Saturday, May 18, 2024
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भारतीय मूल के वरिष्ठ नागरिकों का प्रथम सम्मेलन जर्मनी की राजधानी बर्लिन में

सुशीला शर्मा-हक़
जब न तो भारत विभाजित था और न ही जर्मनी, तभी से भारतीय मूल के लोग जर्मनी में उच्च शिक्षा के लिए आते रहे हैं। जर्मनी की शिक्षा प्रणाली ,विशेषकर तकनीक के क्षेत्र में उच्चकोटि की मानी जाती थी, जबकि इन्फॉर्मेशन टेक्नोलॉजी  में आज भारतीय मूल के लोगों की मांग सारी  दुनिया में है,किन्तु यहाँ बात हम भारतीय मूल के वरिष्ठ नागरिकों की कर रहे हैं।  इन्हीं नागरिकों में मेरी भी गिनती है।
मेरा बर्लिन आना दोनों देशों के विभाजन के बाद ही हुआ। बर्लिन के लगभग बीचोबीच एक दीवार थी। इसे पूर्वी और पश्चिमी हिस्से में बाँट दिया गया था। पश्चिमी हिस्से में बसने वाले भारतियों की संख्या सन  १९७८ में मात्र तीन हज़ार सात सौ थी,और पूरी पश्चिमी जर्मनी में पचास हज़ार। बर्लिन के पश्चिमी  हिस्से में एक संस्था है जिसका नाम “भारत मजलिस” है. इस संस्था की स्थापना सन १९३३ में, उस समय विदेशों में पढ़नेवाले विद्यार्थियों ने बर्लिन में की थी।यह योरोप की पहली भारतीय संस्था है. नाज़ी राज्य में इस पर प्रतिबंध लगा दिया गया था। १९५७ में इसकी पुनर्स्थापना हुई।
इतिहास की गहराई में न जाते हुए इतना बताना आवश्यक है कि  राजधानी जर्मनी की अब बर्लिन नहीं बॉन शहर में हो गई थी इसलिए सभी दूतावास वहां स्थानान्तरित कर दिए गए थे। बर्लिन में भारतीय संस्कृति के प्रचार और प्रसार का पूरा जिम्मा भारत मजलिस के कंधों पर था। सन  १९७५ में बर्लिन में भरतीय कला का संग्रहालय खोला गया और इसी संग्रहालय में हर वर्ष भारतीय सांस्कृतिक सप्ताह का आयोजन  भारत मजलिस की तरफ से होने लगा। भारत से जानेमाने कलकारों को बुलाया जाता जैसे कि पंडित रवि शंकर,बिस्मिल्लाह खान,बिरजू महाराज,श्रीमान चौरसिया,इत्यादि इत्यादि। इस समारोह में जो पत्रिका छपती उसमें भारत के प्रधान मंत्री और बर्लिन के नगरनिगम के सन्देश भी  छपा करते थे ।बर्लिन का सारा भरतीय समाज  बढ़चढ़ कर इसमें सहभागी होता  तथा अन्य शहरों से भी सम्मनित अतिथिगण आया करते थे।

मजलिस नाम भारत से आनेवाले हिन्दू और मुस्लिम विद्यार्थियों ने रखा था। इसी संस्था का प्रेसिडेंट सन १९८३ में मुझे चुना गया.सदस्य सांख्या  थी  १५० ब्रांडनबुर्गिशे स्ट्राशे में तीन कमरों  का किराए का मकान था इसी के एक कमरे में गुरुद्वारा बनाया गया था । भारतीय समाज का यह एकमात्र  अड्डा था। हर शुक्रवार को यहां जमावड़ा होता।खाने-पीने के अलावा भरतीय त्यौहार भी मनाए जाते और छोटे मोटे  सांस्कृतिक कार्यक्रम  भी होते।भारतीय मूल के बड़े बड़े कालकर यहाँ आते,जैसे कि इरशाद पंजतन, पैंटोमाइम के हुनर में दुनिया में इनका सानी नहीं। जर्मनी की कई फिल्मों  में इन्होने अदाकारी की है। “विनिटू का जूता” नाम की फिल्म में इन्होने प्रमुख भूमिका निभाई। इसे उस वर्ष की सर्वश्रेष्ठ फिल्म का पुरस्कार भी मिला। आपकी उम्र इस समय ९० वर्ष की है,जर्मनी में इन्हें ५० वर्ष से भी अधिक हो गए है ,पत्नी जर्मन हैं किन्तु इन्होने जर्मनी की नागरिकता कभी भी स्वीकार नहीं की अभी भी भारत का पासपोर्ट बड़े गर्व के साथ दिखाते हैं। राज्य श्री रमेश,इन्होने नृत्य भंगिमाओं पर डॉक्टरेट की है ,धीरज रॉय ने बर्लिन की संगीत अकादमी से से गायन में स्नातक की उपाधि प्राप्त की। अन्य भी कई उल्लेखनीय नाम जैसे की डॉक्टर ब्रून ,डॉक्टर त्रिपाठी,इत्यादि इंडोलॉजिस्ट।

बर्लिन की दिवार गिरने के बाद मजलिस के कमरों का किराया बढ़ जाने के कारण उन्हें छोड़ना पड़ा। इसके बाद कुछ  और ठिकानों पर सदस्यों को जमा करने का प्रयत्न किया गया.पर वो बात नहीं बन पाई जो १९८३ में थी।  सब लोग तितर बितर हो गए।  दूतावास अब बर्लिन आ गया था ,उनका सांस्कृतिक विभाग भी।
नए विद्यार्थियों और आई .टी.  के लोगों के बीच उन लोगों को भुला दिया गया जिन्होंने जर्मनी में भारत की पहचान बनाई  थी।  बर्लिन के भारतीय दूतावास से कई बार निवेदन करने के पश्चात भी जब वयस्क नागरिकों की उपेक्षा होती रही तब इसी शहर के एक वयस्क नागरिकों की गतिविधियों से सम्बन्धित  संस्था में उन लोगों के सम्मान में एक आयोजन किया गया जिन्होंने स्वदेश और विदेश में भी अपनी सेवाएं प्रदान की हैं और नाम कमाया है।
इन्ही में एक नाम सुप्रसिद्ध लेखक आरिफ नक़्वी  का भी है आप हिंदी और उर्दू भाषा में कई पुस्तकें लिख चुके हैं.बर्लिन शहर में हिंदी भाषा का अध्यापन भी आप कर रहे है। इस आयोजन का मकसद यही था कि अभी हम जिंदा हैं और दमदार भी हैं इतनी आसानी से हमें नहीं भुलाया जा सकता। कार्यक्रम में भारतीय मूल के ये सभी वयस्क नागरिक उपस्थित थे, जिनकी उम्र  साठ से नब्बे वर्ष तक की थी। कुछ लोग बीस तो कुछ तीस साल के बाद मिले। इस संस्था में विकलांग लोगों के आने-जाने की पूरी सुविधा है। पहले भी अन्य देशों के वयस्क  नागरिक यहां मिलते रहे है,भारतीय मूल के लोगों और उनकी जर्मन तथा भारतीय सहभगिनों के लिए इस प्रकार का यह पहला आयोजन था।
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