Saturday, May 18, 2024
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रश्मि लहर की कलम से सुधीर मिश्र की पुस्तक ‘मुसाफिर हूँ यारों’ की समीक्षा

पुस्तक- ‘मुसाफिर हूँ यारों’  लेखक- सुधीर मिश्र पृष्ठ- 95 मूल्य- 199 प्रकाशन- वाणी प्रकाशन
सुधीर मिश्र लखनऊ के जाने-माने साहित्यकार तथा पत्रकारिता के सशक्त स्तम्भ हैं। इनकी रचनाधर्मिता के कारण लखनऊ का नाम संपूर्ण भारत के साथ विदेशों में भी सम्मान से लिया जाता है। इनकी पुस्तक पढ़ते समय मुझे कई बार पुराने संस्मरण याद आए। संस्मरण पढ़ने के क्रम में मुझे सदैव यह लगता रहता था कि लेखक की लेखनी सामयिक मुद्दों पर केन्द्रित होने के साथ-साथ यर्थाथ की समस्याओं का हल बताने वाली भी होनी चाहिए। साहित्यिक अभिरुचि होने के कारण समय बीतने के साथ अनेक संस्मरण पढ़ने को मिलते रहे। पर जब ‘मुसाफिर हूँ यारों’ पुस्तक पढ़ने बैठी तो सुधीर मिश्र जी की विशिष्ट शैली पर मन्त्रमुग्ध हो गई। आज के युवाओं के लिए बहुपयोगी यह पुस्तक जहाँ एक तरफ पत्रकारिता से जुड़े अनेक संघर्षों पर दृष्टि डालती है, वहीं दूसरी तरफ विदेश में आने वाली कठिनाइयों पर भी नितांत परिपक्वता से प्रकाश डालती है तथा बातों-बातों में जीवनोपयोगी उपाय भी बताती चलती है।
पुस्तक पढ़ते समय पाठक को अपने अभावों पर ग्लानि न होकर सहजता प्रतीत होती है। इसमें युवाओं के विभिन्न चिन्ताओं से बाहर निकलने के ढंग पर भी चर्चा की गई है। सही अर्थों में, पुस्तक के माध्यम से एक जिज्ञासु मन को परिणाम तक पहुँच कर बहुत तसल्ली मिलती है। यह पुस्तक निहायत सादगी से यह बताने में समर्थ है कि धन को बचाते हुए किस तरह हम विदेशी भूमि पर भी अपने प्रभाव के पगचिन्ह छोड़ सकते हैं।
एक स्थान पर “ऑंखे उसकी भी भीगी हुई थीं” पढ़कर यह प्रतीत हुआ कि अपने देश की कशिश और उसकी स्मृति में भरे हुए आँसू अपनेपन की अनमोल धरोहर होते हैं। एक स्वदेशी का रिश्ता जाति-धर्म से परे बस स्नेह का रिश्ता था। देश से विछोह का रिश्ता था, मानो दोनों की आत्मा एक-सी हो गई थी। कई बार पढ़ते-पढ़ते लगा कि अपने देश की सुरभित वायु विदेश में ढूँढने पर भी नहीं मिलती। भारतीय दुकानदार ने जिस अपनत्व से रात को वहाँ न आने की सलाह दी, वह भारतीयता की रगों में बहते हुए उस लहू की निशानी है, जो संपूर्ण विश्व के भारतीयों को एक सूत्र में बाँधे है।
यदि छात्रों द्वारा यह पुस्तक पढ़ी जाए तो यह जानकारी भी आवश्यक है कि प्रसिद्ध वस्तुएँ संरक्षण हेतु अधिक लोकप्रिय होती हैं। पढ़ते-पढ़ते एक सार्वभौमिक सत्य से भी सामना हुआ कि ‘गरीबी’ विश्व स्तर पर पहचानी जाती है।
लखनऊ वालों के लिए सपनों का शहर ‘पेरिस’, ‘फ्रांस’ वगैरह ऐसे हैं जिन्हें सोचकर लगता था कि बहुत विशिष्ट लोग ही वहाॅं जाते होंगे। उन शहरों का नाम लेने में भी आम लोग हिचकते थे। आज इस पुस्तक के द्वारा ‘एम्सटर्डम’ इतना सहज शब्द लग रहा है मानो बरसों से इसको हम पहचान रहे हों। ‘ब्रसेल्स’, ‘द हेग’, ‘राटर्डम’ जैसे तमाम शहर आज सहज भाव से दिमाग व ज़बान को याद हो गए हैं ।
पुस्तक पढ़ते समय कई भाव मन को उद्वेलित कर गए, जैसे वेश्यावृत्ति वहाँ ‘लीगल’ है। बेबसी से की जाने वाली ‘वैध’ नौकरी कितने अवैध दुःखों को जन्मती होगी, कौन जाने। तभी मन में यह विचार भी कौंधा कि क्या कहीं उन असंख्य दुःखों का आँकड़ा भी बन रहा होगा, जो विवशता के कारण भावों की मृत्यु पर सिसकी भी नहीं भर पाते होंगे? मेरा मानना है कि इतनी सहज तथा प्रभावशाली भाषा में लिखी गई यह पुस्तक बरसो-बरस प्रासंगिक रहेगी।
‘यूनाइटेड नेशन’ की गतिविधियों का केंद्र रहा ‘द हेग’ को पढ़ना भी बहुत अच्छा लगा। ट्यूलिप के खेत पढ़कर तमाम खेतिहर लोग याद आए, जिनका ज़िक्र सिर्फ खेत की धरा करती होगी। वे असंख्य बेनाम लोग, जिनकी हर साॅंस शाख़ों पर अपनी गवाही दे रही होगी।
मिश्र जी की लेखनी की विशेषता जगह-जगह पर देखने को मिली। शहर की भौगोलिक स्थिति का वर्णन उन्होंने इतने रोचक ढंग से किया है कि भूगोल में अरूचि रखने वाले लोगों को भी पसंद आ जाए। जैसे “जोश उत्तरी सागर के ठंडे पानी में पूरी तरह से ठंडा हो गया।“ (पृष्ठ सं. 38)
पुस्तक इस विचार को भी प्रसारित करती है कि जब हम किसी ऐसी जगह जाऍं, जो आम लोगों की पहुँच से बाहर हो, तो वहाॅं से कुछ न कुछ ज़रूर लाऍं। कहने का मतलब यह है कि ऐसा सकारात्मक सन्देश  देकर मिश्र जी ने बच्चों को यह समझाने का प्रयास किया है कि यदि वे कहीं बाहर जाऍं तो अपने बजट के अनुसार अपनों के लिए यथायोग्य सामान भी अवश्य लाऍं। उन्होंने किफायत से पैसा खर्च करना तो बताया ही, साथ ही साथ विदेश में भारतीय मन-मस्तिष्क को किस तरह उपयोग में लाएँ, इसकी भी बहुत सरल तरीके से जानकारी दी।
अफ्रीकी महिला ने भारत का जो रूप बताया वह भी चिंतनीय था। यदि यह पुस्तक न पढ़ती तो शायद यह पता भी न चलता कि वहाँ की महिला भारत के लोगों, पूँजीपतियों के प्रति क्या विचार रखती हैं।
“शायद कूदने से कुछ गर्मी आए” कहकर उन्होंने विषम परिस्थितियों में स्वाभाविक बने रहने का भाव संप्रेषित किया है। अद्भुत कथा-शिल्प का प्रयोग करते हुए लेखक कब मन को स्पर्श कर जाता है, पता ही नहीं चलता। एक उदाहरण देखिए-
“पानी की नहर में बर्फ की मोटी मलाई-सी उतरा रही।”
लेखक ने बहुत सलीके से यह बता दिया है कि एक विदेश यात्रा से हम चाहें तो क्या-क्या लाभ ले सकते हैं। हम अपनी सोच बदल सकते हैं और सोच की सकारात्मकता हमारी प्रोफेशनल लाइफ को प्रभावित तथा लाभान्वित करती है। लेखक का यह जताना कि आत्मीयता  तथा दोस्ती विश्वस्तर पर  मिलने वाली भावना है, सुखद लगा। यकीनन मानवीयता सदैव जोड़ने का कार्य करती है।
मैंने कई यात्रा संस्मरण पढ़े हैं, पर यह पुस्तक सर्वथा भिन्न लगी; क्योंकि इसकी सर्वग्राही भाषा जहाँ अन्तर्मन को स्पर्श करती रही, वहीं इसके छिपे सन्देश मस्तिष्क को एक नया आयाम देते रहे। पर्यावरणीय पत्रकारिता से जुड़ी कई सूचनाओं की जानकारी पाकर मन पुलक के भर उठा।  मिठाई में भी नानवेज होता है, यह जानकारी भी आम वर्ग के लिए अलग-सी है। जो लेखक धन को कृपणता से व्यय करने की सीख दे रहा था, उसको यूनाइटेड नेशन की मान्यता मिली थी,  यह पढ़ना बहुत सुखद लगा। सच कहूँ तो कई बार लेखन इतना रोचक हो गया कि मुझे लगा मानो मुझे ही मेट्रो और बस पर फ्री चलने की अनुमति मिल गई हो। पत्रकारों के लिए भाषाई ज्ञान कितना आवश्यक है, यह जानकारी भी बहुपयोगी लगी |
लेखन की एक और प्रभावी कड़ी लगी अपनेपन की अपनी भाषा। जैसे- “वीरानी शादी में अब्दुल्ला दीवाना।” सुधीर जी! मुझे लखनऊ पर तथा आप पर सहसा एक बार पुन: गर्व हो आया। इस पुस्तक को पढ़कर लगा जैसे मैं वह समय जी रही हूॅं। नि:सन्देह यह एक सार्थक तथा बेहतरीन लेखकीय कार्य है।
पुस्तक का एक पक्ष और बहुत विशेष लगा वह यह कि इसमें ‘चिन्ताएँ’  किस प्रकार व्यक्तिगत स्तर से उठकर विश्वस्तर तक जा पहुँचती है, इसकी बहुत सुलझे हुए ढ़ंग से चर्चा की गई है। लेखक के मन में टूरिज़्म के धन्धे को सोचते हुए कश्मीर का ध्यान आया, यह भी चिंतनीय लगा।
‘हेलो – ओला’  को पढ़कर भी बड़ा अच्छा लगा। आपने प्रकृति चित्रण भी इतने सहज भाव से किया है कि पढ़कर मन खुश हो जाता है। अफ्रीकी तथा यूरोपीय संतानों के बारे में जानकार आश्चर्य हुआ। न जाने कितनी गहन पीड़ा से कितनी पीढ़ियाँ गुजरी होंगी। एक पंक्ति में लिखा इतिहास मन को झकझोर गया। “जो मोह ले वह माया है!“ पढ़कर भी मन भाव-विभोर हो गया। “चेचेन इत्जा” के बारे में जानकर भी खुशी हुई क्योंकि कभी किसी कहानी या उपन्यास में पढ़कर इतना अनुमान नहीं लगा पाती थी।
“संस्कृति मानव समूहों के व्यवहार से बनती है।” भारत के लिए ऐसी पंक्ति मिश्र जी ही लिख सकते हैं। चाँद, लखनऊ और कैनकुन, कूटी हुई चांदी जैसी बालू पढ़कर सुधीर जी की काव्य-रचनाऍं पढ़ने की इच्छा बलवती हो गई। पुस्तक में विदेश के सांस्कृतिक तथा सामाजिक जीवन का परिचय बखूबी मिलता है। जितने भी परिचित विदेश में हैं, किसी ने भी इतनी बारीकी से वहाँ के रहन-सहन को, कार चलाने के ढंग को नहीं बताया। आपकी यह पुस्तक पाठकों को सामाजिक तथा वैश्विक स्तर पर होने वाले विभिन्न परिवर्तनों का तार्किक ज्ञान दे पाने में सफल होगी। इसमें अंतर्निहित यथार्थ से जुड़े तथ्य के साथ भाषाई-परिपक्वता ने पुस्तक में चार चाँद लगा दिये हैं।
2006 से 2010 तक का सफर मैंने कुछ घण्टों में ही पूरा कर लिया। यूॅं भूगोल विषय में मैं शुरू से कमजोर रही हूॅं, पर, इस पुस्तक को पढ़ने के बाद भूगोल विषय मुझे रुचिकर लगने लगा। भले मैं विदेश नहीं गई, पर पुस्तक के अंत तक आते-आते मुझे लगा मैंने सारी विदेश-यात्राएँ कर ली हैं।
अन्त में बस एक कमी लगी कि पुस्तक का समापन और प्रभावशाली ढंग से हो सकता था।
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