Sunday, May 3, 2026
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लालित्य ललित की तीन कविताएँ

(1)
माँ 
पहले आती थीं खांसी तब की बात
पहले वाली बात नहीं रही
अब!
पता है क्या
क्या करोगे जानकर
लेकिन बताने में भी कोई हर्ज नहीं
अब जब खांसी आती है
तो याद आती हैं मां
जो जब थीं तुरंत अपने हाथों से पीठ सहलाया करती थीं
पानी लेने दौड़ के जाया करती थीं
कहती थीं
खाना खाते वक्त बोलते नहीं
डांटती भी खूब थीं मां
अब मां मन में है और सपनों में है
याद है बचपन की मुझे
जब स्कूल में छोड़ने जाया करती थी
तो कहती जरूर थी
कि किसी से शरारत मत करना
जमाना ठीक नहीं है
मैं हां में हां मिलाया करता था
अब जब खांसी आती है तो मां को अपने से दूर पाता हूं
लेकिन अब मेरी पत्नी बेशक रसोई में कितनी ही व्यस्त हो
जैसे ही वह सुन लेती हैं मेरी खांसी की आवाज
तो दौड़ी चली आती है
गिलास लिए दौड़ कर
समय बदल जाता है और किरदार नहीं बदलते
कभी भी नहीं
आज भी खांसी जारी है और मां का स्मरण भी
किसी ने कहा है वाणी का लिपियंत्रण हो सकता है उसका अनुवाद नहीं
मानता हूं बात सही है
मां भी कहीं न कहीं से आशीर्वाद दे रही होंगी
कहानी है बड़ी विचित्र सी
लगता है सचित्र सी है
जिसकी दुनिया में रहता हूं और उसके इर्द गिर्द घूमता हूं
यात्री हूं और सहयात्री भी हूं अपना।
(2)
एक पिता 
वह पिता
जो जीवन भर
अपने घर के लिए
मरता रहा ताकि उसके घर ने लोग खुशहाल रहें
कई परिस्थितियां सामने आती रही
सुखद और दुखद
जिसके हर लम्हे से वह दो चार होता रहा
उसने अपने स्तर से सोचा और सोचने का अनथक प्रयास भी किया
वह पिता
जो जीवन के कई पहलुओं को समझता रहा
कई बार विफल भी हुआ
आखिर वह भी इंसान है कोई विज्ञान का पुतला तो नहीं
जो हर समस्या का समाधान मिनटों में कर दें
देखा जाएं तो पिता वह मानवीय पुतला है
जो कई तरह की विसंगतियों से लड़ने का प्रयास करता है
उसकी कोशिश रहती है कि वह अपने फ्रंट पर टिका रह सकें और घर की जरूरतों को समय से जुटा सके
कई बार वह सफल भी होता है और कई बार अपने ही प्रयासों में विफल भी
पिता अपने ही भीतर रोता है लेकिन बताता किसी को नहीं
अपनी व्यथा
अपना दुख और दर्द भी
पिता वह समाजिक इकाई है जो दहाई और सैंकड़ा के अनुभवों को भी जानता समझता है
आज एक पिता अपने से ही मिला
और कई कई पिताओं के दर्द को महसूस किया
पिता आज भी खामोश है
और वह सोचता है कि दूसरे लोग उसके प्रयासों से स्वस्थ रहें
खुश रहें और सानंद रहें।
(3)
पिताजी का कमरा
कुछ बातें
कुछ यादें दिमाग में रहती है
जिनका रहना किसी आशीर्वाद से कम नहीं होता
आज भी पिताजी के कमरे में जाता हूं
उन्हें नहीं पाता
पिताजी अब वहां नहीं रहते
बल्कि मैं उन्हें महसूस करता हूं
अब उस कमरे में मेरा बेटा अपने स्कूल का काम करता है
कुछ देर रहता है वहां
मैं भी शाम को दफ्तर के बाद वहां बैठता हूं
बेशक पिताजी नहीं हो वहां
वे जहां भी है उनका आशीष मिलता है
समय कैसे बीत जाता है
और हम सब कुछ करते हुए भी कहां बचा पाते हैं
ईश्वर से
सोचने की बात है
हम कितनी बातें करते है जब अपना कोई सामने होता है
और सोच कर देखिए
जब कोई अपना बुजुर्ग अपने बीच से अनुपस्थित हो जाता है
तो!
एक विराम लग जाता है विमर्श में
फिर महसूस होता है कि उनके बताए मार्ग पर चलते रहिए
निसंदेह कोई अड़चन नहीं आएगी
और हमारा उद्देश्य ठीक होगा
तो सभी तरह के काम बनते जाएंगे
आज बेशक पिताजी के कमरे से देर रात खांसी की आवाज़ नहीं आती
जब आती थीं तो दौड़ जाता था मैं बिना किसी के कहे
और अब गले में कोई शब्द अटक जाता है या रोटी का कोई टुकड़ा
तो बेटा बिना कहे दौड़ जाता है गिलास पानी के लिए
यही आदर्श है परिवार का
बच्चों का
आज कई बार हम बच्चों पर गुस्सा हो जाते है
बच्चा भी मन से बुरा मानता हो
लेकिन कुछ देर में गुस्सा जल की मानिंद शीतल हो जाता है
पिताजी का कमरा मेरा कमरा है
जहां कभी कोई उलझन महसूस करता हूं
तो फौरन उसका समाधान पा जाता हूं
धीरे धीरे मैं भी पिताजी के जैसे हाव भाव वाली प्रकृति में ढल रहा हूं
समय की प्रवृति है
समय की मांग है
कल तक मैं बेफिक्र रहता था जब पिताजी थे
अब मैं स्वयं सचेत हुआ हूं
आखिर मुखिया जो बन गया हूं
अपने परिवार का
जिम्मेवारियों का
आहिस्ता आहिस्ता
वक्त सिखाता है और हमें लगातार सीखते रहना है
यही नियम है
और यही प्रकृति भी हैं
हरि ॐ..
  • डॉ लालित्य ललित 
संपादक- नेशनल बुक ट्रस्ट, इंडिया
5,इंस्टिट्यूशनल एरिया, वसंत कुंज, नई दिल्ली, 110070
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