की है। उपन्यास की संवेदनाएं, समस्यायें और नारी पीड़ा का सम्यक उल्लेख हुआ है। विस्थापन किसी के लिए सहज नहीं होता। नारी के लिए सब कुछ तोड़ने-छोड़ने जैसा है। नदी उपन्यास में पुरुष नारी जीवन को त्रासदी से भरते दिखते हैं और जो अच्छे हैं,वे सहायता करना चाहते हैं। संधु जी लिखती हैं-जीवन उसूलों से नहीं चलता,बार-बार झंझावात आते हैं और गंगा को रास्ता बदलने के लिए बाध्य करते हैं। उन्होंने समीक्षा के अंत में कुछ निष्कर्ष निकाले हैं, लिखती हैं-यह विदेश में बनवास काटती एक सन्यासिन/वैरागिन की व्यथा कथा है जिसे जीवन में पति,प्रेमी,मित्र,संतान किसी का भी साथ नहीं मिला। वह बार-बार विस्थापित होती रही,नदी की तरह इधर-उधर भटकती रही. लहरों की तरह पत्थरों से सिर पटकती रही।
डा० मधु संधु ने अर्चना पेन्यूली के तीन उपन्यासों की समीक्षाएं यहाँ शामिल की है। ‘वेयर डू आई बिलांगःडेन्मार्क की धरती के अप्रवासी’ शीर्षक की समीक्षा में संधु ने विस्तार से प्रवास के कारणों को समझने का प्रयास किया है। अपनी धरती से उखड़े लोगों की प्रमुख समस्या पहचान का संकट है। सभी को अपने देश से अगाध प्रेम है। एक बेहतर और सुरक्षित गन्तव्य की ओर पलायन करता है जब उसे अपने स्थान पर मुसीबतें कठोर होती हैं। इस उपन्यास में तीन पीढ़ियाँ चित्रित हुई हैं। यहाँ दो तरह के प्रवासी हैं-रिफ्यूजी या जिसने भारत को हमेशा के लिए अलविदा कह दिया है और दूसरा वे लोग जो संयुक्त राष्ट्र संघ व बहुराष्ट्रीय कम्पनियों में काम करते हैं। संधु जी ने स्त्री पात्रों को सबल,सशक्त माना है। यहाँ विधवा या परित्यक्ता की अवधारणा नहीं है,दूसरी शादियाँ हो जाती हैं। लिव-इन-रिलेशन प्रचलित है। नस्लवाद की समस्या यहाँ भी है। डा० संधु लिखती हैं-अंत में सभी बिखरे प्रसंगों को समेटने का श्लाघ्य प्रयास है। भारतीय जीवन मूल्य छूटा नहीं है और उलझे पात्र स्वयं को सुलझाते-बदलते देखे जाते हैं। देश वापसी की इच्छा और न लौट पाने की विवशता सभी के साथ है। डा० मधु संधु अर्चना पेन्यूली के दूसरे उपन्यास पर अपनी समीक्षा का शीर्षक लिखती हैं-“प्रेम गणित नहींःपाल की तीर्थयात्रा”। पेन्यूली के उपन्यास की जटिलताओं,सम्बन्धों,जीवन-मूल्यों,रिश्तों और प्रेम की अवस्थाओं का चित्रण संधु जी ने बेबाकी से किया है। पाल और नीना की प्रेमकथा में महत्वपूर्ण है,विवाह,तलाक और तूफानों से गुजरने के बाद भी प्रेम जीवित है। 56 वर्षीय पाल नीना की पहली पुण्य तिथि पर आयोजित कार्यक्रम स्थल सिद्धि विनायक मन्दिर तक 108 किलोमीटर की पैदल यात्रा का संकल्प लेता है। पूरे 28 घंटे लगते हैं। पेन्यूली जी ने यहाँ लेखन में प्रयोग किया है,डा० संधु ने सार्थक समीक्षा की है और सूत्रों को अनुक्रम में रेखांकित किया है। यह संधु जी की अपनी विशेषता है। इस यात्रा के दौरान पाल की स्मृतियों में सम्पूर्ण जीवन उभरता है और उपन्यास उद्घोष करता है कि सुख,मनःशांति,ठहराव सम्बन्धों से जुड़ने में है। टूटन,भटकाव-बिखराव का मूल है और संतान तथा समाज के लिए घातक है।
अर्चना पेन्यूली के ग्लोबल उपन्यास “कैराली मसाज पार्लर” पर डा० मधु संधु की समीक्षा “चार महाद्वीपों में बिखरी नदी सी अबाध जीवन धाराःकैराली मसाज पार्लर” है। नायिका तीन बार तलाक लेती है,चार शादियाँ करती है और चार महाद्वीपों-एशिया,यूरोप,अफ्रीका और अमेरिका में रहती है। अपनी समीक्षा में डा० संधु ने विस्तार से,गहन छानबीन के साथ पूरी कहानी लिखी है और समीक्षात्मक दृष्टि से बेहतर मूल्यांकन किया है। यह प्रवासी स्त्री की कहानी है। हर प्रवासन उस पर विस्थापन बनकर टूटता है। नैन्सी प्रकृति-प्रेमी है। वह भारतीय धर्मों,रीति-रिवाजों,परंपराओं को जानती है। हर शादी के बाद उसे बदलना पड़ता है,पहनावा,खानपान,तौर-तरीके,संस्कृति और बहुत कुछ। भारतीय जीवन सरल है। डा० संधु लिखती हैं,पूरे विश्व में स्त्री को पति,पुरुष पीड़ित करते हैं और इस जग में औरत अकेली है। प्रश्न पूछती हैं-क्या उत्पीड़न ही स्त्री की नियति है? उपन्यास एक स्त्री के 29-30 वर्षों के जीवन की उथल-पुथल से भरा है। साथ ही महाद्वीपों की जीवन्त यात्राओं का रसास्वादन भी है। संधु ने उपन्यास से सूत्र वाक्यों को पाठकों के लिए एकत्र किया है और उनका यह निष्कर्ष अद्भुत है-नैन्सी जैसे लोग अपना देश याद रखते हैं,वापस आना चाहते हैं,भारतीय पासपोर्ट रखते हैं,भारत में बसने का खयाल कभी नहीं आता,विदेशों में भटकते हैं,अपने ही जीवन के मूल्य पर प्रयोग करते हैं,मातृभूमि और सगे-सम्बन्धियों के मोह में स्वदेश आते हैं,पर जड़ों से उखड़े विरवे कहाँ पनप पाते हैं। कुल मिलाकर पीड़ा,दुख-दर्द और सुख की तलाश करती प्रवासी स्त्री का चित्रण बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करता है।
“एक शाम में समाई असंख्य शामेंःशाम भर बातें” दिव्या माथुर के उपन्यास “शाम भर बातें” की समीक्षा में डा० मधु संधु लिखती हैं-“भरी शाम हो,पार्टी का आयोजन हो,मित्रों और संबंधियों का जमघट हो,विदेश की धरती हो और दिव्या माथुर की कलम हो-असंख्य कहानियाँ उभरने लगती हैं-सुख और दुख की,पीड़ा और मस्ती की,आजादी और सीमाओं की,सातवें आसमान और धूर पाताल की,प्रगति और दुर्गति की।” उपन्यास में नाना तरह की बातों के साथ डा० संधु ने सूत्र वाक्यों को समेटा है। यह पार्टी कम,डिबेट अधिक लग रहा है जहाँ लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने में लगे हैं। सभी अपना-अपना हुनर दिखा रहे हैं,नहले पर दहला व ऐसी-तैसी कर रहे हैं। फिर भी एक अपनापन है। उपन्यास में कोई कहानी नहीं है,सिर्फ बातें हैं और इन बातों में असंख्य कहानियाँ उभर रही हैं।
सुधा ओम ढींगरा के दो उपन्यासों-‘नक्काशीदार केबिनेट’ और ‘दृश्य से अदृश्य का सफर’ की अपनी समीक्षाओं को डा० मधु संधु ने यहाँ सम्मिलित किया है।’नक्काशीदार केबिनेट’ में जो कुछ लेखिका ने समेटा है,डा० संधु  समीक्षा में वर्णन करती हैं और उन विसंगतियों,दुखों का उल्लेख भी। काल खण्ड का ऐतिहासिक महत्व उपन्यास में है और समीक्षा में भी। संधु लिखती हैं-स्त्री जीवन का संघर्ष जितना विकट है, सशक्तिकरण की चाह उतनी ही प्रबल है। ढींगरा की भाषा में हिन्दी के साथ पंजाबी और अंग्रेजी का प्रयोग है। कवि पाश की पंक्तियों के साथ बौद्धिक चिन्तन है। पूरे उपन्यास के सूत्र वाक्यों को डा0 संधु ने खोज निकाला है। अपनी समीक्षा में लिखती हैं,यहाँ वर्तमान से अतीत और अतीत से वर्तमान की यात्रा है। अंत सुखद है। मूल्यों की विजय का संदेश है। पंजाब खालिस्तानियों से मुक्त हो जाता है और उपन्यास की संघर्ष गाथा में लक्ष्य प्राप्ति का उद्घोष है। सुधा ओम ढींगरा के उपन्यास “दृश्य से अदृश्य का सफर” की समीक्षा का डा० संधु ने शीर्षक दिया है-“महामारी और नारी उत्पीड़न के सन्दर्भ में नकारात्मकता से सकारात्मकता की यात्राःदृश्य से अदृश्य का सफर”। लेखिका के बारे में और उपन्यास की कथा-वस्तु का विवरण डा० संधु ने लिखा ही है,साथ ही कोरोना काल की त्रासदी का जीवन्त चित्रण हुआ है। समीक्षा मे स्त्री का संघर्ष और हार न मानने वाले गुणों को दिखाया गया है,लिखती हैं-पीड़ा से ही आत्मबल सँजोती है। महामारिओं पर विशद चर्चा लेखिका के ज्ञान के साथ समीक्षक की पकड़ दिखलाता है। यहाँ भी सूत्र वाक्य सहेजे गये हैं। दार्शनिक चिन्तन को संधु ने रेखांकित किया है और नकारात्मक-सकारात्मक शक्तियों की सम्यक विवेचना की है। उनका निष्कर्ष समझने योग्य है,लिखती हैं-दो युद्ध और दो प्रकार के योद्धा हैं। एक युद्ध अदृश्य शत्रु कोरोना के साथ है और दूसरा युद्ध उस आधी दुनिया का है जिसपर उत्पीड़न,अत्याचारों के जानलेवा हमले निरंतर चल रहे हैं। एक ओर कोरोना वैरियर्स युद्ध लड़ रहे हैं और दूसरी ओर अपनों की दानवी वृत्तियों से लड़ रही युवतियाँ हैं।
इला प्रसाद के उपन्यास “रोशनी आधी अधूरी सी’ कि समीक्षा का डा0 मधु संधु ने शीर्षक दिया है “मुट्ठी भर आकाश की खोज मेंःरोशनी आधी अधूरी सी”। यह एक युवती के सपनों,संघर्ष,क्षमताबोध और जीवट की गाथा है। उपन्यास नायिका प्रधान है। किसी भी मंजिल तक न पहुँचा पाने वाले शोध संस्थानों,उनकी नकारात्मक राजनीति और भविष्यहीन,कैरियर रहित शिक्षानीति की चर्चा है। समीक्षा में विस्तार से बिहार,बनारस,मुम्बई,अमेरिका तक के अध्ययन,शोध के साथ नौकरी न पाने की विवशता संघर्षशील युवती की कथा है। यहाँ संस्थानों की तुलनात्मक स्थिति का खुलासा भी है जिसमें शिक्षक, छात्र-छात्राएं,राजनीति,शोषण,गंदगी,नैतिक-अनैतिक सम्बन्ध,जीवन के संघर्ष खूब चित्रित हुए हैं। संधु जी ने विषय-वस्तु की व्यापक चर्चा की है और उपन्यासकार के उपन्यास लेखन के उद्देश्य को पकड़ा है। सूत्र वाक्यों का संग्रह उनकी अपनी विशेषता और शैली है। डा० संधु निष्कर्षतः लिखती हैं, इला प्रसाद प्रतिष्ठित,उच्चस्तरीय शिक्षण एवं शोध संस्थानों की परतें केले के गाभ की तरह परत दर परत खोलती जाती हैं। वहाँ की राजनीति,प्रेम कथाएं, भ्रष्टाचार,दोगलापन.उपर उठने या अपना काम निपटाने के रहस्य यहाँ मिलते हैं। उनकी सूक्ष्म दृष्टि बनारस के बीएचयू, मुंबई के तकनीकी संस्थान और अमेरिका के जीवन का अनेक स्तरों पर तुलनात्मक अध्ययन करती जाती हैं। उपन्यास का अंत कुछ-कुछ सुखान्त हो चला है।
‘नारी उत्पीड़न से सशक्तिकरण की यात्रा पारो-उत्तरकथा’ सुदर्शन प्रियदर्शिनी के उपन्यास पारो-उत्तरकथा की समीक्षा करते हुए डा० मधु संधु ने लिखा है-शरत चंद्र के ‘देवदास’ के 100 वर्ष बाद प्रकाशित ‘पारो-उत्तरकथा’ पुनर्पाठ न होकर  पुनर्सर्जना है। उपन्यास में स्त्री उत्पीड़ित है और उसका उत्पीड़न चौतरफा है। वह स्त्री जब सिर उठाती है तो नारी सशक्तिकरण का जीवंत उदाहरण बनती है। यह उपन्यास अबला से सबला की कहानी है। डा० संधु ने समीक्षा करते हुए हर बिन्दु पर चिन्तन किया है और अपना निष्कर्ष निकाला है। स्त्री पात्रों ने सशक्त भूमिकाएं निभाई हैं। अपनी शैली को दुहराते हुए डा० मधु ने यहाँ भी सूत्र वाक्य खोज निकाले हैं। अत में उन्होंने लिखा है-उपन्यास अगर सामन्तीय परंपरा की अभिशप्त स्त्रियों के लिए है तो उनमें लौह स्त्री का स्वाभिमान और संघर्ष क्षमता भी है। उत्पीड़न की आग ने अग्निकुंड से निकली इन स्त्रियों को खरा सोना बना दिया है।
डा० हंसा दीप के तीन उपन्यासों-बंद मुट्ठी,कुबेर और केसरिया बालम की समीक्षाएं यहाँ शामिल हैं। तीनों उपन्यासों की भावभूमि-पृष्ठभूमि अलग-अलग है। ‘बंद मुट्ठी’ में रिश्तों के आधिपत्य की कहानी है। यहाँ दूर वाले अपने हैं और अपने पराये जैसा व्यवहार करते हैं। नस्लभेद और रंगभेद की ग्रंथि से पिता आक्रान्त हैं। डा० संधु लिखती हैं,यह आने वाले कल का उपन्यास है। ‘कुबेर’ जीवट और संघर्ष की गाथा है। उपन्यास निहायत गरीब,भावनाशील और तीव्र-बुद्धि बच्चे के संघर्ष की कथा है। धनंजय प्रसाद,धन्नू,डीपी,डीपी सर से होते हुए कुबेर की कथा की बेहतरीन समीक्षा डा० संधु ने की है और संघर्ष,सेवा,समर्पण,धैर्य जैसे गुणों के साथ संस्कृतियों की पहचान की है। ‘केसरिया बालम’ की समीक्षा का शीर्षक ‘रेगिस्तान में हरीतिमा और संपन्नता में दारिद्र्य’ सारी कहानी कह देता है। यह कथा भारत से शुरु होकर अमेरिका तक फैली है। नायिका धानी में जहाँ रागात्मकता-प्यार,स्नेह,ममता, वात्सल्य व सम्मान महत्वपूर्ण है, वहीं उसका पति यंत्र युग का प्राणी है,भौतिकता की दौड़ में मनोरोगी बन जाता है। नायिका धानी अपने केसरिया बालम से मन से जुड़ी है और उसका हमेशा ध्यान रखती है। इन तीनों उपन्यासों की समीक्षा जिस तरीके से डा0 संधु ने की है,सारे तत्वों को निचोड़कर रख दिया है। सूत्र यहाँ भी हैं और उन्होंने उन्हें पूरे मन से सहेजा है।
अगली समीक्षा ‘अपराध कथाःनिष्प्राण गवाह’ शीर्षक से डा० संधु ने संग्रह में रखा है। कादम्बरी मेहरा द्वारा रचित ‘निष्प्राण गवाह’ रहस्य,रोमांच से भरा जासूसी उपन्यास है। उन्होंने सम्पूर्ण कथा का परिचय दिया है,विषय-वस्तु समझाया है और नये तरीके से छानबीन की है। विवाह/प्रेम के भिन्न रुप का चित्रण हुआ है और बोली,भाषा पर भी संधु जी की दृष्टि गई है। इस समीक्षा में सूत्र वाक्य नहीं हैं बल्कि रहस्य के आवरण हैं। डा० संधु  के अनुसार  स्त्री पात्रों का जीवन संघर्ष उपन्यास को जनवाद और नारीवाद से जोड़ता है। ‘बंदूक संस्कृति और अन्य ब्लैक होलःसितारों में सूराख’ अनिलप्रभा कुमार के उपन्यास ‘सितारों में सूराख’ उपन्यास की समीक्षा है। बंदूकें अमेरिकी इतिहास, राजनीति और संस्कृति का अभिन्न हिस्सा है। यहाँ आये दिन गोलियाँ चलती रहती हैं और नस्ल, लिंग,रंगभेद खूब है। उपन्यास का संदेश यही है,बंदूक संस्कृति तभी खत्म होगी जब राजनेता, जन प्रतिनिधि और जन-जन का प्रयास हो। उपन्यास की मूल भावना को डा० मधु संधु ने विस्तार से चिन्हित किया है और सूत्र वाक्य तो उनकी शैली में है ही।
सुषम बेदी के उपन्यास ‘पानी केरा बुदबुदा’ की समीक्षा डा० मधु संधु ने ‘मूल्यों की टूटन और सार्वदेशिक बेचैनियाँ’ शीर्षक से की है। यह लेखिका के लम्बे जीवन अनुभवों का मार्मिक दस्तावेज है जिसमें नायिका का जीवन संघर्ष, द्वन्द,चिन्तन,समझौते,छटपटाहटें स्वाभाविक रुप से चित्रित हुई हैं। सूत्र वाक्यों के साथ डा० संधु ने अपनी बेहतरीन समीक्षा में कथ्य-कथानक को विस्तार से दिखाया-समझाया है। वे लिखती हैं-कथ्यगत गहराई और अभिव्यक्तिगत कलात्मकता आदि से अंत तक उपन्यास की रोचकता और पठनीयता को बनाए रखते हैं। नीना पाॅल का उपन्यास ‘कुछ गाँव-गाँव, कुछ शहर-शहर’ गुजराती खानाबदोश परिवार के तीन पीढ़ियों की कहानी है। विस्तार से पूरी कहानी का सारांश डा० मधु संधु ने अपनी समीक्षा में लिखा है। संस्कृति का प्रभाव,पाश्चात्य जीवन शैली और लेस्टर के माध्यम से पहचान उपन्यास के चिन्तन में है। संधु जी लिखती हैं-उपन्यासकार ने अपनी धरती से उखड़े और अन्य देशों में जीवन संघर्ष कर रहे एक परिवार की लगभग आधी शती लंबी यात्रा को बड़े संतुलित और निरपेक्ष भाव से चित्रित किया है। यहाँ समीक्षा में सूत्र वाक्यों  का प्रभाव पूर्ववत ही है।
इतना तो मानना ही होगा,प्रवासी महिला साहित्यकारों ने अपने उपन्यासों के माध्यम से प्रवासी जीवन की सच्चाई को खोलकर रख दिया है। प्रवासी स्त्री जीवन में सुख के साथ-साथ संघर्ष है,उत्पीड़न है, छल-छलावा और नाना विसंगतियाँ हैं। नस्ल,रंग,लिंग,जाति के साथ-साथ आर्थिक संपन्नता-विपन्नता का दंश झेलना पड़ता है। स्त्री विमर्श,स्त्री संघर्ष और स्त्रियों की सफलताएं उम्मीद जगाती हैं। आज स्त्री उठ खड़ी हो रही है,अपनी चुनौतियों को स्वीकारती है और सफल होती है। सभी महिला उपन्यासकारों को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं। डा० मधु संधु की समीक्षाओं में सभी आवश्यक तत्व समाहित हुए हैं। विस्तार से लेखिकाओं सहित कथ्य-कथानक,विषय-वस्तु से परिचय करवाती हैं। सूत्र वाक्यों का संग्रह संधु जी की समीक्षा की अपनी प्रभावशाली शैली है। उन्हें उपन्यासकारों की भाषा-शैली की अद्भुत समझ है। समीक्षा की उनकी अपनी भाषा-शैली में रोचकता है। पुस्तक में प्रकाशन सम्बन्धी कहीं-कहीं समस्याएं हैं। कुल मिलाकर कहा जाना चाहिए-डा० मधु संधु जी एक बेहतरीन समीक्षक हैं और मैं उन्हें शुभकामनाओं के साथ बधाई देता हूँ।

समीक्षक – विजय कुमार तिवारी
(कवि,लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,समीक्षक)
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-4 फ्लैट-1002
पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029
भुवनेश्वर,उडीसा,भारत
मो०-9102939190
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