“अब तिफ्ल में खूबियाँ कैसे हों अवतार की,
दूध तो बोतल का है तालीम है सरकार की,
उस्ताद शायर अकबर इलाहाबादी साहब ने वैसे तो ये बात इंसानों के गिरते हुए किरदार के सबब से कही थीं। पर अब यह बात आजकल अदबी मंचों पर हो रहे अदबी तमाशे को लेकर खासी मौज़ू हो चली है। फूहड़ता और उठा पटक तो मुशायरों और कवि सम्मेलनों से पहले भी जुड़ी थी पर पहले ये सब पर्दे के पीछे होती थी अब मंच पर होती है।
पहले मुशायरे में अहल-ए-ज़ौक़ बैठते थे — जो एक मिसरे पर रात भर सोचते थे। फिर उसी मिसरे की मिसाल बनाकर बज्म – ए अदब की सदारत किया करते थे। कोई शायर या कवि अगर डायरी या पर्चा निकाल कर अपना कलाम या कविता पढ़े तो उसे हल्कापन माना जाता था। दर्शक हूटिंग करते थे कि कैसा शायर है जिसे अपना ही कलाम याद नहीं रहता। लोग बाग खिल्ली उड़ाते हुए पूछते “अपना ही कलाम याद नहीं रख पाते। अपना ही लिखा पढ़ रहे हो या किसी गैर का? अपना होता तो याद रहता। गैर का है तभी तो“ इस बात पर महफ़िल में ठहाके लगते और शायर शर्म से पानी -पानी हो जाता।
इसके उलट अब तो मोबाइल निकालकर ही लोग अपने शेर या कविता को सगर्व बाँचना शुरू करते हैं। क्योंकि अब अच्छे शेर सुनने और उसे समझ कर दाद देने वाले कद्रदान भी तो नहीं रहे। मोबाइल निकालकर शेर पढ़ने वाले शायरों के सामने मोबाइल निकालकर रील बनाने वाली भीड़ बैठती है। उसे शेर नहीं, “स्टेटस” चाहिए। उन्हें 15 सेकंड का टुकड़ा मिल जाए व्हाट्सएप पर अपनी डीपी लगाने को, इंस्टाग्राम पर अपनी फोटो के साथ नये शेरों की डीपी लगाने के लिए। आजकल के शायर भी अब पूरा कलाम ना तो लिख कर पोस्ट करते हैं और ना ही पूरी नज्म का वीडियो डालते हैं बस इधर -उधर सोशल मीडिया पर प्रचार -प्रसार के लिए अपने किसी मशहूर शेर की “हुक-लाइन” डालते रहते हैं।
ये गजलगो अपने वीडियो की शुरुआत “हाय गायज, या फिर माई डियर फ्रेन्डस” से करते हैं फिर आगे अपने हुकलाइन का शेर सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हैं। ऐसे ही हाइब्रिड शायरों के लिए किसी कवि ने क्या खूब कहा है-
“उर्दू का जनाज़ा, हिंदी का तमाशा
ज़बान से वफ़ा किसी को नहीं ”
इसके अलावा “चिकलिट “ भी खूब चल रहा है। चाकलेट लिट्रेचर यानी जिसमें लड़का -लड़की किसी कैंपस में कैंटीन में काफी शॉप या कैंपस में मिले साथ में चॉकलेट शेयर करते हुए जावेद अख्तर या गुलजार का कोई शेर भी सोशल मीडिया पर शेयर कर दिया। इसके अलावा “कविता विथ काफी “ या कविता कैफे जैसी बातें भी प्रचलित होती हैं। ऐसी जगहों पर कविता काफी के साथ परोसी जाती है पर शर्त ये होती है कि सभी की काफी का बिल कविता सुनाने वाला ही भुगतान करता है। इस महफ़िल भी सभी श्रोता भी कवि या कवियत्री होते हैं। हर किसी का कविता सुनाने और सुनने का नंबर आता है। बस शर्त सिर्फ एक ही होती है कि जिसकी कविता सुनाने की बारी होती है वही सभी सुनने वालों की काफी का भुगतान करता है। तो लब्बोलुबाब यह है कि कवि अपने श्रोताओं को कविता सुनने का भुगतान करता है। सुप्रसिद्ध कवि धूमिल ने कहा था –
“ कविता, भाषा में आदमी होने की तमीज है। ” तब उनका आशय यही रहा होगा कि कविता में मनुष्यता की बात होगी और कविता कहने वाले लोग किरदार से आला होंगे। उनमें कोई क्षुद्रता नहीं हुआ करेगी।
मगर अब तो कविता के मंचों के चोंचले देखकर भवानी बाबू की कविता याद आती है –
“जी हां, मैं किसिम -किसिम के गीत बेचता हूँ ,
मैं तरह -तरह के गीत बेचता हूँ,
लोगों ने तो बेच दिये अपने ईमान,
ये सुनकर आप ना हों हैरान,
मैं किसिम किसिम के गीत बेचता हूँ। ”
यानी अब काफी हाउस में कविता बिक रही है काफी के साथ बतौर चखना कविता परोसी जा रही है।
अब इस चिकलिट समय में ना तो खालिस उर्दू बची, और ना ही शुद्ध हिंदी। किरदार के साथ -साथ अदब की भी एक खिचड़ी पकी है — “ब्रो”, “वाइब”, “लिट” वाले शेर। मंच से तहज़ीब उठ गई, बाज़ारू जुमले रह गए। जो शायर ज़बान की हिफ़ाज़त करे, उसे “ओल्ड स्कूल” कहकर साइड कर दिया जाता है।
अदबी और तरही मुशायरे की अब दावत नहीं बल्कि “बुकिंग” होती है। 50 हज़ार, 1 लाख, l ये कीमत शायरी की नहीं, बल्कि चेहरे के रेट हैं, जो सबसे सस्ते में सबसे ज़्यादा चीख़ सके, वो “यंग सेंसेशन” असली शायर अगर फ़ीस पूछ ले, तो कहा जाता है “अरे आप तो कमर्शियल हो गए।” वाह!
“देखो और दिखाओ के इस क्रूर और चम चमाते सोशल मीडिया के दौर ने शायर को “इन्फ्लुएंसर” बना दिया। अब वो शेर इसलिए नहीं कहता कि दर्द है, इसलिए कहता है कि ट्रेंड में है। “मोहब्बत”, “बेवफ़ाई”, “दिल टूटना” — तीन टॉपिक, सौ रीलें, एक ही लफ़्ज़ बार-बार। नई बात, नया ख़याल, नई ज़मीन सब नदारद।
कोई इन साहिबानों को ये भी बताये कि कविता सुनने की चीज़ है, देखने की नहीं। जिस दिन माइक से पहले कैमरा हटेगा, उस दिन आधे नकली “शायर” ख़ुद भाग जाएँगे।
जब तक शेर की क़ीमत लाइक्स से तय होगी, तब तक अदब यतीम रहेगा। मंच पर वो ही बचेगा जिसके पास कहने को दर्द हो, बेचने को चेहरा नहीं।
वरना याद रखिए — ताली बजाने वाली भीड़ कल किसी और के लिए भी बजाएगी। पर जो लफ़्ज़ रूह कंपा दे, वो अकेले में भी ज़िंदा रहता है।
एक मशहूर शायरा ने फरमाया भी है-
“दर्दे नियाजे इश्क के काबिल नहीं रहा,
जिस दिल पे हमको नाज था वो दिल नहीं रहा।“
मुशायरों और कवि सम्मेलनों के गिरते स्तर से आप दुखी नहीं हैं क्या?
“तुम्हारे शहर में कुछ भी नहीं हुआ है क्या,
कि चीखें तुमने सच में सुनी नहीं हैं क्या “
