डॉ. प्रभा मिश्रा का एक मुक्तक और एक गीत
जिस साँझ कभी बारिश में
अपना पानी बचाकर रखे है कँवल
जिसकी चाहत है जो ,वो उसे मिल रहा
जो सहारा दिया तो नदी ही रही
ख़्वाब आये तो पलकों से हटते नहीं
खुश्बुओं से उसे क्या शिकायत रहे
आस्था को बदलती नई सोच है
वो तुम्हारी अदब, या मेरी सभ्यता
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