Friday, June 21, 2024
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रेखा श्रीवास्तव की दो लघुकथाएँ

1 – करनी और कथनी
डॉक्टर साहब कैंसर की आखिरी अवस्था से गुजर रहे थे । उन्हें पता था कि अब अधिक नहीं जीना है सो बेटे से कहा, ” अब घर ले चलो, बच्चों के साथ आखिरी समय रहना चाहता हूँ ।”
बेटा उन्हें घर ले आया । वह खुद कुछ भी करने में असमर्थ थे । बहू ही उनको नहलाने धुलाने से लेकर सारे काम करती । बेटे को अब अपना काम भी देखना था ।
दोपहर में जब बहू उनके कपड़े बदलने लगी, तभी ताई सास आ गई और बहू को धूप में उनकी मालिश करते देखा – “अरे राम राम कैसा कलयुग आ गया है , कहाँ बहुएं मुँह ढक कर रहती थीं और कहाँ ससुर को तेल लगा रही हो ? अरे भगवान तुम्हें नरक में जगह न देगा और उनकी करनी क्यों बिगाड़ रही हो?”
“भाभी, ये आप  क्या कह रहीं है ? भाईसाहब की बीमारी में उनके लिए नर्स मैंने ही लगवाई थी । आपको तो छूत की बीमारी लगने का डर था । तब किसकी करनी बन बिगड़ रही थी।”
“……..”
“आप से नहीं देखा जाता है तो जा सकती हैं क्योंकि जब अस्पताल में  नर्स ये काम करती है, तब वह भी तो किसी की बहू और बेटी होती है तब किसकी करनी बिगड़ती है? यह तो मेरी अपनी बहू है ।”
ताई जी सकपका गयीं और अगले बग़लें झाँकने लगीं।
2 – अपने हिस्से का दुःख      
रेड लाइट पर गाड़ियाँ खड़ी थीं  कि शमिता की नजर बगल वाली गाड़ी पर चली गई और फिर दोनों की नज़रें एक साथ टकराईं। एक गाड़ी में कुछ बड़े बच्चे को लेकर महिला बैठी थी और दूसरी गाड़ी में एक बच्चे को लिए पुरुष।  
तभी ग्रीनलाइट हुई और दोनों ने अपनी-अपनी गाड़ी आगे बढ़ा दी 2 घंटे बाद शमिता के पास एक फोन आया – “क्या हम आज शाम साथ में कॉफी पी सकते हैं?”
क्यों अभी भी कुछ शेष है?” शमिता ने झुँझलाकर कहा।
हाँ कुछ बातें करनी हैं, जो आज तुम्हें देखकर करने का मन कर आया।आशीष ने संयत स्वर में कहा।
कुछ खास बात?” शमिता ने जानना चाहा।
आशीष का 5 साल बाद इस तरह बात करना उसकी कुछ समझ नहीं आया, पर पता नहीं क्यों उस बच्चे का उसके साथ होना एक प्रश्न चिह्न तो खड़ा करता ही है।  लेकिन क्या? यह वह ना समझ सकी और फिर वह अपने अतीत में ही  डूबती चली गई विवेक के आने के करीब 1 साल बाद उसको पता चला कि विवेक स्पेशल चाइल्ड है। बहुत मेहनत से खोज कर उसने ऐसे बच्चों के सेंटर के बारे में पता किया और उसमें उसको भेजने की सोची। फिर वहाँ से डे केयर में रखना शुरू कर दिया। बैंक से निकलने के बाद विवेक को लेकर घर जाती। लेकिन कोई सुधार नहीं हुआ और शमिता को आशीष से ज्यादा विवेक को समय देना पड़ता था। एक और साल गुजरा कि आशीष ने दो टूक कह दिया – “मैं 1 साल का समय दे सकता हूँ चाहे तुम छुट्टी लो या फिर कुछ भी करो उसको ठीक होना चाहिए नहीं तो मैं इस मैरिड लाइफ को और नहीं झेल पाऊँगा।” 
और फिर वही हुआ उन्होंने सहमति से तलाक ले लिया। सोचते सोचते उसके आँसू गालों पर लुढक गये। बीच में विवेक ने उठकर उसके आँसू पोंछे और बोला – ” माँ क्या हुआ
कुछ नहीं।कह कर उसने उसको अपने से चिपका लिया। यादें पीछा कब छोड़ती हैं, यादों के भँवर में डूबती तैरती हुई वह कब सो गई पता ही नहीं चला।  
वीकेंड पर समय निश्चित किया गया कि वे कॉफी हाउस में मिल सकते हैं उसका बेटा 8 साल की हो चुका था और आशीष का बेटा 3 साल का था। 
आशीष पहले से ही कॉफी हाउस में आकर बैठा था, शमिता जैसे ही आई आशीष ने उठ कर वैलकम किया।  
कहिए क्या बात है?” शमिता ने बैठते हुए सवाल किया।
क्या  हाल पूछा चाल और  तुमने तो सीधे से सवाल दाग दिया।आशीष ने विनम्र होते हुए कहा।
क्या हमारे बीच ऐसा कुछ शेष है?” शमिता के स्वर में तल्खी थी। 
यार, मैं चाहता था कि हम एक दूसरे के जीवन में झाँके।आशीष सीधे बात पर गया।
शमिता ने कहा – “वैसा ही जैसा पहले था कुछ बदलने जैसा है ही नहीं।” 
लेकिन मेरे कहने का या इस सवाल का मतलब है कि तुम विवेक को कैसे पढ़ा लिखा रही हो? वह तुम्हारे पीछे कहाँ रहता है और तुम्हारे काम के दौरान कहाँ रहता है?” आशीष ने स्पष्ट कर दिया। 
 “मैं नहीं समझती इन बातों का कोई मतलब है, यह बताओ तुमने मुझको बुलाया क्यों?”
क्या हम फिर से एक साथ नहीं रह सकते हैं?” 
क्या कहा? विवेक अभी वैसा ही है।
जानता हूँ, लेकिन जब से हम अलग हुए हैं, उसके बाद की कहानी बहुत अलग है। मैंने अपनी कलीग से शादी कर ली हमारी लाइफ सही चल रही थी, इस बीच दिविक का हमारे जीवन में आना हुआ लेकिन होने से 1 साल बाद पता चला कि वह भीस्पेशल चाइल्डहै और उसके बाद उसने मेरा साथ छोड़ दिया यह कहकर कि तुम्हारे अंदर ही कुछ तो कमी है, पहला बच्चा भी स्पेशल चाइल्ड हुआ और दूसरा भी, जबकि माँएँ अलगअलग है। मैं ऐसे नहीं रह सकती और तब से दिविक को मेरे पास छोड़ कर चली गई।कहकर आशीष ने गहरी साँस ली।
मुझसे क्या चाहते हैं?” शमिता ने जानना चाहा।
मैंने तुमसे यही कहा था और शायद उसी का दंड मुझको मिला है।. क्या ऐसा नहीं हो सकता है कि हम लोग से एक साथ रहने लगें। उससे दोनों बच्चे एक साथ रहेंगे तो उन्हें अच्छी कंपनी मिलेगी तो अच्छी तरह डेवलपमेंट हो सकेगा।” 
नो, नेवर तुमने सोच कैसे लिया कि मैं इस बात के लिए राजी हो जाऊँगी हमें अपने अपने हिस्से का जीवन जीना है, फिर मैं तुम्हारा दुख और तुम मेरे दुख क्यों जिओगेतुमने यही कहा था ना।शमिता ने अपना पर्स उठाया और तेजी से बाहर निकल गई।

रेखा श्रीवास्तव
रेखा श्रीवास्तव
संपर्क - rekhasriva@gmail.com
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5 टिप्पणी

  1. रेखा जी!आपकी पहली लघुकथा करनी और कथनी बहुत अच्छी लगी। यह सच है कि ससुर हैं तो क्या हुआ? अगर वे बीमार हैं मरणासन्न हैं तो एक बेटी की तरह उनकी देखभाल बहू को करनी ही चाहिये। नर्स की तो बात ही अलग है। पुरानी रूढ़ियों को इसी तरह से तोड़ा जा सकता है।यह एक प्रेरक लघु कथा है।

    “अपने हिस्से का दुख” इसे हम तो लघुकथा नहीं कहेंगे ।लघु कहानी कहा जा सकता है।
    लघुकथा एक निश्चित अवधि की होती है।
    इस में संकेत में बात की जाती है।लघुकथा का कथानक बहुत सूक्ष्म होता है।यह शरीर में रीढ़ की तरह महत्वपूर्ण होता है। अभिव्यक्ति की तीव्रता और मर्मस्पर्शिता इसकी मारक क्षमता को सिद्ध करते हैं।यह कुछ समय की कथा होती है
    पहली लघुकथा में कुछ ही समय में संवाद खत्म हो गए और एक बेहतर संदेश दिया गया।
    लघुकथा इसे भी बनाया जा सकता है लेकिन इसमें समय खिंच गया है।और यह कुछ ज्यादा ही लंबी हो गई। लघुकथा सिर्फ वर्तमान की बात करती है जिसका प्रभाव दीर्घकालिक रहता है आज याने आज ,अभी याने अभी।
    फिर भी आजकल लघु कथा के नाम पर इस तरह से कई लोग लिख भी रहे हैं, इसलिए यह सिर्फ हमारी सलाह है बाध्यता नहीं।
    वैसे संदेश भी इसमें महत्वपूर्ण है।
    पता नहीं बच्चे के इस तरह के किसी दोष के लिये स्त्री को ही दोषी क्यों माना जाता है।
    वैसे बेहतर संदेश दिया। ‘जैसे को तैसा’ मिला टाइप।

  2. कथनी और करनी ,लघुकथा एक संकीर्ण सोच को उजागर करती है।जबकि बहू हो या बेटी ,जब वो एक अशक्त ससुर की सुश्रुषा में लगी है ,ऐसी भावना को सम्मान देना चाहिए।
    अपने हिस्से का दुख ,लघुकथा एक पुरुष की मौकापरस्ती को दर्शाती , यथार्थपरक लघुकथा है

  3. नीलिमा जी आपने मेरी लघुकथा और दूसरी लघु कथा को संज्ञान में लिया और उसका सही विश्लेषण किया। आपने जो कहा वह सत्य है। दिशानिर्देश के लिए आभार

  4. कथनी और करनी लघुकथा समाज को उचित दिशा देने के उद्देश्य को पूरा करती है।
    अपने हिस्सर का दुख छुद्र मानसिकता व इसजव्र के न्याय को रेखांकित करती अच्छी लघु कथा है।थोड़े ही प्रयत्न से इसे लघुकथा के कलेवर में ढाला जा सकता है।सादर प्रणाम दी।

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