विजय कुमार तिवारी की कलम से - 'आगे से फटा जूता' की धारदार कहानियाँ 5
समीक्षित कृति : आगे से फटा जूता (कहानी संग्रह); कहानीकार : राम नगीना मौर्य; मूल्य : रु 220/- प्रकाशक : रश्मि प्रकाशन, लखनऊ
कोई भी कहानीकार या रचनाकार पुरस्कृत होता है तो उनके प्रति जन-स्वीकृति जैसा भाव उत्पन्न होता है। राम नगीना मौर्य कहानी लेखन के संसार में सुपरिचित हैं और उनके अनेक संग्रह छप चुके हैं। उन्हें डा० विद्यानिवास मिश्र पुरस्कार और यशपाल पुरस्कार से सम्मानित किया गया है। उनकी कहानियों में हमारा घर-परिवार खूब रचा-बसा होता है, सारे परिदृश्य जाने-पहचाने से लगते हैं और भावनाएं-संवेदनाएं मन को छूती-सहलाती हैं। ‘आगे से फटा जूता’ मुझे अपने प्रकाशन के शुरु में ही मिल गया था परन्तु अतिव्यस्तता और कुछ अन्य कारणों से समय से पढ़ नहीं पाया। सौभाग्य रहा है,मौर्य जी के तीन कहानी संग्रहों को मैंने पढ़ा है और उन पर यथा अपना समीक्षात्मक चिन्तन-विवेचन किया है। ‘मन बोहेमियन’ कहानी संग्रह की समीक्षा बहुतायत पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हुई है। प्रस्तुत संग्रह उनके अन्य संग्रहों की तरह खूब चर्चा में है और पाठक खूब चिन्तन-मनन कर रहे हैं।
इस संग्रह के शुरु में राम नगीना मौर्य ने ‘अपनी बात’ खूब विस्तार से लिखी है। यह एक तरह का उनका प्रयोग भी है। आखिरी गेंद,आप कैमरे की निगाह में हैं,साफ्ट कार्नर,यात्रीगण कृपया ध्यान दें और मन बोहेमियन संग्रहों पर पाठकों,समीक्षकों की आई प्रतिक्रिया को विस्तार से उद्धृत किया है। सारांशतः इनमें मौर्य जी के लेखन की सम्पूर्ण विशेषताएं शामिल हुई हैं। इस संग्रह की कहानियों के सारे तत्व भी इसमें पाये जा सकते हैं। अलग से बहुत कुछ जोड़ने-घटाने की संभावना नहीं है।
राम नगीना मौर्य की इस बात से सहमत हुआ जाना चाहिए,वे लिखते हैं,”आखिर लेखन,स्मृतियों और कल्पनाओं का लेखा-जोखा भी तो है।” बड़ी बेबाकी से  उन्होंने अपनी कहानी “आगे से फटा जूता’ की रचना-प्रक्रिया की चर्चा की है। यह उनका सामर्थ्य भी है और साहस भी। इस संग्रह का नामकरण भी उसी कहानी के आधार पर हुआ है और इसमें मौर्य जी द्वारा लिखी 11 कहानियाँ संग्रहित हैं।
राम नगीना मौर्य कहानी ढूँढने कहीं दूर नहीं जाते,अपने आसपास को,जीवन के हालात,लोगों,उनके मनोविज्ञान,उनकी जद्दोजहद व संघर्ष को खूब गहराई से देखते-समझते हैं और कहानी का कोई संवेदनशील सिरा पकड़ लेते हैं। संग्रह की पहली कहानी ‘ग्राहक देवता’ की बुनावट देखिए। प्रायः हम सभी ने फल,सब्जी आदि खरीदा है और ऐसे दृश्यों से गुजरे हैं परन्तु हमने कोई कहानी नहीं लिखी। यह उनकी संवेदना है और स्थितियों को गहराई से देखने की दृष्टि भी। उनकी कहानियों में खास तरह का विस्तार होता है जिसमें उनका अपना घर-परिवार भी होता है और दूसरों का भी। कहानी में बारीकी से हर चीज होती है जिसे जहाँ होना चाहिए,वस्तु भी,सम्बन्ध भी और व्यवहार भी। ‘ग्राहक देवता’ कहानी में सब कुछ उनका आँखों देखा या भोगा हुआ यथार्थ है,पूरी करुणा और संवेदना के साथ। वैसे ही अगली कहानी ‘पंचराहे पर’ का कथानक और विस्तार है। हर शहर में ऐसा चौराहा होता ही है,खूब भीड़ होती है,ऐसी भीड़ कि सामान्य आदमी का पैदल चलना दूभर होता है। कोई कहता है,”अरे जनाब,चौराहा नहीं,इसे तो पंचराहा कहिए।” देखा जाय तो मौर्य जी ने हास्य-व्यंग्य लिखा है और यथार्थ चित्रण किया है। राम नगीना जी लोगों के बीच बतरस और मौजू विषय पर चर्चा का खूब आनंद ले रहे हैं। उनकी संवाद शैली अद्भुत है जिसमें सत्य भी है और व्यंग्य भी। उनकी दृष्टि से कुछ भी नहीं छूटता चाहे कान में मोबाइल लगाये रोमियो-जूलियट हों,वन वे वाला बोर्ड पर नौजवानों की निराशा दूर करने वाला विज्ञापन या बिना हेलमेट के पत्नी सहित फटफटिया पर निकल रहे लोग। पान चबाते,कहीं भी पिक फेंकते,मूँगफली खाते लोग या भीख माँगते बच्चे सब कुछ लोगों की चर्चा में है। यहाँ खरीद-विक्री का अपना संसार है,खूब मोल भाव और बिना खरीदे जाने वाले ग्राहक हैं। ऐसे चौराहे से कहानी निकाल लाना मौर्य जी की अद्भुत विशेषता है। वे वही भाषा लिखते हैं और शैली भी पंचराहे वाली ही है।
राम नगीना मौर्य के पात्र अक्सर कहते पाये जाते हैं कि हमारे साथ ही ऐसा क्यों होता है? प्रश्न और उत्तर का मनोविज्ञान बड़ा पेचीदा है और चैन लेने नहीं देता। कहानी का संदेश यही है,किसी के बोलने-कहने से व्यक्ति का मन-मिजाज बदल जाता है,कभी खुश होता है,कभी चिढ़ जाता है और कभी छोटी सी बात बड़ी हो जाती है। पति-पत्नी के बीच की नोक-झोंक और संवाद लिखने में उनका कोई सानी नहीं है। पत्नी के तर्क पति को निढाल कर देते हैं। ऐसा भी हो सकता है मौर्य जी पत्नी-प्रेम में हारना स्वीकार कर लेते हैं। मानते भी हैं,वह सब समझती है,चाहे कितना छिपा लो। पति-पत्नी के बीच का संवाद और उसके भीतर छिपा प्रेम अक्सर उनकी कहानियों में उभर आता है। वे हास्य की स्थितियाँ सृजित करते हैं,नहीं-नहीं, उनकी कहानियों में सभी रस आ ही जाते हैं। औपन्यासिक पृष्ठभूमि लिए, “लिखने का सुख” कहानी बहुत कुछ कहती है। स्वयं मौर्य जी निष्कर्ष भी बता देते हैं,”अपने दिन भर के काम-काज के तमाम अनुभवों,उनसे उपजी विसंगतियों,विद्रूपताओं-विडम्बनाओं भरी दिनचर्या को किसी कागज पर उकेरना या दैनन्दिन की डायरी में लिपिबद्ध किया जाना, तनाव-शैथिल्य का सर्वोत्कृष्ट उपाय है।”
राम नगीना मौर्य रोजमर्रा की जिंदगी की कहानियाँ चुनते हैं और परत-दर-परत बुनते जाते हैं। उनके चित्र व शब्द पाठकों को पारिवारिक-प्रेम की दुनिया  में गहरे ले जाते हैं और प्रेम,संवेदना,सहयोग की भावनाओं से भर देते हैं।’सांझ-सवेरा’ कहानी को ही देख लीजिए। कभी-कभी किसी दूसरे के व्यवहार, तौर-तरीके को देखकर जीवन में सकारात्मक बदलाव होते हैं और जीवन सुखद ढर्रे पर चलने लगता है। कहानीकार से पूछना चाहिए,अधिकांश कहानियों में पति-पत्नी के बीच की नोक-झोंक,प्रेम-मनुहार से मन भरता नहीं क्या? पाठक उबते नहीं क्या?  ‘उठ! मेरी जान–‘ यथार्थ कहानी है,ऐसा ही होता है। सारे पात्र अपनी जगह सही हैं,उनका सकारात्मक-नकारात्मक पक्ष बखूबी चित्रित हुआ है और यही राम नगीना मौर्य की विशेषता है। उनकी कहानियों में संवाद जीवन्त होते हैं और तार्किक भी। भाषा-शैली चमत्कृत करती है। हर पात्र के मनोभाव को समझना और लिख डालना कहानीकार की सामर्थ्य है। कहानी का संदेश यही है,व्यक्ति को अपनी भीतरी शक्ति को समझना,पहचानना चाहिए और विश्वास रखना चाहिए,समस्याओं का समाधान निकलता है।
चरित्र चित्रण करना राम नगीना जी का अलग ही हुनर है,वे उस पात्र में जान डाल देते हैं जैसे महीनों,सालों से उसका एक-एक भाव,व्यवहार देखते-परखते रहे हों। ‘ढाक के वही तीन पात–” कहानी में बाॅस के जनसम्पर्क अधिकारी भाई सज्जन कुमार हैं,अपनी तरह के,अपनी धुन के हैं और उन्हें समझाना सहज नहीं है। साहित्यिक महिला मित्र के शब्दों को मौर्य जी तक पहुँचाना चाहता हूँ ताकि इसका उपयोग भविष्य की कहानियाँ लिखते समय ध्यान रखें। किसी सहज बातचीत के बीच माहौल को गर्म करते हुए उसने कहा,”जो दूसरों को समझाने का प्रयास करते हैं और समझते हैं कि वे समझ जायेंगे,वे महामूर्ख हैं।” खैर इस प्रसंग पर चिन्तन करने की जरुरत नहीं है। सच यह है,लोग समझाते हैं और लोग समझते भी हैं। हाँ,यहाँ,सज्जन कुमार जी किंचित भिन्न प्रकृति के हैं। उनके तर्क से हँसी भी आती है और चिंता भी होती है। कहानीकार के भी धैर्य का जवाब नहीं है। हमारे देश के कार्यालयों में उपर से नीचे तक ऐसे लोग भरे पड़े हैं। हास्य-व्यंग्य से भरी यह यथार्थ कहानी है।
मौर्य जी अक्सर भावुकता में बहते दिखाई देते हैं, जनकल्याण की कोई भावना उभर आती है। ‘ग्राहक की दुविधा’ कहानी के माध्यम से उन्होंने रोजमर्रा के जीवन में ग्राहक,विक्रेता और व्यापार के अनेक बिन्दुओं पर गहराई से विचार किया है। उनकी कहानियों में व्यौरेवार विवरण होते हैं,जीवन के गुण-तत्व छिपे होते हैं और संवाद करते हुए रहस्योद्घाटन करते हैं। परिस्थितियाँ,गरीबी किस तरह हमारे सोच-विचार,व्यवहार को प्रभावित करती है,भाषा और संस्कार भी बदल जाते हैं,इस कहानी में अनुभव किया जा सकता है। सफल कहानीकार वही है जिसकी दृष्टि जीवन से जुड़ी छोटी-बड़ी हर स्थिति-परिस्थिति पर जाती हो और उसके समाधान में लगा रहता हो। मौर्य जी कुछ-कुछ वैसे ही लेखक हैं जिनकी आँखें किसी एक्सरे की मशीन की तरह हैं। जहाँ बैठ जायेंगे,वहाँ का हर व्यौरा समेट लेंगे। वैसे ही वे जीवन में दुख-दर्द,पीड़ा को भी अनुभव करते हैं। ‘आॅफ स्प्रिंग्स’ कहानी में जीवन की जरुरी समस्या चित्रित हुई है,उम्र ढलने पर कमोड के बिना काम नहीं चलता। इस कमोड प्रसंग के माध्यम से कहानी में पिता हैं,उनकी यादें हैं,पति-पत्नी के बीच सौहार्द-प्रेम है,किंचित हास-परिहास है और मधुर जीवन्त जीवन है।
संग्रह की रोचक,हास्य-व्यंग्य के साथ कहानी है,’गड्ढा’। कहानी बहुत कुछ कहती है और अपने तरह से समाज पर,व्यवस्था पर प्रश्न खड़ा करती है। जीवन में मानवीय मूल्य होते हैं,संगतियाँ-विसंगतियाँ होती हैं,कोई समस्या हो तो समाधान तलाशा जाता है। गड्ढा कहानी में घटना घटती है,कहानीकार की धर्मपत्नी फोन पर बातें करते हुए असावधानी पूर्वक उस गड्ढे में गिर पड़ती हैं,उन्हें तनिक चोट लगती है। पति-पत्नी के बीच का संवाद रोचक भी है और मानवीय भी। गड्ढे को लेकर जैसा चिन्तन कहानीकार ने प्रस्तुत किया है,वह हमारी व्यवस्था की पोल खोल देता है। सबसे मजेदार तो वह प्रसंग है जिसे समाज के महत्वपूर्ण लोग बयान करते हैं,दलीलें देते हैं और निश्चिन्त हो जाते हैं। यह कहानी संवेदना जगाती है और समाज का बदनुमा चेहरा दिखाती है। ‘परसोना नॉन ग्राटा’ कहानी व्यक्ति और समाज के मनोविज्ञान पर प्रकाश डालती है। व्यक्ति यदि स्वयं के प्रति सजग-सावधान नहीं है तो उसे यह समाज ढोने को तैयार नहीं है। मौर्य जी ने  उन कारणों की पड़ताल की है जिससे व्यक्ति पिछड़ता हुआ दिखता है और समाज उसे छोड़ देता है। हमारी गतिविधियाँ,प्राथमिकताएं, सहभागिताएं, हमारा विचार,दृष्टिकोण सब माने रखते हैं समाज में साथ चलने के लिए। कहानी यह भी संदेश देती है,हर व्यक्ति को समाज की भावना समझनी चाहिए और सावधान होना चाहिए।
संग्रह की अंतिम कहानी है ‘आगे से फटा जूता’ और इसी नाम से संग्रह का नामकरण भी हुआ है। राम नगीना मौर्य की कल्पना शक्ति,मन की उड़ान और उनका जूता पर आर्थिक,सामाजिक, मनोवैज्ञानिक ज्ञान चमत्कृत करता है। इस कहानी में संवेदना है,इतिहास की खोज है और जीवन के अनगिनत पहलुओं पर चर्चा है। जूता के बहाने उन्होंने अपने आसपास का भौगोलिक धरातल,मुहल्लों के हर तरह के लोग और जूता पहनने वालों की प्रेमिकाओं तक की बातें की है। मौर्य जी को जूता के अकेले होने की पीड़ा है और उसके जोड़ीदार को लेकर बहुत सी चिन्ताएं हैं। जब दोनों जोड़ीदार जूते साथ-साथ रहे होंगे तब की उनकी कल्पनाओं से पाठक रोमांचित हो रहे होंगे। दुनिया में जूता से जुड़ी जितनी कहानियाँ प्रचलित हैं,उनके पहनने वालों के नाम चर्चा में हैं,राम नगीना मौर्य को सब ज्ञात है। जूता आख्यान उनसे अच्छा शायद ही किसी ने लिखा है। आज की तारीख में वे सर्वाधिक तौर पर जूता-विशेषज्ञ हैं। यदि कोई कम्पनी या सरकार इस प्रसंग में कोई पुरस्कार देना चाहे,तो उनका निर्विरोध पहला हक है। जूता को लेकर मौर्य जी के आसपास के घरों की बहुत सी कहानियाँ है जिसका ज्ञान पाठकों को आसानी से हो रहा है। साहित्यिक समारोहों की चर्चा बिना जूते के कैसे हो सकती है,वह भी मौर्य जी द्वारा। जूतों के कहीं एकत्र होते ही उनमें जो बातचीत होती है,मौर्य जी की कल्पना वहाँ तक जाती है और उनके सुख-दुख,दृष्टिकोण समझने की कोशिश करते हैं। जूता बेचने वालों से लेकर मरम्मत करने वालों तक की कहानियाँ,समस्यायें,संघर्ष सब कुछ उनके चिन्तन में है। वे कविताएं भी लिखते हैं और बच्चों को सुनाते हैं। दादी की कहानियों में जूते हैं और बच्चों के दूध-भात में भी। जूते खिलखिलाकर हँसते हैं किसी बात पर और दुखी हो आँसू बहाते हैं। सबसे रोचक जूतों का आपसी संवाद है। मौर्य जी संवाद लेखन में किसी से पीछे नहीं है। लेखक,संपादक और प्रकाशक सबसे जूता को जोड़ते हुए उन्होंने स्तरीय जूता-प्रसंग चित्रित किया है। कहानी का बड़ा सुखद अंत होता है जब बाँसुरी बजाने वाले उस बुजुर्ग को अपना दूसरा जूता मिल जाता है।
इस तरह देखा जाए तो मौर्य जी की कहानियाँ भिन्न-भिन्न कथानक और पृष्ठभूमि से जुड़ी हैं। उनकी रचनाओं में समाज का हर वर्ग उभरता है,हर वर्ग का संघर्ष और हर वर्ग की संवेदनाएं भी। उनके पास भाषा बड़ी सार्थक और सशक्त है। मुहावरे,अलंकार और रसों से ओत-प्रोत भाषा का जीवन्त चित्र पठनीयता में वृद्धि करता है। हिन्दी,उर्दू,अंग्रेजी,भोजपुरी,अवधी सबका धड़ल्ले से प्रयोग हुआ है उनकी कहानियों में। मौर्य जी में स्थितियों की बड़ी गहरी समझ है,वे हास्य का पुट डालते हैं और व्यंग्य का भी। पति-पत्नी के बीच की स्थितियों को लेकर उनका चित्रण मनोहारी है और लोगों को उनसे सीखना चाहिए। उनके मन में आदर्श की जबरदस्त समझ है और समाज के विचलन पर चिन्ता करते हैं।

विजय कुमार तिवारी की कलम से - 'आगे से फटा जूता' की धारदार कहानियाँ 6

विजय कुमार तिवारी
(कवि,लेखक,कहानीकार,उपन्यासकार,समीक्षक)
टाटा अरियाना हाऊसिंग,टावर-4 फ्लैट-1002
पोस्ट-महालक्ष्मी विहार-751029
भुवनेश्वर,उडीसा,भारत
मो०-9102939190

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