Sunday, June 23, 2024
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रुमानियत के एहसास से ज़्यादा रात की दहशतगर्दी बयाँ करती है सिद्धांत गुप्ता अभिनीत फ़िल्म – ऑपरेशन रोमियो

आजकल किसी के भी पास कार का होना बहुत ही सामान्य-सी बात है, मगर आज भी यह बस उन लोगों के लिए ही एक सामान्य-सी बात है, जो रईस होते हैं, जिनके पास पैसे होते हैं, या जिनके पास पोज़िशन होती है । मगर कार का होना आज किसी के लिए एक बड़ी भी बात हो सकती है या होती है, ख़ासकर उनके लिए जो लोवर मिडल क्लास से ऊपर उठकर एक ठीक-ठाक ज़िन्दगी जीने के लिए ख़ुद को क़ाबिल बना पाते हैं । मगर कार का होना अनिवार्य रूप से सदा ही अच्छा होता हो, ऐसा ज़रूरी नहीं है । कार की ज़िन्दगी बहुत-सी सहूलियतों के साथ कभी कभार कई ढेर सारी मुश्किलों को भी अपने पास में बुला सकती है या लाती है, जो कि अक्सर आदमी की लापरवाहियों के बदले में उसे मिलती हैं । फिर कार वाली लाइफ अचानक बेकार वाली लाइफ बन जाती है । या यूँ कहें कि एक बर्बाद करने वाली लाइफ बन जाती है । कार जो कभी सुख देती थी, अचानक दुःख देने लगती है । कार, जो आराम से कहीं आने-जाने के लिए आदमी खरीदता है, उससे बहुत कुछ आदमी चुकने लगता है, चुकाने लगता है ।  
कभी-कभी ऐसी भी परिस्थितियाँ आती हैं कि जिस कार का धड़ल्ले से गियर बदल के आदमी जिधर चाहता, उधर चला जाता, मगर नहीं जा पाता है । अपनी मर्ज़ी से जहाँ जिसको चाहता, बिठाता, मगर नहीं बिठा पाता है । अपने मन-मुताबिक दरवाज़े खोलता और बन्द करता, मगर नहीं कर पाता है । कार के शीशे को बन्द रखना चाहता और बन्द रखता, मगर बन्द रखने की इच्छा के बावजूद भी कभी-कभी खोलने को मजबूर हो जाता है । कभी-कभी दरवाज़ा खोलना चाहता है, मगर खोल नहीं पाता है । कार के आगे पीछे आते-जाते लोगों को देखता है, उन्हें बुलाना चाहता है, मगर बुला नहीं पाता है । उनसे मदद माँगना चाहता है, मगर माँग नहीं पाता है । कार का होना बहुत सुविधाजनक तो होता है, मगर हर बार हर समय कार की सुविधा चाहते हुए भी, आदमी उसकी सुविधा नहीं ले पाता है ।
रात बहुत सुहानी होती है, मस्तानी होती है । रात में सुनसान सड़कों की अपनी ही एक अलग दुनियाँ होती है, जो पैदल चलने वालों को अलग ढंग से, और कार से चलने वालों को अलग ढंग से महसूस होती है । कार में म्यूज़िक लगाकर सुनसान राहों की ख़ामोशी का लुत्फ़ उठाना, एकदम से एक अलग ही मज़ा देता है । मगर इसे तो बस वही जानता है जिसके पास कार होती है । और साथ ही जो अपनी कार के साथ रात में चलने का आदी भी होता है । जिनको म्यूज़िक में रस होता है, और जो ख़ामोशियों को अपनी आगोश में भर लेना जानते हैं ।
कार हो, सुनसान राह हो, थोड़ी-सी म्यूज़िक और थोड़ा-सा रुमानियत का एहसास दिलाने वाला कोई साथी, कोई हमसफ़र, कोई हमनफ़स हो, तो फिर रात एक बारात बन जाती है । वो अनोखे एहसासों वाली फिर सौगात लाती है । कोई वहाँ दिया बन जाता है, तो कोई वहाँ बाती बन जाती है । 
अब रुमानियत का एहसास एक युवा दिल ही तो करता है । माना कि उसका दिल थोड़ा कच्चा है, मगर नए-नए एहसासों के बीच वो थोड़ा सच्चा भी तो है । माना कि उसकी उम्र अभी इतनी नहीं होती कि सयानी-सयानी बातों को ही वो सदा करता रहे, मगर इसी कच्ची उम्र से तो हर कोई यहाँ पर गुज़रता है । जो उसका दिल आज चाहता है, वही कल सभी का चाहा करता था । वे सारे एहसास कभी न कभी सभी करते हैं । अगर उनके किसी अफ़साने को दुनियाँ गलत कहती है, तो वो गलत सभी ही तो करते हैं – 
वो ज़िन्दगी भी क्या ज़िन्दगी है,
जिसमें गलत करने की गुंजाइश ना हो ।
वो जवानी का आलम आलम ही क्या,
जहाँ कुछ बदनाम फरमाइश ना हो ।।
युवा दिल, युवा धड़कनें…युवा मन, युवा ख़्वाहिशें । युवा अरमान, युवा जान…युवा-संग-साथ, युवा-तरंग-रात । जवानी की राहें एहसासों की राहें होती हैं; ऐसी राहें, जो जवानी में ही महसूस होती हैं । ऐसी निगाहें, जो भेदकर सारे राज़ खोलती हैं । जवान दिल बहुत कुछ चाहता है, जिसे जवान दिल ही बस समझ पाता है । मगर समझदारों की दुनियाँ ने तो दिल के एहसासों को बस फ़ितूर कह के बक़वास करार दिया है । और आश्चर्य है कि ये सारे समझदार लोग अपनी ख़ुद की जवानी में वही सब किया करते थे, जिसे वे आज वे सदा-सदा के लिए कटघरे में खड़े कर देने में बड़े प्रतिबद्ध दिखते हैं ।
ख़ैर! युवा दिलों के बीच कोई समझदारी की दीवार तो कभी आनी ही नहीं चाहिए, मगर न चाहने पर भी आख़िर वो आ ही जाती है । युवा दिलों को अपने एहसासों को जीने के लिए मुक़म्मल जगह मयस्सर होनी चाहिए, मगर वो कभी भी मुश्किल से ही उन्हें मयस्सर हो पाती हैं । एक युवा दिल आख़िर जाए भी तो जाए कहाँ! हर तरफ़ तो निगाहों का पहरा है । हर तरफ़ आदमी का दिल न जाने क्यूँ बहरा है । हर ओर लोगों के दिलों में उदासी छायी रहती है । हर किसी की ज़िन्दगी दर्द और व्यथा ही बस कहती है । ऐसे में जहाँ भी थोड़ी-सी शांति, थोड़ा-सा सुकून और थोड़ा-सा कुछ देर के लिए अकेलापन दो दिलों को मिलता है, वे तुरंत ही मिलने को आतुर हो जाते हैं, एक दूसरे में खो जाने को व्याकुल हो जाते हैं ।
बस यही था फ़िल्म “Operation Romeo” में आदी और नेहा के बीच का अफ़साना । उनका दिल मिल रहा था । उनके बीच मोहब्बत का फूल खिल रहा था । दोनों इश्क़ के एहसास में डूबने को तैयार हो रहे थे । एक दूसरे को अपनी बाहों में भरने को ताकझांक रहे थे । झिलमिलाती निगाहों से एक दूजे को पास बुला रहे थे । लफ़्ज़ों को मूक करके निःशब्द में डूबने को अकुला रहे थे । मगर थोड़ी-सी झिझक भी थी उनमें । क्यूँ न हो? वो भी तो इसी दुनियाँ के वासिंदे थे । इसी समाज में उनका भी आशियाना था । उन्हें भी अपने सपनों को जीना था । अपनी सुंदर-सी एक नई दुनियाँ को रचना था । वे कहीं शून्य से तो आए नहीं थे । उनका भी हक़ था कि वो भी अपनी ज़िन्दगी को अपने ढंग से जियें । जो महसूस करते हैं एक दूसरे के लिए, वक़्त मिलते ही वे सब एक दूजे से कहें ।    
एक रोज़ वे इसी दुनियाँ की सड़कों पर ख़ुद को जीने के लिए एक लम्बी ड्राइव पर निकल पड़ते हैं । नेहा का बर्थडे और आदी का गिफ़्ट और न जाने क्या-क्या… ढेर सारे अरमान दिल में उमड़ रहे थे । आज घूमते-घूमते कब समय निकल गया, पता ही नहीं चला । और फिर रात की ख़ामोशी को वे अपने बीच बाँटने को आतुर होने लगे । वे भी रात के इस अनमोल एहसास को हाथ से नहीं जाने देना चाहते थे । आज उसे वो पूरा जी लेना चाहते थे ।
मगर हमारी दुनियाँ में रात का सच बस इतना ही नहीं होता । रात अगर कभी सुहानी होती है, तो कभी बहुत ही डरावनी भी होती है । रात के बाद अगर हर रोज़ सुबह आ जाती है, तो कभी-कभी रात इतनी लम्बी भी हो जाती है कि सुबह के आने का सारा नामोनिशान मिट जाता है । रात में ही सारे काले कारनामे होते हैं । रात में ही बदनाम साये मंडराते हैं । रात में ही वो आदमी भी कभी-कभी नज़र आ जाता है जिसके अंदर का जानवर प्रकट होता है, मगर जो दिन के उजालों में लाचार, गरीब और निपट सभ्य नज़र आता है । रात में ही आदमी का असली रंग, असली ढंग दिखता है । रात की बात थोड़ी और होती है । रात वो नज़ारे भी दिखाती है जिसके बारे में सोचकर भी मन रूह तक काँप जाता है । रात में जो होता है, वो अक्सर दिल के उजालों में सोच पाना भी शायद संभव नहीं होता है । 
रात के सुहाने एहसास अचानक उस रोज़ कभी न भुलाए जाने वाले भयानक डर और दहशत की दास्तान में तब्दील हो जाते हैं । आदी और नेहा की ज़िन्दगी में दस्तक देने वाले रुमानियत के एहसास अचानक मनहूसियत के घेरे में बन्द हो जाते हैं । आदी और नेहा अनजाने में ही सही मगर एक ऐसे चंगुल में उस रात फँस जाते हैं जिससे निकलना बिल्कुल असंभव-सा लगता है । वो रात कटने का नाम ही नहीं लेती है । वो रात कटेगी या नेहा और आदी की ज़िन्दगी कटेगी, कुछ पता नहीं लगता है । दहशत इतनी ज़्यादा बढ़ जाती है कि सिवाय स्तब्ध और मजबूर होने के सिवाय और कोई रास्ता नज़र नहीं आता है । और फिर अचानक वे अंततः उस रात के काले साये से बाहर निकल आते हैं, जो कि बिल्कुल आश्चर्य-सा दिखता है । बचने का कोई रास्ता तो उस रात था नहीं, मगर शुक्र ही मानना होगा कि वे दोनों आख़िरकार बच जाते हैं । सब भगवान की कृपा ही कही जा सकती है । वरना ऐसी रातों की कहानियां न कोई लिखने वाला बचता है और न ही कोई सुनने या सुनाने वाला ।  
बाद में उस दहशत का शिकार आदी फिर से उसी दहशत को रचता है । इस बार उसके साथ, जिसने उसे उस रात अपना शिकार बनाया था । परन्तु जीवन में सीखने और सिखाने के लिए तो ये सब ठीक है, मगर जिस दहशत से आदी ख़ुद उस रात गुज़रता है, उसे जानबूझकर उस तरह से न तो वो रच पाता है और न ही कोई रच सकता है । क्योंकि उस रात का माहौल एक भेड़िए के द्वारा रचा गया होता है और बाद में उस भेड़िए को सबक सिखाने वाला उपक्रम बस एक मासूम दिल के द्वारा किया गया उपचार मात्र । अनजाने में ही सही मगर उस रात जिस अंधेरी गली में नेहा और आदी प्रवेश कर जाते हैं, उनकी पीड़ा और वेदना, न तो बताए, बतायी जा सकती है, और न दिखाए, दिखायी जा सकती है । मगर आदी तो ये सब कुछ बस ख़ुद को जवाब देने के लिए कर रहा था । नेहा ने उस रात के बीत जाने पर उसे मैन कहते वक़्त प्रश्नवाचक चिह्न जो लगा दिया था । उस रात के भयानक प्रकरण के उपरांत नेहा नाराज़ होती-सी दिखती है, मगर वो नाराज़ आदी को कर देती है । आदी ख़ुद को जवाब देने के लिए उस रात के शिकारी को शिकार बनाता है । एक हफ़्ते तक गायब रहता है । नेहा का फ़ोन पिक-अप नहीं करता है । वो तो वही दहशत उस शिकारी के घर में उसकी पत्नी और बच्चे के सामने उसे एक्सपोज़ करके करता है । वही दहशत भरा एहसास उसे दिलाता है, जिसे वो और नेहा उस रात को बड़ी पीड़ा और मजबूरी के साथ महसूस किए थे ।  
मगर कुछ सवाल फिर भी छूट जाते हैं, जो पूछने बहुत ज़रूरी हैं – क्या होता अगर नेहा के साथ वो शिकारी (पुलिस/चोर/ड्राइवर) कुछ और अनहोना कर गुज़रता? क्या होता अगर आदी को वे दोनों शिकारी मार डालते? क्या होता यदि आदी ज़बरदस्ती गाड़ी चलाकर दोनों को कुचलकर भाग जाता? क्या होता अगर वो अपनी गाड़ी का शीशा ही नहीं खोलता? क्या होता अगर वो थोड़ी और ज़ोर-ज़बरदस्ती करता और नेहा को गाड़ी में आगे बिठाने पर ज़ोर डालता? क्या होता अगर वो उस शिकारी को अपने और नेहा के घर वालों को फ़ोन करने देता? क्या होता अगर आदी उनसे उनकी आई.डी. कार्ड माँगता? क्या होता अगर आदी उन दोनों भेड़ियों से हाथापाई कर लेता? क्या होता अगर आदी और नेहा गाड़ी से निकलकर भागने लगते? क्या होता अगर उस रात वे दोनों शिकारी उन्हें जाने ही नहीं देते? क्या होता? क्या होता? अगर ऐसी हज़ार संभावनाएं उस रात अपना मुँह बा लेतीं?  
इन सबके प्रतिउत्तर में हम कुछ भी नहीं कह सकते । कुछ भी उस रात को हो सकता था । बहुत कुछ हुआ भी । मगर अंततः वे दोनों बच जाते हैं, यही बस अच्छा होता है । मगर जिस पीड़ा और दहशतगर्दी के माहौल से आदी और नेहा उस रात को गुज़रते हैं, उसे न तो कोई कहानी कहने वाला कह सकता है और न ही कोई कहानी लिखने वाला लिख सकता है । वो तो एहसासों से ही एहसास में आने वाली अनुभूतियाँ होती हैं । और भगवान करे कि वैसी अनुभूति किसी को भी ज़िन्दगी में कभी ना मिले । मगर फ़िल्म “Operation Romeo” उस दहशत को दिल में उतार देने में पूरी तरह से सफल होती है, और वह भी एक सुखद अंत के साथ कि रुमानियत का एहसास नेहा और आदी के बीच बरकरार भी रह जाता है । ऐसा भी हो सकता था कि नेहा नाराज़ हो जाती । ऐसा भी हो सकता था कि आदी इस सदमें से बाहर नहीं आ पाता । बहुत कुछ बुरा हो सकता था । नहीं हुआ, बस यही अच्छा था । मगर उस स्थिति में बहुत कुछ बुरा होने की हज़ार संभावनाएं तो थी हीं, जिससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता । 
फ़िल्म में सब ठीक हो जाता है, मगर असल ज़िन्दगी में सबकुछ इतना ही ठीक-ठीक नहीं होता है । ज़्यादातर रात की कहानियाँ अनुष्का शर्मा अभिनीत फ़िल्म NH10 की तरह होती हैं जो रात को सदा-सदा के लिए अंधेरे में खोए मुसाफिरों की कहानी बन जाती हैं । फ़िल्म ने सुखद अंत करके युवाओं को एक सन्देश तो दिया है कि रुमानियत के एहसास को जीना तो ठीक है, मगर यह भी याद दिलाया कि उसे जीने में बरती गयी किसी भी प्रकार की लापरवाही ज़िन्दगीभर के लिए पछतावे का सबब बन सकती है । अगर उससे ख़ुद का बचाव युवा कर ले, तो ठीक, वरना रात अगर बारात लाती है, तो कभी-कभी जज़्बातों को छलनी भी कर जाती है । ये सबब बहुत बड़ा है जिसे आदी अपने दामन में लिए फ़िल्म की पटकथा पर बड़ी मजबूती से खड़ा है ।
डॉ प्रवीण कुमार अंशुमान
डॉ प्रवीण कुमार अंशुमान
डॉ० प्रवीण कुमार अंशुमान असोसिएट प्रोफ़ेसर अंग्रेज़ी विभाग किरोड़ीमल महाविद्यालय दिल्ली विश्वविद्यालय। ईमेल: pkanshuman@kmc.du.ac.in
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