समकालीन साहित्य में यर्थात और अभिव्यक्ति का समय है। इसमें कल्पना कम वास्तिविकता अधिक होती है। संस्मरण इसका मुख्य अंग है। संस्मरण, सोचा, चलो कुछ पुरानी यादों को खंगाला जाये। उसमें क्या याद करूं, क्या लिखूं, इसी भंवर में उलझी-पुलझी बैठी थी कि तभी हमारे समय का एक गाना, ‘ओ साथी रे’ बज उठा। और मैं चली गई अतीत के दरिया में डुबकी लगाने। जैसे ही डुबकी लगाई तो भूल गई पैरों का दर्द, भूल गई दवा खाना, सच! याद आ गया वो ज़माना पुराना।
वे दिन भी क्या दिन थे जब हम ज़िंदगी की सीढ़ियों पर धीरे-धीरे चढ़ रहे थे, और हर छोटी-छोटी खुशी भी, किसी बड़े उत्सव से कम नहीं लगती थी। हमारी मां और छोटी बुआ दोनों, एक नंबर की फिल्मची थीं। हम बच्चों को दादी के भरोसे छोड़कर निकल जाती, फिल्म देखने। उन दिनों सिनेमा हमारे लिए सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, बल्कि सपनों की एक खुली खिड़की हुआ करता था।
उस समय अमिताभ बच्चन, जया बच्चन और रेखा का फिल्मों पर अधिपत्य था। उनकी एक से बढ़कर एक फिल्में आती और उन्हीं के बीच आई, ऋषि कपूर और नीतू सिंह की फ़िल्में। टाईम्स ऑफ इंडिया, और हिन्दी का समाचार पत्र ‘हिन्दुस्तान’ आया करता था। हमारे घर इन दोनों के साथ ‘द स्क्रीन’ नामक पेपर भी लिया जाता था। यह बहुत लोकप्रिय फिल्मी साप्ताहिक था जो इंडियन एक्सप्रेस के द्वारा छपता था। यहीं से हमें इन्टव्यू, बॉलीवुड के अपडेट्स, फिल्मी खबरें और इन्टरव्यू के साथ-साथ स्क्रीन अवॉर्ड के बारे में भी पता चलता था। जहाँ पता चला कि ऋषि कपूर और नीतू सिंह की पिक्चर आ रही है।
हम लग जाते घरवालों को मनाने में जिसमें मुख्य रूप से माँ और बुआ हुआ करती थी। जब भी वे दोनों परदे पर आते तो दिल जैसे किसी अनदेखी धुन पर थिरकने लगता। मन में हूक सी उठती, काश हम भी सिनेमा हॉल की उस अंधेरी हॉल में बैठकर, उन रंगीन कहानियों का हिस्सा बन पाते! ढ़ीले-ढ़ीले फ्लेयर्स टॉप पहने नीतू सिंह की तरह कपड़े पहन कर दीदी तो इतरा कर चलती ही थी। उसको देखकर मैं भी कहां पीछे रहने वाली थी। उस समय ज़रीना बहाव, अमोल पालेकर, सचिन और सारिका की जोड़ी न जाने कितने एक्टर-एक्ट्रेस। पर हम और हमारी दीदी, हम दोनों को तो ऋषि कपूर और नीतू सिंह ही अच्छें लगते। क्या बताऊं आपको, उस समय पिक्चर देखना किसी साधारण दिनचर्या का हिस्सा नहीं था, वह तो जैसे साल में एक-दो बार मिलने वाला कोई दुर्लभ पर्व होता था। वह भी मिन्नतों, मान-मनुहार और इंतज़ार के बाद।
जिस दिन फिल्म देखने का प्रोग्राम बनता, वह दिन हमारे लिए किसी त्योहार से कम न होता। सुबह की शुरूआत ही एक विशेष अनुष्ठान से होती। शिकाकाई के बने और उसकी खुशबू वाले साबुन से धुलते थे, लम्बे-लम्बे बाल। बाल के साथ, वह कड़वा झाग जो मुंह में आ जाता था, उसका कसैलापन आज तक याद है। और फिर करीने से पहनते कपड़े जैसे हम खुद को किसी फिल्मी दुनिया के लिए तैयार कर रहे हों।
पर यह तैयारी सिर्फ़ बाहरी नहीं होती थी। भीतर भी एक ‘आदर्श बेटी’ का अभिनय शुरू हो जाता था। दो-तीन दिन पहले से ही हम घर के हर काम में तत्पर, हर बात पर ‘जी माँ’ कहने वाले बन जाते, ताकि माँ गुस्सा न हो जाये और हमारे कुटने की गुंजाइश कम हो। उस समय बच्चों को खूब कूटा-पीटा जाता था और इसी डर से हम सब एकदम सीधे शांत बने रहते ताकि किसी तरह एक दिन की खुशी पक्की हो सके बस।
कभी-कभी आते थे हमारे ‘उद्धारक’ -धीरू दादा और आशा भाभी। वे हमारे लिए किसी फिल्मी हीरो-हीरोइन से कम न थे। भाभी की सुंदरता हमें सुलक्षणा पंडित की याद दिलाती, सादगी में लिपटी एक मधुर आभा। सुंदरता तो आज भी है बस उस सुंदरता ने, उम्र की चादर ओढ़ ली है। समय के साथ दादा कहीं दूर खो गए। इतनी दूर की कभी पिक्चर दिखाने भी न आ पाए। मुझे लगता है अब वह ऊपर बैठे आशा भोसले जी का गाना सुन रहे होंगे। उन्हीं के साथ हम साल में एक बार सिनेमा का वह जादुई सफ़र अवश्य तय करते।
हॉल में बैठकर जब पर्दा उठता, पहले स्क्रीन के ऊपर पर्दा पड़ा हुआ करता था। फिल्म शुरू होने के पहले छोटी-छोटी देश-विदेशों की खबरें दिखाई जाती। फिर रोशनी से भर उठता स्क्रीन, तो जैसे हमारी छोटी-सी दुनिया भी फैलकर अनंत हो जाती। रफ़ूचक्कर, कभी-कभी, ‘खेल-खेल में’ और ‘ज़हरीला इंसान’ जैसी फ़िल्में, हमारे लिए सिर्फ़ कहानी नहीं, अनुभव बन जातीं। माँ को भले ही वह अटपटी लगतीं, ‘कैसी फिल्म ले आईं दोनों, लड़का लड़की बनकर घूम रहा था!’ -पर हमें तो उसमें ही एक अलग ही आनंद मिलता। वह स्पेशल ऋषि कपूर हुआ करता था। हम न हिलते न डुलते टक-टकी लगाकर हर सीन को ऐसे देखते कि अगर पलक झपक गई तो न जाने कितनी कहानी बीत जायेगी। कितने दृश्य देखने से हम वंचित रह जायेंगे।
इंटरवल में बेचने आता टन-टन भाजा, तरह-तरह की दालमोंठ, आलू के चिप्स के छोटे-छोटे टुकड़े और और पफ्ड राइस, हम तो भैया उसे कहते थे, मूंड़ी या परमल। पर आज के बच्चों को समझाने के लिए उसे पफ्ड राइस लिखना पड़ता है। सभी चीजों को वह वेंडर, एक साथ मिलाता, और कागज के बने तिकोने दोनो में भर कर देता। मां का मूड ठीक रहता तो दिलवा देती, वरना तो हम बस ललचायी नज़रों से देखते रहते थे कि कितने लोगों को पिक्चर हॉल में वह, यह टन-टन भाजा बेच रहा है। फिर आता था, ओपनर से शीशे की बोतलों को गिटार की तरह बजता हुआ, ज़ोर-ज़ोर से बोलता ठंडा ले लो ठंडा, फ़ैंटा फ़ैंटाsss।
पिक्चर शुरू होती इंटरवल के बाद वाली कभी हंसते कभी उत्साहित होते तो कभी आँखों में आसूँ भी आ जाते। इस तरह फिल्म का होता ‘दी एण्ड’। हम चल देते वापस घर की ओर।
वापसी में रास्ते भर अगर माँ को फिल्म पसंद नहीं आती तो पीछे से कभी हमारी चुटिया खिंचती, तो कभी नोंच भी लेती थी। ‘मरा लड़की बनकर नाच रहा था।’ माँ की नाराज़गी और हम दोनों बहनों की दबे स्वर में की गई शरारती टिप्पणियाँ, यह सब भी उस दिन का हिस्सा बन जाता था। अगर कभी कोई फिल्म मैं न देखूं या दीदी न देखे तो उसकी स्टोरी सुनना भी अपने-आप में एक नया सिनेमा रच देता।
‘शुरू-शुरू में दिखता है हीरो, काली पैंट और सफेद शर्ट में काला चश्मा, जो आगे से थोड़ा नुकीला होता था। पर्दे पर आता है, ठक-ठक-ठक। इस तरह 3 घंटे की पिक्चर की स्टोरी शुरू होती तो भइया वह दो-तीन दिनों तक रूक-रूक कर चलती रहती। हर बार थोड़ी रंगीन और रंगीन एक्टर बन जाते हम भाई-बहनें।
गर्मियों की रातें तो जैसे इस आनंद की पराकाष्ठा होती थीं। बड़ा-सा आँगन, पानी के छिड़काव द्वारा ठंडा किया हुआ फर्श, खटियों की कतार, सिरहाने रखे छोटे-छोटे मिट्टी के घड़े, और फिर देर रात तक चलने वाली अंताक्षरी।
उन रातों में फिल्म, ‘गीत गाता चल’ के गानों की सुर लहरी जैसे हवा में घुल जाती थी। ‘गीत गाता चल, ओ साथी गुनगुनाता चल…, श्याम तेरी बंसी को बजाने से काम, लोग करे मीरा को यूं ही बदनाम’ और हम सब उस गाने को कोरस में गाते।
हमने बहुत उन्नति कर ली आज जब दुनिया बदल गई है तो एक क्लिक पर अनगिनत फिल्में भी उपलब्ध हो गई हैं। पर वह आनंद कहीं खो गया, कोई खोज कर ला सकता हो, तो लौटा दो ना वह पुराने दिन, वह पिक्चर देखने का उत्साह, वह हंसी, वह ठिठोली, वह माँ और बुआ का गलियाना, पिटना और दादी-दादा के पीछे जाकर छिप जाना। अब सिनेमा सहज उपलब्ध है, पर वह प्रतीक्षा, वह उत्सुकता, वह सामूहिक उल्लास… कहीं पीछे छूट गया है।
आज भी जब यादों की पोटली खोलती हूँ, तो वही दृश्य आँखों के सामने तैरने लगते हैं, ऑटो में ठुस कर बैठना, सिनेमा जाना, अपने दोनों पैरों पर बोझ रखकर बड़ों की गोदी में बैठने के लिए पैरों का सहरा लेना और फिर बड़ों से डॉट खाना, ‘कम्वख़्ती की मारी पूरा बोझ डाले दे रही है। टांगे तोड़ देगी।’ लौटते वक्त रास्ते भर कोहनी से भाई-बहनों को अपने से दूर करना और घर आकर उन पलों को ज़ीना, फिर-फिर जीना।
सच ही तो है फिल्में अब भी बनती हैं, पर वह बचपन… वह पूरे परिवार की मुस्कुराती स्मृतियाँ… वे अब नहीं हैं। पकड़ने की बहुत कोशिश करती हूँ, पर कमबख्त ये जो समय है न, मोबाइल ने उसे खा लिया हो ऐसा नहीं है, बेचारे मोबाइल क्यों क्यों दोष दें। वह तो फिर भी हमारे लिए समाचार पत्र का काम करता है कॉपी पेन का काम करता है। पर समय को तो मॉन्स्टर की तरह निंगल लिया है, ढ़ेर सारे चैनलों ने।
हमारी आपसी बात कहीं खो गई और ये सब बीच में विलेन बनकर खड़े हैं। तो अगले अंक में, दूसरा संस्मरण लेकर अवश्य हाजिर रहूँगी, आपके बीच।
रूबी भूषण
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