अपेक्षाओं के बियाबान : स्त्री-जीवन के संघर्षों की अंतर्कथाएँ 3
आज जब स्त्री-केन्द्रित कहानियाँ बड़े पैमाने पर धरातल से दूर विमर्श की वस्तु बनकर रह जा रहीं, तब डॉ. निधि अग्रवाल का कहानी-संग्रह ‘अपेक्षाओं के बियाबान’ एक उम्मीद जगाने का काम करता है। इस संग्रह में कुल बारह कहानियाँ हैं और हर कहानी के केंद्र में स्त्री है। किसी कहानी में प्रत्यक्ष रूप से कोई एक स्त्री केंद्र में है, तो किसीमें कई स्त्रियाँ तो किसीमे प्रकारांतर से स्त्री संबंधी विषय को उठाया गया है। कहानियों के केंद्र में स्त्रियाँ अवश्य हैं, मगर अनेक कहानियों में वर्णित संघर्ष और द्वंद्व सिर्फ स्त्री तक सीमित नहीं रह जाते अपितु पूरे मानव जीवन की जद्दोजहद का दस्तावेज लगने लगते हैं।
संग्रह की पहली और शीर्षक कहानी पत्र-शैली में लिखी गयी है। बंगाल की पृष्ठभूमि में शुभेंदु और पाखी नामक भाई-बहन के बीच पत्रवार्ता के माध्यम से यह कहानी बढ़ती है। बहन अपनी दुनिया में परेशान है, उसकी अपनी उलझने हैं और पति को लेकर असंतोष है, जिसे पत्र के माध्यम से भाई तक पहुंचाकर वो संतोष पाती है। उधर भाई अपनी पत्नी की असाध्य बीमारी से परेशान है, लेकिन तब भी बहन के पत्रों का उत्तर देना और उसकी समस्याओं का समाधान सुझाना नहीं छोड़ता। दोनों के अपने संघर्ष हैं जिससे दोनों ही परिचित हैं और प्रत्यक्षतः कोई किसीके लिए कुछ कर भी नहीं पा रहा, परन्तु पत्रों के माध्यम से एकदूसरे के सुख-दुःख को जानना उन्हें राहत देता है। वस्तुतः सारा खेल अपेक्षाओं का ही है। मानव की मानव से अपेक्षा ही वो चीज है जो इस दुनिया को चला रही है। कुछ अपेक्षाएं टूटती हैं तो कुछ पूरी होती हैं और अपेक्षाओं के इसी बियाबान में आदमी अपने संघर्षों को झेलता हुआ जिंदगी गुजार लेता है।
‘यमुना बैंक की मेट्रों’ संग्रह की दूसरी कहानी है। ये कहानी आधुनिक कहानी को लेकर स्थापित हुई इस धारणा को बल देती है कि बिना कथानक के भी कहानी लिखी जा सकती है। वस्तुतः इसमें कोई कथासूत्र नहीं है जो आरम्भ होकर अंत में समाप्त हो। ये एक बुजुर्ग व्यक्ति की मेट्रो यात्रा में उसके सामने घट रहे आम दृश्यों का वर्णन है। मगर इस दृश्य-वर्णन में भी ऐसी रोचकता और गहराई है कि पाठक कहानी से बंधा रहता है। मेट्रो में सवार गालियों में बातचीत कर रही रही एक लड़की इस कहानी का केन्द्रीय चरित्र है। अंग-प्रदर्शन करने वाले उसके वस्त्र और गालियों से भरी बातों से सभी सहयात्रियों में असहजता है। मगर लड़की इन सबसे बेपरवाह अपनी दोस्त से बातचीत में मशगुल है। मगर यही आपत्तिजनक भाषा बोलने वाली लड़की जब बुजुर्ग दम्पति के लिए अपनी सीट छोड़ती है, तो उसके चरित्र का एक नया ‘शेड’ उभरकर आता है।
लेखिका ने इस प्रसंग के बाद बिलकुल सही लिखा है कि, ‘गुलाब के फूल का रंग कोई भी हो, महक और गुण तो वही रहते हैं। आधुनिकता की होड़ में भागते, स्वयं से दूर होती इन युवतियों की आपत्तिजनक भाषा से भ्रमित होते हम दरअसल भूल जाते हैं कि यह अँधेरी कोठरी से बाहर आ, प्रकाश में नहाने का प्रथम उन्माद है। सदियों से मौन स्वर जब मुखर हुए हैं तो उनकी वाचालता हमें अचंभित किए है। ये आवेश के क्षण हैं न कि इनका स्थायी रूप…अभी इन्होने यही प्रतिबंधित पृष्ठ पढ़े हैं तो उन्हें ऊंचे स्वर में बोल, बराबरी का तमगा हासिल करने का आकर्षण भी है लेकिन समय के साथ इन पृष्ठों को यह स्वयं ही फाड़कर, एक नया सुसभ्य शब्दकोश विकसित कर लेंगीं।” स्वतंत्रता के नामपर स्वच्छन्दता की ओर बढ़ जाने वाली आधुनिक लड़कियों की मनोवृत्ति का सटीक और तार्किक आकलन इन पंक्तियों में मिलता है। सबसे बड़ी बात ये कि यह सबकुछ लेखिका ने एक पुरुष पात्र के माध्यम से पाठकों तक पहुँचाया है और उक्त पंक्तियाँ पुरुष पात्र की ही चिंतन-प्रक्रिया  के रूप में आती हैं। अंत में पुरुष पात्र उस लड़की को एक मनचले लड़के की पिटाई के लिए शाबासी भी देता है। इस प्रसंग का संदेश है कि नए दौर की इन लड़कियों में छोटी-छोटी बातों को लेकर बुराई निकालने की बजाय उनकी हिम्मत और साहस को सराहने की जरूरत है, तो वे धीरे-धीरे अपनी कमियों-खामियों को भी पहचान लेंगीं और अपने लिए सही रास्ता भी ढूंढ लेंगीं।
निधि अग्रवाल पेशे से चिकित्सक हैं, अतः इस ज्ञान की रचनात्मक उपस्थिति भी उनकी कहानियों में दिखती है। ‘फैंटम लिंब’ कहानी इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। चिकित्सा विज्ञान में फैंटम लिंब वो स्थिति है, जब पाँव कट जाने के बाद भी आदमी को लगता है कि वहाँ दर्द हो रहा है। इसी तरह कहानी की नायिका समिधा को भी उससे दूर हो चुके अम्बर को अनुभूति होती है। अम्बर अब किसी और के साथ है, मगर समिधा खुद से अलग हो चुके इस अंग से जुड़ी पीड़ा का अनुभव कर रही है। यहाँ फैंटम लिंब समिधा-अम्बर के संबंधों का एक रूपक बनकर उपस्थित हो गया है। यह कहानी छोटी है, मगर इसके भाव गहन हैं। वैसे ये कहानी सुखांत है या दुखांत ये कहना कठिन, शायद यह कहा जा सकता है कि ये इन दोनों के बीच किसी स्थिति पर समाप्त होती है।
‘दण्ड-निर्धारण’ कहानी का कथानक जितना अलग है, उसकी कथन-शैली भी उसी तरह अनूठी है। कथन-शैली का अनूठापन ऐसा है कि एकबार में शायद कहानी समझ में भी न आए। साइकिल चोरी की एक सामान्य घटना से शुरू होकर कहानी का अचानक से पाप-पुण्य और शाप-विधान तक पहुँचना पाठक के दिमाग को चक्करघिन्नी बना सकता है, मगर एक-दो बार पाठ करने के बाद जब कहानी का मर्म स्पष्ट होता है, तो पाठक चकित भी होता है और प्रभावित भी। कहानी के अंत में इसके प्रमुख पात्र आदित्य का यह कथन ही इस कहानी का सारांश है, ‘इस लोक में देवी में मानी जाने वाली नारी की अस्मिता पर प्रतिदिन होते आघातों को जानकर, मैं पूर्ण विश्वास से कहता हूँ कि श्री आचार्य द्वारा मुझे दिया गया दण्ड पूर्णतः न्यायोचित था। काश धरती लोक पर भी कुत्सित विचारों के पनपते ही कठोर दण्ड देने का प्रावधान होता।’
‘आईना कभी झूठ नहीं बोलता’ कहानी भी उल्लेखनीय है। यह कहानी आपको सत्य घटना से प्रभावित लग सकती है और शायद है भी। यह तेज़ाब पीड़ित लड़की पद्मा की कहानी है। मनचले लड़कों द्वारा तेजाबी हमले में चेहरा झुलस जाने के बाद पद्मा श्रेयस नामक एक पत्रकार युवक के प्रयासों से मीडिया की सुर्ख़ियों में आ जाती है। उसकी पहचान किसी बड़ी हस्ती-सी हो जाती है। सरकारी नौकरी मिल जाती है। लेकिन तब भी उसके प्रति लोगों का नजरिया नहीं बदलता। माँ-बाप के लिए अब वो एक दुधारू गाय की तरह है, जिसकी शादी की बात वो नहीं करना चाहते। उनकी परवाह किए बगैर वो श्रेयस से शादी कर लेती है। श्रेयस उससे शादी करके अपनी छवि तो चमका लेता है, लेकिन निजी जीवन में उनके बीच वैसा सम्बन्ध नहीं बन पाता जैसा एक पति-पत्नी के बीच होता है। इस कहानी का अंत तेज़ाब पीड़ित लड़कियों के लिए एक जीवन संदेश छोड़ जाता है। अंत में जब वो स्वयं से प्रश्न करती है कि क्या कोई उसके चेहरे से प्यार कर सकता है ? तब उत्तर मिलता है, ‘तुम्हारे प्रश्न का उत्तर कुछ संशय भरा भले हो लेकिन सत्य है कि यह चेहरा कई चेहरों को स्वयं से प्यार करने की हिम्मत अवश्य दे सकता है।’
तितली और तिलचट्टा, हरसिंगार सब जानता है, दूसरी पायदान आदि कहानियाँ भी जीवन, विशेषकर स्त्री-जीवन की विविध करुण अंतर्कथाओं को अभिव्यक्ति करती हैं। हर कहानी के शिल्प में भी लेखिका ने नयापन रखने का प्रयास किया है और एक हद तक कामयाब भी रही हैं। भाषा सहज किन्तु साहित्यिक है। भाषा को लेकर कोई कट्टरता लेखिका में नहीं दिखती। उन्होंने हिंदी लिखा है, मगर परहेज उन्हें किसी भाषा के शब्दों से नहीं। आवश्यकतानुसार अंग्रेजी के शब्द भी आए हैं। मगर इतना ही जिससे हिंदी के हिंदीपन में कोई सेंध न लगे।
कुल मिलाकर यदि किसीको स्त्री-जीवन के अंतर्संघर्षों, जटिलताओं, चुनौतियों और द्वंद्वों को समझना हो तो यह कहानी-संग्रह उसके लिए सर्वथा पठनीय है। स्त्रियों को तो यह पसंद आएगा ही, पुरुष भी यदि खुले मन से पढ़ेंगे तो उन्हें भी इसमें कुछ अरुचिकर नहीं लगेगा।
पुस्तक – अपेक्षाओं के बियाबान (कहानी-संग्रह)
लेखिका – डॉ. निधि अग्रवाल
प्रकाशक – बोधि प्रकाशन
मूल्य – 250 रूपये

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