मित्रो, ब्रिटेन में सोहन राही, प्राण शर्मा, गौतम सचदेव और नीना पॉल के निधन के बाद हिन्दी ग़ज़ल में जैसे एक ऐसा रिक्त स्थान पैदा हो गया था जिसे भर पाना आसान नहीं है। वैसे तो परवेज़ मुज़्ज़फ़र, अजय त्रिपाठी, कृष्ण कन्हैया ब्रिटेन में हिन्दी ग़ज़ल की रचना निरंतर कर ही रहे हैं, मगर हाल के वर्षों में आशुतोष कुमार ने ग़ज़ल पर क़लम चलानी शुरू की है। तो लीजिये पुरवाई आपके लिये लाई है उपरोक्त चार दिवंगत ग़ज़लकारों के साथ-साथ ग़ज़ल के नये हस्ताक्षर आशुतोष कुमार की एक ग़ज़ल।
1. सोहन राही
समन्दर पार करके अब परिन्दे घर नहीं आते।
अगर वापस भी आते हैं तो लेकर पर नहीं आते।
मिरी आँखों की दोनों खिड़कियाँ ख़ामोश रहती हैं
कि अब इन से सुख़न करने मिरे मंज़र नहीं आते।
मिरी चाहत ख़लाओं में धुआँ बन बन के उड़ती है
मगर इस ख़ाक के ज़र्रे मिरे दर पर नहीं आते।
सुनहरी धूप की चादर, वो पूरे चाँद की रातें
हम इनमें क़ैद रहते हैं, कभी बाहर नहीं आते।
मिरे आँगन की छतरी के कबूतर ख़ूब हैं, लेकिन
चले जाते हैं वापस, तो कभी मुड़कर नहीं आते।
तुम्हारे शहर के मौसम, हमारे शहर में ‘राही’
सुनहरी धूप की लेकर कभी चादर नहीं आते।






