लंदन के नेहरू केंद्र के सभागार में 18 मई को जय वर्मा द्वारा सम्पादित ‘ब्रिटेन की प्रतिनिधि कहानियाँ’ का लोकार्पण समारोह लंदन और नॉटिंघम के हिंदी साहित्यकारों की उपस्थिति में नेहरू केंद्र के निदेशक एवं प्रख्यात अंग्रेज़ी उपन्यासकार श्री अमीश त्रिपाठी जी द्वारा सम्पन्न हुआ। उस कार्यक्रम में डॉ. अरुणा अजितसरिया ने अपना आलेख पढ़ा। प्रस्तुत है उस आलेख का एक अंश…

‘जय वर्मा ब्रिटेन में लिखे जा रहे हिंदी साहित्य में एक परिचित नाम हैं और पिछले 45 वर्षों से ब्रिटेन में शिक्षा, लेखन, एवं साहित्य सेवा के माध्यम से भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिए कर्मठता से काम कर रही हैं।’

ब्रिटेन की प्रतिनिधि हिंदी कहानियाँ : संपादक जय वर्मा 5

‘ब्रिटेन की प्रतिनिधि हिंदी कहानियाँ’ संकलन में जय जी ने ब्रिटेन में बसे 26 हिंदी लेखकों की कहानियों को संकलित किया है। उनमें तेजेंद्र शर्मा, दिव्या माथुर, उषा राजे सक्सेना, अचला शर्मा, शमीम अहमद, शैल चतुर्वेदी, कादम्बरी मेहरा, ज़किया ज़ुबैरी, उषा वर्मा, अरुण सब्बरवाल, पद्मेश गुप्त, कृष्ण कुमार, स्वर्ण तलवाड़, गुरुदेव भाटिया, जय वर्मा, कादम्बरी मेहरा, वंदना मुकेश शर्मा, डॉ निखिल कौशिक, महेंद्र दवेसर ‘दीपक’ आदि वरिष्ठ लेखकों के साथ नीना पॉल, गौतम सचदेव, रमा जोशी, प्राण शर्मा आदि दिवंगत लेखक, जो आज हमारे साथ न होने के बावजूद अपनी रचनाओं से हमसे जुड़े हुए हैं और सदा जुड़े रहेंगे। इनके साथ ही शिखा वार्ष्णेय, अभिषेक त्रिपाठी, हरमिंदर सिंह नागी जैसे नवोदित हस्ताक्षर जो अपनी कहानी कहने की शैली की ताज़गी से हिंदी कथा साहित्य के मंच पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं, सबको एक साझा मंच प्रदान किया है। 
मैं इसे जय वर्मा जी की दूरदर्शिता और सबको एक साथ लेकर चलने की प्रतिबद्धता का उदाहरण और एक ऐतिहासिक उपलब्धि मानती हूँ। सभी लेखकों की प्रतिनिधि कहानी के साथ उनका संक्षिप्त परिचय जुड़ा है जिससे यह संकलन ब्रिटेन के हिंदी लेखकों पर शोध करने वाले विद्यार्थियों के लिए एक मूल्यवान संदर्भ प्रमाणित होगा। इन 26 प्रकाशित कहानीकारों के अतिरिक्त ब्रिटेन में ऐसे अनेक लेखक हैं जो अनवरत रूप से लिखने में संलग्न हैं पर जिनकी रचना छपकर पाठकों तक नहीं पहुँच पाती। यह संकलन उन्हें सतत लिखते रहने की प्रेरणा देगा ऐसी आशा करती हूँ।
संकलन की योजना बनाने के पीछे भी जय वर्मा जी के व्यक्तित्व की वह विशेषता है जो जीवन की समस्याओं में नये अवसरों को खोज निकालती हैं। सम्पादकीय भूमिका में वे लिखती हैं, ‘आज के लॉकडाउन के कष्टदायक समय में मैं यह महसूस करती हूँ कि विश्व में कोविड19 के कारण उत्पन्न हुई अति विषम परिस्थितियों में, अनेक देशों में मानवता का ह्रास हुआ।  लोगों के मन में भय, असुरक्षा और कुंठा पैदा होने लगी। … ऐसे वातावरण में मैंने सोचा कि क्यों न मैं कुछ सृजनात्मक कार्य करूँ तथा ब्रिटेन के साहित्यकारों की कहानियों को एक पुस्तक में संकलित करूँ’ और इस तरह से बीजारोपण हुआ इस संकलन का। संकलन की कहानियों की सूची में जिस बात ने मेरा ध्यान आकर्षित किया वह था रचनाकारों का क्रम। संकलन में रचनाकारों के नाम के अंग्रेजी वर्णमाला के क्रम के अनुसार स्थान देने के पीछे एक महत्वपूर्ण संदेश है कि सभी रचनाकार एक समान महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे सभी विदेश में रहकर हिंदी कथा सहित्य को समृद्ध कर रहे हैं।
कहनियों पर अलग-अलग विस्तार पूर्वक चर्चा करने के बजाय मैं कुछ बिंदुओं को रेखांकित करना चाहूँगी जो इन कहानियों विशिष्ट बनाते हैं। इन लेखकों के व्यापक जीवन अनुभव के अनुरूप कहानियों का कैनवस बहुत व्यापक और विविधतापूर्ण है। 

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ब्रिटेन के कहानीकारों के लिए कुछ आलोचकों के कथन कि वे विदेश में रहकर केवल नौस्टैल्जिया की कहानियाँ लिखते हैं, को ये कहानियाँ पूरी तरह से झुटलाती हैं। इनमें व्यक्ति और समाज के वे सरोकार हैं जो ब्रिटेन के सामाजिक जीवन के तानेबाने में गुथे हुए होने के साथ-साथ वैश्विक भी हैं। 
अभिषेक त्रिपाठी की ‘अपने हिस्से की चमक’, भारतीय और पाश्चात्य संस्कृति के अंतर को रेखांकित करती है। कथानायक, को आयरलैंड में आने पर मेरठ के एक छोटे कस्बे सरधना में पली बढ़ी बचपन की मित्र जिससे वह विवाह करना चाहता था, गँवार और पुराने ख्यालों की लगने लगती है। बेलफास्ट के चेल्सी बार में अलग-अलग नामों से जाने वाली सुनहरे बालों और नीली आँखों वाली लड़की की असलियत जानने पर उसकी गलतफहमी दूर होती है और उसकी आँखों से पाश्चात्य समाज की चकाकौँध का रंगीन चश्मा उतर जाता है। लेखक अपनी बात कहने के लिए किसी शिल्पगत चमत्कार पर निर्भर नहीं। सरल भाषा में कही गई सीधी बात से पाठक अनायास जुड़ जाता है। 
पश्चिमी समाज में सामाजिक मूल्यों के विघटन का विकृत रूप ज़किया ज़ुबैरी जी की ‘बाबुल मोरा’ 18 वर्षीय लिसा, उसकी माँ और लिजलिजे प्रेमी की कहानी में खुलासा हुआ है जो लिसा को अपनी वासना का शिकार बनाने से नहीं हिचकता। वर्षों से लंदन के कौलिंडेर में काउंसिलर रही ज़किया जी को समाज के इस विकृत रूप के प्रत्यक्ष अनुभव हैं जो कहानी की विषयवस्तु को प्रामाणिक और खरा बनाता है। माँ के बॉयफ्रेंड के जेल से लौटने पर लिसा अपने डैडी का घर छोड़ने को तैयार है। यह प्रसंग भारत में रहने वाले पाठकों को ब्रिटेन की सामाजिक व्यवस्था से परिचित कराता है। यहाँ 18 वर्ष की लड़की कानूनन बालिग होती है और अपना पैतृक घर छोड़्ने पर उसके रहने की व्यवस्था करने की जिम्मेदारी सोशल सर्विस की होती है। 
प्राण शर्मा की ‘अकेलापन’ बुढ़ापे के अकेलेपन की विवशता को उकेरने वाली एक संवेदनशील कहानी है। अपने अकेलेपन के त्रास से बचने के लिए एक कुत्ता ख़रीदने में भी उसे धोखा ही मिला और अंत में वह फिर भी अकेला का अकेला ही रहा। वृद्धावस्था की यह संवेदना किसी एक देश या काल की नहीं वरन सर्वदेशीय है। पुष्पा राव की ‘नानाजी’ ब्रिटेन में जन्मे और पले बच्चों की स्वार्थपरता को उजागर करती है। भारत से आए नाना जी के साथ कोई बच्चा अपना कमरा साझा नहीं करना चाहता है। लेखिका ने इस समस्या का सकारात्मक समाधान किया है। नानाजी अपनी सूझबूझ, योग्यता और कुशलता से दोहता-दोहती के प्रिय बन जाते हैं। 
‘मेड इन इंडिया’ में दिव्या माथुर ने एक ज्वलंत समस्या को रेखांकित किया है। ब्रिटेन में स्वच्छंदता से पली जसबीर का परिवार  भारत जाकर मर्यादित परिवार के सतनाम को दामाद बना कर ले आता है। परिवार के लिए उसकी उपयोगिता रहने-खाने के बदले व्यवसाय में सामान ढोने वाले मजदूर से अधिक नहीं। सतनाम को लगता है कि जैसे सिर पर एक छत और दो वक्त की रोटी के बदले उसका जीवन गिरवी रख लिया गया। जसबीर का आलसी और निखट्टू भाई धर्मेंद्र ‘मेड इन इण्डिया चीप ऐंड अनरिलाएबल’ कहकर जसबीर और भारत दोनों को एक साथ अपमानित करता रहता है। अपने स्वच्छंद मित्रों के सामने जसबीर को उसका मर्यादित व्यवहार शर्मिंदगी देता है। यह अंतर दो संस्कृतियों का है। सतनाम को कल्चरल शॉक और जसबीर के परिवार के षड़यंत्र के चंगुल से कुलबीर और उसके साथी मुक्त करते हैं। दिव्या जी ने विषय के अनुकूल भाषागत प्रयोगों में जो स्वतंत्रता अपनाई है वह कभी-कभी चौँकाने वाली होकर भी कथावस्तु की माँग होने के साथ प्रामाणिक वातावरण निष्पन्न करती है।
ऊषा राजे सक्सेना की ‘दर्द का रिश्ता एक ऐसी संवेदनात्मक कहानी है जो पाठक को भावुक बनाकर छोड़ती हैं। ऊषा जी ने पति-पत्नी के रिश्ते को एक नई परिभाषा दी है। उनका पारस्परिक प्रेम शारीरिक संबंध का मोहताज़ नहीं। एच आई वी एड्स से पीड़ित मिहिर और मंजरी के इस भावात्मक रिश्ते को दर्द जोड़ता है। उन दोनों के बीच दर्द का सुदृढ़ रिश्ता है जिससे मंजरी मिहिर के जीवन के अंत तक जुड़ी रहती है। कहानी की संवेदना मर्मस्पर्शी है। 
शिखा वार्षेण्य की ‘मर्यादा’ कहानी एक पाकिस्तानी परिवार की हिपोक्रिसी को उजागर करती है। पति को बाहर जाकर स्वच्छंद रूप से जीने का हक है पर पत्नी को दिन के समय भी रसोई में मोटे पर्दे ढाल कर रहने की बंदिश है। अंत में शिखा ने 18 वर्षीय लड़की के माध्यम से यह आशा जगाई है कि कदाचित अगली पीढ़ी इस बंदिश से विद्रोह करेगी। ऊषा वर्मा की ‘’उसकी जमीन’ की सबिया पाकिस्तानी परिवार में लड़कियों पर बंदिश के एक दूसरे पक्ष को चित्रित करती है। सबिया को युनिवर्सिटी जाकर आगे पढ़ने के लिए मनाही है। नौ साल की सबिया को दादी पाकिस्तान ले जाकर अपने रीति-रिवाज़ सिखाना चाहती है। अपने अधिकार के लिए सबिया का झूठ बोलना, घर से दूर जाना और अंत में वह दो संस्कृतियों के बीच त्रिशंकु की तरह लटकती है जब उसका श्वेत बॉयफ्रेंड सहवास के लिए तो तैयार है पर शादी के पुराने ख्याल के लिए नहीं। सबिया न पाकिस्तानी रही और न ब्रिटिश बन सकी। यह कहानी दो संस्कृतियों में पलने वाले व्यक्ति की पहचान के संकट से साक्षात्कार कराती है। 
पदमेश गुप्त ने ‘तिरस्कार’ कहानी में भारतीय संदर्भ में रंगभेद के विषय को संवेदनशील रूप से प्रस्तुत किया है। लेखक अपने समय की नब्ज़ पर हाथ रखने में सधा हुआ है। श्वेत-श्याम वर्ण-भेद समाज के ढांचे के भीतर लगा एक ऐसा विषैला कीड़ा है जो उसे भीतर ही भीतर खोखला कर रहा है। इस गंभीर विषय को रेखांकित किया है। ये कहानी प्रमाणित करती है कि कहानीकार का उद्देश्य केवल मनोरंजन कराना नहीं होता वह अपने समय और समाज का प्रवक्ता भी होता है।
डॉ अरुणा अजितसरिया एम बी ई ने कलकत्ता विश्वविद्यालय से हिन्दी में प्रथम श्रेणी में प्रथम स्थान, स्वर्ण पदक, स्वातन्त्र्योत्तर हिन्दी उपन्यास पर शोध कार्य करके पी एच डी और फ़्रेंच भाषा में डिग्री प्राप्त की। 1971 से यूके में रह कर अध्यापन कार्य, शिक्षण कार्य के लिए महारानी एलिज़ाबेथ द्वारा एम बी ई, लंदन बरॉ औफ ब्रैंट, इन्डियन हाई कमीशन तथा प्रवासी संसार द्वारा सम्मानित की गई। ब्रूनेल विश्वविद्यालय के अंतर्गत पी जी सी ई का प्रशिक्षण और सम्प्रति केम्ब्रिज विश्वविद्यालय की अंतर्राष्ट्रीय शाखा में हिन्दी की मुख्य परीक्षक के रूप में कार्यरत। संपर्क : arunaajitsaria@yahoo.co.uk

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