Monday, May 11, 2026
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दीपक शर्मा की कहानी – आपदा

“हैप्पी बर्थडे,” सुबह सात बजे बहन ने मुझे मोबाइल किया था, “अपने स्कूल से मैं सीधे तुम्हारे पास पहुंच रही हूं। दोपहर का खाना भी बनाऊंगी और शाम को पकौड़ी और हलवा भी….”
“हैप्पी बर्थडे टू यू टू,” उस के संग अपनी नाराज़गी भुला कर मैं ने कहा था , “हम सभी तुम्हारे इंतज़ार में रहेंगे….”
बहन और मैं जुड़वा थे। 
अभी पिछले ही महीने बहन ने अपने सहकर्मी अशोक से अपनी शादी रचाई थी। अंगरेज़ी भाषा पर उस के अधिकार पर वह विशेष रूप से मोहित रही थी।
मां और मेरे विरोध के बावजूद।
 “नौकरी शुरू किए तुम्हें कुल जमा एक साल ही हुआ है,” मां ने कहा था, “और फिर अभी तेरी उम्र ही क्या है? आजकल तो लड़कियां पच्चीस से पहले शादी का नाम तक सुनना पसंद नहीं करती….”
“अशोक को तुम से ज़्यादा तुम्हारी तनख्वाह प्यारी है,” मैं ने कहा था, “शादी  वह इसलिए जल्दी चाहता है, उसे आगे अपनी तीन बहनें ब्याहनी हैं….”
 “दोनों स्वार्थवश ऐसा कह रहे हैं, बाबूजी,” बहन ने झट बाबूजी को हमारे सामने आन खड़ा किया था, “मां को अपनी सेवा- टहल चाहिए और दुर्गेश को अपनी अर्ज़ियां भेजने की मुझ से फ़ीस….”

दो साल पहले मां के बांए भाग पर फ़ालिज गिर पड़ा था और उनकी देखभाल के प्रति निश्चिंतता बरतनी असंभव जान पड़ती थी और इंजीनियरिंग के अपने इस चौथे साल में मैं किसी विदेशी यूनिवर्सिटी में दाखिला पाने के लिए इच्छुक रहा भी।

 “गुणवती और पुण्यवती हमारी उषा का कोई भी निर्णय गलत नहीं हो सकता,” बाबूजी ने हम दोनों का विरोध मिटा डाला था, “उस की छठी इन्द्रिय इलाही है और उस की पसंद मानो इलाही मुहर। याद नहीं उस बार दसवीं के इम्तिहान में उस के बताए वे सवाल छोटे के पर्चों में कैसे आन टपके थे?”

 उस समय बाबूजी के सामने केवल पिछले साल का वह संयोग रहा जब छोटा भाई बाबूजी और बहन से गणित के अपने मुश्किल सवालों के हल निकलवा रहा था कि बीच में बहन कहीं से कुछ सवाल उठा लाई थी, ‘आज सवेरे अपने सपने में देखा यही कुछ सवाल तुम्हारे पर्चे में आए हैं।’मैं ने उन सवालों को परे हटाना चाहा था लेकिन बाबूजी ने बहन के हाथ वाले सवाल मुझे हटाने न दिए थे। और जब वही सवाल आगामी दिनों के दौरान छोटे के पर्चे में हूबहू उन्हीं रकमों के साथ आन प्रकट हुए थे तो बाबूजी ने हम दोनों की पीठों पर हल्के धौल जमाते हुए कहा था, ‘इलाही अपनी इस बहन को अपनी रखवाल- दूत मान कर चलना सीखो। इसे खुश रखोगे तो जिंदगी भी तुम्हें खुशी बख्शेगी….’

लेकिन भविष्य की दूरबीन न उन के पास रही न बहन के पास। नहीं जानते रहे जीवन में गणितीय समीकरण नहीं होता।
नहीं जानते रहे बहन उन के इस कथन को ब्रह्मवाक्य मान कर अशोक के मामले में स्वंंय के अचूक होने का भ्रम पाल लेगी।  नहीं जानते रहे इलाही शक्तियों से अपने को सम्पन्न मान कर बहन उस धरातल पर खड़ी होने जा रही थी ,जिस का धंसना अवश्यंभावी था। नहीं जानते रहे सामाजिक मान्यतायों की पकड़ के बिना संकुचित उन का द्रष्टिकोण बहन को एक ऐसे अतिविश्वास से भर रहा था जिस की दीवार ढह जाने वाली थी।

 “उषा अभी तक नहीं आई,” अढ़ाई बजे के करीब मां रोने लगीं, “कहीं कोई अनहोनी न हो गई हो। इस बार यहां से जाते समय हमें लेकर अशोक से अपने मनमुटाव की बात तो मुझे बताए थी। क्या मालूम उसी ने उसे इधर आने से रोक दिया हो! मेरी मानो, छोटे के संग मिठाई देने के बहाने उषा का पता कर के आओ….”

बहन के ससुराल के प्रति सद्भाव प्रकट करने हेतु मां ने बाबूजी के हाथ मिठाई का एक डिब्बा पहले से ही मंगवा रखा था। 
मां को मैं ने नहीं बताया इस बीच बहन को मैं कई बार मोबाइल कर चुका था परंतु वह स्विच औफ़ मोड पर रहा था।
 “साइकल निकालो, छोटे,” मेरे इंजीनियरिंग कालेज चले जाने से मेरी साइकल उसकी मल्कियत बन चुकी है।

 “साइकल मैं चलाऊंगा,” बारहवीं कक्षा में पढ़ रहा छोटा हर किसी के काम आने को आतुर रहता है। बहन की कमी उस ने मां को महसूस नहीं होने दी है। समय पर मां को अपनी चाय, अपना नाश्ता, अपना भोजन और अपनी दवा उसी नियमितता से उसी के सहयोग से उपलब्ध हो जाती है, जिस नियमितता का अभ्यास बहन ने शुरू कर रखा था।

बहन की ससुराल से पहले छत पर फैलीं मुझे वे चादरें दिखाई दीं जिन्हें मैं अच्छी तरह पहचानता था। अपने दहेज का अधिकांश सामान बहन ने हम भाइयों के संग खरीदा था। केवल ज़ेवर ही बाबूजी की संगति में लिए गए थे।

बहन की ससुराल जिस बंगले के पिछवाड़े किराए के चार कमरों में डेरा डाले है, वे अजीब ऊटपटांग ढांचा रखे है। पहले दो कमरे बंगले की मोटर गैराज से संलग्न ऊपर छत की ओर जा रही सीढ़ियों की ओट में खड़े हैं तो दूसरे दो सीढ़ियों की दिलहेबंदी खत्म होते ही अकस्मात प्रकट हो लेते हैं । एक बांए हाथ और दूसरा एकदम सामने। दांए हाथ छत खुलती है।
बहन का कमरा ऊपर बांए हाथ वाला था।
हम ने अपने कदम इसीलिए सीढ़ियों की तरफ़ ही बढ़ाए। 
सीढ़ियां धुल रहीं थीं।
बहन की बड़ी ननद बाल्टी और मग लिए थी और मंझली झाड़ू। 
दिसंबर की उस सर्द दोपहर में दोनों के पैर नंगे थे।
 “तुम्हारा जन्मदिन भी आज ही है?” मंझली ने अपने हाथ का झाड़ू छोड़कर मेेरे हाथ से मिठाई का डिब्बा ले लेना चाहा।
 “ज़रूर होगा,” बड़ी ने भी हाथ की बाल्टी नीचे रख दी, “तुम भी उषा के साथ पैदा हुए थे?”
 “उषा ऊपर है?” जवाब देने की बजाए मैं ने पूछा। अपना रास्ता रुका हुआ पा कर मिठाई के डिब्बे पर मेरे हाथों ने

“तुम भी आज अपने पच्चीसवें साल में दाखिल हुए?” जवाब न देने की बारी बड़ी ने अपने ऊपर ले ली।
“नहीं,” छोटे ने मेरी तरफ़ से उत्तर दिया, “आज ये दोनों चौबीस के पूरे हुए।”
“उषा ऊपर है?” मैं ने अगला पैर सीढ़ियों पर धर दिया।
सीढ़ियों पर जगह- जगह खून के धब्बे मेरी निगाह में उतर लिए। 
 “नहीं,” मंझली ने उत्तर दिया, “उषा भाभी का हाथ कट गया है। भैया उसे अस्पताल ले कर गए हैं।”
 “सीढ़ियों पर ये धब्बे उषा के खून के हैं?” मेरे होश उड़ चले। 
 “खून? कैसा खून?” बड़ी ने मग एक तरफ़ हटा कर पानी की पूरी बाल्टी सीढ़ियों पर उंडेल दी।
 पानी के कई छींटे हमारे पास आ पहुंचे।
  “कौन से अस्पताल ले कर गए हैं?” मैं ने पूछा।
 “हमें नहीं मालूम,” मंझली की हंसी में शरारत साफ़ झलक आई।
 “आप बताइए,” मैं ने बड़ी से पूछा।
 “नहीं मालूम,”  खाली बाल्टी लिए लिए वह सीढ़ियां उतर ली।
 उन का गुसलखाना नीचे रहा। सीढ़ियों के ऐन नीचे। छाजन के लिए सीढ़ियों को ग्रहण करता हुआ। 
 “बाबूजी से बात करते हैं,” गेेट से बाहर निकलते ही मैं ने छोटे से कहा।
लेकिन उन का फ़ोन हमें मिला नहीं।
न चाहते हुए भी फिर मैं ने अशोक का नंबर मिलाया। मगर उस ने उठाया नहीं।
 “बाबूजी के पास चलते हैं,” अपने अंदर जमा हो रही चिंता को मैं छोटे पर प्रकट नहीं करना चाहता था।
 “इतनी दूर?”
 बाबूजी जिस सार्वजनिक पुस्तकालय में सुबह के आठ बजे से शाम के छः बजे तक डिप्टी लाइब्रेरियन की हैसियत से काम करते हैं वह बहन की ससुराल से आठ किलोमीटर की दूरी पर तो रहा ही था।
 “साइकल इस बार मैं चलाऊंगा,” मैं ने छोटे से कहा, “मिठाई का डिब्बा तुम पकड़ लो….” “मिठाई उन्हें दी नहीं?”
“मिठाई उषा के लिए थी….”
 रास्ते भर मैं सोचता रहा ‘है’ की बजाए मैं ‘थी’ क्यों बोल उठा था?
 बाबूजी अपने पुस्तकालय में न थे।
 “अभी एक घंटा पहले अस्पताल से आप के जीजा का उन्हें फ़ोन आया था। आप की बहन एमरजेंसी में हैं,” लाइब्रेरियन से हमारी जान- पहचान अच्छी थी। 
  “कौन से अस्पताल?” एक तीखी झुरझुरी मेरी समूची काया को कंपा- कंपा गई। 
 “शायद सिविल में….हां, सिविल ही में….”
सिविल अस्पताल पहुंचने पर हम ने बाबूजी को कई लोगों से घिरे हुए पाया।
घेरने वाली भीड़ में डाक्टरों के एप्रेनों के साथ पुलिस की कुछ वर्दियां भी रहीं।
“सौरी,यंग मैन,” हम भाइयों को देखते ही अशोक मेरी ओर बढ़ आया, “तुम्हें मैं आज ‘विश’ नहीं कर सकता, मैनी हैप्पी रिटर्नज़ औव द डे, ( यह दिन बार- बार आए)….”
 “उषा कहां है?” मैं ने पूछा।

“अ चांस एक्सीडेंट, (एक सांयोगिक दुर्घटना),अ शीयर एक्सीडेंट, ( एक विशुद्ध दुर्घटना), अ ट्रैजिक एक्सीडेंट, (एक अनर्थकारी दुर्घटना),” अशोक ने अपने हाथ मेरे कंधों पर टिकाने चाहे, “ दोपहर में सब्ज़ी काटते समय उस के हाथ की छुरी उस की अपनी ही कलाई पर चल गई और वह….”

“वह क्या?” अशोक के हाथ मैं ने अपने कंधों से नीचे झटक दिए।
 “द वर्सट हैपन्ड, (बदतरीन हो गुज़रा)….”

अशोक की गाल पर एक ज़ोरदार थप्पड़ मैं ने दे मारा। हकबका कर अशोक बाबूजी की दिशा में बढ़ लिया।
“इधर आओ, दुर्गेश,” कुछ ही देर में भीड़ चीर कर बाबूजी हम भाइयों को एक कोने मे ले गए, “अशोक ने मुझे धमकी दी है, कि उषा के मामले को अगर हम पुलिस केस बनाएंगे तो वह तुम्हारे विदेश जाने पर रोक लगवा देगा। तुम्हारा पासपोर्ट जारी नहीं होने देगा। अपना मुजरिम करार कर देगा तुम्हें….”

वहीं उसी कोने में पालथी मार कर मैं फूट-फूट कर रोने लगा।

 “यह समय हौसला बांधने का है,” बाबूजी मुझे ज़मीन से ऊपर उठा दिए, “यह समय बैठने का नहीं। रोने का नहीं। छोटे को हिम्मत दिलाने का है। उसे रोने देने का नहीं।  उस के साथ तुम घर पहुंचो। मैं जो यहां रुका हूं। यहीं रुकूंगा। सब देख रहा हूं। आगे भी देखूंगा। तुुम घर पहुंचो। जल्दी। राजलक्ष्मी उधर अकेली है….”

 “मां को क्या बताएंगे?” मेरी रुलाई दुगुनी तेज़ हो ली, “उषा हमें छोड़ गई है?”
 “तुम्हें रोना बिल्कुल नहीं,” बाबूजी ने मेरे कंधे थपथपाए, “छोटे की खातिर, राजलक्ष्मी की खातिर, मेरी खातिर….”
  मैं ने अपने आंसू पोंछ लिए।
 “राजलक्ष्मी से अभी खुलासा हाल नहीं कहना,” बाबूजी का गला भर आया, “उसे कुछ बताने से पहले हमें अपने डाक्टर चंद्रा की सलाह लेनी होगी….”

“उषा ने बताया नहीं अपने स्कूल से वह यहां क्यों नहीं आई,” घर पर मां बहुत अधीर रहीं।
 “अशोक ने उसे आने नहीं दिया,”  मैं ने कहा।
 “आप की चाय बना लाऊं?” छोटे ने मां से पूछा, “शाम की अपनी दवा आपको अभी खानी होगी….”
 “बना लाओ, जाओ,” मैं ने छोटे से कहा।
 “तुम्हारे लिए उषा ने ज़रूर कोई महंगी गिफ़्ट खरीदी होगी और अशोक ने उधर कोई बखेड़ा खड़ा कर दिया होगा,” मां ने कहा।
 “क्या मालूम?”
 “और वह मिठाई का डिब्बा? उषा ही के हाथ में दिया न?”
 “हां,” मैं ने सिर हिला दिया और छोटे के संग मां के कमरे से बाहर चला आया। 
 छोटे के हाथ से मिठाई का वह डिब्बा कब और कहां अलग हुआ था, मुझे ध्यान न रहा था।

  •  दीपक शर्मा

 

दीपक शर्मा
दीपक शर्मा
हिंसाभास, दुर्ग-भेद, रण-मार्ग, आपद-धर्म, रथ-क्षोभ, तल-घर, परख-काल, उत्तर-जीवी, घोड़ा एक पैर, बवंडर, दूसरे दौर में, लचीले फीते, आतिशी शीशा, चाबुक सवार, अनचीता, ऊँची बोली, बाँकी, स्पर्श रेखाएँ आदि कहानी-संग्रह प्रकाशित. संपर्क - [email protected]
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6 टिप्पणी

  1. ढेरों धन्यवाद व शुभ कामनांए
    कृपापूर्ण इसे ग्रुप में सांझा करें।

  2. आदरणीय दीपक दी!

    आपकी कहानी आपदा पढ़ी।
    कहानी पढ़कर काफी तकलीफ हुई।
    जन्मदिवस के दिन जुड़वाँ भाई-बहन के खुशमय वार्तालाप से शुरू हुई कहानी अकल्पनीय रूप से बहन की आकस्मिक दुर्घटना के नाम पर हत्या या आत्महत्या पर समाप्त हुई।

    ऐसा लगा कि कहानी बहुत जल्दबाजी में आगे बढ़ गई।

    कहानी एक बेहद गंभीर विषय की ओर इशारा करती है कि विवाह जीवन भर का सवाल होता है इसलिए इस निर्णय तक, गंभीरता से विचार करने के बाद ही कोई फैसला लेना चाहिये।दूरदर्शिता से काम लेना चाहिये।

    ज़िन्दगी गणित के सवालों की तरह नहीं होती है। काश पिता यह बात समझ पाते।
    कभी-कभी इत्तेफाक से ही ऐसा हो जाता है कि अपन जो बोल देते हैं वह सत्य हो जाता है। लगभग सभी के जीवन में कभी-कभी इस तरह की स्थितियाँ बन जाती हैं।
    लेकिन वैवाहिक मामलों में बिना जाँच परख किये पिता का बेटी को सहमति दे देना
    आश्चर्यजनक लगा।
    शादी की एक माह के अंदर ही हादसा हो गया।
    हमें ऐसा लगता है कि इस कहानी को थोड़ा सा विस्तार और दिया जाना चाहिए था।
    दोनों भाइयों का सीढ़ी पर खून को देखना, उनका चौंकना और इतने बड़े हादसे के बाद भी बिना घबराए बहनों का हँसते हुए बताना…बात करना…,
    बाहर ले जाते समय कलाई पर बहते हुए खून पर कुछ पट्टी वगैरा क्यों नहीं बाँधी?
    सब कुछ अप्रत्याशित सा लगता है।

    और फिर धमकी!!!! शादी के एक महीने बाद ही इस तरह की अस्वाभाविक मौत संदेह को जन्म तो देती ही है।
    दीदी! हमने आपकी कई एक से‌ बढ़कर एक कहानियाँ पढ़ी हैं।
    लेकिन इस कहानी को पढ़कर कुछ प्रश्न मन में उठे, जिन्होंने कहा कि कहानी को थोड़ा विस्तार देना था। जो बात भाई के दिमाग में आई ,उस पर पिता थोड़ा सहमत होते, बेटी को समझाते थोड़ा रोकते।
    माँ और भाई के समझाइश के साथ रोकने पर भी बात काटते हुए बहन ने पिता को सामने कर दिया।

    वह जानती थी कि पिता उसके फेवर में ही बात करेंगे और कहा कि, *”दोनों स्वार्थवश ऐसा कह रहे हैं बाबूजी!माँ को अपनी सेवा- टहल चाहिए और दुर्गेश को अपनी अर्जियां भेजने की मुझसे फीस…!”*
    बेटी ने भावनात्मक दृष्टि से बहुत कड़वी और गंभीर बात कह दी थी।
    लेकिन पिता के अंधे प्रेम ने, अंधविश्वास ने कुछ कहना या एक बार टोकना भी उचित नहीं समझा…।
    यहाँ पर कहानी को थोड़ा सा विस्तार देकर और स्पष्ट किया जा सकता था जिससे कम से कम यह साबित होता कि आजकल की लड़कियाँ अपनी जिद के कारण अपना भविष्य किस तरह बिगाड़ लेती हैं!
    क्योंकि सही बात तो यही है।
    बराबर का भाई मित्र की तरह था! माँ तो फिर माँ ही थी। दोनों ने जो कहा उस पर कम से कम पिता को एक बार विचार जरूर करना चाहिए था। ऐसा लग रहा है कि इस पर थोड़ी सी चर्चा और होकर कहानी आगे बढ़ती तो एक तो दुर्घटना का कारण निकल कर आता।

    दुर्घटना घट जाने के बाद अगर पिता धमकी से डर कर कार्यवाही करने से नहीं रुकते। तो भी एक सकारात्मक संदेश जाता ,भले ही फैसला पक्ष में होता या ना होता।
    माँ को अन्ततः पता चल ही जाएगा।पर क्या भाई ऐसी नौकरी करते हुए स्वयं को सहज रख पाएगा? बहन की मौत पर चुप्पी उसको आत्मग्लानि से नहीं भरेगी?
    पिता अपने को माफ कर पाएंगे?

    कहानी संदेश तो अब भी दे रही है पर वह संतोषजनक नहीं लग रहा।
    हमें लग रहा है कहानी को बहुत जल्दी अंत तक पहुँचा दिया।

    पहली बार ऐसा लगा कि आपकी कहानी के शीर्षक पर हम दुविधा में पड़े ‘आपदा’ शब्द बड़े संकटों की ओर संकेत करता है। बड़ी-बड़ी दुर्घटनाएँ जिसमें अत्यधिक जान-माल की हानि होती है।
    जैसे केदारनाथ की प्राकृतिक आपदा। भूकंप का आना या बड़ी-बड़ी घटनाएँ हो जाना।

    हमें ऐसा लगता है।

    अगर आपको ठीक लगे तो। वरना कहानी तो लिखी जा चुकी है।
    कथानक सामयिक , बेहद मार्मिक और बेहद संवेदनशील है, किंतु थोड़ा विस्तार माँगता है।
    आपसे क्षमा याचना के साथ
    प्रस्तुति के लिए तेजेन्द्र जी का शुक्रिया। पुरवाई का आभार।

    • सहमत हूँ आपसे। कहानी तो बस शुरू ही हुई थी कि उसका अचानक अंत हो जाना चकित कर गया।

  3. जरूरी नहीं की कथा का अंत सुखद हो या सुखद हो सकता था या सुखद होना चाहिए, कई बार स्वार्थ वश निजी रिश्ते भी धूमिल पड़ जाते हैं , सोचते हैं जाने वाला तो चला ही गया अब जो हाथ में है उसे भी क्यों जाने देकर क्या होगा, ऐसी भावना वश जो सही निर्णय लिया जाना चाहिए , वह नहीं लिया जाता।
    यहां पर यही हो रहा है, कहानी का पाठकों के समक्ष प्रश्न छोड़कर खत्म हो जाती है कि आगे क्या होगा,
    जाहिर है वही स्वार्थ वो भी सगे रिश्तों में ,,,,,,,
    लेकिन ऐसा भी होता है
    सीढ़ियां धोते हुए नंदो का हास्य उचित नहीं लगता भले ही मन में अच्छा लग रहा हो मगर दिखावे वश भी ऐसी स्थिति में असहज लगता है
    दूसरा कहानी का शीर्षक आपदा भी उचित नहीं जान पड़ता

    लेकिन कहानी ,सामयिक कहानी है ,
    समाज का एक चटका हुआ दर्पण का आईना है
    दीपक दी हार्दिक बधाई

  4. दीपक जी की कहानी आपदा बहुत मार्मिक है, निःशब्द करती है कि केवल ससुरालवाले और पति की संवेदनशीलता ही नहीं परोसती, पिता के हिसाब-किताबी दिमाग को भी सामने रखती है।
    बेटियों के प्रति असंवेदनशीलता की हद है।
    रचाव भी अच्छी, कथानक भी

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