राकेश शंकर भारती की कलम से भुवनेश्वर उपाध्याय के उपन्यास 'हाफ मैन' की समीक्षा 3

इस बार जब मैं अपनी किताबें “इस ज़िंदगी के उस पार” और “कोठा नं. 64” के प्रचार-प्रसार और दिल्ली विश्व पुस्तक मेले में अपने देश गया था तो अमन प्रकाशन के स्टॉल से हाल में ही प्रकाशित उपन्यास हॉफ़ मैन लिया था। यूक्रेन वापस आ जाने पर कुछ लेखक मित्रों की किताबें पढ़ने के बाद इस उपन्यास की भी बारी आयी। इसी बीच पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था कोरोना वायरस के बढ़ते प्रकोप की वजह से लड़खड़ाने लगी। इससे मैं भी अछूता नहीं रहा। आर्थिक परेशानी की वजह से मन में एक अजीब सी उदासी रहती है।

अपने भविष्य और लेखनी को लेकर भी उदासी रहती है। अपनी पारिवारिक और लेखनीय व्यस्तता से समय चुराकर इस हफ़्ते उपन्यास हॉफ़ मैन पढ़ा। इससे पहले किन्नर विमर्श पर ही अपने लेखक मित्र और अभिनेता राजेश मालिक का उपन्यास आधा आदमी पढ़ा था, जिसमें किन्नर दीपिका माई की ज़िंदगी के दर्द और पीड़ा को बेहतरीन अंदाज़ में पिरोया गया है।

आधा आदमी उपन्यास को हॉफ़ मैन से तुलना नहीं करें। फिर भी दोनों उपन्यास के शीर्षक देखकर लगता है कि आधा आदमी का अंग्रेज़ी अनुवाद है- हॉफ़ मैन। लेकिन दोनों उपन्यास की कहानी और संदेश बिलकुल अलग हैं। मैं इस उपन्यास की तुलना किन्नर विमर्श के किसी भी उपन्यास से नहीं करने जा रहा हूँ, क्योंकि किन्नर विमर्श पर केंद्रित होते हुए भी यह उपन्यास किन्नर विमर्श से ऊपर की चीज़ है। इस उपन्यास में भुवनेश्वर जी ने अपूर्णता को पूर्णता, हताशा को प्रेरणा में बदलने की भरपूर कोशिश की है।

उपन्यास की भाषा-शैली भी गजब की है। उपन्यास अपने पहले अध्याय से पाठक को अपने काबू में ले लेता है। एक गंभीर विषय पर होते हुए भी उपन्यास का प्लॉट पाठक को कहीं से भी निराश नहीं करता है। उपन्यास में वाक्य-विन्यास, प्लॉट में पिरोयी गयी उपमाएँ पढ़कर लगता है कि लेखक को लेखनी में बहुत गहराई है। साहित्य की गहरी समझ है। मैंने अभी किन्नर विमर्श पर जितने भी उपन्यास पढ़े हैं, उनसे बिलकुल भिन्न है। उपन्यास का खंभा भी मज़बूत है, और साथ में सबप्लॉट को भी उपयुक्त स्थान पर रखकर कहानी आगे बढ़ती है।

अर्जुन के माता-पिता सजल और पारस ने जब उसे जन्म दिया था, तब उनके दिल में ज़रूर थोड़ा बहुत पछतावा था कि एक अपूर्ण बच्चा को जन्म देकर एक बच्चा की लालसा पूरी होने के बावजूद उसका सपना अधूरा रह गया है, लेकिन अर्जुन ज़िला पदाधिकारी बनकर अपने माता-पिता को वह ख़ुशी देता है, जिसके बारे में उसने कभी सोचा तक नहीं था। इस उपन्यास में किन्नर अर्जुन ही मुख्य पात्र है, उसके बाद दूसरा पात्र नीरव भी उपन्यास में प्रवेश करता है, जो उपन्यास में हम सबों के लिए प्रेरणा का बड़ा स्रोत भी है।

अर्जुन के साथ-साथ उपन्यास में कई उपकथानक (subplot) भी जुड़ते चले जाते हैं, जिससे कहानी और ज़्यादा दिलचस्प होती चली जाती है। नीरव, कनुप्रिया, दीपा, सुबोध, जैसे दिलचस्प पात्रों की वजह से उपन्यास के प्लॉट की फ़िज़ा भी दिलचस्प होती जाती है और उपन्यास कई पैगाम अपने साथ लेकर आगे बढ़ता है। 

अर्जुन और दीपा की प्रेम कहानी भी पाठकों को अंदर तक झकझोर देती है। दीपा अर्जुन को दिल से चाहती है और वह इस बात से बिलकुल अनजान है कि हक़ीक़त में अर्जुन है क्या। जब उसे सच्चाई का पता चलता है, तब तक अर्जुन की चाहत में खोकर दीवानी हो जाती है। सच्चाई जानने में बहुत देर हो जाती है। उपन्यास में तब बेहद दिलचस्प मोड़ आता है, जब अर्जुन दीपा से कहता है, “दीपा तुम बहुत प्यारी हो, और वो कोई अभागा ही होगा जो तुम्हारी प्रेम की अनदेखी करेगा। यहाँ कोई भी पेड़ नहीं चाहता कि उसपर पतझड़ आये, मगर वो आ जाता है।“ 

इसपर दीपा कहती है, “परंतु वो चला भी तो जाता है।“ 

इसपर किन्नर अर्जुन की बानगी सुनें, “काश मैं भी इतना भाग्यशाली होता!” 

जब दीपा अर्जुन के राज के बारे में जानना चाहती है तो अर्जुन इस प्रकार कहता है, “दीपा! मुझ जैसे लोग तराशे नहीं जाते, हमें तो समय ही तोड़ता है और वही गढ़ता है, बिना किसी ज़रूरत के। हम तो ऊँचाई से गिरे पत्थरों की तरह समय के तेज़ बहाव के साथ लगातार बहते रहते हैं। समय की रगड़ बहुत सख्त और असामान्य होती है। वही घिस देती है, जो हिस्सा उसकी चपेट में आ जाता है।

कभी कम कभी थोड़ा ज़्यादा… मैं भी समय की ऐसी चोटों से ढला हूँ, इसीलिए किसी के जैसा नहीं हूँ। तुम कोशिश भी करो, तब भी मुझे बदलकर स्वीकारने की तेरी कोशिश बेकार ही होगी।“ इसपर दीपा मायूस ज़रूर हो जाती है, लेकिन अर्जुन दीपा की इस चाहत को दोस्ती का रूप देने की भरपूर कोशिश करता है और इसमें वह काफ़ी हद तक सफल भी होता है। उपन्यास की दूसरी कड़ी में नीरव और कनुप्रिया की प्रेम ने भी अर्जुन और दीपा को आपस में जोड़ने की भरपूर कोशिश करती है।

इन सभी पात्रों की सार्थक मित्रता की बदौलत अर्जुन ज़िलाधिकारी बन जाता है। नीरव और अर्जुन की दोस्ती भी बहुत निराली है। अगर अर्जुन की ज़िंदगी में नीरव जैसा अच्छा प्रेरक दोस्त नहीं मिलता तो शायद अर्जुन की ज़िंदगी सेट नहीं होती। उसे दिल्ली विश्वविद्यालय में और ज़्यादा अपमान सहना पड़ता। अच्छे दोस्त मिल जाने से ज़िंदगी बदल जाती है। जीवन में नया रास्ता बनता है।

नीरव की प्रेरणा और सुझाव रंग लाते हैं और अर्जुन को सही राह पर लाकर सफल बनाकर नीरव हम सभी को सकारात्मक रूप से प्रेरित करता है और दोस्ती की बेहतरीन मिसाल भी पेश करता है। दीपा एस. डी. एम. बन जाती है। फिर आख़िर में एक खटक तो रह ही जाती है।

दीपा और अर्जुन मित्र के रूप में जुदा हो जाते हैं। उपन्यास ख़त्म करते समय मुझे भी एहसास हुआ कि हर किसी की ज़िंदगी में कुछ न कुछ कमी तो रह ही जाती है। अर्जुन ने अनाथ बच्चे को गोद लेकर और एक आई. ए. एस. बनकर अपनी ज़िंदगी की कमी पूरी की है और अपने माता-पिता को यह भी एहसास कराया कि लैंगिक विकलाँगता जीवन की सफलता की राह में रोड़ा नहीं बनती है। 

उपन्यास- हॉफ़ मैन 
लेखक- भुवनेश्वर उपाध्याय 
प्रकाशक- अमन प्रकाशन, कानपुर 
समीक्षक- राकेश शंकर भारती,  यूक्रेन 
पृष्ठ- 176
मूल्य- 250

Leave a Reply

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.