अपनी तीनों अम्मियों में मँझली वाली के हाथों कबॉब और फिश कोफ्ते खाने में ही मुझे मज़ा आता है. मँझली अम्मी मतलब रुख़्साना अम्मी जब तश्तरी में मटन कबॉब लिए बेड पर मुझे बुलाती हैं कि अब्दुल, आ-जा प्यारे! तो मैं एक पल भी गवाँए बिना, तुरत-फुरत हाज़िर हो जाता हूँ. बेशक, मैं उस पल का बेसब्री से इंतज़ार करता रहता हूँ. यूँ तो मँझली अम्मी कबॉब-कोफ्ते-पकौड़े और मटन-चिकन कोरमा-दोपियाजा बनाने में बिल्कुल फिसड्डी हैं. किसी भी डिश का गुड़-गोबर कर देती हैं. मगर, जब मैं शाहज़ादे की माफिक पलंग पर बैठकर, उनके हाथों कबॉब-कोफ्ते खाने का लुत्फ लेता हूँ तो उसका ज़ायका ही बिल्कुल ज़ुदा-ज़ुदा सा लगता है. पता नहीं, इसकी क्या वज़ह है? मैंने बड़ी अम्मी यानी ताहिरा अम्मी से कई मर्तबे कहा है कि वह मँझली अम्मी को लज़ीज़ नॉन-वेज़ डिशेज़ बनाना सिखा दें. मतलब, मटन कोरमा बनाते समय कब प्याज तड़का लगाया जाता है, कब अदरक-लहसुन-प्याज़ का पेस्ट डालकर उसे कितनी देर तक भुना जाता है? गरम मसाले का अंदाज़ा क्या है और उसे तड़का-पेस्ट में डालने के बाद कितनी देर तक भुना जाता है? कितना पानी डालकर शोरबे को पकाया जाता है? वग़ैरह, वग़ैरह…पर, बड़ी अम्मी ताहिरा मुझे बच्चा समझ कर मेरी बातों को नज़अंदाज़ कर देती हैं.
अब मैं कहाँ बच्चा रहा? पूरे सत्रह साल का हो गया हूँ. हलक फूट चुका है; ख़ुदा की क़सम, तीन साल से मैं मर्दानी आवाज़ से भी नवाज़ा जा चुका हूँ. चाँद मियाँ इमामबाड़े से लगे हुए बाबरी मदरसे से ताहानिया और फौकानिया इम्तेहानों में अव्वल रहा हूँ और मौलवी के एग्ज़ाम में पूरे शहर में टॉप करने के बाद आलिम कोर्स में दाख़िला ले चुका हूँ. इतना सयाना-पट्ठा हो गया हूँ कि निक़ाह की ज़ोरदार तलब लगने लगी है. कई बार किसी काफिर लौंडिया को इधर-उधर डोलते देखता हूँ तो जी करता है कि उसका मुँह दबाकर किसी निचाट मे ले जाऊँ और… उसके बाद, ज़ामा मस्ज़िद के इमाम के पास जाकर कहूँ कि लीज़िए मैंने एक काफिर बांभन की लौंडिया को अपनी बीवी बना लिया है; उसे कलमा पढ़ना और बुरखे पहनना भी सिखा दिया है—सो, अब रवायत के अनुसार ईनाम में मुझे बारह लाख रुपए दो.
चुनांचे, अब्बाजॉन कहते हैं कि तूँ आलिम पास करने के बाद कामिल का एग्ज़ाम निकाल ले. उसके बाद, तुझे शहर की ज़ामा मस्ज़िद की जूनियर मौलवी की कुर्सी मुहैया करा दूँगा. मेरा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के चेयरमैन के साथ उठना-बैठना है जिनसे सिफारिश लगा सकता हूँ. आख़िर, मामूली मस्ज़िदों का मौलवी बनकर तूँ क्या करेगा? इन मौलवियों की औक़ात ही क्या होती है? इनकी तनख़्वाह भी ज़ामा मस्ज़िद के मौलवियों की आधी होती है. यहाँ की बनिस्बत, वहाँ का काम भी कम है और इज़्ज़त, शानो-शौकत के क्या कहने!
मग़र भाई नवाब ख़ान की मंशा कुछ और ही है. उसने ख़ुद मुझसे गुज़ारिश की है कि अब्दुल को वक़्फ वाली सुनहरी मस्ज़िद का मौलवी बनाने में क्या दिक्कत पेश आ रही है. बंदे की आवाज़ में इतनी क़शिश है कि जब वह पाँचों दफे नमाज़ अता करेगा तो उसके अजान को सुनकर काफिर लौंडे-लौंडियाँ भी खिंचे चले आएंगे और इस्लाम कुबूल कर लेंगे. आख़िर, हमारा मक़सद भी तो यही है कि इस मुल्क़ को जितनी ज़ल्दी हो सके, इस्लामिक मुल्क़ बनाया जाए और ख़ुदा के नेक काम को आगे बढ़ाया जाए.
मँझली अम्मी से मैं कहता हूँ कि वह अब्बू से बोल दें कि वह मुझे मेरी हालत पर छोड़ दें. घर में क्या कमी है कि मैं मौलवी बनूँ? अब्बू का इतना बड़ा कारोबार है! इस्लामिक मुल्क़ों से भी कितने पैसे की आमद होती है! मैं तो बस, मजे में हड्डी चिचोरते हुए बारी-बारी से चार निक़ाह करना चाहता हूँ. ख़ूब बच्चे पैदा करके क़ौम को गुलज़ार करना चाहता हूँ. पर, उस दिन जब मैंने अम्मी से अपनी ख़्वाहिशें बताईं तो उन्होंने मेरी बात पर बिल्कुल ग़ौर नहीं फरमाया. बदले में वह मुँह बिचकाकर अब्बू के कमरे में चली गईं. तब, मैं कमरे के दरवाज़े के पास छिपकर अब्बू और उनके बीच चल रही फुसफुसाहट और उसके बाद पलंग की चरमराहट सुनता रहा. बेशक, जब रुख़्साना अम्मी अब्बू के कमरे में होती हैं तो पता नहीं क्यों मुझे बहुत बुरा लगता है.
उस अल्लसुबह, मैं उठा ही था कि मैंने अहाते से ख़ालाज़ाद बहन फातिमा की चहकती आवाज़ सुनी तो मैं यक-ब-यक रोमांचित हो उठा. मैंने तय कर लिया कि आज मदरसा न जाकर फातिमा के साथ सारा दिन अहाते में नीम की आड़ में कॉरपेट बिछाकर बिताऊंगा. तभी, फातिमा अपने हाथ में दो कटे हुए मुर्गे उठाए हुए, मेरी बगल से मुँह चिढ़ाते हुए गुज़री. मैंने उसके हाथ से मुर्गों को ज़बरन छीनते हुए ज़मीन पर रखा और उसे खींचते हुए अहाते की ओर ले जाने लगा. मँझली अम्मी चींख उठी, “अब्दुल प्यारे! यह क्या बदतमीज़ी है? जाओ, बरामदे में खालू और खाला बैठे हुए हैं, उनकी ख़िदमत करो. बुज़ुर्गों का दुआ-सलाम ज़रूरी होता है—ज़न्नत की ऐशो-आराम वाली ज़िंदग़ी के लिए. अब्बू ने आज उन्हें तुम्हारे मौलवी के इम्तेहान में अव्वल आने की खुशी में दावत दी है. देखते नहीं, इन मुर्गों को अहाते से हलाल करके उनके लंच के लिए लाया गया है? फातमा को छोड़ो, आज वह हमारे साथ किचन के काम में मदद करेगी.”
मैं समझ गया कि जब भी मैं फातिमा के साथ रहने की ख़्वाहिश ज़ताता हूँ तो मँझली अम्मी किसी न किसी बहाने शोर मचाते हुए मुझे कहीं और उलझा देती हैं. मुझे फातिमा के साथ रहना अच्छा लगता है; पर, रुख़्साना अम्मी क्यों जल-भुन उठती हैं?
तब, मैं काफी देर तक अहाते में जाकर ग़ुमसुम टहलता रहा. जहाँ अब्बू ने मुर्गों को हलाल किया था, वहीं ज़मीन पर बैठकर बिखरे हुए खून को कुरेदते हुए फैलाने लगा. फातिमा की आवाज़ अभी भी बीच-बीच में बदन में सिहरन पैदा कर रही है. जब वह मेरे घर आती है तो वह जानबूझकर ज़ोर-ज़ोर से चहचहाते हुए क्यों आसमान को सिर पर उठाए रहती है? उसे उसके घर में तो हमेशा ही ख़ामोश और आहिस्ता-आहिस्ता बोलते हुए सुना है. इतनी चंचल भी वहाँ नहीं रहती.
लंच में वह डाइनिंग टेबल पर ठीक फातिमा के बगल वाली कुर्सी पर बैठ गया तो रुख़्साना अम्मी ने कहा, “मेरे बगल में बैठ जाओ. वहाँ तुम बैठकर फातिमा को तसल्ली से खाने भी न दोगे.”
मैंने मँझली अम्मी को घूरते हुए देखा. उन्हें चिढ़ाने की गरज़ से फातिमा से और सटकर बैठ गया और दोंगे में से सबसे बड़ा चिकन लेगपीस लेकर चिचोरने लगा. अब्बू ने टोकते हुए कहा, “बच्चों को चैन-सुकून से खाने दो. उनकी ज़िंदग़ी में दख़लंदाज़ी मत करो.”
बेशक, वह हिदायत तीनों अम्मियों के लिए थी और ख़ासतौर से मँझली अम्मी के लिए क्योंकि अब्बू की सख़्त नज़र उन्हीं पर गड़ी हुई थी. पता नहीं, वह क्या सोच रहे थे? वैसे भी वह मेरे और फातिमा के बीच नज़दीकियों पर कोई एतराज़ नहीं फरमाते थे. शायद, उन्होंने हम दोनों के बारे में कुछ बेहतर सोच रखा है.
उस दिन मेरा मूड एकदम बेकाबू था. शाम तक मैं फातिमा के पास तक नहीं फटका था. वह भी मुझसे मिलने का एक पल का भी मौका न मिल पाने के कारण, मुँह फुलाए हुए थी. बेशक, आज का दिन मेरे साथ अहाते के एकांत में न गुज़ार पाने के कारण मायूस थी. मँझली अम्मी को यह देखकर अच्छा लग रहा था कि मैं फातिमा से दूरी बनाए हुए हूँ और वह भी. आख़िर, मँझली अम्मी चाहती क्या हैं?
शाम को खाला, खालू और फातिमा रुख़्सत हुए तो मैं अब्बू के लाख बुलाने पर भी इबादतखाने में क़ुअरान खोल कर पढ़ने के बहाने उन्हें अलविदा कहने गेट तक नहीं गया. मेरे इस बर्ताव पर अब्बू बेहद खफ़ा थे. उन्होंने आते ही मुझसे कहा, “फातिमा तुम्हें लौटते समय ढूँढ़ रही थी. लेकिन, तुम आए क्यों नहीं? वैसे तो तुम लाख कहने पर भी कुअरान को हाथ तक नहीं लगाते हो? आज ऐसा क्यों?”
मैं चुप रहा तो अब्बू गुस्से में रुख़्साना अम्मी के साथ कमरे में ख़ुसुर-फुसुर और पता नहीं क्या करने चले गए? मुझे बिल्कुल नागवार लगा. अब्बू हमेशा रुख़्साना अम्मी के ही कमरे में घुसे रहते हैं. दो और भी तो अम्मियाँ हैं. उनके पास तो विरले ही जाते हैं. मैं सब समझता हूँ. बड़ी अम्मी बूढ़ी हो चली हैं; वह हैं भी तो अब्बू से कई साल बड़ी. जबकि छोटी अम्मी काली-कलूटी बैंगन की बूटी जैसी हैं. उनसे अब्बू का यूँ भी खटर-पटर चलता रहता है. चलो, बड़ी अम्मी घरेलू काम-काज में माहिर हैं. तिल से लेकर पहाड़ तक सारे घर के मसलों का निपटारा अकेले दम पर कर लेती हैं. फिश कोफ्ता वाह! कितना ज़ायकेदार बनाती हैं. मटन कोफ्ता भी. बीफ़ कोरमे का कहना ही क्या? बस, इसी खूबी के कारण अब्बू उन्हें सिर पर चढ़ाए रहते हैं. छोटी अम्मी में क्या है—कोई काबलियत नहीं. सिर्फ अहाते में मुर्गियों को दाना चुगाने, पानदान में ज़र्दा-सुपारी और कत्था-चूना सहेजने और खाने के बाद अब्बू और बाकी दोनों अम्मियों को पान की गिलौरियाँ थमाने के सिवाय उन्हें किसी भी काम से मतलब नही होता है, हाँ, अब्बूजॉन की बात-बात में ख़ुशामद करने की आदत उनकी पुरानी है. वह जानती हैं कि अब्बू को ख़ुश करके ही इस घर में वह गुज़ारा कर सकती हैं, वर्ना…
लेकिन, मँझली अम्मी रुख़्साना की तो बात ही निराली है. क्या हुआ अगर उन्हें बढ़िया बीफ कोरमा बनाने नहीं आता है? पर, उनकी अदाएं, उनकी कमल-नाल सरीखी गठीली बाँहें और सुराही जैसी गोरी-गोरी गरदन, उनके चेहरे की रुहानी चमक-दमक और उनकी कोयल-सी आवाज़—ये सब उन्हें बहत्तर हूरों की पटरानी बनाने के लिए काफी हैं. मैं तो मदरसे के हेड मौलवी से कहूंगा कि क्या उन्होंने मेरी मँझली अम्मी को देखा है… जब देखेंगे तो उन्हें तिहत्तरवीं हूर के तौर पर ज़न्नत की हूरों की पटरानी ऐलॉन करने में तनिक भी हिचक नहीं होगी.
जब अब्बू इमामबाड़े से किसी क़ौमी मज़लिस में सिर खपाकर और गला बैठाकर घर में कदम रखते हैं तो बड़ी अम्मी चींख-चिल्ला कर सारे आसमान को सिर पर उठा लेती है—अरे, रुख़्साना! शौहर के लिए रूह आफज़ा शर्बत लाना…छोटी बेग़म कहाँ हो, देखो, जब मर्द का घर में आमद हो तो उसकी ख़िदमत में जुट जाया करो. उसके बाद, वह अब्बूजॉन से मुखातिब होती हैं, “मियाँ, अभी तुम इतने जवां हो कि एक और निक़ाह कर सकते हो. कर लो ना! हममें से किसी को कोई एतराज़ नहीं होगा.”
चौथे निकाह की बात सुनकर अब्बू फूले नहीं समाते हैं. उनका सारा गुस्सा और तनाव मुट्ठी में रेत की माफिक फिसल जाता है. तब, वह बोल पड़ते हैं, “रेहाना, तुम हो मेरी बड़ी बेग़म; लेकिन, बातें मेरी मरहूम अम्मी की तरह करती हो.” फिर, वह उठकर सबके सामने उनके मुख का बोसा लेते हैं. बेशर्म अब्बू…
मैं कुअरान को बाकायदा आलमारी में रखने के बाद बाहर बरामदे में आया तो देखा कि अब्बू अचकन शेरवानी पहने और मँझली अम्मी को छोड़ दोनों और अम्मियाँ पेशावरी बुरखे पहने हुए कहीं जाने के लिए तैयार हैं. तभी अब्बू ने हुक्माराना अंदाज़ में कहा, “अब्दुल! मँझली अम्मी का ख़याल रखना. हम तीनों अज़ायब ख़ान के बेटे के खतने में जा रहे हैं. देर रात तक पार्टी और दावत का इंतज़ाम है. इसलिए, कल सुबह देर से आना होगा.”
उनके रुख़्सत होने के बाद, मैं अपने कमरे में चला गया और मोबाइल पर कैंडी क्रश गेम खेलने लगा. फातिमा के बार-बार ख़याल से मन उचट रहा था. तब, मैंने कुर्ता-पायज़ामा उतारकर लुंगी-कुर्ता पहन लिया और सोने की कोशिश करने लगा. मुश्किल से दो-तीन करवटें ही बदली थीं कि कुछ देर बाद, मँझली अम्मी ने मुझे अपने कमरे से आवाज़ दी, “अब्दुल प्यारे! यहाँ आ जाओ, मुझे नींद नहीं आ रही है. अकेले अज़ीब-सा लग रहा है.
मैंने ख़ुद से कहा, अब्बू ने मुझे अम्मी का ख़याल रखने की हिदायत दी है. इसलिए, अम्मी के साथ ही सोना मुनासिब होगा.
जब मैंने अम्मी के कमरे में कदम रखा तो मेरा दिल ताज़्ज़ुब में गोते लगाने लगा. रात के कोई ग्यारह बज रहे थे जबकि रुख्साना अम्मी दुल्हन की तरह सजी-सँवरी पलंग पर बैठी थीं. पूरे कमरे में इत्र की सुगंध कोने-कोने फैल रही थी. पलंग के नीचे और और पलंग पर गुलाब और चमेली के फूल करीने से बिखरे हुए थे. मैंने उस सुगंध को नाक से सुड़का तो मुझे नशा-सा आने लगा. मैं सोच रहा था कि क्या ऐसा रोज़ होता है जबकि अब्बूजॉन रुख़्साना अम्मी के साथ होते हैं.
तभी, अम्मी बेड से उठकर मेरे पास आते हुए फुसफुसाने लगीं, “अब्दुल प्यारे! आज तुम्हारा इम्तेहान है. आओ, मेरे साथ यहाँ.”
फिर, वह मुझे खींचते हुए बेड तक ले गई और मैं भी ऑटोमेटिक मशीन की तरह पलंग पर पड़े कराची से लाए गए कम्बल में उनके साथ दुबक गया. मैं जब तक कुछ समझता, हम दोनों बेकाबू हो चुके थे. रुख़्साना अम्मी ने फुसफुसाकर कहा, “तुम मुझे फातिमा समझो और मैं तुम्हें अपना अब्दुल प्यारा. आज मेरे मन की मुराद पूरी हुई.”
सुबह मैं देर से उठा तो मैंने देखा कि अब्बू आसमान में कड़कती बिजली की माफिक गरज रहे थे. रात को दरवाज़ा खुला ही रह गया था और अब्बू सीधे बेडरूम में घुसते आए थे. रुख़्साना अम्मी एक कोने में उनकी डाँट-फटकार सुनते हुए भी बेख़ौफ खड़ी थी. मैं रातभर बेड में नंग-धड़ँग ही सोता रहा. मैंने झट से अपने कपड़े पहने और बेड से नीचे उतर आया. तब तक, अब्बूजॉन अम्मी को तीन तलाक़ दे चुके थे. उसके बाद, अब्बू मुझे मारने दौड़े तो रुख़्साना अम्मी मुझसे लिपट गईं और अब्बू बेचैनी में हाथ झाड़ते हुए वापस लौट गए.
शाम तक, रिश्तेदारों में ख़बर फैल गई कि अब्दुल और रुख़्साना के बीच ज़िस्मानी रिश्ता बनने के कारण उसके अब्बू मियाँ ख़ालिद ने तीन तलाक़ दे दिया है. मामला गंभीर न हो इसलिए रिश्तेदारों ने यह तय किया कि अब्दुल और रुख़्साना का आपस में निक़ाह करा दिया जाए. सो, उसी शाम, काज़ी को इत्तला किया गया और हम दोनों के बीच निक़ाहे-करारनामा मुस्तकिल हो गया.
लिहाज़ा, कई बरस गुज़र चुके हैं और माहौल में तनिक भी बदलाव नहीं आया है. अब भी मैं और रुख़्साना अब्बू के घर में बेख़ौफ आते-जाते हैं. बस, कुछ रिश्ते बदल गए हैं; रुख़्साना अम्मी से बीवी बन गई है तो क्या हुआ? हाँ, मेरे घर से रिश्तेदारों तक किसी के दिल में किसी तरह का कोई मलाल नहीं है. मोहल्लेवालों की बेवज़ह कानाफुसियों से हमें क्या लेना-देना है? सोशल मीडिया वाले तो यूँ ही तिल का पहाड़ बना देते हैं. जो कुछ हुआ है, सब रवायत के अनुसार…सब ठीक-ठाक चल रहा है.
लेकिन, अब्बू की ज़िंदग़ी में एक और फेरबदल नाज़िल हुआ है—उन्होंने फातिमा से शादी कर ली है. मेरा दिल फातिमा को अम्मी कहने के लिए कतई राज़ी नहीं होता है. उसे अम्मी कभी नहीं कहूंगा? पता नहीं, अब्बू के जाने के बाद अल्लाताला को क्या मंज़ूर है? तब वह अम्मी रहेगी या कुछ और…पर, ख़ुदा के लिखे हुए के आगे किसी का क्या बस चलता है?
- डॉ. मनोज मोक्षेन्द्र
कविता, व्यंग्य, नाटक एवं कहानी सहित विभिन्न विधाओं में लेखन दो दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित, कई संस्थाओं द्वारा सम्मानित
सम्प्रति: साहित्य-लेखन एवं सामाजिक कार्य
(भारतीय संसद के पूर्व संयुक्त निदेशक)
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