Wednesday, May 22, 2024
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शिवकांत की फेसबुक वॉल से साभार – फ़िलस्तीनी संकट का इतिहास, चुनौतियाँ और कुछ ज्वलंत प्रश्न

संयुक्त राष्ट्र में केन्या के राजदूत मार्टिन किमानी ने सुरक्षा परिषद में यूक्रेन के संकट पर कहा था, ‘हमारी सीमाएँ हमारी खींची हुई नहीं हैं। उन्हें पेरिस और लंदन में बैठ कर हमारी संस्कृतियों की परवाह न करते हुए खींचा गया था। आज़ादी के वक़्त यदि हमने जात, नस्ल और मजहब के नाम पर देश तलाशे होते तो दशकों बाद भी आज हम एक-दूसरे का ख़ून बहा रहे होते।’ काश यह बात 1948 में कही गई होती और यहूदियों और अरबों ने ध्यान से सुनी होती तो शायद पश्चिम एशिया का रूप कुछ और ही होता! इज़राइल और फ़िलस्तीनियों के बीच क्या हुआ? कैसे हुआ और क्यों हुआ? कौन दोषी है और कौन नहीं और आगे क्या हो सकता है? पढिएः
26 अक्तूबर, 2023 को संयुक्त राष्ट्र महासभा ने भारी बहुमत के साथ एक प्रस्ताव पारित किया जिसमें हमास और इज़राइली सेना के बीच गाज़ा पट्टी में तत्काल एक स्थायी और दूरगामी इंसानी युद्धविराम का आह्वान किया गया था। प्रस्ताव में गज़ा पट्टी में फँसे नागरिकों के जीवन निर्वाह के लिए आवश्यक सामग्री की पर्याप्त, अबाध और निरंतर सप्लाई की माँग भी की गई थी। अरब लीग के सदस्य देशों की तरफ़ से यह प्रस्ताव इज़राइल के पड़ोसी जोर्डन ने रखा था जिसे 45 देशों का समर्थन हासिल था। प्रस्ताव के पक्ष में रूस, चीन और फ़्रांस समेत 120 देशों ने वोट डाला।
प्रस्ताव में 7 अक्तूबर, 2023 के बर्बर आतंकी हमले के लिए हमास की निंदा नहीं की गई थी। हमले में इज़राइली सैनिकों समेत 1405 लोगों की हत्या की गई थी जिनमें बड़ी संख्या में बच्चे, औरतें और नागरिक शामिल थे। प्रस्ताव में हमास द्वारा बंधक बनाए गए 240 लोगों को तत्काल छोड़े जाने की माँग भी नहीं थी जिनमें अमरीका और यूरोप समेत दर्जनों देशों के लोग शामिल हैं। इसलिए इज़राइल और अमरीका समेत 14 देशों ने प्रस्ताव का विरोध किया और ब्रिटेन, जर्मनी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत समेत 45 देशों ने तटस्थता की नीति अपनाते हुए मतदान में हिस्सा नहीं लिया। तटस्थ रहने वाले देशों का तर्क था कि जितना अनैतिक हमास को ख़त्म करने के लिए गाज़ा के बच्चों, औरतों और निर्दोष नागरिकों का राशन-पानी बंद कर उनपर बम बरसाना है उतना ही अनैतिक इज़राइल के प्रतिरोध के नाम पर इज़राइल के बच्चों, औरतों और निर्दोष नागरिकों की हत्या करना और हत्यारों की ढाल बनना है।

1. फ़िलस्तीन का विभाजनः
संयुक्त राष्ट्र महासभा के प्रस्ताव सुरक्षा परिषद के प्रस्तावों की तरह बाध्यकारी नहीं होते, इसलिए इज़राइली प्रधानमंत्री नेतनयाहू ने युद्ध रोकने से साफ़ मना कर दिया है। उन्होंने कहा है कि इज़राइल आतंकवाद के समक्ष समर्पण नहीं करेगा। संयोग से संयुक्त राष्ट्र महासभा के ही एक और प्रस्ताव ने 1947 में फ़िलस्तीन का एक यहूदी और एक अरब देश में विभाजन करने का अनुरोध किया था। यह प्रस्ताव संख्या 181 (II) था जिसमें सुरक्षा परिषद से अनुरोध किया गया था कि वह प्रस्ताव के क्रियान्वयन के लिए सभी आवश्यक उपाय करे।
फ़िलस्तीन के विभाजन का प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र के ही एक आयोग की सिफ़ारिशों पर आधारित था। आयोग ने फ़िलस्तीन की करीब 56% ज़मीन यहूदी देश को और 43% अरब देश को देने की सिफ़ारिश की थी जिसका नक़्शा नीचे लगा है। बाक़ी की एक प्रतिशत ज़मीन वाले प्राचीन शहर येरुशलम को संयुक्त राष्ट्र शासित क्षेत्र घोषित किया गया था। यहूदियों ने विभाजन के प्रस्ताव को तत्काल मान लिया और इज़राइल की स्थापना कर ली। परंतु अरब देशों ने इसे विश्वासघात और ज़ायनिस्ट षडयंत्र बता कर इसका विरोध किया और मई 1948 में ब्रिटेन के जाते ही नवगठित इज़राइल पर चारों ओर से हमला बोल दिया जिसके कारण गृहयुद्ध छिड़ गया था।
2. पहले अरब-इज़राइली युद्ध की पृष्ठभूमिः
फ़िलस्तीन में इज़राइल की स्थापना होते ही छिड़े युद्ध की जड़ें बहुत पुरानी थीं। फ़िलस्तीन उस्मानिया साम्राज्य का हिस्सा था जिसके पतन के बाद लीग ऑफ़ नेशन्स ने उसे नए देश में बदलने का जनादेश ब्रिटेन को दिया था। उस जनादेश में यह कहा गया था कि नए राष्ट्र का गठन फ़िलस्तीनी जनता की इच्छाओं के अनुसार किया जाएगा। परंतु ऐसा हुआ नहीं। क्योंकि लीग ऑफ़ नेशन्स का जनादेश मिलने से लगभग पाँच साल पहले ब्रिटेन की सरकार ज़ायनवादी संगठन को फ़िलस्तीनी धरती पर यहूदियों का देश बसाने का वचन दे चुकी थी। यूरोप में बढ़ रहे नस्लवादी हमलों के सताए यहूदी किसी ऐसी जगह की तलाश में थे जहाँ वे नस्लवादी दमन से दूर सुरक्षित ज़िंदगी बसर कर सकें। फ़िलस्तीन में उन्हें अपनी ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जड़ें नज़र आती थीं जहाँ वे अपना देश बसाने और सुरक्षित जीवन बिताने का सपना लिए यूरोप से भाग-भाग कर आने और बसने लगे।
फ़िलस्तीनी अरबों ने इसका विरोध किया। मार-पीट और दंगे होने लगे पर ब्रिटेन ने यहूदियों के आने पर रोक लगाने की जगह उसे बढ़ावा दिया। तीस के दशक में हिटलर, मुसोलिनी और स्तालिन की सरकारों की फ़ासीवादी नीतियों से यहूदियों का दमन और बढ़ा जिसके कारण यूरोप से भाग कर फ़िलस्तीन आने वाले यहूदियों की संख्या बढ़ती गई। इसके बावजूद फ़िलस्तीन में 1948 के विभाजन के समय अरबों की आबादी यहूदियों की आबादी से दोगुनी से भी ज़्यादा थी। ऐसी परिस्थितियों में नए यहूदी राष्ट्र को अरब राष्ट्र की तुलना में एक तिहाई अधिक और उपजाऊ मैदानी ज़मीन दिए जाने से अरबों का रोष और भड़का। उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव को मानने के बजाय इज़राइल की हस्ती मिटा कर पूरे फ़िलस्तीन पर अरब राष्ट्र बनाने के लिए उसी तरह के हमले शुरू कर दिए जैसे भारत में मुस्लिम लीग ने डायरेक्ट एक्शन प्लान के द्वारा शुरू किए थे।
यहूदियों ने भी हथियारबंद दस्ते तैयार कर लिए थे जिन्हें यूरोप और अमरीका से हथियार मिल रहे थे। जैसे भारत में देश व्यापी दंगों की शुरुआत मुस्लिम लीग द्वारा कलकत्ता में कराए गए क़त्ले आम से हुई थी उसी तरह फ़िलस्तीन में भी दंगों की शुरुआत अरब आतंकवादियों के फ़ज्जा बस हमले से हुई जिसमें सात यहूदियों की हत्या की गई थी। उसके बाद गाँव-गाँव में दंगे शुरू हो गए और गृहयुद्ध छिड़ गया। ब्रितानी सरकार 14 मई, 1948 की रात को अपना जनादेश समाप्त होते ही फ़िलस्तीन को उसी तरह दंगों में जलता छोड़कर भाग गई जैसे भारत को दंगों की आग में जलता छोड़कर भागी थी। गृहयुद्ध से फैली अराजकता का बहाना बनाकर जोर्डन, लबनान, सीरिया, इराक़ और मिस्र की सेनाओं ने फ़िलस्तीनी अरबों के साथ मिलकर इज़राइल पर हमला बोल दिया।
अरब देशों का संयुक्त हमला और गृहयुद्ध दस महीने चला। नवगठित होने के बावजूद इज़राइली सेना ने अरब सेनाओं का डटकर मुकाबला किया। विभाजन के नक़्शे से स्पष्ट हो जाता है कि प्रस्तावित यहूदी और अरब देशों का विभाजन इस तरह किया गया था कि दोनों के तीन-तीन हिस्से थे जो बहुत ही संकरी पट्टियों के ज़रिए एक-दूसरे से जुड़ते थे। ठीक उसी तरह जैसे भारत के पूर्वोत्तरी राज्य बांग्लादेश और भूटान के बीच से होकर जाने वाली संकरी सी पट्टी के ज़रिए शेष भारत से जुड़े हैं।

3. पहले अरब-इज़राइली युद्ध के परिणामः
1948 की लड़ाई में इज़राइल न केवल अपनी ज़मीन को बचाने में कामयाब हुआ बल्कि उसने फ़िलस्तीन को मिली एक तिहाई ज़मीन पर भी कब्ज़ा कर लिया और अपने सँकरे हिस्सों को चौड़ा करके यह सुनिश्चित कर लिया कि उसे दो या तीन हिस्सों में न बाँटा जा सके। युद्ध समाप्त होने तक फ़िलस्तीन की 77% ज़मीन इज़राइल के क़ब्ज़े में आ चुकी थी और बाकी बची 23% ज़मीन को जोर्डन, मिस्र और सीरिया ने अपने-अपने क़ब्ज़े में ले लिया।
यानी संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव संख्या 181 की वजह से इज़राइल की स्थापना तो हो गई लेकिन जिस 43% ज़मीन पर फ़िलस्तीनी राष्ट्र बनना था वह अरब देशों के संयुक्त हमले की वजह से नहीं बन पाया। उसमें से फ़िलस्तीनियों की 20% ज़मीन अरब देश लड़ाई में हार गए और वह इज़राइल के पास चली गई और बाकी बची 23% ज़मीन पर फ़िलस्तीनियों के हिमायती अरब देशों ने कब्ज़ा कर लिया जो 1967 की लड़ाई तक चला। इस तरह पहले 19 साल बचा-कुचा फ़िलस्तीन भी अरब देशों के क़ब्ज़े में रहा।
फ़िलस्तीन के बँटवारे से पहले तीन साल चले गृहयुद्ध और इज़राइल की स्थापना के बाद 10 महीने चली लड़ाई के दौरान यहूदी हथियारबंद गिरोहों ने इज़राइल को मिले इलाकों में सदियों से रहते आ रहे फ़िलस्तीनी अरबों को या तो मार कर भगा दिया या वे स्वयं जान बचाकर भाग गए। लगभग सात लाख फ़िलस्तीनी गाँव छोड़ कर पश्चिमी किनारे और जोर्डन में भाग गए जिसे फ़िलस्तीनी नक़बा या महात्रासदी कहते हैं।
यह ठीक उसी तरह की त्रासदी है जो विभाजन के समय पंजाब और सिंध में बसे लाखों हिंदुओं और सिखों ने झेली थी। लेकिन उन्होंने भारत लौटकर कभी पाकिस्तान से बदला लेने के लिए सीमापार के हमले करने के बारे में नहीं सोचा। न ही कभी कश्मीर से मार कर भगाए गए कश्मीरी पंडितों ने कश्मीरी मुसलमानों से बदला लेने के लिए आतंकी हमलों के बारे में सोचा। परंतु 1948 की लड़ाई बंद होने के बाद इज़राइल से भागकर पश्चिमी किनारे और जोर्डन में जा बसे फ़िलस्तीनियों में इज़राइल से बदला लेने के लिए सीमापार हमले करना जारी रखा जिन्हें फ़िदायीन हमले कहा जाता था। जोर्डन और मिस्र ने फ़िलस्तीनियों को फ़िदायीन हमलों से रोकने के बजाय उकसाना जारी रखा।
4. अरब आतंकवाद का उदयः
इस तरह कश्मीरी आतंकियों के लिए चल निकले फ़िदायीन शब्द और आतंकी विचार की शुरुआत फ़िलस्तीन से हुई। 1948 की लड़ाई से 1967 की लड़ाई तक पश्चिमी किनारे का क्षेत्र और पूर्वी येरुशलम जोर्डन के पास रहा और गाज़ा पट्टी मिस्र के पास। लेकिन दोनों देशों में से किसी ने उन्हें फ़िलस्तीनी राष्ट्र के रूप में विकसित करने का कोई प्रयत्न नहीं किया। 1948 के जैरिको संमेलन में फ़िलस्तीनी नेताओं ने जोर्डन के शाह हुसैन को अपना शासक मान लिया।
इज़राइल के पड़ोसी अरबों ने 1948 से लेकर 1993 तक, पहले 45 साल, न इज़राइल के अस्तित्व को स्वीकार किया और न ही संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रस्तावित यहूदी और फ़िलस्तीनी, दो राष्ट्रों के उस विचार को, जिसकी आज हर साँस में दुहाई दी जाती है। इससे न इज़राइल के दमन का औचित्य सिद्ध होता है और न पश्चिमी किनारे की फ़िलस्तीनी ज़मीन पर यहूदी बस्तियाँ बसाने का। परंतु इतना ज़रूर समझ आ जाता है कि यह फ़िलस्तीनियों की शांति की बातों पर इज़राइल के अविश्वास और असुरक्षा की भावना का एक बड़ा कारण है। फ़िलस्तीनियों की 20% ज़मीन जीत लेने के बावजूद पश्चिमी किनारे से होने वाले फ़िदायीन हमलों के कारण इज़राइल में यह भय बराबर बना रहा कि क़ल्क़िया चिड़ियाघर और अपोलोनिया राष्ट्रीय उद्यान के बीच की तटवर्ती पट्टी पर पश्चिमी किनारे और भूमध्यसागर से एक साथ सामूहिक हमले करके उसे दो हिस्सों में बाँटा जा सकता था।
इज़राइल को उम्मीद थी कि पश्चिमी किनारे और येरुशलम के जोर्डन के पास चले जाने और गाज़ा पट्टी के मिस्र के पास चले जाने के बाद अलग फ़िलस्तीनी राष्ट्र का मसला ठंडा पड़ जाएगा और वह सुरक्षित माहौल में रह सकेगा। लेकिन उसे निरंतर फ़िदायीन हमलों का सामना करना पड़ा जिनका जवाब उसी तरह के सीमापार हमलों से देने के साथ-साथ इज़राइल ने उन फ़िलस्तीनियों को भी मारना शुरू कर दिया जो वापस अपने घर लौटने या पीछे छूटा सामान लाने के लिए घुसपैठ करते थे। घुसपैठियों को फ़िदायीन समझ कर मारने की घटनाओं में हर साल सैंकड़ों फिलस्तीनी मारे जाते रहे।
5. तीसरा अरब-इज़राइली युद्धः
अंत में इज़राइल को वह मौक़ा उसी विवाद से मिला जिसकी वजह से 1956 में उसे मिस्र से लड़ना पड़ा था और जिसका उसे एक लंबे अरसे से इंतज़ार था। विवाद मिस्र के साइनाई रेगिस्तान की नोक पर पड़ने वाले तिरान जलडमरूमध्य को लेकर था जिसकी मिस्र द्वारा नाकेबंदी कर दिए जाने के कारण इज़राइल को 1956 के स्वेज़ युद्ध में कूदना पड़ा था और उसे हराकर तिरान को खुला रखने का समझौता कराया था। तिरान जलडमरूमध्य अक़बा की खाड़ी को लाल सागर में खोलता है और इससे होकर गुज़रे बिना इज़राइली जहाज़ लाल सागर में प्रवेश नहीं कर सकते। मिस्र ने समझौता तोड़ते हुए 1967 में एक बार फिर तिरान जलडमरूमध्य की नाकेबंदी कर ली थी जिसकी वजह से 1967 की लड़ाई छिड़ी जिसे फ़िलस्तीनी लोग नक़्शा (आघात) कहते हैं।
मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने जून 1967 में एक बार फिर तिरान जलडमरूमध्य की नाकेबंदी करके इज़राइल की सीमा पर सेना तैनात कर दी। सीमा पर शांति की निगरानी के लिए तैनात संयुक्त राष्ट्र आपात सेना को भी हटने के आदेश दे दिए। दरअसल मिस्र, जोर्डन और सीरिया कई महीनों से इज़राइल पर हमले की तैयारी कर रहे थे जिसकी भनक इज़राइल को लग गई थी। इनमें सबसे बड़ी सेना मिस्र के पास थी जिसके पास मिग-21 विमानों समेत 420 विमान थे। इज़राइल ने इन तीनों अरब देशों और इन्हें इराक़ और सऊदी अरब से मिल रहे समर्थन के ख़तरे को भाँपते हुए 5 जून को मिस्र पर औचक हमला बोल दिया और उसके विमानों को खड़े-खड़े ही नष्ट कर दिया।
सात दिनों तक चली लड़ाई में इज़राइली सेना ने मिस्र से गाज़ा पट्टी के साथ-साथ उसका साइनाई प्रायद्वीप, जोर्डन से सारा पश्चिमी किनारा और येरुशलम और सीरिया से उसका गोलान पहाड़ी क्षेत्र छीन लिया। पश्चिमी किनारे से तीन लाख से ज़्यादा फ़िलस्तीनी भाग कर जोर्डन चले गए या भगा दिए गए और गोलान पहाड़ी क्षेत्र से एक लाख सीरियाई भाग गए। इस शर्मनाक़ हार के बाद मिस्र के राष्ट्रपति नासिर ने स्वेज़ नहर को बंद कर दिया जो 1975 तक बंद रही और 1973 के ऊर्जा संकट का कारण बनी।
जून 1967 की जीत के बाद से फ़िलस्तीनियों के हिस्से की पश्चिमी किनारे और गाज़ा पट्टी की ज़मीन, संयुक्त राष्ट्र के शासन वाला येरुशलम और सीरिया की गोलान पहाड़ियाँ इज़राइल के ही कब्ज़े में हैं। फ़िलस्तीनी लोग अपने हमदर्द अरब देशों के उकसावे में आकर पूरा फ़िलस्तीन लेने के चक्कर में अपनी वह 43% ज़मीन भी खो बैठे जो उन्हें 1948 के संयुक्त राष्ट्र बँटवारे के ज़रिए मिली थी। पहले अरब-इज़राइली युद्ध के बाद 19 साल उनकी बची-कुची ज़मीन को जोर्डन और मिस्र ने दबाए रखा और 1967 के बाद से वह इज़राइल के कब्ज़े में है।

6. इज़राइली कब्ज़ा और यहूदी बस्तियाँ
पश्चिमी किनारा क्षेत्र, गोलान पहाड़ियाँ और गाज़ा पट्टी की ज़मीन मिलने के बाद इज़राइल का हमलों से दो या तीन हिस्सों में बँटने का भय तो दूर हो गया। लेकिन इतनी बड़ी और ख़ून की प्यासी फ़िलस्तीनी आबादी को काबू में रखने की चिंता भी मँडराने लगी, ख़ास तौर पर यह जानते हुए कि आस-पास के अरब देश उसे उकसाने में कसर नहीं छोड़ेंगे। इसलिए कब्ज़े में आई ज़मीन पर इज़राइली बस्तियाँ बसाना शुरू किया गया ताकि उनकी रक्षा के बहाने आस-पास रहने वाले फ़िलस्तीनियों पर नज़र रखी जा सके और आगे चलकर कब्ज़े को स्थायी बनाया जा सके। लड़ाई ख़त्म होते ही जुलाई 1967 में गोलान पहाड़ियों पर पहली यहूदी बस्ती बसाई गई। अगली बस्तियाँ हेबरॉन और जुडिया और समारिया में बनीं। पूर्वी येरुशलम के संवेदनशील इलाक़ों में भी अरबों के घर खाली करा कर यहूदियों को बसाया जाने लगा।
7. फ़िलस्तीनी आतंकवाद का दौरः
उधर 1967 की हार के बाद इज़राइल, पश्चिमी किनारे और गाज़ा पट्टी से भाग कर शरणार्थी बने दस लाख से अधिक फ़िलस्तीनियों का असंतोष और रोष आतंकवाद में बदलने लगा। फ़िलस्तीनियों को समझ आ गया कि अरब देशों की सेनाएँ इज़राइल को कभी नहीं हरा पाएँगी। इसलिए उन्होंने लातीनी अमरीका, उत्तरी अफ़्रीका और दक्षिणपूर्व एशिया के विद्रोहों से सबक लेते हुए छापामारी, अपहरण और आतंकवादी हमले शुरू कर दिए। इज़राइल को मिटाने का जो लक्ष्य आधा दर्जन अरब देशों की सेनाएँ मिलकर हासिल नहीं कर सकीं उसे हासिल करने के लिए फ़िलस्तीनी संगठनों ने विमानों का अपचालन, महत्वपूर्ण हस्तियों का अपहरण और आतंकवादी हमले करने शुरू कर दिए।
अकेले जोर्डन में ही यासर अराफ़ात के फ़िलस्तीनी मुक्ति संगठन या पीएलओ के अलावा छह ऐसे फ़िलस्तीनी संगठन सक्रिय थे जो अरब और पूर्वी यूरोप के देशों से पैसे और हथियार लेकर इज़राइल और उसके समर्थक अमरीका और पश्चिमी यूरोप के देशों को आतंकवादी हमलों का निशाना बना रहे थे। सितंबर 1970 के आरंभ में तीन विमानों का अपचालन किया गया। दो अमरीकी विमानसेवाओं के थे और एक स्विट्ज़रलैंड की विमान सेवा का था। बंधक यात्रियों को छोड़ने के बाद तीनों विमानों को बमों से उड़ा दिया गया। इसके बाद दस दिन का गृहयुद्ध चला जिसमें सीरिया, इराक़ और अमरीका की सेनाओं ने मिलकर फ़िलस्तीनी आतंकवादियों पर हमले किए जिन्हें ‘काले सितंबर’ के नाम से जाना जाता है।
इधर जोर्डन में फ़िलस्तीनी छापामारों और शाही सेना के बीच झड़पें शुरू हुईं जो छह महीनों तक चलीं। जोर्डन के शाह हुसैन पर कई जानलेवा हमले हुए और उनके प्रधानमंत्री की काहिरा में हत्या कर दी गई। जोर्डन की सेना को फ़िलस्तीनी संगठनों पर हमला बोलना पड़ा और फ़िलस्तीनी नेता यासर अराफ़ात को अपने संगठन समेत जोर्डन से भागकर लबनान जाना और वहाँ अपना अड्डा बनाना पड़ा। इन घटनाओं ने अरब नेताओं को फ़िलस्तीनी संगठनों के प्रति आशंकित और सावधान कर दिया।
जून 1967 की लड़ाई में सबसे अधिक नुक़सान मिस्र और सीरिया का हुआ था। इज़राइल ने मिस्र से साइनाई प्रायद्वीप और सीरिया से गोलान पहाड़ियाँ छीन ली थीं। इसलिए दोनों ने मिलकर इज़राइल पर 1973 के रमज़ान के दसवें दिन औचक हमला बोल दिया। इज़राइल उस दिन यहूदी त्योहार योम किपूर मना रहा था। मिस्र की सेना स्वेज़ नहर पार कर पूर्वी किनारे के इज़राइली क्षेत्र में दाख़िल हो गई और सीरियाई सेना ने गोलान पहाड़ियों पर हमला बोल कर उन्हें इज़राइली सेना से छीनना शुरू कर दिया।
इस लड़ाई में मिस्र और सीरिया को सोवियत संघ से मदद मिल रही थी और इज़राइल को अमरीका से। इसलिए यह परोक्ष रूप से सोवियत-अमरीका युद्ध भी था। शुरू के दिनों में मिस्र और सीरिया ने इज़राइली सेना को खदेड़ कर कुछ इलाक़ा छीना। लेकिन इज़राइल ने कुछ दिन लड़ाई रोक कर जवाबी हमला किया और दो सप्ताह के भीतर उसकी सेनाएँ सीरिया में राजधानी दमिश्क और मिस्र में राजधानी काहिरा के पास तक जा पहुँची थीं। तभी महाशक्तियों ने युद्धविराम करा दिया। योम किपूर युद्ध ने इज़राइल और अरब दोनों पक्षों को सोचने पर विवश किया और लंबी शांति वार्ताओं के बाद अमरीकी मध्यस्थता से इज़राइल और मिस्र के बीच 1978 का केम्प डेविड समझौता हुआ और मिस्र इज़राइल को मान्यता देने वाला पहला अरब देश बना।
कैम्प डेविड समझौते तक इज़राइल को बने तीस साल हो चुके थे। फिर भी मिस्र को छोड़कर बाक़ी के अरब देश इज़राइल को मान्यता देने के लिए तैयार नहीं थे। उधर पीएलओ के लबनान आने बाद वहाँ फ़िलस्तीनियों की गतिविधियों से अराजकता फैलने लगी थी। 1980 आते-आते लबनान में फ़िलस्तीनियों और ईसाई गिरोहों के बीच गृहयुद्ध छिड़ गया जिसमें पश्चिमी एशिया के पैरिस के नाम से मशहूर बेरुत बर्बाद हो गया। इस गृहयुद्ध में सीरिया और इज़राइल भी अपने-अपने गुटों की मदद के लिए कूदे। ईरान में इस्लामी क्रांति होने के बाद दक्षिणी लबनान के शिया समुदाय ने भी आतंक का रास्ता अपनाया और हेज़बोल्लाह का गठन हुआ जो आगे चलकर लबनान का सबसे शक्तिशाली आतंकी संगठन बनकर उभरा।
8. पहला इंतिफ़ादा और हेज़बोल्लाह:
लबनान और अफ़गानिस्तान के गृहयुद्धों और ईरान की इस्लामी क्रांति से फैले कट्टरपंथ का प्रभाव गाज़ा और पश्चिमी किनारे पर भी हुआ। यहाँ फ़िलस्तीनी ज़मीन पर यहूदी बस्तियों के विस्तार को लेकर और फ़िलस्तीनियों के आत्मघाती हमलों के जवाब में इज़राइल की धरपकड़ और कई गुणा हिंसक कार्रवाइयों को लेकर रोष बढ़ता जा रहा था।
1987 में इज़राइल अधिकृत फ़िलस्तीनी इलाकों में विरोध, पथराव और तोड़-फोड़ और इज़राइली शहरों में आत्मघाती हमलों और रॉकेट हमलों का दौर शुरू हुआ जिसे पहला इंतिफ़ादा कहते हैं। पाँच साल चले विद्रोह के इस दौर ने इज़राइल और पीएलओ पर शांति समझौते का दबाव बनाया जिसके कारण 1993 का ओस्लो समझौता हुआ जिसमें पहली बार फ़िलस्तीनियों ने इज़राइल को मान्यता दी और इज़राइल ने भी फ़िलस्तीनियों के लिए अलग राष्ट्र की बात मानी। लेकिन समझौते को न फ़िलस्तीनी और अरब जनता से दिल से समर्थन दिया और न इज़राइली जनता ने।
पहले इंतिफ़ादा से जहाँ फ़िलस्तीनी और इज़राइली नेताओं के बीच समझौता हुआ वहीं दूसरी ओर गाज़ा में हमास और इस्लामी जिहाद जैसे आतंकवादी संगठनों की जड़ें भी जमीं और सीरिया व ईरान का प्रभाव बढ़ने लगा जो इज़राइल का अंत देखना चाहते थे। ओस्लो समझौते के फलस्वरूप फ़िलस्तीनी राष्ट्रीय प्राधिकरण का गठन हुआ जिसने पश्चिमी किनारे और गाज़ा पट्टी का प्रशासन संभाला।
लेकिन न इज़राइल ने पश्चिमी किनारा क्षेत्र में यहूदी बस्तियाँ बसाना बंद किया और न ही हमास और इस्लामी जिहाद जैसे आतंकी संगठनों ने आत्मघाती बम धमाके करना और शहरों पर रॉकेट दाग़ना बंद किया। इससे दोनों को एक-दूसरे पर समझौतों का पालन न करने के आरोप लगाकर ख़ुद समझौता तोड़ने का बहाना मिलता रहा। ऊपर से यासर अराफ़ात ने कुवैत पर कब्ज़ा करने वाले सद्दाम हुसैन का समर्थन करके जो भूल की थी उससे पश्चिम के साथ-साथ अरब जगत में भी फ़िलस्तीनियों के लिए सहानुभूमि कम हुई। ऐसे कारणों से ओस्लो समझौते पर पूरी तरह अमल नहीं हो पाया जिसने दूसरे इंतिफ़ादा को जन्म दिया।
9. अराफ़ात का निधन और हमास का उदयः
अक्तूबर 2000 से 2005 तक चले दूसरे इंतिफ़ादा में इज़राइली सुरक्षा बलों और नागरिकों के साथ-साथ मिस्र के साइनाई प्रायद्वीप के उन पर्यटन केंद्रों को निशाना बनाया गया जहाँ इज़राइली और पश्चिमी देशों के पर्यटक छुट्टियाँ मनाने जाते थे। इज़राइल ने जवाब में डिफ़ेंसिव शील्ड नाम का अभियान चलाया जिसने फ़िलस्तीनी आतंकवादियों और उनके ठिकानों और हथियारों को निशाना बनाया।
सद्दाम हुसैन के समर्थन से कमज़ोर हुए यासर अराफ़ात का फ़िलस्तीनी गुट फ़तह, शांति समझौते के क्रियान्वयन में देरी के कारण और कमज़ोर पड़ता जा रहा था। उसी के बीच नवंबर 2004 में पेट की किसी रहस्यमय बीमारी से यासर अराफ़ात का निधन हो गया। इसके बावजूद इज़राइली प्रधानमंत्री शैरोन ने ओस्लो समझौते के तहत अगस्त 2005 में गाज़ा पट्टी को पूरी तरह फ़िलस्तीनियों के हवाले कर दिया और पश्चिमी किनारे के उत्तरी समारिया क्षेत्र से चार यहूदी बस्तियों को हटा लिया।
इज़राइल के गाज़ा से हटने के बावजूद वहाँ फ़तह के प्रतिद्वंद्वी उग्रपंथी संगठन हमास का प्रभाव बढ़ता गया और उसने 2006 के फ़िलस्तीनी चुनावों में जीत हासिल कर ली। हमास के सत्ता में आते ही अमरीका और कई यूरोपीय देशों ने हमास और फ़िलस्तीनी प्राधिकरण की आर्थिक सहायता बंद कर दी और इज़राइल ने गाज़ा की नाकेबंदी कर दी क्योंकि इज़राइल को मान्यता देने की जगह हमास का घोषित लक्ष्य उसे मिटाकर इस्लामी फ़िलस्तीनी राष्ट्र की स्थापना करना था।
हमास ने नाकेबंदी का जवाब गाज़ा पट्टी का नियंत्रण अपने हाथों में लेकर इज़राइल पर उन क़ासिम रॉकेटों, मोर्टार और ग्राद मिसाइलों की वर्षा से दिया जिन्हें वे बरसों से हेज़बोल्लाह की मदद से ख़रीद, बना और जमा कर रहे थे। इज़राइल भी हमास के आत्मघाती हमलों, अपहरणों और रॉकेटों का जवाब 2008, 2012, 2014 और 2022 के बड़े हवाई और ज़मीनी हमलों और बीच-बीच सर्जिकल हमलों से देता आ रहा है। इस समय चल रही गाज़ा की लड़ाई उन्हीं की एक कड़ी है और फ़िलस्तीनियों और इज़राइलियों के बीच 1967 के बाद की सबसे बड़ी लड़ाई है।
10. इज़राइली-फ़िलस्तीनी संकट पर फ़िलस्तीनी दृष्टिकोणः
1. फ़िलस्तीनी दृष्टिकोण से देखें तो वे अपनी ज़मीन के लिए पिछले 75 वर्षों से हर तरह की लड़ाई लड़ चुके हैं। पहला दौर गृहयुद्धों का रहा। पहले विश्वयुद्ध से लेकर 1948 के पहले अरब-इज़राइली युद्ध तक फ़िलस्तीनी अरबों ने गृहयुद्ध के द्वारा यहूदियों को भगाने और अपनी ज़मीन पर बसे रहने की कोशिश की। परंतु कामयाब न हो सके।
2. दूसरा दौर सैनिक युद्धों का था। ब्रिटेन के फ़िलस्तीन से हटते ही जोर्डन, सीरिया, मिस्र, इराक और लबनान ने फ़िलस्तीनियों के साथ मिलकर इज़राइल को मिटाने और यहूदियों को फ़िलस्तीन से भगाने की कोशिश की। लेकिन कामयाब होने की जगह वे फ़िलस्तीनियों को मिली ज़मीन में से भी करीब आधी ज़मीन हार बैठे। बची हुई 23% फ़िलस्तीनी ज़मीन को भी अरब देशों ने 1967 की लड़ाई में खो दिया और ऊपर से कुछ अपनी ज़मीन भी गँवा बैठे। इस प्रकार सैनिक युद्धों की नीति और भी नाकाम रही।
3. तीसरा दौर अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद की मुहिम का था। विश्व समुदाय को आतंकित कर समझौते पर मजबूर करने के लिए 70 और 80 के दशकों में फ़िलस्तीनी आतंकवादी संगठनों ने जानी-मानी हस्तियों का अपहरण करने, खिलाड़ियों और बड़े नेताओं की हत्या करने और विमानों का अपचालन करने और उन्हें बमों से उड़ा देने की रणनीति अपनाई। लेकिन वह भी नाकाम रही। ऊपर से फ़िलस्तीनियों पर आतंकवाद का ठप्पा और लग गया।
4. हमास, इस्लामी जिहाद और हेज़बोल्लाह जैसे आतंकी संगठनों की छापामार और आतंकी लड़ाई का मौजूदा दौर इस लड़ाई का चौथा दौर है। इन संगठनों ने इज़राइल के भीतर या आस-पास रहकर आतंकी और छापामार हमलों के द्वारा सरकारों को समझौते के लिए विवश करने की रणनीति अपनाई है। सेना की मार से बचने के लिए वे शहरों, अस्पतालों, स्कूलों और परोपकारी संस्थाओं में नागरिकों को ढाल बनाकर इज़राइली नागरिकों और सेना पर वार करते हैं। यह रणनीति कितनी कामयाब हो पाती है यह देखना बाक़ी है।
5. फ़िलस्तीनी संगठनों की सबसे बड़ी विडंबना यह है कि संयुक्त राष्ट्र और इज़राइल से उन्हें अब वही सब माँगना पड़ रहा है जिसको वे 1948 से लेकर 1993 के ओस्लो समझौते तक 45 साल ठुकराते रहे और इज़राइल को मिटाने की कोशिशें करते रहे। लेकिन 75 सालों में बहुत कुछ बदल चुका है। जो 43% ज़मीन फ़िलस्तीनियों को मिली थी उसमें से 20% को इज़राइल ने 1948 में ही जीत लिया था और उसपर इज़राइलियों को बसे हुए अब 75 साल बीत चुके हैं।
11. इज़राइली-फ़िलस्तीनी संकट पर इज़राइली दृष्टिकोण
1. इज़राइली दृष्टिकोण से देखें तो पिछले सौ साल की घटनाएँ उसके इस संदेह को पक्का करती हैं कि एक ज़मीन दो देश के सिद्धांत को मानते हुए पश्चिमी किनारे और गाज़ा पट्टी का पूरा नियंत्रण देना विनाश को न्योता देना है। पश्चिमी किनारे की सीमा जोर्डन नदी और मृत सागर से लगती है जो पानी का एक प्रमुख स्रोत है। नदी के पार जोर्डन है जहाँ फ़िलस्तीनी शरणार्थियों की बड़ी आबादी है। ऐसी सीमा को पूरी तरह फ़िलस्तीन को सौंपने से हथियारों की बाढ़ और आतंकवाद की लहर आ सकती है जिसका निशाना इज़राइल ही बनेगा!
2. इज़राइली मानते हैं कि फ़िलस्तीनियों ने संयुक्त राष्ट्र प्रस्ताव 181 को ठुकराते हुए अरब देशों के साथ मिलकर इज़राइल पर हमला किया इसमें उनकी क्या ग़लती है? उन्होंने 1949, 1956. 1967, 1973 और 1993 में जब-जब अरबों और फ़िलस्तीनियों के साथ युद्धविराम और शांति समझौते किए तब-तब उन्होंने समझौते तोड़े हैं।
3. सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या फ़िलस्तीनी और उनके सारे अरब पड़ोसी पिछले सौ सालों की दुश्मनी को भुला कर शांति से रहने को तैयार हैं? मिस्र, जोर्डन और संयुक्त अरब अमीरात जैसे अरब देशों की सरकारों ने भले ही इज़राइल को मान्यता दे दी हो। पर आज भी सीरिया और ईरान जैसे देश और हेज़बोल्लाह, हमास, इस्लामी जिहाद और इस्लामी ब्रदरहुड जैसे आतंकी गुट इज़राइल को मिटाना अपना मज़हब मानते हैं।
4. जिन अरब सरकारों ने इज़राइल को मान्यता दी है उनके लोग कहाँ तक इज़राइल से दुश्मनी भुलाने को तैयार हैं यह भी अहम सवाल है। पिछले 75 सालों से लगातार चल रहे तनाव के बावजूद इज़राइल में 14 लाख अरब मुस्लिम सुरक्षा से रहते हैं। पड़ोसी अरब देशों में कितने यहूदी हैं? इन प्रश्नों का संतोषजनक हल निकाले बिना इज़राइल की सुरक्षा सुनिश्चित नहीं हो सकती।
ऊपर से इज़राइल अधिकृत ज़मीन पर भी इज़राइली सरकारों ने 1967 के बाद से करीब सात लाख यहूदी बसा लिए हैं। दिखावे के लिए समारा की चार बस्तियाँ हटवा देना और गाज़ा पट्टी फ़िलस्तीनियों को सौंप देना अलग बात है। लेकिन पश्चिमी किनारे और येरुशलम से इतने सारे बसे-बसाए लोगों को हटाकर फ़िलस्तीनियों को अपना देश बसाने देना कितना व्यावहारिक और संभव होगा यह बहुत बड़ी चुनौती है। बस्तियों में बसे सात लाख यहूदी इज़राइल की कुल आबादी के छह प्रतिशत से ऊपर हैं। इतना बड़ा वोट बैंक भारत में सरकारें बना-बिगाड़ सकता है। इज़राइल में तो राजनीति भारत से भी ख़राब है।
यह लड़ाई विश्व के सामने भी सुरक्षा का एक बहुत बड़ा सवाल खड़ा करती है। हमास ने गज़ा में और हेज़बोल्लाह ने लबनान में घनी बस्तियों में छिप कर जिस आतंकवादी छापामार लड़ाई का मॉडल सामने रखा है वह विश्व भर के देशों और उनके सुरक्षा बलों के लिए सिरदर्द साबित हो सकता है। छापामार घात लगाकर आतंकी हमले कर सकते हैं पर सेना को उनकी धरपकड़ या उनपर प्रहार करने के लिए मानवाधिकारों और नागरिकों के जानमाल की रक्षा जैसी कड़ी सीमाओं में रहकर काम करना पड़ता है।
इज़राइल वही नहीं कर रहा है जिसकी वजह से उसकी विश्वव्यापी निंदा हो रही है। यह रणनीति आतंकी विचारधारा वालों को नागरिकों का वह अमोघ कवच देती है जिसकी आड़ में वे बड़ी से बड़ी सेना को घुटनों पर ला सकते हैं। विश्व समुदाय को इस ख़तरे से निपटने के लिए कुछ नए उपाय सोचने होंगे। आतंकवाद की एक सर्वमान्य परिभाषा तय करना उसका पहला चरण है जिसकी माँग भारत दशकों से करता आ रहा है। परिभाषा तय होने पर भी घनी आबादी में छिपे आतंकियों को कैसे पकड़ा जाए और कैसे उनके तंत्र का उन्मूलन किया जाए इसका भी कोई सर्वमान्य पैमाना तय करना होगा।
शिवकांत की फेसबुक वॉल से साभार
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