26 दिसंबर, 2021 को प्रकाशित पुरवाई के संपादकीय ‘पूरे विश्व में आपदा को अवसर बनाया जा रहा है’ पर निजी संदेशों के माध्यम से प्राप्त पाठकीय प्रतिक्रियाएं

सुरेश ऋतुपर्ण
यथार्थ विष्लेषण किया है भाई तेजेन्द्र जी।
मैंने अनेक लोगों से इस बारे में कुछ बातचीत की तो उनकी समझ में नहीं आती है। मीडिया इस खेल का एक बड़ा दलाल है।
यह खेल उस दिन ही खत्म होगा जब अमेरिका यूके जैसे देश इसे समाप्त घोषित करेंगे नहीं तो तीसरी दुनिया के लोग इसी तरह ठगे जाते रहेंगे।
मैं कुछ दिन पहले ही यूएसए से लौटा हूं। मैंने जापान में एक rtpcr के
15.000 रुपए के बराबर के yen दिए थे। USA में 100 डालर के करीब लगे। भारत में या यूएसए में भी उन कागजों को सरसरी निगाह से देख बंद कर दिया। आपको बधाई एवम् नव वर्ष के लिए हार्दिक शुभकामनाएं।
प्रज्ञा पांडेय
बहुत सही लिखा है आपने तेजेन्द्र जी। बढ़ा चढ़ाकर प्रचार का यही कारण है । वसूली शुरू हो चुकी है।
ज़ुल्फ़िकार
सर, पुरवाई का संपादकीय, आपदा को अवसर बनाया जा रहा है, पढ़ कर लगा जैसे सारा विश्व स्वार्थ और लालच के मकर जाल में फँसता जा रहा है..,. आपके परिवार के निजी अनुभव दर्शाते हैं कि कोरोना को एक प्रोजेक्ट की भाँति परोसा जा रहा है… इस पर काम करने की जरूरत है, जनता को जागरूक होना बहुत जरूरी है…
आपके लेख ने वर्तमान समाज की विसंगतियों को उजागर किया है,धन्यवाद.
नूतन पांडेय
तेजेन्द्र जी, बहुत ही प्रासंगिक मुद्दे को संपादकीय मे उठाया गया है।
सभी लोग कोरोना के कारण उपजी इस व्यवस्था से दो चार हो रहे हैं। इस अंतराल में जीवन के हर क्षेत्र में आपदा में अवसर ढूंढने के नए तरीके ईजाद किये गए हैं जिनसे कुछ लोग मालामाल हो रहे हैं।
वे सभी/अधिकांश कारण जिनसे मनुष्य सृष्टि की सर्वश्रेष्ठ कृति होने का दावा करता आ रहा हैं वे अब बमुश्किल दिखाई पड़ते हैं।।
यूरोपीय देशों में भी बड़ी मात्रा में भ्रष्टाचार किया जा रहा है और अवसर का गलत ढंग से लाभ उठाया जा रहा है…….
उर्मिला माधव
तेजेन्द्र जी, संपादकीय पढ़ा।
कितनी बारीक़ बात है जो आपने कही है… संभवतः आगे की आपदाओं का ज़िक्र भी है। क्या कर सकती है जनता… असहाय, निरुपाय… सिर्फ़ तमाशबीन बनिये, शायद इसका हिस्सा भी… गरीबों को यहां तो भूख से मरते देखा गया घर छोड़ छोड़ कर भागे अपने घर जो पैदल चलते थे ..
मधु मेहता
बहुत ही सटीक संपादकीय है।
न तो किन्हीं सरकारों को कुछ पडी़ है ना नेताओं को… सब अपनी अपनी जेब भरने में लगे हैं…
कहाँ करोना और कहाँ अम्रिकान…. वो देखिए इत्र वाला करोड़ों रुपये के साथ… कहाँ है इन सभी को करोना…. बस है तो सिर्फ मध्यम वर्गीय लोगों को सब परेशानियों का सामना करना होता है…
सही कह रहे हैं तेजेन्द्र जी की सभी टेस्ट सिर्फ जेब भरने के लिए हैं… कहीं भी किसी को नहीं पडीं चेकिंग की… इस तरह सिर्फ पेपर बनाने और टेस्ट करवाने का कितना पैसा सरकार को मिल रहा है…
अभी से इस बीमारी के लिए कुछ खास नही हो रहा और जब बहुतायत में होगा तो हम सभी इन दो सालों के गवाह है ही…
यह सभी बेहद दुखद है… आपने यह बहुत ही अच्छा मुद्दा उठाया है….
डॉक्टर किरण खन्ना
बहुत कटु यथार्थ… आंखें खोलने वाला सत्य…
किन्तु उतना ही उपेक्षित जितनी पुरानी यह फिल्म हो चुकी।
हम सब सरकारों के भरोसे महामारी की विभीषिका का अनुभव करते हैं… मीडिया ही हमें चेताता है कि महामारी भयंकर रूप धारण कर गई और हम चेतराम बन जाते हैं । जैसे ही कुछ दिन मीडिया पर महामारी की दुंदुभी नहीं बजती … सभी चेतराम अचेत हो जाते और फिर आरंभ होता है यह परिदृश्य जो आपने अपने अति संवेदनशील संपादकीय में वर्णित किया है…
तो 17000 रुपए हम से निकलवाने में सक्रिय और दोषी कौन?
मेरे विचार नितांत व्यक्तिगत हैं🙏
शुभम् राय त्रिपाठी
सत्य कहा आपने… आखिर जो आर टी पी सी आर शासकीय अस्पतालों पर फ्री है , बाहर जाने वालों को इतनी अधिक कीमत क्यों… वैक्सिन के दोनों डोज लगवाने के बाद फिर इतना नाटक क्यों ?
संजीव जायसवाल
तेजेंद्र भाई लुटेरे हर युग में रहे हैं और आगे भी रहेंगे… यह बात दीगर है की उनका लालच अब अनाड़ी फिल्म के सेठ से कई गुना बढ़ चुका है।
वैक्सीन निर्माताओं के मुंह में खून लग चुका है और अब वे आसानी से शांत नहीं बैठेंगे। एक के बाद एक अफवाहें और भय की लहरें फैलाते रहेंगे।
विकल्प हीनता की स्थिति में हम लोगों को बूस्टर लगवाना ही पड़ेगा क्योंकि सामने सौदा होगा अपने प्राणों का।
इंडिया में प्राइवेट अस्पतालों में तो वैक्सीन की कीमत ली जा रही है लेकिन बहुत बड़े स्तर पर वैक्सीन मुफ्त में लगाई जा रही हैं। यदि ऐसा ना होता तो कितनी लूट खसोट मचती और कितनी नकली वैक्सीन मार्केट में आ जाती।
जो भी हो खबर तो यही है कि ओमिक्रोन के गंभीर परिणाम सामने नहीं आ रहे हैं अतः आशा की जानी चाहिए की वायरस कमजोर हो रहा है और शायद 2022 में इससे राहत मिल जाए।
रूप सिंह चंदेल
तेजेन्द्र भाई, ऐसा ही होता है। कुछ के लिए आपदा अवसर ही होता है।
गॉन विद द विंड का चरित्र रेयत बटलर बार-बार कहता है कि “विकास और विध्वंस’ के समय कुछ लोगों के लिए धन कमाने के अवसर होते हैं।”
प्रगति टिपणिस
अत्युत्तम सम्पादकीय तेजेन्द्र जी।
जिस चुभन और परेशानियों का आज सब सामना कर रहे हैं, उनका आपने बखूबी इस में ज़िक्र किया है।
आपदा ने जहाँ लालच के घिनौने रूप को दिखाया है वहीँ राजनीतिक प्रतिशोध भी खूब खुलकर सामने आया है। यह कहना कि अमुक देश द्वारा बनाए गए टीके को हम मान्यता नहीं देते, भले ही वह टीका कितना प्रभावी रहा हो। यह सब देख कर लगता है कि लोग जैसे ऐसी आपदाओं के इंतज़ार में बैठे रहते हैं।
डॉ. सच्चिदानंद
तेजेन्द्र जी संपादकीय सटीक है। वास्तव में कोरोना वायरस मेडिकल व्यवसायियों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी साबित हुआ है। और स्वास्थ्य मंत्रालयों के सक्षम पदाधिकारियों ने भी इसके नाम पर खूब बजट बनाकर अपनी चल अचल संपत्ति को मजबूत बनाया। दूसरी लहर में जब लोग दहशत में मर रहे थे तब एसीडिटी की दवा को इंजेक्शन में भर के दसों हजार में ब्लैक करने का मामला खूब उठा..
मीरा गौतम
तेजेन्द्र जी, आपने ‘अनाड़ी ‘फ़िल्म के माध्यम से जो व्यवस्थागत सच्चाई सामने रखी है वह, आँखें खोल देने वाली है। वरना, लोग केवल मनोरंजन और गीतों के लिए फ़िल्में याद रखते हैं.हृषिकेश मुखर्जी की तो बात ही अलग है। बधाई तेजेन्द्र जी🙏🏻
पद्मा शर्मा
तेजेन्द्र जी, सच्चाई को उजागर करता संपादकीय। प्राचीन काल से अब तक तौर तरीके और लोग बदले हैं। कालाबाज़ारी बदद्स्तूर जारी है…
अरुणा अजितसरिया, लंदन
तेजेन्द्र जी, आपका सम्पादकीय अवसरवादिता की अश्लीलता का पर्दाफ़ाश करता है। मुनाफ़ाख़ोरी कोविद से बदतर और लाइलाज बीमारी है। उसको अपने व्यक्तिगत अनुभव का साक्ष्य देकर रेखांकित करने के लिए बधाई।
डॉक्टर तब्बसुम जहॉं
संपादकीय पढ़ा सर। बहुत ही प्रासंगिक लेख है।
‘राम नाम की महिमा है लूट सके तो लूट’ की तर्ज़ पर कोरोना की महिमा को भुनाया जा रहा है। यहां तक कि जो यू पी के झोला छाप डॉक्टर थे उनकी तो बिल्डिंगे तैयार हो गयी हैं कोरोना मैय्या की मेहरबानी से।
इनसे अगर कोई गाना गाने को कहा जाए तो यही कहेंगे- कोरोना, कभी अलविदा न कहना कभी अलविदा न कहना।👏
शन्नो अग्रवाल, लंदन
बहुत सटीक कथन है आपका, तेजेन्द्र जी।
इस कोरोना के मारे सारी दुनिया को रोना आ रहा है। मान न मान मैं तेरा मेहमान… यह जाने का नाम नहीं ले रहा। नये-नये रूप दिखाकर हौवा की तरह डरा रहा है सबको।
कहीं भी यात्रा करने वालों को भी नाकों चने चबाने पड़ रहे हैं। लेकिन हम नियमों का उलंघन भी नहीं कर सकते।
और कोरोना के चलते वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों के हाथ में तो जैसे झुनझुना आ गया। आर्थिक लाभ के मौके का पूरा फायदा उठा रही हैं। बीट द आयरन व्हाइल इट्स हॉट।
अपने संपादकीय में आपने दवाओं की काला बाजारी से लेकर आक्सीन की मारामारी और सरकार के अवसरवादी रवैये आदि सभी का चित्रण बख़ूबी किया है।
अरुण सभरवाल, लंदन
तेजेन्द्र जी, आपने इस बार अपने संपादकीय में बहुत संवेनशील प्रश्न उठाया है। विडंबना यह है कि इस आपदा की स्थिति में भी इंसान अपने व्यापार के लाभ-हानि के चक्कर में पड़ा है। कलयुग में नैतिकता की परिभाषाएं बदल चुकी हैं।दुखद और शर्मनाक स्थिति है ।

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