वही साहित्य कालजयी बन पाता है जो अपने समाज का प्रतिबिंब होता है। और एकदेशीय होने के बावजूद वही साहित्यकार सार्वभौमिक बन सकता है जो ऐसे साहित्य की रचना करता है जिसमें तत्कालीन स्थानीय और वैश्विक समस्याओं/विषमताओं/असमानताओं एवं विद्रूपताओं के सांगोपांग वर्णन के साथ-साथ उनके तार्किक समाधान का प्रावधान और भविष्य का बोध भी रहता है।
सामाजिक यथार्थ को साहित्यिक पटल पर शब्दांकि्त करने के दौरान साहित्य-सर्जक अपने साहित्य में यदि जीवन स्पंदन पैदा करने में सक्षम है तो वह अपने सृजन दायित्व धर्म को तो निभाता ही है उसका साहित्य युग और समाज का जीवंत व्याख्यान हो कर भी अपने पाठकों श्रोताओं और दर्शकों को भूत, वर्तमान और भविष्य से जोड़ कर एक श्रेयस्कर पथ की और अग्रसर होने की प्रेरणा देता है।

