संपादकीय : राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन के बहाने 1

यदि एन.जी.ओ. कानूनों का पालन नहीं कर रहे तो यह सरकार का दायित्व बन जाता है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करवाई जाए। पिछले छः वर्षों से देखा जा रहा है कि सोनियां गान्धी, राहुल गान्धी, चिदम्बरम, रॉबर्ट वाडरा, मायावती, अखिलेश यादव परिवार, तेजस्वी यादव परिवार जैसे लोगों पर रोज़ाना टीवी पर इल्ज़ाम तो लगते हैं मगर अभी तक किसी को सज़ा नहीं हुई।

एक तरफ़ चीनी और भारतीय फ़ौजें सीमा पर आमने सामने डटी हैं तो दूसरी ओर भाजपा और काँग्रेस ने एक दूसरे पर तलवारें कसी हुई हैं। इसी सिलसिले में नवीनतम कड़ी जुड़ी है राजीव गांधी फ़ाउण्डेशन को मिलने वाले डोनेशन। 
आज भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्ढा ने सोनिया गान्धी पर दस सवाल दाग़ दिये। इन सवालों तक जाने से पहले हम समझ लें कि आख़िर यह राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन है क्या औऱ उसके ट्रस्टी कौन हैं। इस फ़ाउण्डेशन की शुरूआत 21 जून 1991 को सोनिया गान्धी ने की थी। इस फ़ाउण्डेशन के उद्देश्य हैं साइंस एवं टेक्नॉलॉजी का प्रमोशन, शोषित और दिव्यांगों की सहायता। 
सोनिया गान्धी इस ट्रस्ट की चेयरपर्सन हैं और राहुल गान्धी, प्रियंका गान्धी, पी. चिदम्बरम एवं पूर्व प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह इस के ट्रस्टी हैं।
जे.पी. नड्ढा का पहला सवाल था कि 2005 से 2009 तक राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन को चीन से पैसा मिला। 2006 से 2009 तक लक्ज़मबर्ग से डोनेशन मिला जो कि एक टैक्स हेवन है और जहां हवाला होता है। आख़िर यह किस ओर इशारा करता है।
नड्ढा जानना चाहते हैं कि काँग्रेस पार्टी और चीन की कम्युनिस्ट पार्टी में किस प्रकार का एम.ओ.यू. साइन हुआ है। 
जे.पी. नड्ढा ने अगला सवाल यह पूछा कि क्या चीन की सेंट्रल मिलिट्री कमीशन फ़ाउण्डेशन के साथ राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन का कुछ ख़ास रिश्ता था। क्या इस रिश्ते के तहत देश की नीतियों को प्रभावित करने के प्रयास किये गये।
एक अहम मुद्दा यह भी है कि 2005 से 2008 के बीच प्रधानमन्त्री राहत कोष के पैसे क्यों राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन को हस्तांतरित किये गये। 
राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन के ऑडिटर ठाकुर वैद्यनाथन एंड अय्यर कंपनी थी जिसके मालिक राजेश्वर ठाकुर थे जो कि दो बार राज्य सभा के सदस्य थे और चार राज्यों के राज्यपाल रहे। भला उनकी निष्पक्षता पर कैसे ऐतबार किया जा सकता है।
राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन के खातों पर आर.टी.आई. क्यों लागू नहीं है? और इन खातों की सी.ए.जी. से क्यों ऑडिटिंग नहीं करवाई जाती। 
काँग्रेस अब तक भाजपा पर मेहुल चौकसी को लेकर बहुत से सवाल खड़े करती रही है। मगर इस बार जे.पी. नड्ढा ने पूछा है, मेहुल चौकसी से राजीव गांधी फाउंडेशन में पैसा क्यों लिया गया? मेहुल चौकसी को लोन देने में मदद क्यों की गयी?”
सबसे बड़ा आरोप चीन से मिलने वाले पैसे को लेकर है तो वहीं विदेशी और भारत की पब्लिक सेक्टर कंपनियों से मिलने वाले पैसे पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इस सूची में शामिल हैं – चीन की एम्बेसी, आयरलैण्ड की सरकार, चीनी सरकार, स्वास्थ्य मंत्रालय, पर्यावरण मंत्रालय, लघु उद्योग मंत्रालय, डी.एल.एफ़ युनिवर्सल, स्टेट बैंक ऑफ़ इण्डिया, ओरिएण्टल बैंक ऑफ़ कॉमर्स, ऑयल इण्डिया लिमिटेड, गैस ऑथॉरिटी ऑफ़ इण्डिया लिमिटेड और ऑयल एण्ड नेचुरल गैस कॉरपोरेशन। भाजपा के सवाल हैं कि ऐसे संस्थान भला क्यों मजबूर थे राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन को चन्दा देने के लिये। 
सबसे कठिन प्रश्न है कि प्रधानमन्त्री राहत कोश में प्रधानमन्त्री मनमोहन सिंह और सोनियाँ गान्धी दोनों पदाधिकारी हैं। और राजीव गान्धी फ़ाउण्डेशन में। तो ऐसे में कॉन्फ़्लिक्ट ऑफ़ इंटरेस्ट से कैसे बचा जा सकता है?
हर टीवी चैनल पर काँग्रेस प्रवक्ता बहुत बचकाने ढंग से अपने नेताओं का बचाव कर रहे थे। उनका कहना था कि हम तो भ्रष्ट हैं ही, भाजपा भी कोई दूध की धुली नहीं है। उन्होंन ना जाने कहां कहां से कुछ ट्रस्ट एवं नेताओं के नाम खोज निकाले जिन से भाजपा या राष्ट्रीय स्वयं संघ के नेता भी जुड़े हैं। 
यानि कि भारत का पूरा राजतन्त्र ही भ्रष्ट है। यदि ऐसा है तो यह भारत के लिये कोई अच्छी स्थिति नहीं है। यदि एन.जी.ओ. कानूनों का पालन नहीं कर रहे तो यह सरकार का दायित्व बन जाता है कि इस पूरे प्रकरण की निष्पक्ष जांच करवाई जाए। पिछले छः वर्षों से देखा जा रहा है कि सोनियां गान्धी, राहुल गान्धी, चिदम्बरम, रॉबर्ट वाडरा, मायावती, अखिलेश यादव परिवार, तेजस्वी यादव परिवार जैसे लोगों पर रोज़ाना टीवी पर इल्ज़ाम तो लगते हैं मगर अभी तक किसी को सज़ा नहीं हुई।
क्या हमारी अदालतों का रवैय्या ढुलमुल है या फिर सरकार को ये मसले कश्मीर के मसले की तरह लटकाए रखने में रुचि है? भारत की जनता माँग करती है कि अब भ्रष्टाचार का टीवी पर ढिंढोरा ना पीट कर; उस पर राजनीति बन्द करके, दोषियों को सज़ा दिलवाई जाए – फिर वो किसी भी पार्टी के क्यों ना हों।
तेजेंद्र शर्मा
लेखक वरिष्ठ साहित्यकार, कथा यूके के महासचिव और पुरवाई के संपादक हैं. लंदन में रहते हैं.

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