Sunday, August 9, 2026
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उनकी अनुपस्थिति भी एक पात्र बन सकती है — जसवीर राणा

पंजाबी कथाकार जसवीर राणा के साथ हरकीरत हीर की बातचीत

‘70% प्रेम कथा’ जसवीर राणा का उपन्यास है। इस उपन्यास को भाषा विभाग, पंजाब द्वारा ‘नानक सिंह पुरस्कार–2025’ से सम्मानित किया गया है। इसे पढ़कर यह एहसास होता है कि कुछ उपन्यास केवल पढ़े नहीं जाते, वे धीरे-धीरे पाठक के भीतर बस जाते हैं। यह उन रचनाओं में से है जो समाप्त होने के बाद भी समाप्त नहीं होतीं। इसके पात्र, दृश्य, मौन, संवाद और प्रतीक लंबे समय तक पाठक के भीतर गूँजते रहते हैं।

इस कृति को पढ़ते समय सबसे पहले जिस बात ने मेरा ध्यान खींचा, वह यह थी कि इसमें संवाद जीवित लोगों से अधिक बिछड़ चुके लोगों से होते हैं। वे केवल स्मृतियाँ बनकर नहीं रहते, बल्कि वर्तमान में चलते-फिरते, बातें करते पात्र बन जाते हैं। उनकी अनुपस्थिति भी एक जीवंत पात्र की तरह साँस लेने लगती है।

इस रचना को केवल माता-पिता के बिछड़ने का वृत्तांत कहना इसके साथ न्याय नहीं होगा। यह एक बेटे के भीतर अनाथ हो जाने की कहानी भी है। माँ और पिता भले ही शारीरिक रूप से उपस्थित नहीं हैं, लेकिन वे हर क्षण उसके भीतर जीवित हैं। उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार यह महसूस होता है कि यहाँ लेखन केवल एक साहित्यिक क्रिया नहीं रह जाता, बल्कि बिछड़े हुए माता-पिता से दोबारा संवाद करने का माध्यम बन जाता है। कई स्थानों पर ऐसा लगता है कि लेखक उन्हें विदा नहीं कर रहा, बल्कि हमेशा के लिए अपने भीतर बसाता जा रहा है।

उपन्यास की एक और असाधारण विशेषता यह है कि लेखक अपने माता-पिता को केवल याद नहीं करता, बल्कि उनकी आँखों से दुनिया को देखता है। एक क्षण के लिए ऐसा लगता है कि उपन्यासकार अपने पात्रों को नहीं लिख रहा, बल्कि वे पात्र उसे लिख रहे हैं।

उपन्यास में पानी, राख, मिट्टी, पीपल, श्मशान घाट, अस्थियाँ, लाल धागा और दीपक केवल वस्तुएँ नहीं रह जातीं। ये मनुष्य की स्मृतियों, शोक और अस्तित्व के प्रतीक बन जाते हैं। उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार यह लगता है कि मनुष्य के चले जाने के बाद यही वस्तुएँ उसकी जीवनी लिखती हैं।

पिता की छाती का चिता में न जलने वाला प्रसंग और भोग के समय पुत्र का बोलना केवल घटनाएँ नहीं हैं; ये भीतर से कुछ टूट जाने के चरम क्षण हैं। छाती के न जलने वाले प्रसंग को पढ़ते समय यह महसूस हुआ कि यहाँ केवल एक शरीर नहीं जल रहा, बल्कि एक पुत्र की अंतिम सुरक्षा भी अग्नि के हवाले हो रही है। उस क्षण पुत्र होना लेखक होने से कहीं बड़ी जिम्मेदारी बन जाता है।

इस उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बेमिसाल ईमानदारी है। लेखक अपने जीवन की वे बातें भी बिना किसी झिझक के लिखता है जिन्हें अधिकांश लेखक छिपा लेते हैं। उपन्यास में मृत्यु से जुड़ी पंजाबी सिख परंपराओं का जो सूक्ष्म और विस्तृत चित्रण है, वह इसे एक सांस्कृतिक दस्तावेज का दर्जा देता है। फूल चुनने से लेकर अस्थियाँ एकत्र करने, पिहोवा की यात्रा, घर की रस्में, गेहूँ, बर्तन, पानी के छिड़काव से लेकर लाल धागे तक—लेखक ने उन सभी परंपराओं और अनुभवों को अत्यंत संवेदनशीलता और विस्तार के साथ दर्ज किया है।

…जिन्हें समय धीरे-धीरे भुलाता जा रहा है। उपन्यास पढ़ते हुए बार-बार यह भी महसूस होता है कि यहाँ रस्में केवल धार्मिक कर्मकांड बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि वे मनुष्य की मनःस्थिति को उद्घाटित करने का माध्यम बन जाती हैं।

मेरी दृष्टि में ‘70% प्रेम कथा’ की सबसे बड़ी सफलता इसी बात में है कि यह पाठक को प्रश्नों से भर देती है। ये वे प्रश्न नहीं हैं जो केवल लेखक से पूछे जाएँ; ये वे प्रश्न हैं जिन्हें पाठक स्वयं से पूछने लगता है। मेरे मन में उठे सभी प्रश्नों की जड़ भी इसी उपन्यास में है। वे कहीं बाहर से नहीं आए, बल्कि इस उपन्यास ने उन्हें जन्म दिया है। किसी भी महान रचना की पहचान यही होती है कि वह पाठक को उत्तर नहीं देती, बल्कि उसके भीतर ऐसे प्रश्न पैदा कर देती है जो पुस्तक बंद हो जाने के बाद भी लंबे समय तक उसके साथ जीवित रहते हैं। निस्संदेह यह एक असाधारण कृति है। इसे पढ़ने के बाद मैं जिन प्रश्नों से भर गई हूँ, उनके उत्तर जानने के लिए जसवीर राणा से यह संवाद प्रस्तुत है…

प्रश्न– आपके उपन्यास ‘70% प्रेम कथा’ में सबसे अधिक संवाद जीवित लोगों से नहीं, बल्कि बिछुड़ चुके लोगों से हैं। क्या आपके लिए किसी की अनुपस्थिति भी एक पात्र हो सकती है?

उत्तर– हीर जी! आपने बहुत सुंदर प्रश्न किया है। जब कोई व्यक्ति मर जाता है, तो अधिकांश लोगों के लिए वह अनुपस्थित हो जाता है। लेकिन मैं उन लोगों में हूँ जिनके लिए मृत्यु के बाद भी इंसान उपस्थित रहता है। यदि मैं अपने बाऊजी (पिता) की बात करूँ, तो वे 17 अप्रैल 2015 को चले गए थे। मेरी माँ 18 नवंबर 2020 को इस दुनिया से विदा हुईं। दोनों के जाने के बाद मैं भरी-पूरी दुनिया के बीच भी अकेला रह गया। परिवार है, पत्नी है, बच्चे हैं, दोस्त हैं, रिश्तेदार हैं। साहित्य की दुनिया है। हर दिन स्कूल जाता हूँ, बच्चों और अध्यापकों के बीच रहता हूँ। अपनी-अपनी जगह सब कुछ ठीक है, लेकिन कोई भी मेरे सूने दिल के दरवाज़े पर दस्तक नहीं दे पाया।

आज, 29 जून 2026 को, जब हम यह बातचीत कर रहे हैं, तब भी मेरे भीतर एक गहरा खालीपन है। इस खालीपन की उम्र चार दशकों से भी अधिक है। इस दौरान रिश्तेदारी में न जाने कितने सुंदर रिश्ते एक-एक करके विदा होते रहे, लेकिन माँ और बाजी के जाने के बाद मैं फिर कभी पहले जैसा नहीं हो सका। उन्होंने अपना पूरा जीवन जिन जगहों पर बिताया, जहाँ-जहाँ आते-जाते रहे, काम करते रहे, वे वर्ष, वे स्थान और वे दिन आज भी मेरे भीतर सुरक्षित हैं। कभी खेतों में उन्हें खोजता हूँ, कभी घर के भीतर। उनकी सँभालकर रखी हुई चीज़ों को देखता हूँ। एक भी दिन ऐसा नहीं गुजरता जब मैं उनकी उपस्थिति महसूस न करता हूँ।

अधिकांश लोग ऐसी स्थिति में दूसरों का सहारा खोजते हैं, लेकिन मैं एकांत चाहता हूँ। बचपन से ही मेरे भीतर जैसे कोई साधु-फ़कीर रहता है। वही मुझे उजाड़, वीरान और श्मशान जैसी जगहों की ओर ले जाता रहता है। अपनी आत्मा के उस साथी के साथ भटकते हुए मैं अक्सर माँ और बाजी से बातें करता रहता हूँ। वे मेरी हर बात का उत्तर देते हैं। वे मेरे सपनों में आते-जाते रहते हैं। जब भी किसी समारोह में मुझे कोई लोई या सम्मान-चिह्न मिलता है, तो घर पहुँचकर सबसे पहले उसे माँ और बाजी की तस्वीरों से लगाता हूँ। उसके बाद ही घर के बाकी सदस्यों को दिखाता हूँ।

जिस दिन, 1 नवंबर 2025 को, भाषा विभाग, पंजाब ने ‘70% प्रेम कथा’ को सर्वश्रेष्ठ उपन्यास के लिए ‘नानक सिंह पुरस्कार’ से सम्मानित किया, उस दिन मेरे साथ केवल पत्नी और बच्चे ही पटियाला नहीं गए थे; मेरी स्मृतियों में बैठे माँ और बाजी भी मेरे साथ थे…बाऊजी भी मेरे साथ थे। जिस क्षण मंच संचालक ने मेरा नाम पुकारा और मैं अपनी कुर्सी से उठकर मंच की ओर चला, उस समय माँ और बाजी भी परछाइयों की तरह मेरे साथ चल रहे थे। पंडाल में उपस्थित लोग जसवीर राणा के बारे में कही जा रही बातें सुन रहे थे, लेकिन मैं अपने कदमों के साथ अपने पुरखों की पदचाप सुन रहा था।

मंच से पुरस्कार प्राप्त करके जब मैं नीचे उतरा, वे भी मेरे साथ ही उतरे। मुझे कुर्सी पर बैठाकर वे चुपचाप विदा हो गए। उस दिन उनकी उपस्थिति आज भी मेरे रोम-रोम में बसी हुई है। मेरी स्मृतियों के विद्यालय में वे एक दिन भी अनुपस्थित नहीं रहे। हर दिन उनकी हाज़िरी लगती है। यही कारण है कि वे इस उपन्यास के मुख्य पात्र बनकर दर्ज हुए हैं।

प्रश्न–2. क्या यह उपन्यास केवल माता-पिता के बिछोह की कहानी है, या फिर एक पुत्र के भीतर घटित हुए अनाथ हो जाने की कथा भी है?

उत्तर— ‘70% प्रेम कथा’ मेरा दूसरा उपन्यास है। यह मेरी आत्मकथा के दो पन्नों पर लिखा गया है। पहला पन्ना मेरी माँ है, दूसरा पन्ना मेरे बाऊजी (पिता)। और मैं उन दोनों के बीच हूँ। ये चार पंक्तियाँ मैंने उपन्यास की भूमिका में लिखी हैं और मेरे लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण हैं। उनमें अंतिम पंक्ति है— “मैं उन दोनों के बीच हूँ।”

इसका अर्थ है कि माँ और बाऊजी जीवन के दो छोर थे। जब दोनों छोर टूट जाते हैं, तो उनके बीच की वस्तु का भी कोई अस्तित्व नहीं बचता। वह भरभराकर गिर पड़ती है। जब मैं गिरा था, उस गिरने की आवाज़ आज भी मेरे भीतर गूँजती है। वह माँ और बाजी के बिछड़ने की गूँज है। जो भी उसे सुनता है, वह गहरे मौन में उतर जाता है। और जब वह मौन टूटता है, तब बिछोह तलवार की धार की तरह चमक उठता है।

मैंने उस धार की चमक को अपनी आत्मा की गहराइयों तक महसूस किया है। इसलिए यह उपन्यास केवल माँ और बाजी के बिछोह की कथा नहीं, बल्कि एक पुत्र के भीतर अनाथ हो जाने की कहानी भी है। इस पुस्तक को पढ़ते समय एक हाथ दिल पर रखना पड़ता है और दूसरे हाथ से आँखों के आँसू पोंछने पड़ते हैं। आपने शायद यह भी महसूस किया होगा कि इस उपन्यास के हर अध्याय में एक बच्चा रोता हुआ सुनाई देता है। वह बच्चा मैं ही हूँ।

प्रश्न– आपको सबसे अधिक किसने तोड़ा—माता-पिता के चले जाने ने या उसके बाद छा गए मौन ने?

उत्तर— एक पुरानी हिंदी फ़िल्म का गीत है—”किस-किस का नाम लूँ मैं, मुझे हर किसी ने मारा…गिला मौत से नहीं है मुझे, ज़िंदगी ने मारा…।”

यह गीत मेरी स्थिति का सबसे सटीक बयान है। माँ और बाऊजी के जाने के बाद मैं बुरी तरह टूट गया था। घर, परिवार और बच्चों के लिए जब मैंने स्वयं को फिर से संभाला, तब एक घातक मौन ने मेरा पीछा करना शुरू कर दिया। वह मृत्यु के बाद उतर आया मौन था, और आज भी मेरा पीछा कर रहा है। जब किसी की माँ मरती है, मुझे लगता है जैसे मेरी माँ फिर मर गई हो। जब किसी का पिता मरता है, तो मुझे महसूस होता है कि बाजी एक बार फिर चले गए। मृत्यु का यही एहसास उस मौन का रूप है, जो मुझे हर दिन भीतर से तोड़ता रहता है। इस टूटन से बचने के लिए मैंने अपने अकेलेपन को एकांत में बदल दिया और उसी से सृजन का मार्ग खोज लिया। ‘70% प्रेम कथा’ में मैंने माँ-बाजी के जीवन की कहानी के साथ-साथ अपने बिखरे हुए टुकड़ों को भी समेटने का प्रयास किया है। उनके चले जाने के बाद छा गए मौन से संवाद करने का यह मेरा अपना एक तरीका है।

प्रश्न– क्या आपको कभी ऐसा लगा कि यह उपन्यास लिखते-लिखते आप अपने माता-पिता को विदा नहीं कर रहे थे, बल्कि उन्हें फिर से अपने पास बुलाने की कोशिश कर रहे थे?

उत्तर— हीर जी! आपके इस प्रश्न का उत्तर देते हुए मुझे जसविंदर का एक शेर याद आ रहा है— “तेरी जुदाई के बाद मैं सँभलता भी तो कैसे, हिलती थी यह ज़मीन भी हिलते रूमाल के साथ…।”

जब मैं प्राथमिक विद्यालय में पढ़ता था, तब मेरे बाल बहुत घने और लंबे थे। माँ मेरे सिर पर जूड़ा बनाकर उस पर सफ़ेद रूमाल बाँध देती थी। उसके जाने के बाद मुझे ऐसा महसूस हुआ, जैसे मेरे सिर से वह रूमाल उतरकर उड़ गया हो। मैं आज भी अपने मन में उसे पुकारता रहता हूँ— “माँ… मेरे सिर पर फिर से रूमाल बाँध दो।” लेकिन वह मेरी आवाज़ नहीं सुन पाती, क्योंकि वह बाजी के पास चली गई है।

एक बार बाजी जब फौज में ड्यूटी पर पठानकोट जा रहे थे, तो वे मुझे अपने साथ लुधियाना ले गए। वहाँ से उन्होंने मेरे लिए सरसों के फूल जैसा पीले रंग का एक कोट खरीदा, जिस पर कोका-कोला रंग के हिरण बने हुए थे। फिर उन्होंने मुझे गाँव जाने वाली बस में बैठा दिया। बाजी के जाने के बाद वे चरते हुए हिरण भी जैसे उड़ गए। समय के साथ वह कोट छोटा हो गया, पर उसकी स्मृति कभी छोटी नहीं हुई। आज भी मैं मन ही मन पुकारता हूँ— “बाजी… मेरे लिए एक नया कोट ले आओ।”

मुझे पता है कि मेरी आवाज़ उन तक नहीं पहुँचती। लेकिन यह केवल सांसारिक और शारीरिक दूरी का प्रश्न नहीं है। मेरी समस्या आध्यात्मिक और मनोवैज्ञानिक है। मैंने उन्हें कभी विदा नहीं किया। मैं उन्हें आज भी अपने सामने उपस्थित मानकर उनसे बातें करता हूँ। उनके साथ अपने रिश्ते को हर दिन निभाता हूँ। यही उन्हें अपने पास फिर से बुलाने का मेरा तरीका है। मैं इसी तरह जीता हूँ। इस उपन्यास का हर अध्याय ऐसी ही युक्तियों से भरा हुआ है। यदि मैं ऐसा न करता, तो भीतर से बिल्कुल खाली हो जाता। इस उपन्यास का हर अध्याय लिखकर मैंने अपने भीतर कुछ भर लिया है। केवल मैंने ही नहीं, इसे पढ़ने वाले अनेक पाठकों ने भी कहा कि यह उपन्यास एक तरह की चिकित्सात्मक प्रक्रिया (थेरेपी) है।

प्रश्न– इस उपन्यास को पढ़ते हुए कई जगह ऐसा लगता है कि आप अपने माता-पिता को केवल याद नहीं कर रहे, बल्कि उनके भीतर उतरकर दुनिया को देख रहे हैं। आखिर लेखक और पुत्र—इन दोनों में किसने किसे लिखा?

उत्तर— माँ और बाऊजी की मृत्यु के बीच छह वर्षों का अंतर था। मैंने माँ के साथ बावन वर्ष और बाजी के साथ सैंतालीस वर्ष बिताए। मेरी रगों में उनका रक्त बहता था। उन्हीं की उँगली पकड़कर मैंने चलना सीखा। उन्हीं ने मेरी तोतली ज़बान को स्पष्ट बोलना सिखाया। मैं उनके ऋण से उऋण होना चाहता था। लेकिन भीतर से एक आवाज़ आती रही—”यह तुम्हारा भ्रम है, बेटे… कोई भी माँ-बाप का ऋण नहीं चुका सकता।”

हर वर्ष श्राद्ध वाले दिन उनकी आत्मा जैसे मेरा हाथ पकड़ लेती। मैं कागज़ और कलम उठा लेता। कुछ पंक्तियाँ लिखता, फिर काट देता। कभी माँ का शब्द-चित्र बनाने की कोशिश करता, कभी बाजी का। लेकिन हर बार खाली हाथ उठ खड़ा होता। मैंने अनेक पुस्तकें लिखीं, पर माँ-बाऊजी के बारे में कुछ भी नहीं लिख पाया। मैं स्वयं से पूछता— “आख़िर क्यों नहीं लिख पा रहा?”

एक दिन मेरे भीतर का लेखक और पुत्र आमने-सामने खड़े हो गए। उसी दिन मुझे समझ आया कि मैं क्यों नहीं लिख पा रहा था। तब मुझे एहसास हुआ कि वे इतने विराट व्यक्तित्व हैं कि उन्हें कुछ शब्दों के चित्र में बाँधा नहीं जा सकता। उनके साथ बिताया गया पूरा जीवन किसी बड़े साहित्यिक आकार की माँग करता था। तभी मेरे भीतर के पुत्र ने लेखक के कान में धीरे से कहा—

“तुम उनके बारे में एक उपन्यास लिखो।”

और उसी क्षण मैंने यह उपन्यास लिखना शुरू कर दिया। इस उपन्यास की सृजन-प्रक्रिया दुधारी थी…इस उपन्यास में पुत्र और लेखक दोनों आमने-सामने खड़े हैं। एक के हाथ में जीवन है, दूसरे के हाथ में लेखन की कला। दोनों बारी-बारी से एक-दूसरे को लिखते हैं। यही कारण है कि इस उपन्यास में पुत्र और लेखक के बीच हवा जितनी भी दूरी नहीं है।

इस वृत्तांत को दूर खड़े होकर लिखना संभव नहीं था। इसकी सबसे बड़ी शर्त निकटता थी। मैंने इसे माँ और बाजी के भीतर बैठकर लिखा है। यह अपने पात्रों के भीतर उतरकर उनकी आँखों से दुनिया को देखने का कथा-दृष्टिकोण है। ऐसी दृष्टि रचने के लिए मृत्यु की सीमा पार कर चुके लोगों से संवाद करना पड़ता है। उनकी आँखों से उनकी दुनिया को देखना पड़ता है। यदि मैं इस उपन्यास में ‘जादुई यथार्थ’ की सर्जना कर पाया हूँ, तो वह भी माँ और बाऊजी की कृपा है। मैं तो केवल एक माध्यम हूँ।

प्रश्न– श्मशान, अस्थियाँ, राख, पानी और मिट्टी—ये सब आपके उपन्यास में प्रतीक बन जाते हैं। क्या आपको कभी लगा कि मनुष्य के चले जाने के बाद यही चीज़ें उसकी जीवनी लिखने लगती हैं?

उत्तर— आपने बिल्कुल सही कहा, हीर जी। मनुष्य के चले जाने के बाद सचमुच यही चीज़ें उसकी जीवनी लिखने लगती हैं।  जब माँ चली गईं, तो मैंने उनका चश्मा, मोबाइल, पर्स, छड़ी, सूट, चुन्नी, चप्पलें और कागज़ों से भरा लिफ़ाफ़ा—सब कुछ संभालकर रख लिया। बाजी के जाने के बाद मेरे ससुराल वालों ने जो हरे रंग की मेहंदी वाली पगड़ी उनके सिर पर बाँधी थी, वह आज भी मैं अपने सिर पर बाँधता हूँ।

बाजी की फौज की वर्दी और सामान, मोटर वाला कमरा, उनका तख्तपोश, उनका चश्मा और उनकी दो पगड़ियाँ—आज भी वैसे ही सुरक्षित रखी हुई हैं। जिस श्मशान घाट में उनका अंतिम संस्कार हुआ था, वहाँ से गुजरते हुए मैं आज भी सिर झुका देता हूँ। दीपावली की रात मैं समाधियों पर दीप जलाकर आता हूँ। जिस खेत की मिट्टी में उनका पसीना गिरा था, उसे आज भी अपने माथे से लगाता हूँ। उनके नाम का स्मरण करके पानी पीता हूँ। मेरी चेतना में पातालपुरी का अस्थि-घाट आज भी बसा हुआ है। उसकी पुलिया से माँ और बाजी की राख अब भी जैसे झरती रहती है।

उपन्यास में ये सभी चीज़ें मिलकर ‘पंजाबियों के मृत्यु-दर्शन’ की रचना करती हैं। वास्तविक जीवन में भी यही वस्तुएँ मुझे माँ और बाजी की जीवित उपस्थिति का अनुभव कराती हैं। मृत्यु के बाद वे इन्हीं चीज़ों के माध्यम से मेरे साथ जीवित हैं। इन्हीं के सहारे मेरा हृदय धड़कता है, मेरी साँस चलती है। मैंने इन सब को उसी तरह सँभालकर रखा है, जैसे कभी माँ और बाजी रहते थे। मैं तो यहाँ तक सोचता हूँ कि ये वस्तुएँ नष्ट होने के बाद भी पूरी तरह नष्ट नहीं होतीं। वे हमारी स्मृतियों में अंकित हो जाती हैं—ठीक उसी तरह जैसे माँ और बाजी मेरे भीतर हमेशा के लिए अंकित हैं।

प्रश्न– आपके पिता की छाती के चिता में न जलने वाला प्रसंग अत्यंत मार्मिक है। क्या वह केवल एक देह का दृश्य था, या उस क्षण एक पुत्र के भीतर बची हुई अंतिम सुरक्षा भी जल रही थी?

उत्तर— जिस दिन बाजी का अंतिम संस्कार हुआ, उस दिन ऐसा लग रहा था मानो मैं स्वयं अग्नि पर चल रहा हूँ। उनकी देह चिता पर जल रही थी, लेकिन उनकी आत्मा मेरे भीतर थी। वह बार-बार मुझे श्मशान घाट आने के लिए पुकार रही थी। सब लोग मुझे रोक रहे थे, पर मैं नहीं रुका। मैं जगदीप के साथ कार में बैठकर श्मशान पहुँच गया।

वहाँ बाऊजी की चिता धधक रही थी। उनका सिर, पैर, हाथ, उँगलियाँ—सब कुछ जल चुका था। “शायद अभी कुछ बाकी हो…!” यही सोचकर मैं चिता के पास जाकर खड़ा हो गया।

मुझे देखते ही जीत का बारू ऊँची आवाज़ में बोला—”आ जा… आ जा… यह भी देख!”

उसकी आवाज़ किसी भूत की तरह भयावह लग रही थी। उसके हाथ में दाँत जैसी लंबी धार वाला गंडासा था, जिससे वह चिता को उलट-पुलट रहा था। उसके साथ पांडी ब्राह्मण भी था। दोनों को चिता की रखवाली के लिए वहीं छोड़ा गया था। हम उनके लिए चाय लेकर गए थे। “आओ… चाय पी लो।”

मैंने पांडी ब्राह्मण की ओर देखते हुए डोलची से गिलासों में चाय डालनी शुरू की। बारू ने चाय का गिलास उठाया और चिता के चारों ओर घूमने लगा। उसकी आँखों में भी मानो आग जल रही थी। जगदीप हाथ बाँधे खड़ा था। मैं शेड की धुएँ से काली पड़ चुकी छत की ओर देख रहा था।

बारू ने कहा—”ऊपर क्या देख रहा है? इधर देख… तेरे बाजी का बाकी शरीर तो जल गया था… लेकिन उनकी छाती नहीं जली। उसमें से पानी निकल रहा था। हमने बहुत तेल डाला… और लकड़ियाँ मँगवाकर रखीं… लेकिन फिर भी छाती नहीं जली।”

इतना कहकर वह गंडासा हाथ में लिए मेरे पास आ खड़ा हुआ। मैं भी उठकर खड़ा हो गया। उसने चिता की ओर देखा, फिर तिरछी नज़र से मेरी तरफ़ देखते हुए कहा—”जब छाती नहीं जली, तो हमने उसे चिता से बाहर निकाला। फिर इसी गंडासे से उसके छोटे-छोटे टुकड़े किए। उन्हें दोबारा आग में डाला। ऊपर और लकड़ियाँ रखीं। तब जाकर वह जली…।”

उसकी यह बात सुनकर मेरी चेतना जैसे सुन्न हो गई। उसी ने मेरे बाऊजी की छाती काटी थी। वह हमारे खेत का पड़ोसी था। खेत की मेड़ को लेकर उसका और बाजी का वर्षों से विवाद चलता रहता था। हर फसल के मौसम में दोनों के बीच कहासुनी हो जाती थी। कई बार बाजी ने उसे पीटा भी था। वह शारीरिक रूप से कमजोर था, जबकि बाजी बहुत मजबूत थे। जीते-जी वह बाऊजी का कुछ नहीं बिगाड़ सका। लेकिन मृत्यु के बाद उसने उनकी छाती को उसी तरह टुकड़ों में काट दिया, जैसे शायद वह उन्हें जीवित रहते काटना चाहता था। बारू की यह बात सुनकर मेरे भीतर उसके लिए एक गहरा भय पैदा हो गया।

बाजी मेरे सुरक्षा-कवच थे। उस चिता में केवल उनकी देह ही नहीं जली थी, बल्कि मेरी पूरी ज़िंदगी का सुरक्षा-कवच भी राख हो गया था। उनके जाने के बाद जब भी जीवन में कोई संकट आता है, मैं भीतर से सहम जाता हूँ…मैं चारों ओर देखता हूँ, पर कहीं भी कोई सुरक्षा-कवच दिखाई नहीं देता—कोई ऐसा नहीं जो बाजी की तरह ढाल बनकर मेरे सामने खड़ा हो जाए और कहे—

“डर मत, राणिया… मैं खड़ा हूँ। एक जाट अकेला ही बहुत होता है।”

प्रश्न– जब आपने अपने पिता के भोग के अवसर पर स्वयं उनके पक्ष में बोलने का निर्णय लिया, तो क्या उस दिन पहली बार आपको यह महसूस हुआ कि पुत्र होना, लेखक होने से कहीं बड़ी ज़िम्मेदारी है?

उत्तर— हीर जी! जिस दिन बाजी का भोग था, उसी दिन हवा के साथ उड़ती हुई एक बात हमारे घर तक पहुँची। यह बात मुझे पाठी सिंह ने सुनाई, हालाँकि उसने यह नहीं बताया कि यह किसने कही थी।

उसने बताया कि सुबह जब गुरुद्वारे से यह उद्घोषणा हुई— “आज दोपहर एक बजे गुरुद्वारा साहिब में गुरमुख प्यारे दर्शन सिंह जी की अंतिम अरदास होगी। परिवार की ओर से सभी संगत से अरदास में शामिल होने की विनती है।”

तो किसी व्यक्ति ने आपत्ति जताते हुए कहा—”तुमने उसे गुरमुख क्यों कहा? वह तो दाढ़ी कटवाता था… शराब भी पीता था…!”

पाठी के मुँह से यह बात सुनकर वह मेरे हृदय में उसी तरह चुभ गई, जैसे कभी शराब बाजी के जिगर में चुभती थी। मैं भीतर तक आहत हो गया। उसी क्षण मैंने तय कर लिया कि भोग के अवसर पर मैं स्वयं बोलूँगा। मेरे इस निर्णय के बाद घर में फुसफुसाहट शुरू हो गई। मेरी बुआ कहने लगीं—”नहीं, मेरे बेटे… अच्छा नहीं लगेगा। यदि बोलने का इतना ही शौक है तो कहीं और बोल लेना। आज तो किसी और को ही बोलने देना चाहिए।”

मुझे उनकी बात अच्छी नहीं लगी। मैंने देखा था कि ऐसे अवसरों पर कई नेता बोलने आते थे, जिन्हें दिवंगत व्यक्ति के बारे में कुछ भी पता नहीं होता था। वे हर भोग पर लगभग वही घिसी-पिटी बातें दोहरा देते थे। बस नाम बदल जाता था, श्रद्धांजलि वही रहती थी। मुझे मृत्यु के साथ जुड़ी यह औपचारिक और राजनीतिक भाषा कभी स्वीकार नहीं हुई।

मैं अपने बाऊजी के भोग पर “एक बेटे की भाषा” को सम्मान देना चाहता था—और मैंने वही किया। बाऊजी के सैनिक जीवन और सामाजिक जीवन से जुड़ी अनेक घटनाएँ मैंने श्रद्धांजलि के रूप में लोगों के साथ साझा कीं। वे घटनाएँ उनके भीतर बसे एक सुंदर, उदार और सच्चे इंसान की गवाही थीं। उन्हीं घटनाओं का विस्तार मैंने अपने उपन्यास में भी किया है।

भोग के बाद लोग कह रहे थे—”वाह! सचमुच दर्शन सिंह एक गुरमुख इंसान थे। उनके बेटे ने तो पूरी कहानी ही सामने रख दी। भोग पर इसी तरह बोलना चाहिए।”

सुबह जिस व्यक्ति ने पाठी से यह कहकर आपत्ति जताई थी कि उन्हें “गुरमुख” क्यों कहा गया, वही बाद में उनकी प्रशंसा कर रहा था। उसी दिन मुझे पहली बार गहराई से महसूस हुआ कि पुत्र होना, लेखक होने से कहीं बड़ी ज़िम्मेदारी है। और मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने एक सैनिक पिता के पुत्र होने की उस ज़िम्मेदारी को निभाने का प्रयास किया।

प्रश्न–. इस उपन्यास में आपने मृत्यु के बाद निभाई जाने वाली अनेक सूक्ष्म रस्मों का अत्यंत विस्तार से चित्रण किया है—जैसे फूल चुनना, अस्थियाँ एकत्र करना, घर में परना फेरना, घड़े के नीचे गेहूँ रखना, पानी का छिड़काव करना, गेहूँ से भरे तसले में पैसे रखकर माथा टेकना, यहाँ तक कि अस्थियों की पोटली से टपकते पानी तक। साहित्य प्रायः इन छोटे-छोटे दृश्यों की उपेक्षा कर देता है। क्या ये बातें केवल कथा का हिस्सा थीं, या आपने सचेत रूप से लुप्त होते जा रहे सांस्कृतिक जीवन को भी संरक्षित करना चाहा? अथवा क्या आपको लगता है कि किसी समाज को उसके रोज़मर्रा के रीति-रिवाजों के माध्यम से इतिहास की अपेक्षा अधिक गहराई से समझा जा सकता है?

उत्तर— आपने अत्यंत महत्त्वपूर्ण प्रश्न किया है। हर पंजाबी मनुष्य छोटी-छोटी रस्मों और रीति-रिवाजों के बीच जन्म लेता है, बड़ा होता है और अपना जीवन पूरा करता है। यह हर किसी के साथ होता है। मेरी माँ और बाजी के साथ भी ऐसा ही हुआ, क्योंकि ये रस्में जीवन का अभिन्न हिस्सा हैं। इसलिए वे इस उपन्यास की कथा का भी स्वाभाविक अंग हैं।

माँ और बाऊजी इन परंपराओं को पूरी श्रद्धा से निभाने वाले लोग थे। जब बाजी का निधन हुआ, तब माँ ने मृत्यु से जुड़ी सभी रस्में निभाईं और मैं उनके साथ था। बाद में जब माँ चली गईं, तब मैंने अकेले ही वे सारी रस्में निभाईं। मेरे लिए ये रस्में केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं हैं। ये उन लोगों के साथ जीते रहने की मनोवैज्ञानिक युक्तियाँ हैं, जो इस संसार से विदा हो चुके हैं। वे उनके साथ संबंध बनाए रखने का एक मानवीय तरीका हैं।

जिस प्रकार प्रत्येक देश, प्रत्येक समुदाय और प्रत्येक क्षेत्र का अपना इतिहास होता है, उसी प्रकार हर मनुष्य का भी अपना इतिहास और अपनी सांस्कृतिक विरासत होती है। इस उपन्यास में मैंने माँ और बाजी का इतिहास भी सहेजा है और उनकी संस्कृति भी लिखी है।

समय के साथ, आधुनिकता और ऑनलाइन संसार के प्रभाव में हमारी पुरखों की बनाई हुई परंपराएँ धीरे-धीरे छूटती जा रही हैं। नई पीढ़ी उन्हें भूलती जा रही है। इसी कारण मैंने मृत्यु के समय और उसके बाद निभाई जाने वाली सभी रस्मों का विस्तारपूर्वक वर्णन इस उपन्यास में किया है। जिस प्रकार जीवन बदल रहा है, उसी प्रकार समकालीन साहित्य से भी यह चित्रण धीरे-धीरे गायब होता जा रहा है। यदि यह क्रम इसी तरह चलता रहा, तो आने वाली पीढ़ियों की स्मृति से अपने पुरखों की छवि भी धुँधली पड़ जाएगी।

जब मैं यह उपन्यास लिख रहा था, तब मेरे अवचेतन में यह चिंता भी थी कि मेरी आने वाली पीढ़ियाँ अपनी पिछली पीढ़ियों को जानें, उन्हें पहचानें। इसी उद्देश्य से मैंने दोनों पीढ़ियों के बीच शब्दों का एक पुल बनाया है। उस पुल के एक ओर खड़े होकर देखें तो माँ, बाजी और उनसे पहले की पीढ़ियों का जीवंत जीवन दिखाई देता है। दूसरी ओर से देखें तो उनकी मृत्यु से लेकर उसके पार तक की समूची सांस्कृतिक यात्रा और उससे जुड़ी रस्में दिखाई देती हैं। इसी युक्ति के माध्यम से मैंने उनके जीवन और मृत्यु—दोनों का इतिहास और सांस्कृतिक संसार सहेजने का प्रयास किया है। और उस पूरे संसार के बीच मैं स्वयं भी उपस्थित हूँ।

प्रश्न– इस उपन्यास में रस्में केवल धार्मिक कर्मकांड बनकर नहीं रह जातीं, बल्कि वे पात्रों की मनःस्थिति को भी खोलती हैं। लिखते समय आपने पहले रस्म को देखा या उसके भीतर छिपी भावना को महसूस किया?

उत्तर— आज तक मैंने जितनी भी रस्में निभाई हैं, उनका कारण उनके भीतर छिपी भावना रही है। मेरे लिए किसी भी रस्म का मूल्य उसी भावना से जुड़ा है जो उसके भीतर धड़कती है। यदि किसी रस्म में भावना नहीं है, तो वह केवल एक कर्मकांड बनकर रह जाती है।

इस उपन्यास में जिन-जिन रस्मों और रीति-रिवाजों का मैंने उल्लेख किया है, वे मेरी और माँ-बाजी की……मनोस्थिति को उजागर करती हैं। उनमें हमारे माँ-बाप और पुत्र के रिश्ते भी बसे हुए हैं। हम केवल इस उपन्यास के पात्र नहीं हैं; हमारा संबंध, हमारी मानसिक अवस्था और हमारी भावनाएँ इन छोटी-छोटी रस्मों में समाई हुई हैं। यही रस्में हमारे भीतर के उस संसार को खोलती हैं, जो सामान्यतः अनकहा रह जाता है।

अपनी बात को और स्पष्ट करने के लिए मैं उपन्यास का एक प्रसंग साझा करना चाहूँगा—मैंने आँखें खोलीं और उनकी तस्वीर की ओर देखा। वे मुझे देख रही थीं। मेरी आत्मा बेचैन थी। मैं अपने कमरे से उठकर उनके कमरे में चला गया। तभी राजू की आवाज़ आई—”उठो… रोटी खा लो।”

मैं उठकर बैठ गया। वह रोटी की थाली रखकर रसोई में लौट गई। मेरी नज़र कभी रोटी की थाली पर जाती, कभी दीवार पर टंगी तस्वीरों पर। थाली हाथ में उठाकर मैं पागलों की तरह पूछने लगा— “माँ… तुमने कब से रोटी नहीं खाई… तुम्हें भूख लगी होगी… आओ, रोटी खा लो…!”

फिर बाऊजी की तस्वीर की ओर देखकर बोला—”बाजी… आओ, रोटी खा लो… तुमने भी तो जाने कब से कुछ नहीं खाया…!”

मुझसे एक निवाला भी नहीं टूट रहा था। जो लोग मुझे एक दिन भी भूखा नहीं देख सकते थे, जो अपने मुँह का निवाला निकालकर मेरे मुँह में रख देते थे, आज वही भूखे थे। तभी तस्वीर में मुस्कराती माँ जैसे मुझे समझाने लगी—”बेटा… मरने वालों को भूख नहीं लगती। तुम रोटी खा लो।”

मैंने आँसू पोंछे और फिर से निवाला तोड़ने की कोशिश की, लेकिन हाथ काँपने लगे। तभी बाजी की आवाज़ सुनाई दी—”अपने कमरे में चला जा… हमारे सामने बैठकर तुमसे रोटी नहीं खाई जाएगी।”

मैंने सिर झुका लिया और रोटी खाने लगा। मेरी आँखों के सामने वह दृश्य घूमने लगा, जब माँ बाजी का श्राद्ध कर रही थीं। अपनी मृत्यु से कुछ महीने पहले वे बरामदे में बैठी अग्नि पर घी अर्पित कर रही थीं। और उनकी मृत्यु के कुछ महीनों बाद उसी बरामदे में बैठा मैं वही घी अग्नि में डाल रहा था। तभी मेरे भीतर एक प्रश्न उठा—”मेरा श्राद्ध किस दिन होगा? माँ की तरह मैं भी तो यह नहीं जानता।”

इस पूरे प्रसंग में रस्म भी है और भावना भी। मैं पहले किसे देखता हूँ—रस्म को या उसके भीतर छिपी भावना को? यह प्रसंग स्वयं इस प्रश्न का सबसे सुंदर उत्तर है।

प्रश्न– कीरतपुर साहिब में रिश्तेदारों द्वारा ‘मृत्यु का सामान’ खरीदने वाला प्रसंग भी बहुत बेचैन करता है। क्या वह केवल एक पुत्र की पीड़ा है, या उसके बहाने आप हमारी कुछ सामाजिक परंपराओं और रस्मों पर भी प्रश्न उठाना चाहते थे?

उत्तर— जब किसी परिवार में सुख या दुःख का अवसर आता है, तो पंजाबी समाज में लेन-देन की कुछ परंपराएँ निभाई जाती हैं। रिश्तेदार एक-दूसरे को कुछ वस्तुएँ भेंट करते हैं। जब हम माँ और बाजी की अस्थियाँ प्रवाहित करने के लिए कीरतपुर साहिब गए, तब दोनों बार एक जैसी घटना घटी। सबसे पहले हर रिश्तेदार कहने लगा— “मैं भी चलूँगा… मैं भी चलूँगा।” दोनों अवसरों पर पूरी ट्रैक्स गाड़ी रिश्तेदारों से भर गई। अस्थि-विसर्जन के बाद मैं गुरुद्वारा पातालपुरी साहिब के रजिस्टर में अपने पुरखों का नाम दर्ज करवाने के लिए कतार में खड़ा हो गया। रजिस्टर लिखने वाले ने पूछा—

“मृतक से आपका क्या संबंध है?”

मैंने उत्तर दिया—”वह मेरे पिता थे।”

“पिता” शब्द मेरे मुँह से निकलते ही मेरा गला भर आया। मैं कतार से बाहर निकल आया और गुरुद्वारा पातालपुरी साहिब की ओर चल पड़ा। अरदास के बाद जब अंतिम निशानी लेने का समय आया, तो रिश्तेदारों की भीड़ बर्तनों की दुकानों की ओर बढ़ गई। दुकानों में पीतल और स्टील के बर्तन चमक रहे थे। कहीं लाठियाँ थीं, कहीं खूंटियाँ, कहीं श्रृंगार का सामान, कहीं बच्चों के खिलौने, तो कहीं गंडासे टँगे हुए थे। बाऊजी हमेशा बड़े गिलास में पानी पीते थे। मैंने उनके लिए एक बड़ा हैंडल वाला गिलास खरीदा और उसके नीचे मशीन से खुदवाया—”बापू दर्शन सिंह।”

उकेरे गए अक्षर दानेदार चमक रहे थे। मैं सब का ऋणी था। उधर हर रिश्तेदार अपनी-अपनी पसंद का बर्तन चुनने में लगा था।

“मैं तो यह गड़वी लूँगा…”

“मुझे तो यह केतली दिला दो…”

“हमारे लिए भी दो केतलियाँ ले लो…”

रिश्तेदारों की आवाज़ों के बीच माँ एक ओर चुपचाप खड़ी थीं। वे मेरी ओर देखतीं, फिर कुछ देर बाद आँसू पोंछकर दूसरी ओर मुँह फेर लेतीं। मृत्यु के इस बाज़ार को देखकर राजू के होंठ भी काँप उठे। उसकी आँखों में एक मौन विरोध था। तभी जैसे बाजी की आवाज़ मेरे भीतर गूँजी—”एतराज़ तो मुझे भी है, राणिया… पर तुझे अब क्या बताऊँ! ये रिश्तेदार मेरी मृत्यु का सामान खरीद रहे हैं। कल यही लोग मेरी लाश के पास बैठकर रो रहे थे। अगर मैं पानी से निकलकर फिर बाहर आ जाऊँ, तो यही लोग मुझे दोबारा जीने नहीं देंगे…!”

बर्तनों की दुकानों में गूँजती रिश्तेदारों की आवाज़ों के बीच बाजी की आवाज़ दबती चली गई। मैंने उनके नाम वाला गिलास उठाया और माँ की ओर देखा। उन्होंने इशारे से राजू को चुप रहने के लिए कहा। सब का हिस्सा चुकाकर मैंने जैसे अपने पुरखों का ऋण उतार दिया। मृत्यु का सामान उठाए रिश्तेदारों का काफ़िला फिर ट्रैक्स गाड़ी की ओर लौट पड़ा। उन्होंने माँ के समय भी ठीक ऐसा ही किया था। दोनों ही अवसरों पर मैं भीतर तक व्यथित हुआ। जिसका अपना कोई चला जाता है, उसके लिए हर रस्म भावना का विस्तार होती है। लेकिन जो लोग केवल “मृत्यु का सामान” खरीदने आते हैं, उनके लिए वही रस्में भावनाहीन औपचारिकता बनकर रह जाती हैं। इसीलिए इस उपन्यास में मैंने मृत्यु से जुड़ी अनेक सामाजिक रस्मों के भीतर छिपी मानवीय और अमानवीय संवेदनाओं पर भी प्रश्न उठाने का प्रयास किया है।

प्रश्न– आपने अपने जीवन की छोटी-छोटी भूलों को भी बिना किसी झिझक के उपन्यास में दर्ज किया है—जिन्हें अधिकांश लेखक प्रायः छिपा लेते हैं; जैसे बचपन में चोरी करना, किताबें चुराना आदि। क्या आपको कभी यह संकोच नहीं हुआ कि इससे आपकी छवि प्रभावित हो सकती है? या फिर आपके लिए लेखक की ईमानदारी उसकी निर्मल और निष्कलंक छविसे अधिक महत्त्वपूर्ण थी?

उत्तर— हीर जी! यह उपन्यास दो विधाओं का संगम है। इसमें मेरी माँ और बाजी की जीवनी भी है और मेरी आत्मकथा भी। यही इसकी औपन्यासिक संरचना है। इसलिए यह उपन्यास जीवन के सत्य का दस्तावेज़ है। इसमें झूठ और कल्पना बहुत कम है। जहाँ कल्पना का सहारा लिया भी गया है, वहाँ केवल स्वप्नों और स्मृतियों को कथा में रूपांतरित करने के लिए। मेरा पूरा ध्यान और मेरी सारी सृजनात्मक ऊर्जा माँ और बाजी के साथ बिताए जीवन को उसके सत्य रूप में चित्रित करने पर लगी रही। इस उपन्यास में उनके जीवन की अनेक ऐसी कटु और निर्वस्त्र सच्चाइयाँ भी दर्ज हैं, जो उनके व्यक्तित्व को छोटा नहीं करतीं, बल्कि और अधिक मानवीय तथा विराट बना देती हैं।

इसी कारण जहाँ-जहाँ मैं स्वयं एक पात्र के रूप में उपस्थित हूँ, वहाँ भी मैंने अपने बारे में बिना किसी आडंबर और बिना किसी संकोच के लिखा है। यदि झूठ बोलकर किसी लेखक की छवि बड़ी बनती है, तो मैं ऐसी छवि को स्वीकार नहीं करता। मेरी माँ और बाजी ने मुझे सत्य की कमाई दी है। उनकी ही रगों का रक्त मेरी नसों में बहता है। जिस सत्य के सहारे मैंने उन्हें बड़ा दिखाया है, उसी सत्य के सहारे स्वयं को भी छोटा नहीं होने दिया। यही मेरे माता-पिता की दी हुई शिक्षा है। उसी शिक्षा के भरोसे मैंने अपने सारे पत्ते खोलकर यह जीवन-खेल खेला है—और इस खेल में मेरे बाजी ही जीते हैं। जो लेखक इस तरह सच का सामना करता है, उसकी छवि छोटी नहीं होती; वह सत्य के धर्म का पालन करता है। ईमानदारी उसके लिए सृजन का एक नया द्वार खोल देती है। मैंने उसी खुले हुए द्वार की चौखट पर बैठकर यह उपन्यास लिखा है।

इसी कारण मैं बटुआ चुराने से लेकर किताबें चुराने तक की हर घटना को सहजता से लिख सका। आपने मेरी छवि के प्रभावित होने की जो बात उठाई है, उससे जुड़े कई और प्रसंग भी इस उपन्यास में हैं—जैसे बुढ़ापे में माँ का संकोच, बहू से डरकर रहना, छिपकर आम मँगवाना, और अपने ही घर में स्वयं को पराया महसूस करना। ये केवल व्यक्तिगत घटनाएँ नहीं हैं; ये पंजाब के समाज और हमारे घरों में रह रहे असंख्य बुज़ुर्गों की मनःस्थिति का प्रतीक हैं। मैं उन लोगों में से नहीं हूँ जिनके घर का दरवाज़ा वृद्धाश्रम की ओर खुलता है। मैं उन लोगों में हूँ जिनके घर अपने पुरखों की उपस्थिति से अगरबत्ती की सुगंध की तरह महकते हैं। मेरी पत्नी केवल मेरे जीवन की ही नहीं, मेरी सोच की भी सहयात्री है। वह जानती है कि कोई पात्र कहाँ कथा बन जाता है और कहाँ वह कथा को जन्म देता है। इस उपन्यास में उसका संबंध भी कारण और कार्य—दोनों रूपों में उपस्थित है। इसलिए यह किसी निजी छवि की चिंता का प्रश्न नहीं है; यह रिश्तों की ईमानदार प्रस्तुति का प्रश्न है।

प्रश्न– उपन्यास में एक घटना आती है, जहाँ बाऊजी खेत में आपकी माताजी पर हाथ उठाते हैं। आपने उस प्रसंग को भी पूरी ईमानदारी के साथ लिखा है। क्या उस घटना के बाद आपने कभी अपने पिता से पूछा कि उन्होंने ऐसा क्यों किया? यदि नहीं, तो क्या पिता के प्रति सम्मान, पारिवारिक संस्कार या उस समय का सामाजिक वातावरण आपको ऐसा प्रश्न पूछने से रोकता रहा?

उत्तर— बचपन से ही मेरा स्वभाव बहुत शांत और संकोची रहा है। बाजी फौज में थे। उन्होंने तेईस वर्ष सेना में सेवा की। सूबेदार के पद से सेवानिवृत्त हुए। कुछ समय घर रहे, फिर रखड़ा शुगर मिल में सुरक्षा अधिकारी बन गए और वहाँ भी लगभग बीस वर्ष नौकरी की। इस प्रकार वे तैंतालीस वर्षों तक वर्दी में रहे और घर से अधिक समय बाहर ही बिताया। मैंने अपना अधिकांश बचपन माँ के साथ अकेले बिताया। शायद इसी कारण डर, संकोच और झिझक मेरे व्यक्तित्व का स्थायी हिस्सा बन गए। यही मनोवैज्ञानिक कारण रहा कि मैं कभी बाजी से यह पूछ नहीं सका कि उन्होंने माँ को क्यों मारा।

खेत में माँ को पीटने का वह दृश्य आज भी मेरे मन और स्मृति में उसी तरह अंकित है। जब भी उसे याद करता हूँ, मेरी रग-रग में माँ की पीड़ा फिर से दौड़ने लगती है। उपन्यास का वह अध्याय पढ़ते हुए आज भी मेरी आँखें भर आती हैं। मुझे रोती हुई माँ दिखाई देने लगती हैं। जब माँ जवान थीं, तब उन्हें कोई बीमारी नहीं थी। लेकिन जीवन के अंतिम वर्षों में अनेक बीमारियों ने उन्हें घेर लिया। वे रोज़ नई-नई दवाइयाँ खाती थीं। दवाइयों के कारण उनकी त्वचा बहुत पतली हो गई थी और बाँहों पर रक्त जमने के निशान पड़ने लगे थे।

जब कोई उनसे पूछता—”चरण कौर, यह क्या हो गया?”

तो वे अपनी बाँहों पर हाथ फेरते हुए दूर कहीं देखने लगतीं और कहतीं—”ये तो वही निशान हैं, जब राणे के बाजी ने मुझे खेत में डंडों से पीटा था।”

यह प्रश्न आज भी मेरा पीछा करता है। बाऊजी मुझसे बहुत प्रेम करते थे। मैं उनका अत्यंत सम्मान करता था। हमारे घर का वातावरण संस्कारों से भरा हुआ था। उस समय का सामाजिक ढाँचा भी चुप रहना और बहुत-सी बातों पर पर्दा डाल देना ही सिखाता था। शायद यही सब मुझे यह प्रश्न पूछने से रोकता रहा। सच तो यह है कि आपका प्रश्न सुनकर ही मुझे पहली बार लगा कि यह प्रश्न मुझे कभी पूछना चाहिए था। अब मेरे पास प्रश्न तो है, पर उसका उत्तर देने के लिए न बाजी हैं, न माँ। अब मैं किससे पूछूँ? यही मनःस्थिति आज भी मुझे भीतर से बेचैन करती है।

प्रश्न– यदि आपके माता-पिता आज यह उपन्यास पढ़ते, तो आपको सबसे अधिक डर किस बात का होता—कि वे रो पड़ेंगे, मुस्करा देंगे, या फिर कहेंगे—”राणिया, अभी भी बहुत कुछ लिखना बाकी रह गया है।”

उत्तर— माँ और बाऊजी साधारण मनुष्य नहीं थे; वे युगों जितने विराट व्यक्तित्व थे। उनके पूरे जीवन को एक ही उपन्यास में समेट देना संभव नहीं था। वे तो एक महाकाव्य के पात्र थे। यह उपन्यास उनके जीवन का बहुत कुछ कहता है, पर सब कुछ नहीं कह सकता। इसे लिखते समय मैंने एक-एक शब्द अपनी आँखों के आँसुओं में डुबोकर लिखा है। जब आँसू कम पड़ जाते थे, तो ऐसा लगता था मानो स्याही की जगह अपनी रगों का रक्त कलम में भरकर लिख रहा हूँ। यह मेरे पुरखों की प्रेमकथा है, जो मेरे हृदय पर लिखी गई है। यह केवल एक परिवार की कथा नहीं, बल्कि जीवन और रिश्तों का एक पूरा युग है। मुझे मालूम है कि जहाँ माँ और बाजी चले गए हैं, वहाँ किसी लिखित शब्द की आवश्यकता नहीं होती। फिर भी मेरी इच्छा है कि वे एक बार लौट आएँ… यह उपन्यास पढ़ें। यदि वे इसे पढ़ लें, तो मुझे विश्वास है—सबसे पहले माँ रोएँगी…फिर आँसुओं के बीच मुस्कराएँगी…और फिर उपन्यास का एक पन्ना पलटकर कहेगी—”ऐसा क्यों कहते हो ? उपन्यास तो तुमने बहुत सुंदर लिखा है, लेकिन यह उतना सुंदर नहीं, जितना सुंदर मैंने तुम्हें रचा था।”

“दिल की कहानी लिखना बहुत कठिन होता है, राणिया! यह तो पानी के ऊपर पानी से लिखने जैसी बात है।”

बाजी (पिता) की यह बात सुनकर मैं निःशब्द हो जाऊँगा। उनकी इस बात का आशय समझ कर कहूंगा कि अभी भी बहुत कुछ अनकहा रह गया है…।

हरकीरत हीर
मोबाइल: +91 86387-61826
जसवीर राणा
मोबाइल: +91 98156-59220

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