वही साहित्य कालजयी बन पाता है जो अपने समाज का प्रतिबिंब होता है।  और एकदेशीय होने के बावजूद वही साहित्यकार सार्वभौमिक बन सकता है जो ऐसे साहित्य की रचना करता है जिसमें तत्कालीन स्थानीय और वैश्विक समस्याओं/विषमताओं/असमानताओं एवं विद्रूपताओं के सांगोपांग  वर्णन के साथ-साथ उनके तार्किक समाधान का प्रावधान और भविष्य का बोध भी रहता है। 
सामाजिक यथार्थ को साहित्यिक पटल पर शब्दांकि्त करने के दौरान साहित्य-सर्जक अपने साहित्य में यदि जीवन स्पंदन पैदा करने में सक्षम है तो वह अपने सृजन दायित्व धर्म को तो निभाता ही है उसका साहित्य युग और समाज का जीवंत व्याख्यान हो कर भी अपने पाठकों श्रोताओं और दर्शकों को भूत, वर्तमान  और भविष्य से जोड़ कर एक श्रेयस्कर पथ की और अग्रसर होने की प्रेरणा देता है। 

सामाजिक यथार्थ का साहित्यिक पटल  - अंतहीनः विमर्शों का पुंज 3

सौभाग्य से भारत के निवर्तमान उच्च शिक्षा मंत्री और परम सौभाग्य से सुधि साहित्यकार डॉ रमेश पोखरियाल निशंक का कहानी संग्रह अंतहीन एक ऐसी ही कृति है जो जनसामान्य के जीवन से सीधे तौर पर  संबंधित विभिन्न विमर्शों का सार्थक संचयन है और एक बहुत सटीक शीर्षक के साथ पौलैंड में वार्सा विश्वविद्यालय  की  आई. सी. सी. आर. सीट के वर्तमान अध्यक्ष और हंसराज  महाविद्यालय, नयी दिल्ली में एसोसिएट प्रोफेसर के रूप में कार्यरत  और साहित्य सर्जक डॉ सुधांशु शुक्लाजी ने इस कृति पर अंतहीन: विमर्शों का पुंज पुस्तक लिखी जो वास्तव में निशंक जी के संवेदनशील सृजन की नब्ज को पकड़ने में सफल है।
कृति की सम्पूर्ण कहानियों की मूल संवेदना भाव और कला पक्ष के सहित शिल्प निर्माण और प्रासंगिकता को वर्णित करती शुक्ला जी की यह पुस्तक लगभग  21 अधयायों में निशंक जी की कहानियों में विवेचित विमर्शों को सारगर्भित रूप में व्यक्त करती है।
सुधांशु शुक्ला के अनुसार अंतहीन कहानी संग्रह सांस्कृतिक बोध और मानवीय रिश्तों की अद्भुत गाथा है जिसमें निशंक जी के कहानीकार का कवि मन भाषायी सौन्दर्य के साथ साथ उत्तराखंड की प्राकृतिक सुन्दरता का भी सहज शाब्दिक चित्रण इतनी तन्मयता से करता चला जाता है कि एक सहृदय पाठक कहानियों की वेदना को अनुभव करते हुए कहानियों के परिवेश को भी आत्मसात कर लेता है और उसका साहित्यकार की मंशा से साधारणीकरण हो जाता है। 
शुक्ला जी अंतहीन विमर्शों का पुंज  में अध्याय चार में स्पष्ट कहते हैं कि इस समय जब विमर्शों की चर्चा – परिचर्चा के माध्यम से जीवन के खंडित रूप को पाठकों के समक्ष रख अपनी विद्वत्ता का प्रदर्शन करते नहीं लगाते वही अंतहीन की कहानियों में पोखरियाल जी अपनी अनूठी शैली में जीवन को समग्रता के साथ देखते हुए जीवन जीने की कला समझाते हुए मुस्कुराते हुए हर परिस्थिति का सामना करने को तैयार रहने की सीख देते हैं और इसके बावजूद न तो उनकी कोई कहानी उपदेशक लगती है न ही कहीं इतिवृत्तात्मकता को ओढ़ती लक्षित होती है और न ही किसी तीसरी दुनिया के चरित्रों को प्रतिष्ठित करती लगती हैं। सकारात्मकता और जमीनी हकीकत उनकी अभिव्यंजना का सुखद  पक्ष है। 
अतीत की परछाइयां के वृद्ध माता-पिता भागीरथी और रामरथ का बेटा सरजू  उत्तराखंड के पौढ़ी गढ़वाल  क्षेत्र में भटकते अपराधियों द्वारा अपहृत हो कर विदेश में कहीं बेच दिया गया है परन्तु अट्ठारह वर्षो तक उनकी आस नहीं टूटती और विदेश से उत्तराखंड भ्रमण करने आए लड़कों के एक झुंड में सरजू के हु-ब-हु डील डौल/ नखशिख का लड़का फिर से वहां आने का वादा कर  जिंदगी से उनका मोह फिर से पैदा कर जाता है । यहां पाठक  भागीरथी और रामरथ के साथ नियति के क्रूर मजाक के बावजूद के भी कहानीकार की सकारात्मक सोच का कायल हो जाता है
अंजान रिश्ता कहानी में बिना ब्याही शिक्षित और आत्मनिर्भर बहु का  वृद्ध ससुर जी की देखभाल करना और अपने माता-पिता से अधिक उनकी परवाह करना कहानी  की सूत्रधार महिला को मानवीय संवेदनाओं की अभूतपूर्व मिसाल लगता है और वह सोचने को बाध्य है “  ऐसा भी कहीं होता है क्या?? आज लोग जब खून के रिश्ते नहीं निभाते दीनानाथ जी और सुलक्षणा वह रिश्ता निभा रहे हैं जो कभी बना ही नहीं “” (पृष्ठ संख्या 20)।
आज जब स्त्री विमर्श और श्रमिक विमर्श पर लेखक कलम चला कर पुरस्कारों की अपेक्षा करते हैं वृद्ध विमर्श और उसके समाधान का ऐसा अनूठा उदाहरण अन्यत्र दुर्लभ है । संपति कहानी की विमाता का सौतेले बहु बेटे के कुकृत्यों “आजकल लोग प्रापर्टी के लिए नकली वसीयतनामे , फर्जी मृत्यु प्रमाणपत्र लगा कर भी संपति हस्तांतरण को चल पड़ते हैं यह तो मुर्दे को भी कब्र से निकाल खड़े कर देते हैं और जिंदा को कब्र में गाढ़ देते हैं ‘’ (पृष्ठ 29) क्षमा कर स्वर्गीय पति प्रशांत की संपत्ति उनके नाम कर देना स्त्री गरिमा को और भी परिष्कृत करता दिखाई देता है।
बदल गयी जिंदगी की फ्यूली तो रमेश पोखरियाल का भूतो-न-भविष्यति पात्र है जो बाढ़ और महामारी में पति और मासूम बच्चों को खो चुकी है लेकिन मानसिक रोगी या विक्षिप्त मन कर ठोकरें नहीं खाती बल्कि एक विद्यालय में आया बन कर वहां के सभी बच्चों में अपने बच्चों की छवि देख कर अपने मातृत्व को पोषित कर वसुधैव कुटुंबकम् की भारतीय सांस्कृतिक अवधारणा को संपुष्ट करती है… बरबस ही यहां पाठक का मन मस्तिष्क रमेश पोखरियाल की कलम के सम्मुख श्रद्धा से झुक जाता है। 
साहित्यकार निशंक केवल सामाजिक यथार्थ को ही नहीं  गेहूं/खाद्य पदार्थ माफियाओं की भी बहुत जोरदार पोल खोलता है गेहूं के दाने कहानी में और पाठक की आंखें खुली रह जाती है जब बेरोजगारी और भुखमरी का शिकार विनायक और उसका परिवार कीड़े मकोड़ों सी जिंदगी बिताने को विवश हैं और लाला के गोदाम में अंतहीन गेहूं सड़ रहा है । मृत विनायक की मुठ्ठी में पकड़े गेहूं के दाने पाठक की संवेदना को झकझोर देने में समर्थ हैं।
पश्चिमी संस्कृति की देन लिव-इन रिलेशनशिप, मानव तस्करी, नारी-यौन उत्पीड़न, निर्धनता के अभिशाप के अनमेल विवाह बनाम अमानवीय दैहिक शोषण, विकलांग विमर्श इत्यादि और बहुत से विमर्शों को संजोए डॉ सुधांशु शुक्ला जी की यह पुस्तक अंतहीन:: विमर्शों का पुंज वास्तव में  निशंक जी की साहित्यिक जिजीविषा का पुंज है जिसे बहुत सलीके और तार्किक विधि से सराहनीय स्तर पर डॉ सुधांशु शुक्ला जी ने सफलतापूर्वक उभारा है।
मूल पुस्तक – ‘अंतहीन: विमर्शों का पुंज’; लेखक – डॉ सुधांशु शुक्ला, मूल्यः रु.525 /- मात्र प्रकाशकः अनंग प्रकाशन, बी-107 /1, गली मन्दिर वाली, उत्तरी घोण्डा, दिल्ली-10053
डॉ. किरण खन्ना
एसोसिएट प्रोफेसर, स्नातकोत्तर हिंदी विभाग ‌डी.ए.वी. कॉलेज, अमृतसर (पंजाब) ईमेलः kirankhanna517@gmail.com

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