संपादकीय : कोरोना पर विपक्ष की नकारात्मक राजनीति 3
भारत में विपक्ष की टिप्पणियों से साफ़ ज़ाहिर हो जाता है कि उनका मुख्य उद्देश्य केवल और केवल सरकार की आलोचना है। इस मामले में भारत और पाकिस्तान की राजनीति लगभग समानान्तर चल रही है। भारत के विपक्षी दल यह मूलभूत बात नहीं समझ पा रहे कि सरकार की कोरोना फ़्रण्ट पर हार केवल नरेन्द्र मोदी या भाजपा की हार नहीं है। इस का असर भारतीय जनता पर भयानक होने वाला है। यह समय है कि सभी दल केवल एक दिशा में सोचें कि सबने मिल कर कैसे इस भयानक वायरस को हराना है।
अब तो कोरोना से जूझते हुए अमरीका, स्पेन, फ़्रांस, ब्रिटेन, बेल्जियम, जर्मनी ने जैसे घुटने टेक दिये हैं। मौत केवल एक आंकड़ा बन कर रह गयी है। 
दुनियां में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जहां के विपक्ष ने सत्तापक्ष के बखिये उधेड़ने में कोई कसर छोड़ी होगी। किसी भी देश का विपक्ष सत्ता पक्ष द्वारा लिये गये कदमों से संतुष्ट नहीं है, फिर वो चाहे 50,000 से अधिक मौतों वाला देश अमरीका हो या फिर  826 मौतों वाला भारत। 
दरअसल हुआ यूं कि जब कोरोना वायरस ने विश्व पर युद्ध थोपा तो किसी को रत्ती भर अंदेशा नहीं था कि इस दानव के साथ निपटा कैसे जाए। ना तो सत्ता पक्ष को कोई अनुभव था और ना ही विपक्ष को। मगर विपक्ष को इस बात का पूरा ज्ञान था कि राजनीति कैसे करनी है। हर देश के हर विपक्ष ने सत्ता पक्ष को आड़े हाथ लेने में कोई कसर नहीं छोड़ी।
मगर ध्यान देने योग्य बात यह है कि विपक्ष केवल आलोचना करता है। कहीं कहता है कि लॉक-डाऊन बहुत देर से हुआ। कहीं कहता है कि लॉक-डाऊन बहुत जल्दी हो गया। और कहीं कहता है कि लॉक-डाऊन बिना किसी सोच-समझ के जल्दबाज़ी में कर दिया गया। 
लंदन में मैं जब-जब ब्लैक-कैब यानि कि टैक्सी में सफ़र करता हूं तो मुझे मानना पड़ता है कि अगर राजनीति की समझ किसी में है तो लंदन के टैक्सी ड्राइवर में है। वह आपको पूरी तरह समझा देता है कि ब्रिटेन को कैसे चलाया जाना चाहिये।
मुझे कई बार तो लगता है कि भारत का हर फ़ेसबुक सदस्य इस मामले में लंदन के टैक्सी-ड्राइवरों का सगा संबन्धी है। क्योंकि उसे भी पूरी तरह मालूम है कि भारत को कैसे चलाया जाना चाहिये। कई बार तो मानने को जी चाहता है कि लंदन के टैक्स-ड्राइवर और भारत के फ़ेसबुक सदस्य मनमोहन देसाई की फ़िल्म के किसी मेले में खोये हुये रिश्तेदार हैं। उन्हें मालूम है कि देश कैसे चलाना है, बस उन्हें मौक़ा नहीं मिल रहा।
30 जनवरी को डब्लयू एच ओ ने घोषणा की कि चीन में जन्में कोरोना वायरस की अंतर्राष्ट्रीय उपस्थिति महसूस की जा रही है। भारत ने तुरंत इस बात का नोटिस लिया और 04 फ़रवरी 2020 से चीन के नागरिकों और उन सभी लोगों का वीज़ा ख़ारिज कर दिया जो कि चीन में हो कर आए हैं। याद रहे कि इस स्टेज तक विश्व के किसी अन्य देश ने ऐसा निर्णय नहीं लिया था। 
12 मार्च 2020 को डब्लयू एच ओ ने कोरोना का एक विश्वमारी के रूप में घोषित कर दिया। और भारत ने 22 मार्च 2020 को अंतर्राष्ट्रीय उड़ानों को रद्द करते हुए अपने अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डों पर बन्दी का ऐलान घोषित कर दिया। याद रहे कि भारत की गिनती अभी भी प्रगतिशील देशों में होती है। जबकि युरोप के अधिकांश उन्नत देशों ने इस बारे में बिल्कुल सोचा भी नहीं था। ब्रिटेन जैसे देश में उस समय एअरपोर्ट खुले थे और फ़्लाइटें आ जा रही थीं।  
भारत में विपक्ष की टिप्पणियों से साफ़ ज़ाहिर हो जाता है कि उनका मुख्य उद्देश्य केवल और केवल सरकार की आलोचना है। इस मामले में भारत और पाकिस्तान की राजनीति लगभग समानान्तर चल रही है। भारत के विपक्षी दल यह मूलभूत बात नहीं समझ पा रहे कि सरकार की कोरोना फ़्रण्ट पर हार केवल नरेन्द्र मोदी या भाजपा की हार नहीं है। इस का असर भारतीय जनता पर भयानक होने वाला है। यह समय है कि सभी दल केवल एक दिशा में सोचें कि सबने मिल कर कैसे इस भयानक वायरस को हराना है। 
पूरा विश्व इस समय भारत और भारत के नेतृत्व की ओर निगाहें लगाए है। अमरीका समेत तमाम देश सोच रहे हैं कि इस वायरस की वैक्सीनेशन भारत ही बना पाएगा। पूरे भारतवासियों का यह कर्तव्य बन जाता है कि सरकारी निर्देशों का पालन करें और देश को शीघ्र अति शीघ्र इन हालात से बाहर निकालें।
भारत में मृत्यु दर कम होने का एक कारण मैनें भी खोजने का प्रयास किया। मेरा मानना है कि वायरस के प्रति भारतीयों के शरीर में निरोधक शक्ति अधिक है। सच तो यह है कि प्रत्येक भारतीय अपने प्रत्येक भोजन में काली मिर्च, हल्दी, दालचीनी, लाँग, बड़ी इलायची, जायफल, सौंठ, ज़ीरा, धनिया पावडर आदि आदि का इस्तेमाल करता है। भारत में शाकाहारी लोगों की संख्या माँसाहारी लोगों के मुकाबले अधिक है। और फिर हम लोग स्ट्रीट फ़ूड भी खाने के आदि हैं। ज़ाहिर है कि कोरोना वायरस को हमारे शरीरों में रहने में ख़ासी कठिनाई होती होगी। (यह एक संपादक की राय है। इसका मेडिकल चेक नहीं करवाया गया है।)
आज तीन सप्ताह बाद ब्रिटेन के प्रधानमन्त्री बॉरिस जॉन्सन वापिस अपने कार्यालय 10 डाउनिंग स्ट्रीट पहुंच गये हैं। अब उन्हें स्वंय अनुभव है कि कोरोना का मरीज़ किन हालात से गुज़रता है। हमें उम्मीद है कि उनका नेतृत्व अब केवल राजनीतिक ना होकर सद्भावना से प्रेरित होगा।
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

2 टिप्पणी

  1. आपने देश से दूर बैठ कर भी स्थितियों का सम्यक विवेचन किया है उस तरह से यहाँ के अखबार और मीडिया नहीं कर पाई है। मुझे लगता है कि वर्तमान राजनीति, सत्ता पक्ष या विपक्ष की, सत्ता में बने रहने अथवा वर्तमान सत्ता वाली पार्टी को किसी भी तरह हटा कर स्वयं काबिज होने की कोशिशों तक सिमट कर रह गई है। इस प्रक्रिया में नकारात्मकता आना स्वाभाविक है। सम्पूर्ण विश्व में सत्ता और विपक्ष दोनों के रवैये से ऐसा प्रतीत हो रहा है। अमरीका में राष्ट्रपति भी अति आत्मविश्वास से भरे रहे। ब्रिटेन की स्थिति आपने लिखा ही है। ऐसा लगता है कि सत्तापक्ष की प्राथमिकताएँ ज़्यादातर कल्याणकारी राज्य के बजाए अपने प्रचार और बचाए रखने की होती है, और विपक्ष की सत्ता के प्रत्येक कार्य और नीति को गलत साबित करने की। गलतियाँ हुई हैं। लेकिन किससे और कब नहीं होतीं। परंतु यह समय राजनीतिक विरोध को परे एक साथ मिल कर काम करने का है। (राहुल गांधी से एक टीवी पर एक इंटरव्यू में पत्रकार द्वारा पूछने – ‘आपने फरवरी के पहले सप्ताह में ही सरकार को कारोना से निपटने के लिए तैयारियों की चेतावनी दी थी।‘ इस पर राहुल का जवाब था, ‘अब इस सब को याद करने का वक़्त नहीं है। जरूरत है सबको साथ मिल कर सोचने और काम करने का।‘
    आपने ब्रिटेन में रहते हुए भी अपने दोनों संपादकीयों में आलोचना और सकारात्मक दोनों बातें उठाई हैं। यह किसी भी पत्रकार/साहित्यकार महत्त्वपूर्ण गुण और साहस का परिचायक होता है।

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