Thursday, March 5, 2026
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सुमन सारस्वत का यात्रा-वृत्तांत : चंद्र-तारों-नक्षत्रों की साक्षी में महाकुंभ का अमृत स्नान

26 फरवरी, 2025 को अंतिम स्नान के साथ भले ही महाकुंभ का समापन हो गया हो लेकिन प्रयागराज के संगम तट पर स्नानार्थियों के संग गंगा की लहरें जितनी बार हिलोरें लेती थी उससे भी अधिक आस्था की लहरें भारतीय जनमानस में उमड़-उमड़ कर आती रहीं। जो गंगा नहा आए वो तो पुण्य के साक्षी बने ही मगर जो नहीं जा पाए उनके हृदयों में आस्था-श्रद्धा-भक्ति के भावों की त्रिवेणी बहती रही। जो शरीर से वहां उपस्थित नहीं थे उनका मन समाचारों को देखते समय बार-बार वहां जाकर आस्था की डुबकी लगा आता था और उनका यह भाव स्नान भी अमृत स्नान की कोटि में ही आता है क्योंकि माना जाता है कि – मन चंगा तो कठौती में गंगा
कुंभ में आज हमारा जाना या न जाना भले ही हुआ हो मगर संगम तट पर तिरबेनी (त्रिवेणी) नहाने की परंपरा पुरानी है। इतनी पुरानी जितने कि आपके पुरखे रहे होंगे… उससे भी कई युगों-युगों पहले। भारत देश के कोने-कोने पर बसे लोग हजारों-हजार साल पहले से 12-12 सालों के अंतराल पर जब भी कुंभ लगता था लाठी लेकर गठरी बांधे चल देते होंगे और संगम का रास्ता दिखाती थी वह अंतश्चेतना जो सुदूर साइबेरिया के पक्षियों को बसंत ऋतु में भारत खींच लाती है। हमारे पुरखों ने चाहे जितनी बार भी गांव-नगर बदले हों, हमारी हजारों पीढ़ियां जहां-जहां रही हों उसी अंतश्चेतना से बंधी कुंभ नहाने प्रयागराज पहुंचती रही हैं। और हम देश के जिस कोने में भी रहते हों गंगा की लहरें उठ-उठ कर हमारे मन को उद्वेलित करने लगती हैं क्योंकि संगम वही भूमि है जहां की रज में हमारे पुरखों के चरण पड़े थे… तो उसी रज को माथे से लगाने के लिए गंगा की लहरें हमें पुकारती हैं… तो कुंभ में जाना मतलब एक ग्रह-नक्षत्रों के विशेष संयोग के अवसर पर उपस्थित होना जिस समय पर आपकी कई पीढ़ियों के पुरखे वहां उपस्थित थे, ठीक उसी तरह जिस तरह आज आप हैं। कुंभ का मलतब है गंगा-यमुना की तरह अतीत और वर्तमान का मिलन और जिसमें अंतःसलिला सरस्वती की तरह भविष्य (आने वाली पीढ़ियों) का त्रिवेणी संगम।
जनवरी, 2024 होते-होते गंगा की लहरें मेरे मन में घुमड़-घुमड़ कर कुंभ की याद दिलाने लगीं कि मनवा रे, महाकुंभ की तैयारी कर लो। अभी पूरे 24 महीने बाकी थे फिर भी लग रहा था कि तीर्थराज पुकार रहा है कि अबकी मत चूकना। 2024 का साल शुरू होते-होते महाकुंभ की प्रतीक्षा होने लगी। नवंबर, 2024 के महीने में टिकट बुक करवाते समय अतिरिक्त होशियारी बरती गई। हमने 7 फरवरी और 16 फरवरी की टिकटें बुक करवाईं। ये मेरा ही आइडिया था। मैं कोई रिस्क नहीं लेना चाहती थी। रोज दिन में कई-कई बार PNR नंबर चेक किया जाता कि वेटिंग लिस्ट कहां तक पहुंची। 1 फरवरी तक वेटिंग लिस्ट 7 नंबर तक आ गई थी और वापसी की टिकट RAC में आ गई थी। इस बीच अलग-अलग वेबसाइट खंगाले जाते कि अपने बजट में कोई फ्लाइट टिकट मिल जाए लेकिन इन टिकटों के दाम तो एवरेस्ट की ऊंचाई से कंपटीशन कर रहे थे। 5 फरवरी तक ट्रेन की वेटिंग लिस्ट टस से मस नहीं हुई थी। मेरे बेटे ने ऐलाने-जंग कर दिया था कि अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुई तो वह स्टेशन तक भी नहीं जाने वाला। टीवी पर समाचार देख-देख कर वह अपनी फैमिली के लिए कोई रिस्क नहीं लेना चाहता था। 6 फरवरी तक टिकट RAC तक भी नहीं पहुंची थी लेकिन वेटिंग लिस्ट 1,2,3,4,5,6 तक आ गई थी। मेरा दिल धक-धक हो रहा था कि वेटिंग लिस्ट से पहले RAC भी आता है। सब मान चुके थे कि अब टिकट कन्फर्म होने से रहा। रात भर मैं सोचती रही कि अगर टिकट कन्फर्म नहीं हुआ तो कल कैसे जाना होगा और 15 फरवरी का जाना भी मुश्किल लग रहा था। ….तो मेरे पास तो यही रात थी और आज यही रात बड़ी भारी लग रही थी कि सुबह उठकर महाकुंभ जाने का सपना कहीं छन्न से न टूट जाए। अचानक सुबह 4 बजे आंख खुल गई। गाड़ी का PNR नंबर चेक किया तो देखा केवल 2 सीट कन्फर्म हुई थी- मेरी और मेरे बेटे की। बाकी 4 सीटें हवा में तैर रही थी। आखिर थोड़ी ना-नुकूर के साथ सबने हम दोनों को राजी किया कि तुम दोनों जाओ अगली खेप से हम चले जाएंगे।
7 फरवरी, 2025 की रात की ट्रेन थी। मैंने ऑफिस आकर अपना काम निपटाया। ऑफिस और लोकमान्य तिलक टर्मिनस स्टेशन दोनों ही मेरे घर के पास हैं इसलिए समय की चिंता नहीं थी। ऑफिस से छूटने के बाद घर आकर मैंने और बेटे ने अपना-अपना बैग उठाया और भारी मन से स्टेशन की ओर निकले। बाकी लोगों के बिना जाना अच्छा नहीं लग रहा था। …खैर हम समय पर स्टेशन पहंच गए। थोड़ी देर में ट्रेन प्लेटफॉर्म पर लग गई। हम दोनों अपने कोच में दाखिल हुए… और भई अपनी सीट देखकर तो दिल खुश हो गया। अब यकीन हो गया था कि सच में हमारी यात्रा मंगलमय और सुखद होने वाली है। हमारी फर्स्ट क्लास की टिकट थी और मात्र दो सीट वाला कूपे हमें मिला था। बेटा खुश… ट्रेन से यात्रा करने में उसे पहली बार आनंद आया। हमारा पूरा सफर आराम से गुज़रा। 
अगले दिन शनिवार था और रास्ते में पड़ने वाले सभी स्टेशन खचाखच भरे हुए थे। और यह बात अच्छी तरह समझ आ रही थी कि सप्ताहांत होने के कारण इन यात्रियों ने बिना टिकट बुक करवाए जनरल टिकट से ट्रेन की क्षमता से अधिक ठुंस-ठुंस कर यात्रा करने वाले हैं। अगर रेलवे एक ट्रेन की पूरी सीटों की संख्या जितने टिकट जारी करे तो स्टेशन पर यूं गर्दी नहीं लगेगी और हम जैसे कन्फर्म सीट वालों को इन्हें देख-देख कर गिल्ट फील नहीं होगा।
जैसे-जैसे प्रयागराज की दूरी कम होती जा रही थी स्टेशनों पर यात्रियों की भीड़ बढ़ती दिख रही थी। रात को 2 बजे के बाद हमारी ट्रेन वाराणसी स्टेशन पहुंची। स्टेशन पर रंग-बिरंगी छटा छाई हुई थी, पूरा स्टेशन गुलजार पड़ा था। ट्रेन से उतरते ही एक अलग ही उमंग हवा में तैर रही थी। स्टेशन के सभी प्लेटफॉर्म पूरी तरह भरे हुए थे। लोगों का शोर गूंज रहा था। लेकिन इस शोर में अजब सी खनक थी, जैसे सब राग अहीर भैरव (भोर में गाया जाने वाला राग) गा रहे हों।
यात्रा की थकान के बावजूद सबके चेहरे पर परम शांति और संतुष्टि दिख रही थी। हम भी भीड़ को पार करते हुए वाराणसी स्टेशन के बाहर आ गए। 5 मिनट बाद दीदी और जीजाजी हमें लेने आ गए। स्टेशन के सामने की सड़कें यात्रियों और गाड़ियों से अंटे पड़े थे। अपने-अपने सामान के साथ लोग दोनों दिशाओं की तरफ आ-जा रहे थे। एकबारगी ऐसा महसूस हुआ कि जैसे सभी लोग पृथ्वी छोड़ कर दूसरे ग्रह पर बसने जा रहे हों।
एक घंटे बाद हम दीदी के घर पहुंच कर गेस्ट रूम में सोने चले गए। 9 फरवरी हो चुकी थी और रविवार का दिन था। इसलिए हमने पहले से ही सोमवार, 10 फरवरी को बनारस से प्रयागराज जाने की योजना बनाई थी।

सोमवार की सुबह हुई। आज हमें शाम को 6-7 बजे के करीब हमें महाकुंभ अमृत स्नान के लिए तीर्थराज प्रयोग की ओर प्रस्थान करना था। आज सुबह भी हम बाबा विशवनाथ के दर्शन करने की इच्छा से घर से निकले मगर तमाम रास्तों पर भीड़ ही भीड़, मोटर-गाड़ियों की चिल्ल पों। पता चला कि मंदिर में बहुत लंबी लाइन लगी है, 4-5 घंटे के तक भी नंबर नहीं आ सकता। हमने सोचा चलो गिफ्ट देने के लिए बनारसी साड़ी और ड्रेस मटेरियल खरीद लिया जाए। यहां भी दुकान  खाली-खाली सी लग रही थी। अपने काम की कोई चीज नहीं मिली। दुकानदार ने कहा, मैडम जी अब आप मार्च महीने में आना तब आपको हर माल मिल जाएगा। उसकी बात सुनकर हम हैरान होते हुए घर लौट आए। शाम होते-होते हम अपना बैकपैक करके महाकुंभ जाने के लिए तैयार हो गए। इस बीच आस-पास के रिश्तेदारों को पता चल गया था कि मैं बेटे को लेकर अकेले ही मुंबई से महाकुंभ स्नान के लिए आई हूं। दीदी के पास सबके चिंता से भरे फोन आने लगे कि पूर्णिमा को कारण भीड़ बढ़ने वाली है, कैसे जाओगे, न्यूज़ नहीं देखा क्या, 20-25 किमी का जाम लगा है, 10-15 किमी पैदल चलना पड़ेगा, अभी और दो-तीन दिन रुक जाओ। सबके फोन सुन-सुनकर खोपड़ी भन्ना गई। इसी फोन-फान में रात के आठ बज गए। दीदी-जीजाजी चिंता में पड़ गए कि क्या करें, अपने पास दूसरा मौका है नहीं। हम सबकी 12 फरवरी की लौटने की टिकट थी। मैंने और बेटे ने एक-दूसरे को देखा और मन में कहा कि चाहे जो हो जाए हम तो किसी भी हाल में जाएंगे ही चाहे अकेले ही जाना पड़े। 
आखिरकार जीजाजी ने फैसला लिया कि चलते हैं जो होगा देखा जाएगा। बेटे ने हां में हां मिलाई और बोला, “सब लोग महाकुंभ में जा रहे हैं कोई वॉर पर तो नहीं जा रहे …फिर मैं तो हूं ही।” मैं बेटे को देखती रह गई… क्या ये सच में इत्ता बड़ा हो गया है!!! उसने मुझे अपनी ओर देखते हुए देखा तो बोला- “हां मम्मी, मैं अब बड़ा हो गया हूं। आप बोलो तो आपको अपने कंधे पर बिठा कर ले चलूं।” “हैंई… ये तो श्रवण कुमार की तरह बातें करने लगा…” मैं बोली, “ना बाबा ना, तू श्रवण कुमार मत बन। कहीं किसी राजा दशरथ का तीर न लग जाए। अभी मुझे बहुत जीना है और मुंबई लौटकर ऑफिस की मैगज़ीन के लिए महाकुंभ यात्रा संस्मरण लिखना है। मैं कार में बैठ कर ही चली जाऊंगी।” उसके बाद हंसते-बोलते रात करीब 9 बजे हमारी कार रवाना हुई। बनारस से प्रयागराज जाने के लिए एनएच-2 का रूट पकड़ा। जैसे-जैसे आगे बढ़ते गए ट्रैफिक बढ़ता गया। एक घंटे बाद ऐसा लगा कि अब आगे जाना मुश्किल है। लेकिन एक बार निकल पड़े तो आगे बढ़ते ही गए। रास्ते में कितने सारे राज्यों की नंबर प्लेट वाली गाड़ियां मिलीं। दूसरे राज्यों की ढेरों बसें और ट्रक भी। कुछ ट्रकों में मचान भी बनाई गई थी कि जिससे अधिक से अधिक लोग समा सकें। गाड़ियां रेंगती चल रही थी। शायद रात के 1 बज चुके थे। झूंसी अंदावा चौराहे से 4-5 किलोमीटर तक भयंकर जाम लग चुका था। एक जगह सड़क किनारे 4-5 चाय वालों की दुकान खुली थी। हमारी भी चाय की तलब जाग उठी। ड्राइवर को भी फ्रेश रखने के लिए चाय पिलानी जरूरी थी। गाड़ी रोकी गई। चाय के इंतजार में दीदी-जीजाजी के एक परिचित मिल गए, वे लोग भी महाकुंभ स्नान के लिए निकले थे। फिर ये तय किया गया कि हम सब साथ-साथ रहेंगे। हमारी गाड़ियां आगे-पीछे चलने लगी। 
कुछ दूर बढ़ने के बाद देखा कि अचानक से पैदल चलने वालों की भीड़ उमड़ आई। इधर-उधर देखने पर पता चला कि स्टेट बसें अब और आगे नहीं जा सकतीं तो उन्होंने यात्रियों को आगे पैदल ही जाने का निर्देश दिया। आखिरकार झूंसी अंदावा तिराहे पर पुलिस ने गाड़ियों को रोक दिया। ड्राइवर ने वहीं पटेल बाग पार्किंग में गाड़ी पार्क करते हुए कहा कि यहीं आकर मिलना। शास्त्री पुल पर बहुत सारे बाइकर्स थे जो यात्रियों के अपनी बाइक पर बिठा कर 2-3 किमी की दूर मेला क्षेत्र में पहुंचा रहे थे। एक बाइक पर 2 सवारी को बिठाया जा रहा था। हम सबने प्रति सवारी 200 रुपये के रेट से चार बाइक ली। बाइक से मेला क्षेत्र में पहुंचने के बाद आगे का रास्ता पैदल ही चलना था।
यहां पहुंचने के बाद लगा कि हां अब हम महाकुंभ मेले में प्रवेश कर रहे हैे। सड़क के एक ओर आने वालों की लाइन और दूसरी ओर जाने वालों की लाइन थी। सभी स्वतःस्फूर्त अनुशासन बद्ध चल रहे थे। महिलाएं, पुरुष, युवा, बच्चे सभी बढ़े चले जा रहे थे जैसे पैरों में पंख लगे हों, करोड़ों की भीड़, संगम तक पहुंचने की अकुलाहट, हर होठों पर मंत्रोच्चार, हर कदम पर तप, हर सांस में आस्था, हृदय में उमंग… यहां कोई भेदभाव नहीं, बस सभी प्यासी आत्माएं जो शीघ्र से शीघ्र त्रिवेणी के जल में छककर अमृत पान कर लेना चाहती थीं… उनकी, मेरी, सबकी आत्मा पुकार रही थी- भाव विव्हल हो रही थी- 
चल मनवा गंगा जमुना तीर
गंगा जमुना क निर्मल पानी
शीतल होत शरीर…
हर तरफ पुलिस बल तैनात था। सभी यात्रियों का मार्गदर्शन कर रहे थे। चलते-चलते हम किसी सेक्टर में आ गए। सभी को बिना रुके आगे बढ़ते जाना था इसलिए पता करने का मौका ही नहीं मिला कि हम किस सेक्टर में आ पहुंचे हैं। यहां पर अस्थाई रूप से सड़कें बनाई गई थीं। कहीं मिट्टी, कहीं बोरे, कहीं ग्रीन कारपेट बिछाए गए थे। पैदल चलने में जरा भी परेशानी नहीं हो रही थी। 3-4 किमी का रास्ता आसानी से तय हो गया। अब सामने पीपे का पुल दिखाई दे रहा था। भीड़ उस पुल से आगे त्रिवेणी संगम की ओर बढ़ रही थी। भीड़ के साथ-साथ हम भी उसी पर चल दिए। कोई एक फर्लांग आगे बढ़े थे कि पुल के बाईं ओर एक घाट पर सबको स्नान करते देखा। जीजाजी ने कहा कि देखो, यहां चलें क्या? 
पुल पर लोगों का रेला देख कर हम सबकी जान सूख रही थी। कल, बुधवार को पूर्णिमा है तो भीड़ बढ़ने की पूरी संभावना थी। हम 10 फरवरी, सोमवार की रात को निकले थे कुछ ही घंटों में तारीख बदल चुकी थी और आज मंगलवार का दिन हो गया। अभी तो पूरी तरह अंधेरा ही था। भोर होने में काफी समय था अगर एक बार को उस पार चले जाते तो वापस लौटते समय परेशानी का सामना करना तय था। हम सबने एक साथ कहा- हां-हां, चलिए। फिर हम सब उल्टी दिशा में लौटने लगे। किसी तरह पुल से नीचे उतर कर उसी घाट की ओर बढ़ चले। हम जानते थे कि ये अरैल क्षेत्र का संगम घाट नहीं है। लेकिन संगम की ओर जाकर हम रिस्क नहीं लेना चाहते थे। फिर कानों में योगी बाबा की वाणी गूंज रही थी कि सबको संगम घाट पर आने की आवश्यकता नहीं है, जिसको जहां जो घाट मिले वहीं अमृत स्नान कर लें। 
हमारे रास्ते में सबसे पहले यही घाट पड़ा और अभी यहां ज्यादा भीड़ भी नहीं थी। हम नदी की ओर बढ़ चले। वहीं एक पंडा महाराज अपना तख्त बिछाए बैठे थे। हमने उन्हें प्रणाम किया और उनकी कस्टडी में अपना सामान रख कर स्नान करने की अनुमति मांगी।
पास में एक लड़का नीम के दातून बेच रहा था। उससे दातून लेकर हमने स्नान से पूर्व दातून भी किया। बेटे को बोला- ये ऑरगैनिक माउथ क्लीनर है। वह बोला, “मम्मा, मुझे सब पता है, ये नीम का दातून है। इसको बेच-बेचकर महाकुंभ में एक लड़के ने हजारों रुपये कमा लिए।” हम सब लोग हंस दिए। यह अस्थाई घाट था। बोरों में मिट्टी भरकर सीढ़ियां तैयार की गईं थी। आगे 4-5 फीट की दूरी पर बैरीकेट्स लगे हुए थे। 2 नावें भी थीं, सुरक्षित स्नान के लिए एक पर जल पुलिस तैनात थी और दूसरी मल्लाह पर की अपनी नाव थी। संभलते-संभलते सीढ़ियों पर पैर रखते हम पानी में उतर रहे थे। मां गंगा-यमुना-सरस्वती को प्रणाम किया, स्नान के लिए उनकी आज्ञा ली। दूर से देखने पर जल मटमैला जान पड़ रहा था लेकिन कमर तक पानी में जाते ही जल एकदम शुद्ध और दिव्य अनुभूति कराने लगा। पैर रखते ही लगा जैसे पांवों के नीचे किसी ने नरम-नरम बालू का गलीचा बिछा दिया हो। सारा डर गायब हो गया था। फिर याद किया कि कितनी प्रतीक्षा के बाद वह क्षण आ गया है कि मैं महाकुंभ में अमृत स्नान कर रही हूं और यह ग्रह-नक्षत्रों का ऐसा दुर्लभ संयोग है जो सदियों में घटित होता है, जाने कितनी प्रतीक्षा के बाद…। पहली डुबकी लगाते ही लगा कि शरीर शीतल हो रहा है… दो-तीन डुबकियां लगाते-लगाते जैसे अंतर्मन निर्मल होता जा रहा है… 
सच ही तो है- “आपो वै अमृतम्” यानी जल ही अमृत है!
हम सबने शास्त्रोक्त स्नान किया। अपने सभी परिजनों के नाम से आस्था की एक-एक डुबकी लगाई। इंटरनेट पर महाकुंभ स्नान की रील देख-देखकर बहुत कुछ सीख लिया था। बेटे ने भी बड़े उत्साह से आस्था की डुबकी लगाई – माता-पिता, बहन-जीजा और अपने पुरखों के नाम की भी डुबकी लगाई। सब उसने पहले ही पूछ लिया था। स्नान के बाद मंत्रोच्चार करते हुए सूर्य को जल भी अर्पण किया। आसमान में चतुर्दशी के चंद्र देव मोहक छटा बिखराए हुए मुस्कुरा कर अपनी याद दिला रहे थे तो ‘ओम् सोम सोमाय नमः’ कहते हुए उन्हें भी अर्घ्य दिया। …और इस तरह से चंद्र-तारों-नक्षत्रों को साक्षी बनाते हुए हमने अपना महाकुंभ स्नान पूर्ण किया। स्नान के बाद बैरीकेट्स के दूसरी ओर खड़े नाव वाले लड़के को गैलन देकर गंगा जल भी भरवा लिया। 
स्नान के बाद नए वस्त्र धारण कर पंडित जी से संकल्प छुड़ाया। गंगा मैया को साड़ी और श्रृंगार, नारियल-कलश, दीपदान और नैवेद्य अर्पित किया। पंडित जी को दक्षिणा प्रदान की और इस तरह हमारा महाकुंभ स्नान पूर्ण हुआ। फिर निकास के रास्ते से होते हुए 3-4 किमी पैदल चलते हुए उसी जगह आ पहुंचे जहां बाइकर्स पार्किंग एरिया तक ले जाने वाले थे।
अब बात करते हैं महाकुंभ व्यवस्था की। पूरा महाकुंभ क्षेत्र रोशनी से जगमगा रहा था। टेंट वालों ने, अखाड़े वालों ने इतनी सुंदर सजावट की थी कि ऐसा लगता था कि हम पुराणों के काल में पहुंच गए हैं। एक अलग ही अलौकिक दृश्य और दिव्य अनुभूति होती रही। बार-बार लग रहा था कि हम पृथ्वी पर नहीं बल्कि किसी दिव्य लोक में विचरण कर रहे हैं। श्रद्धा और भक्ति की दिव्य आभा तीर्थयात्रियों के चेहरे पर आभासित हो रही थी और लग रहा था कि ये सभी भी किसी दिव्य लोक के वासी हैं। सभी एक ही परमात्मा के अंश लग रहे थे, गंगा की बूंदों की तरह निर्मल और दिव्य। 
हम जहां-जहां से गुजरे, हर जगह चकाचक थी। गंदगी नाम की कोई चीज नहीं थी। रास्ते के दोनों तरफ डस्टबिन और शौचालय बने हुए थे। उनके आस-पास भी बदबू रहित सफाई थी। चाय-नाश्ते की दुकानें भी साफ सुथरी। दूरबीन से देखने पर भी कोई गंदगी नहीं, बदबू का कहीं नामो-निशान नहीं जैसा कि आम तीर्थ स्थलों में दिखाई देता है। बनारस से प्रयागराज के पूरे रास्ते कहीं गंदगी दिखी नहीं जोकि आम दिनों में दिखाई देती है। 
सुबह के 5 बज हो चुके थे। भीड़ का सामना न करना पड़े इसका एहतियात बरतते हुए हम तेज-तेज चलते हुए बाइकर्स के अड्डे तक आ पहुंचे। फिर बाइकर्स ने हमें पार्किंग एरिया पहुंचा दिया। ड्राइवर साब सड़क पर गाड़ी लेकर हाजिर थे। और हम गाड़ी में बैठकर फुर्र…। दो किलोमीटर दूर आ जाने के बाद चाय की एक टपरी पर गाड़ी रोक कर चाय पी और इसके बाद सुबह आठ बजे तक हम बनारस अपने घर लौट आए।
घर आकर हम सबने राहत की सांस ली और फैमिली ग्रुप में पोस्ट कर दिया कि हमारा महाकुंभ स्नान पूरा हुआ और हम सब सकुशल घर वापस आ गए हैं। घर आकर हम सब सत्यनारायण भगवान की पूजा की तैयारी में लग गए क्योंकि किसी तीर्थ से लौटकर पूजा-हवन करना जरूरी होता है। तीन घंटों में पूजा-हवन भी संपन्न हो गया। 
दो-तीन घंटे के बाद बेटे संग मार्केट के लिए निकली। उसके किसी दोस्त को रुद्राक्ष की मालाएं और जेम स्टोन चाहिए थे। तुलसी मानस मंदिर के पास हैंडीक्राफ्ट वाली दुकान भी खाली जैसी मिली। दो-तीन दुकानों में पूछ-ताछ की लेकिन नहीं मिला। हमने सोचा कि चलो विश्वनाथ गली चलते हैं। एक घंटा इंतजार के बावजूद रिक्शा नहीं मिला। रिक्शेवाले भी 200-300 किराया मांग रहे थे। बनारस की हर सड़क-चौराहे-गली में श्रद्धालुओं की भीड़ लगी थी। हर मंदिर के सामने लाइन, जहां देखो मुंड ही मुंड नजर आ रहे थे। यहां भी प्रयाग से कम भीड़ नहीं थी। ऐसा था कि जितने श्रद्धालु प्रयागराज आ रहे थे सभी वहां से अयोध्या राममंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर दर्शन के लिए पहुंच रहे थे। हमने भी यही योजना बनाई थी लेकिन भीड़ को देखते हुए सब कैंसिल कर दिया था। आने वाले श्रद्धालु जमकर खरीदारी भी कर रहे थे। सब यादों के तौर पर कुछ न कुछ ले जाना चाहते थे। फिर बनारस में हैंडी क्राफ्ट, चूड़ियां, लकड़ी के खिलौने, बनारसी साड़ियां, ड्रेस मटेरियल, लखनवी ड्रेस जैसी कितनी सारी चीजें खरीदने के लिए हैं! संकटमोचन गली में पूजा की एक दुकान में मैंने गंगाजल भरने के लिए 2 दर्जन लोटियां मांगी मगर उसके पास सिर्फ 5 थीं। दुकानदार ने बताया कि बनारस में हर जगह इतनी भीड़ और ट्रैफिक जाम है कि हम होलसेल मार्केट जा ही नहीं पा रहे हैं। आप कुंभ के बाद आना। 
हम दोनों निराश होकर लौट आए। दुख के मारे रास्ते में चाट की दुकान से दोने में समोसा-चाट और कुल्हड़ में लस्सी को उदरस्थ किया तब कहीं जाकर मस्तिष्क शांत हुआ। इसी चक्कर में थोड़ा रास्ता भी भटक गए, मगर बनारस की गलियों का लुत्फ उठाते हुए पूछते-पाछते घर पहुंच ही गए।
रात के भोजन के बाद बैग पैक किया। सुबह अपनी वापसी दीनदयाल उपाध्याय रेल्वे स्टेशन (पुराना नाम मुगलसराय) थी। जीजा जी हमें दो-ढाई घंटे पहले ही रेलवे स्टेशन पहुंचा गए कि हम ट्रैफिक जाम में न फंस जाएं। बनारस से रामनगर होते हुए चंदौली दीनदयाल उपाध्याय रेल्वे स्टेशन तक रास्ता साफ-सुथरा था, कहीं भी कचरे के ढेर नहीं दिखे। अच्छा लगा और यही सोचती रही कि महाकुंभ के बाद भी प्रशासन इसी तरह सक्रिय और जनता सफाई के प्रति जागरूक रहे तो अच्छा! सही बात है कि महाकुंभ मेला केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यह जल, पृथ्वी, वायु और प्रकृति के सम्मान का जीवंत उदाहरण है।
मुंबई जाने वाली ट्रेन समय पर आ गई थी। हम दोनों अपनी सीट पर आ कर बैठे। रास्ते भर मन गंगा तट पर ही विचरता रहा। ट्रेन मुंबई की दिशा में दौड़ती जा रही थी कि मेरा मन पीछे की दिशा में भाग रहा था, जिस कुंभ की प्रतीक्षा सालों से थी वह पूर्ण हुई लेकिन मन में अगले कुंभ की प्रतीक्षा जग गई है… यही तो जीवन है यही जीवन यात्रा है। न समय रुका है, न गंगा अपनी धार रोकती है, न घड़ी अपनी गति धीमी करती है, न ही संसार अपनी यात्रा को रोकता है… मनुष्य की तरह निरंतर दौड़ते रहना इन सबकी नियति है।
कुंभ का चक्र चलता रहेगा, एक पीढ़ी जाएगी, दूसरी आएगी… गंगा की बालू पर जहां कभी मेरे पुरखों के चरण पड़े थे शायद उनमें से कोई कण मेरे पैरों में लग गया हो… और शायद यही मोह हमें बार-बार तीर्थों की ओर खींचता है… तीर्थ हैं तो हमारी विरासत है, हमारी सभ्यता, हमारी अस्मिता… बस यही कि पूरब-पश्चिम-उत्तर-दक्षिण से पूरा देश इन तीर्थों की ओर दौड़ा चला आता है।
…इसलिए तीर्थों को बचाइए… अपनी पीढ़ी को एक गौरवमयी विरासत सौंपकर जाइए…!!!


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4 टिप्पणी

  1. बहुत सुंदर यात्रा वृतांत। मै भी आपके साथ साथ कुंभ की यात्रा पर चल रही थी।यात्रा भी इतनी जीवन्त कि उसे पढते हुए मन का यह मलाल जाता रहा कि मैं महाकुंभ नहीं जा पायी। अपने गृहनगर वाराणसी के भी दर्शन कर लिये मैने।संकटमोचन मंदिर के ठीक पीछे मेरा मायका है मैं उस दुकान और बाबा विश्वनाथ मंदिर तक का सफर आपकी कलम.से तय करती हुई अत्यंत भावुक भी हो गई। हृदय से अशेष आभार आपका।हार्दिक बधाई आपके सफल,सार्थक आस्था से भरी महाकुंभ की डुबकी के लिए, मां गंगा आपकी समस्त कामना पूर्ण करें। यह कुंभ जीवन की सार्थकता, गतिशीलता और मानसिक दृढता की त्रिवेणी बन परीक्षा भी लेता है,और समय तय करता है कि हम कितने सफल हुए। **यात्रा वृतांत की अंतिम पंक्तियां बहुत खूबसूरत और गहन चिंतन की प्रेरणा देती हैं।**यही तो जीवन है यही जीवन यात्रा है। न समय रुका है, न गंगा अपनी धार रोकती है, न घड़ी अपनी गति धीमी करती है, न ही संसार अपनी यात्रा को रोकता है… मनुष्य की तरह निरंतर दौड़ते रहना इन सबकी नियति है।
    कुंभ का चक्र चलता रहेगा, एक पीढ़ी जाएगी, दूसरी आएगी… गंगा की बालू पर जहां कभी मेरे पुरखों के चरण पड़े थे शायद उनमें से कोई कण मेरे पैरों में लग गया हो*
    एक बार पुन; बहुत बहुत बधाई।
    पद्मा मिश्रा-जमशेदपुर

  2. धन्यवाद पद्मा जी, इतनी सुंदर और विवेचना पूर्ण प्रतिक्रिया देने के लिए। आपका बहुत बहुत आभार। यह जानकर अच्छा लगा कि आप भी वहीं कहीं आस पास रहती होंगी।
    यह यात्रा वृतांत छापने के लिए पुरवाई के संपादक महोदय और पूरी टीम को मेरा बहुत बहुत आभार।

  3. *सुमन सारस्वत का यात्रा-वृत्तांत : चंद्र-तारों-नक्षत्रों की साक्षी में महाकुंभ का अमृत स्नान*

    सुमन जी!
    महाकुंभ का बहुत ही रोचक वर्णन आपने किया है।
    आपके साथ-साथ हमने भी महाकुंभ का आनंद उठाया।
    हालांकि हम भीड़ वाली जगह पर जाने से बचते हैं, इसलिए किसी भी कुंभ स्थान के लिए कभी नहीं गये। उज्जैन तो यहाँ से बहुत पास पड़ता है। लेकिन तब भी नहीं गए।
    पर आप लोगों को पढ़ते हुए ऐसा लगता है कि जाना चाहिए था। कुंभ का चक्र चलता रहेगा। बच्चे वहाँ का जल ले आये हैं।अपने स्नान के जाल में वह डालकर स्नान हो जाने से भी पुण्य मिलेगा।
    रोचक यात्रा वर्णन के लिये आपको बहुत बहुत बधाइयाँ।
    प्रस्तुति के लिए तेजेंद्र जी का शुक्रिया।
    पुरवाई का आभार।

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