Wednesday, February 11, 2026
होमग़ज़ल एवं गीतडॉ. प्रभा मिश्रा का एक मुक्तक और एक गीत

डॉ. प्रभा मिश्रा का एक मुक्तक और एक गीत

मुक्तक
जिस साँझ कभी बारिश में
पत्तों पर न हो ठहरा पानी
शायद है शरारत मौसम की
या फिर है हवा की नादानी।
गीत
अपना पानी बचाकर रखे है कँवल
और गुलाबों को पानी की दरकार है
जिसकी चाहत है जो ,वो उसे मिल रहा
कौन किसके मुक़द्दर का हक़दार है।
जो सहारा दिया तो नदी ही रही
जो बहा ले गई एक मझधार है।
ख़्वाब आये तो पलकों से हटते नहीं
नींद आँखों में आने को बेज़ार है ।
खुश्बुओं से उसे क्या शिकायत रहे
फूल जिसके लिए एक व्यापार है ।
आस्था को बदलती नई सोच है
देव, जिसके लिए एक उपहार है।
वो तुम्हारी अदब, या मेरी सभ्यता
आ बचाकर चलें, विश्व  बाजार है ।
RELATED ARTICLES

1 टिप्पणी

कोई जवाब दें

कृपया अपनी टिप्पणी दर्ज करें!
कृपया अपना नाम यहाँ दर्ज करें

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.

Most Popular

Latest