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ज़हीर अली सिद्दीकी की तीन कविताएँ

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1-इंतज़ार
आज़ाद कर दो मुझे
यादों की तहखानों से
जो हर वक़्त पीछा करती हैं
घूरती है, डराती है
सोने नही देती हैं
अग़र सो भी जाऊँ तो
डरावना ख़्वाब बनकर
नींद में ख़लल डालती है
तन्हा सा हो गया हूँ
तन्हाई की गोद मे
यादों के हर पन्नों को
पलट रहा हूँ निहार रहा हूँ
पूरे संजीदगी से।।
आज़ाद कर दो मुझे
उन बंदिशों से,
जो मुझे जकड़ रखी हैं
एहसास कराती हैं
कैदी होने का
बस घुटन ही घुटन है।
मेरा ख़ुद का अशियाना
किराये का घर बन गया है
महज़ किरायेदार की तरह
अपनेपन की चाह में
वक़्त का इंतज़ार कर रहा हूँ।।
बस तुम्हारी यादें
हमसफ़र की तरह
छोटे छोटे खुशियों का
एहसास दिलाती हैं
हवा के झोकें की तरह
आती है सुकून लेकर
ग़ायब हो जाती हैं
और फिर क्या?
उसके ही इंतज़ार में
हर यादों में तुमको ही
तलाशती हैं मेरी ये निगाहें।।
2-क़िरदार महिला का!
पैरों से क्षीण हुई ऊर्जा
मक़सद भी ओझल आँखों से
राहों की ताना बोली सुन
मंज़िल बिन रुकने वाला था।
एक महिला रूप सम्मुख देखा
माँ, बहन,बीबी बेटी देखा
पैरों में ऊर्जा प्रवाह हुआ
मंजिल पाने को कूच किया।
आँखों मे ज्योति प्रवाह हुआ
बाधाओं के डर का नाश हुआ
जिस मंज़िल से कोसों दूर था मैं
महिला ने साथ है खड़ा किया।
परित्याग देख मैं सहम गया
अपने दुख को मैं भूल गया
गिरा था मैं उठ खड़ा हुआ
तीक्ष्ण नेत्र लक्ष्य भेद दिया।।
3-एक नारी से
कोख़ में नौ माह रखा
त्याग के मायने बता
निःस्वार्थ भाव प्यार किया
उद्धार हुआ, एक नारी से…
सपनों को पंख मिला
बचपन से बंदिश हटा
उड़ान से वाकिब हुआ
जीने का अर्थ, एक नारी से…
सूखता पत्ता हरा
पत्ते में हलचल दिखा
हवा में ठण्डक बढ़ी
आस जगी, एक नारी से…
उत्थान की बात किया
बन्धन को ललकार दिया
समता का पैग़ाम दिया
सभ्य हुआ, एक नारी से
समाज से सवाल किया
रूढ़ को हका दिया
क्रांति का बिगुल बजा
हक़ बात, एक नारी से…

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