26 फरवरी, 2025 को अंतिम स्नान के साथ भले ही महाकुंभ का समापन हो गया हो लेकिन प्रयागराज के संगम तट पर स्नानार्थियों के संग गंगा की लहरें जितनी बार हिलोरें लेती थी उससे भी अधिक आस्था की लहरें भारतीय जनमानस में उमड़-उमड़ कर आती रहीं। जो गंगा नहा आए वो तो पुण्य के साक्षी बने ही मगर जो नहीं जा पाए उनके हृदयों में आस्था-श्रद्धा-भक्ति के भावों की त्रिवेणी बहती रही। जो शरीर से वहां उपस्थित नहीं थे उनका मन समाचारों को देखते समय बार-बार वहां जाकर आस्था की डुबकी लगा आता था और उनका यह भाव स्नान भी अमृत स्नान की कोटि में ही आता है क्योंकि माना जाता है कि – मन चंगा तो कठौती में गंगा।
कुंभ में आज हमारा जाना या न जाना भले ही हुआ हो मगर संगम तट पर तिरबेनी (त्रिवेणी) नहाने की परंपरा पुरानी है। इतनी पुरानी जितने कि आपके पुरखे रहे होंगे… उससे भी कई युगों-युगों पहले। भारत देश के कोने-कोने पर बसे लोग हजारों-हजार साल पहले से 12-12 सालों के अंतराल पर जब भी कुंभ लगता था लाठी लेकर गठरी बांधे चल देते होंगे और संगम का रास्ता दिखाती थी वह अंतश्चेतना जो सुदूर साइबेरिया के पक्षियों को बसंत ऋतु में भारत खींच लाती है। हमारे पुरखों ने चाहे जितनी बार भी गांव-नगर बदले हों, हमारी हजारों पीढ़ियां जहां-जहां रही हों उसी अंतश्चेतना से बंधी कुंभ नहाने प्रयागराज पहुंचती रही हैं। और हम देश के जिस कोने में भी रहते हों गंगा की लहरें उठ-उठ कर हमारे मन को उद्वेलित करने लगती हैं क्योंकि संगम वही भूमि है जहां की रज में हमारे पुरखों के चरण पड़े थे… तो उसी रज को माथे से लगाने के लिए गंगा की लहरें हमें पुकारती हैं… तो कुंभ में जाना मतलब एक ग्रह-नक्षत्रों के विशेष संयोग के अवसर पर उपस्थित होना जिस समय पर आपकी कई पीढ़ियों के पुरखे वहां उपस्थित थे, ठीक उसी तरह जिस तरह आज आप हैं। कुंभ का मलतब है गंगा-यमुना की तरह अतीत और वर्तमान का मिलन और जिसमें अंतःसलिला सरस्वती की तरह भविष्य (आने वाली पीढ़ियों) का त्रिवेणी संगम।
जनवरी, 2024 होते-होते गंगा की लहरें मेरे मन में घुमड़-घुमड़ कर कुंभ की याद दिलाने लगीं कि मनवा रे, महाकुंभ की तैयारी कर लो। अभी पूरे 24 महीने बाकी थे फिर भी लग रहा था कि तीर्थराज पुकार रहा है कि अबकी मत चूकना। 2024 का साल शुरू होते-होते महाकुंभ की प्रतीक्षा होने लगी। नवंबर, 2024 के महीने में टिकट बुक करवाते समय अतिरिक्त होशियारी बरती गई। हमने 7 फरवरी और 16 फरवरी की टिकटें बुक करवाईं। ये मेरा ही आइडिया था। मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। रोज दिन में कई-कई बार PNR नंबर चेक किया जाता कि वेटिंग लिस्ट कहां तक पहुंची। 1 फरवरी तक वेटिंग लिस्ट 7 नंबर तक आ गई थी और वापसी की टिकट RAC में आ गई थी। इस बीच अलग-अलग वेबसाइट खंगाले जाते कि अपने बजट में कोई फ्लाइट टिकट मिल जाए लेकिन इन टिकटों के दाम तो एवरेस्ट की ऊंचाई से कंपटीशन कर रहे थे। 5 फरवरी तक ट्रेन की वेटिंग लिस्ट टस से मस नहीं हुई थी। मेरे बेटे ने ऐलाने-जंग कर दिया था कि अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुई तो वह स्टेशन तक भी नहीं जाने वाला। टीवी पर समाचार देख-देख कर वह अपनी फैमिली के लिए कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। 6 फरवरी तक टिकट RAC तक भी नहीं पहुंची थी लेकिन वेटिंग लिस्ट 1,2,3,4,5,6 तक आ गई थी। मेरा दिल धक-धक हो रहा था कि वेटिंग लिस्ट से पहले RAC भी आता है। सब मान चुके थे कि अब टिकट कन्फर्म होने से रहा। रात भर मैं सोचती रही कि अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो कल कैसे जाना होगा और 15 फरवरी का जाना भी मुश्किल लग रहा था। ….तो मेरे पास तो यही रात थी और आज यही रात बड़ी भारी लग रही थी कि सुबह उठकर महाकुंभ जाने का सपना कहीं छन्न से न टूट जाए। अचानक सुबह 4 बजे आंख खुल गई। गाड़ी का PNR नंबर चेक किया तो देखा केवल 2 सीट कन्फर्म हुई थी- मेरी और मेरे बेटे की। बाकी 4 सीटें हवा में तैर रही थी। आखिर थोड़ी ना-नुकूर के साथ सबने हम दोनों को राजी किया कि तुम दोनों जाओ अगली खेप से हम चले जाएंगे।
7 फरवरी, 2025 की रात की ट्रेन थी। मैंने ऑफिस आकर अपना काम निपटाया। ऑफिस और लोकमान्य तिलक टर्मिनस स्टेशन दोनों ही मेरे घर के पास हैं इसलिए समय की चिंता नहीं थी। ऑफिस से छूटने के बाद घर आकर मैंने और बेटे ने अपना-अपना बैग उठाया और भारी मन से स्टेशन की ओर निकले। बाकी लोगों के बिना जाना अच्छा नहीं लग रहा था। …खैर हम समय पर स्टेशन पहंच गए। थोड़ी देर में ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग गई। हम दोनों अपने कोच में दाखिल हुए… और भई अपनी सीट देखकर तो दिल खुश हो गया। अब यकीन हो गया था कि सच में हमारी यात्रा मंगलमय और सुखद होने वाली है। हमारी फर्स्ट क्लास की टिकट थी और मात्र दो सीट वाला कूपे हमें मिला था। बेटा खुश… ट्रेन से यात्रा करने में उसे पहली बार आनंद आया। हमारा पूरा सफर आराम से गुज़रा।
अगले दिन शनिवार था और रास्ते में पड़ने वाले सभी स्टेशन खचाखच भरे हुए थे। और यह बात अच्छी तरह समझ आ रही थी कि सप्ताहांत होने के कारण इन यात्रियों ने बिना टिकट बुक करवाए जनरल टिकट से ट्रेन की क्षमता से अधिक ठुंस-ठुंस कर यात्रा करने वाले हैं। अगर रेलवे एक ट्रेन की पूरी सीटों की संख्या जितने टिकट जारी करे तो स्टेशन पर यूं गर्दी नहीं लगेगी और हम जैसे कन्फर्म सीट वालों को इन्हें देख-देख कर गिल्ट फील नहीं होगा।
जैसे-जैसे प्रयागराज की दूरी कम होती जा रही थी स्टेशनों पर यात्रियों की भीड़ बढ़ती दिख रही थी। रात को 2 बजे के बाद हमारी ट्रेन वाराणसी स्टेशन पहुंची। स्टेशन पर रंग-बिरंगी छटा छाई हुई थी, पूरा स्टेशन गुलजार पड़ा था। ट्रेन से उतरते ही एक अलग ही उमंग हवा में तैर रही थी। स्टेशन के सभी प्लेटफॉर्म पूरी तरह भरे हुए थे। लोगों का शोर गूंज रहा था। लेकिन इस शोर में अजब सी खनक थी, जैसे सब राग अहीर भैरव (भोर में गाया जाने वाला राग) गा रहे हों।
यात्रा की थकान के बावजूद सबके चेहरे पर परम शांति और संतुष्टि दिख रही थी। हम भी भीड़ को पार करते हुए वाराणसी स्टेशन के बाहर आ गए। 5 मिनट बाद दीदी और जीजाजी हमें लेने आ गए। स्टेशन के सामने की सड़कें यात्रियों और गाड़ियों से अंटे पड़े थे। अपने-अपने सामान के साथ लोग दोनों दिशाओं की तरफ आ-जा रहे थे। एकबारगी ऐसा महसूस हुआ कि जैसे सभी लोग पृथ्वी छोड़ कर दूसरे ग्रह पर बसने जा रहे हों।
एक घंटे बाद हम दीदी के घर पहुंच कर गेस्ट रूम में सोने चले गए। 9 फरवरी हो चुकी थी और रविवार का दिन था। इसलिए हमने पहले से ही सोमवार, 10 फरवरी को बनारस से प्रयागराज जाने की योजना बनाई थी।


बहुत सुंदर यात्रा वृतांत। मै भी आपके साथ साथ कुंभ की यात्रा पर चल रही थी।यात्रा भी इतनी जीवन्त कि उसे पढते हुए मन का यह मलाल जाता रहा कि मैं महाकुंभ नहीं जा पायी। अपने गृहनगर वाराणसी के भी दर्शन कर लिये मैने।संकटमोचन मंदिर के ठीक पीछे मेरा मायका है मैं उस दुकान और बाबा विश्वनाथ मंदिर तक का सफर आपकी कलम.से तय करती हुई अत्यंत भावुक भी हो गई। हृदय से अशेष आभार आपका।हार्दिक बधाई आपके सफल,सार्थक आस्था से भरी महाकुंभ की डुबकी के लिए, मां गंगा आपकी समस्त कामना पूर्ण करें। यह कुंभ जीवन की सार्थकता, गतिशीलता और मानसिक दृढता की त्रिवेणी बन परीक्षा भी लेता है,और समय तय करता है कि हम कितने सफल हुए। **यात्रा वृतांत की अंतिम पंक्तियां बहुत खूबसूरत और गहन चिंतन की प्रेरणा देती हैं।**यही तो जीवन है यही जीवन यात्रा है। न समय रुका है, न गंगा अपनी धार रोकती है, न घड़ी अपनी गति धीमी करती है, न ही संसार अपनी यात्रा को रोकता है… मनुष्य की तरह निरंतर दौड़ते रहना इन सबकी नियति है।
कुंभ का चक्र चलता रहेगा, एक पीढ़ी जाएगी, दूसरी आएगी… गंगा की बालू पर जहां कभी मेरे पुरखों के चरण पड़े थे शायद उनमें से कोई कण मेरे पैरों में लग गया हो*
एक बार पुन; बहुत बहुत बधाई।
पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर
धन्यवाद पद्मा जी, इतनी सुंदर और विवेचना पूर्ण प्रतिक्रिया देने के लिए। आपका बहुत बहुत आभार। यह जानकर अच्छा लगा कि आप भी वहीं कहीं आस पास रहती होंगी।
यह यात्रा वृतांत छापने के लिए पुरवाई के संपादक महोदय और पूरी टीम को मेरा बहुत बहुत आभार।
*सुमन सारस्वत का यात्रा-वृत्तांत : चंद्र-तारों-नक्षत्रों की साक्षी में महाकुंभ का अमृत स्नान*
सुमन जी!
महाकुंभ का बहुत ही रोचक वर्णन आपने किया है।
आपके साथ-साथ हमने भी महाकुंभ का आनंद उठाया।
हालांकि हम भीड़ वाली जगह पर जाने से बचते हैं, इसलिए किसी भी कुंभ स्थान के लिए कभी नहीं गये। उज्जैन तो यहाँ से बहुत पास पड़ता है। लेकिन तब भी नहीं गए।
पर आप लोगों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि जाना चाहिए था। कुंभ का चक्र चलता रहेगा। बच्चे वहाँ का जल ले आये हैं।अपने स्नान के जाल में वह डालकर स्नान हो जाने से भी पुण्य मिलेगा।
रोचक यात्रा वर्णन के लिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ।
प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया।
पुरवाई का आभार।
बहुत सुंदर वर्णन