लघुकथाओं को किसी सीमा रेखा में न बाँधें - बलराम अग्रवाल 3
अंतर्राष्ट्रीय विश्व मैत्री मंच द्वारा चर्चित लघुकथाकार संतोष श्रीवास्तव के सद्य प्रकाशित लघुकथा संग्रह “मुस्कुराती चोट” के विमोचन (20 जून को ऑनलाइन गूगल मीट पर आयोजित) के अवसर पर अध्यक्षता कर रहे वरिष्ठ लघुकथाकार बलराम अग्रवाल ने अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में कहा कि कोई भी विधा किसी लेखक तथा आलोचक को पहचान लेती है। संतोष जी की कथाओं के विविध विषय आकर्षित करते हैं।  उनकी शैली में प्रयुक्त संकेत वा प्रतीक का सटीकता से प्रयोग प्रशंसनीय हैं। लघुकथाओं को किसी सीमा रेखा में न बांधने की महत्त्वपूर्ण बात भी कही।
कार्यक्रम का आरंभ महिमा श्रीवास्तव वर्मा के द्वारा दीप प्रज्ज्वलन एवं सरस्वती वंदना से हुआ। संतोष श्रीवास्तव ने अपने लघुकथा लेखन की शुरुआत का जिक्र करते हुए कहा कि उनकी पहली लघुकथा 1975 में कमलेश्वर जी के संपादन में सारिका में प्रकाशित हुई थी और इसी लघुकथा पर मुंबई दूरदर्शन ने लघु फ़िल्म भी बनाई थी जो मेट्रो चैनल में प्रदर्शित हुई थी। उन्होंने अपने लघुकथा संग्रह के प्रकाशन का श्रेय अपने पाठकों को दिया जो लगातार आग्रह करते रहे किताब प्रकाशन की।
प्रमुख वक्ता रूपेंद्र राज तिवारी ने कहा संतोष जी की कथाएं उपचार कतई नहीं करती, कथाएं विसंगतियों पर परोक्ष रूप से प्रहार जरूर करती हैं। संकेतों प्रतिकों में अपनी बात कहती हैं समाज में जिन घटनाओं से व्यक्ति की मानसिकता उसकी वृत्ति ,उसकी स्थिति तथा उसके मनोभाव में आंशिक परिवर्तन आता है तो वह उद्देश्य कथा रचने के लिए अनुकूल है ।
प्रमुख वक्ता वरिष्ठ कथाकार नीलम कुलश्रेष्ठ जी ने अपने वक्तव्य में कहा कि इस संग्रह में  देश की सीमाओं को लांघती, घर के  कोने कोने में   गुंथी, स्त्री के घर के प्रति समर्पण  रेखांकित करतीं ,स्त्रियों व गरीबों को चालाकी से ठगती व्यवस्था ,विकलांगता में जिजीविषा के अंकुर रोपती, दलित विमर्श, क़त्ल करती कट्टर  साम्प्रदायकिता, राजनीतिक चालाकी, प्रेम सभी कुछ तो है यानि कि ये लघुकथा संग्रह समाज को उसका आईना दिखाता समूचे जीवन  का कोलाज है।
विशिष्ट अतिथि कांता राय जी जो लघुकथा की सामयिक सशक्त हस्ताक्षर हैं, ने संतोष श्रीवास्तव जी से जुड़े विधा के क्षेत्र में संस्मरण साझा करते हुए चिर प्रतीक्षित लघुकथा संग्रह के विमोचन पर प्रसन्न जताई। साथ ही उनकी लघुकथाओं पर चर्चा करते हुए कथाओं की शैली तथा सामाजिक सरोकार की बात कही और लघुकथा क्षेत्र में संतोष श्रीवास्तव जी जैसे प्रसिद्ध कहानीकारों के हस्तक्षेप पर प्रसन्नता व्यक्त की।
विशिष्ट अतिथि पवन जैन जी ने अपने विचार प्रकट करते हुए कहा ‘भोत चुभता था ताई मंगलसूत्र’ क्या कोई औरत बोल सकती है?हाँ, संतोष श्रीवास्तव की किरदार मंदा बोलती है, क्योंकि वह सशक्त है, बेड़ियों की जकड़न से मुक्त होने का माद्दा रखती है, जो दया पर नहीं अपने हाथों की ताकत पर भरोसा रखती है।
मुख्य अतिथि डॉ मिथिलेश दीक्षित जी ने संतोष श्रीवास्तव जी को बधाई देते हुए कहा कि कथा साहित्य की प्रसिद्ध हस्ताक्षर सन्तोष श्रीवास्तव लघुकथा लेखन तथा इसके प्रचार-प्रसार के लिए वर्षों से कृतसंकल्प हैंऔर सोशल मीडिया में भी निरन्तर सक्रिय रहती हैं। वे मूल्यों को समर्पित जमीन से जुड़ी हुई ऐसी लघुकथाकार हैं, जिन्होंने  अपने लेखन द्वारा समाज में जागरूकता  का सन्देश दिया है। वे न केवल, नये लेखक लेखिकाओं को तलाशती हैं बल्कि उन्हें तराशती भी हैं।
अपने आभार वक्तव्य में कथाकार मुज़फ्फर सिद्दीकी ने संतोष जी को बधाई देते हुए उनके साहित्यिक विविधता तथा जीवन के संघर्षों से जूझ कर आगे बढ़ते रहने की प्रशंसा की तथा उपस्थित सभी विशिष्ट अतिथि, वक्ताओं , कार्यक्रम में उपस्थित रचनाकारों का आभार व्यक्त किया।
कार्यक्रम का सफल संचालन मुंबई की प्रसिद्ध कवयित्री रीता दास राम  ने बहुत ही धैर्य व कुशलता से किया।कार्यक्रम में विभिन्न शहरों से आए 50 लेखकों ने अपनी उपस्थिति दर्ज की।
प्रस्तुति
रूपेंद्र राज तिवारी

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