राकेश शंकर भारती द्वारा निर्मला भुराड़िया के उपन्यास 'गुलाम मंडी' की समीक्षा 3
इस बार के विश्व पुस्तक मेले में जब अपनी किताबें, इस ज़िंदगी के उस पार (किन्नर विमर्श पर पहला मौलिक कहानी संग्रह) और कोठा नं. 64 (जी. बी. रोड और दिल्ली के सेक्स वर्कर्स पर आधारित कहानी संग्रह) के प्रचार-प्रसार के सिलसिले में अपने देश गया था तो सामयिक प्रकाशन के स्टॉल पर निर्मला भुराड़िया जी से मुलाक़ात हुई थी।
मैंने वहीं महेंद्र भारद्वाज जी से गुलाम मंडी ख़रीदकर निर्मला जी से ऑटोग्राफ लेकर कुछ तस्वीरें भी लीं। बाद में उन्होंने भी मेरे साथ अमन प्रकाशन के स्टॉल पर आकर मेरी दोनों किताबें लीं। यूक्रेन आने के बाद कई लेखक मित्रों की किताबें पढ़ने के बाद गुलाम मंडी की भी बारी आयी। दूसरी किताबें पढ़ने की तुलना में यह किताब पूरा करने में थोड़ा सा ज़्यादा वक़्त लगा। शुरुआत की 30-40 पृष्ठ पढ़ने में मुझे कठिनाई का ज़रूर सामना करना पड़ा, लेकिन बीच में आकर उपन्यास ने मुझे अपने प्रवाह में बाँध लिया। उसके बाद बहुत आसानी से आख़िर तक पढ़ गया। 
गुलाम मंडी मानव तस्करी और देह व्यापार पर आधारित उपन्यास है। मैं ख़ुद वेश्या विमर्श के लेखक होने के नाते उपन्यास के हर ऐसे पात्रों से हमदर्दी रखता हूँ, जिसे ज़बरन मानव तस्करी और देह व्यापार की दलदल में धकेला जाता है। किन्नर विमर्श के कुछ पात्र भी उपन्यास को सबल प्रदान करता है, फिर भी हम पूरी तरह से इसे किन्नर विमर्श का उपन्यास नहीं कह सकते हैं। लेकिन आपको अंगूरी और रानी जैसे किन्नर पात्रों से भी हमदर्दी हो जायेगी।
उपन्यास में गौतम, कल्याणी और जानकी ऐसे पात्र हैं, जो हमें उपन्यास के आख़िर तक बाँधकर रखते हैं। शुरुआत में जहाँ कल्याणी जैसे पात्रों के प्रति मेरे मन में जो गुस्सा उठा था, उपन्यास के आख़िर में वह गुस्सा भी शाँत हो गया। इस उपन्यास में गौतम जैसे पात्र को एक सच्चे पिता के रूप में दिखाया गया है, इससे यह तो सिद्ध हो जाता है कि एक मर्द में दूसरे के बच्चों के लिए भी सच्चे पिता बनने के सभी गुण विद्यमान रहते हैं।
बीच उपन्यास में जहाँ जानकी को एक नीच जाति से दिखाया है, उसे कल्याणी की ताई से अछूत होने की दुत्कार मिलती तो है, लेकिन गौतम और कल्याणी जानकी को गोद लेकर एक सच्चे माता-पिता का किरदार अदा करके हमारे समाज के लिए एक आदर्श पेश करता है। मीरा जैसे पात्र से भी हमें हमदर्दी हो जाती है। उपन्यासकार एक हथिनी को मीरा नाम देकर उसकी भावना का वर्णन करके भी हमें जानवर के प्रति हमदर्द होने का संदेश दे जाते हैं।
बीच उपन्यास में हिमालय के मनोरम चित्रण भी पाठक के मिजाज़ में ऊर्जा भरती रहती है। हमें कल्याणी का मनोवैज्ञानिक विश्लेषण करने की ज़रूरत है। कल्याणी इसीलिए अपना बच्चा पैदा नहीं करना चाहती है कि इससे उसके पेट में झुर्रियाँ आ जायेंगी, ख़ूबसूरती में गिरावट आ जायेगी। इससे फ़िल्म इंडस्ट्री में उसका कैरियर चौपट हो जायेगा। लेकिन दूसरी तरफ़ गौतम की मनोदशा का विश्लेषण करने पर हमें पता चलता है कि गौतम को एक उम्मीद तो थी कि कल्याणी से, उसके प्यार से उसकी अपनी संतान की प्राप्ति हो।
उपन्यास में ऐसा नहीं होता है। मुझे इसकी खटक है कि गौतम आख़िरकार अपनी संतान से मरहूम रह गया है, लेकिन दूसरी तरफ़ मुझे इस बात की ख़ुशी है कि जानकी को गौतम और कल्याणी ने अपनी संतान के रूप में परवरिश की और सारी ख़ुशी देने की भरपूर कोशिश की है। अगर एक स्त्री अपने प्यारे मर्द से बच्चा नहीं पैदा करना चाहती है तो मुझे उसे बाध्य करने का अधिकार नहीं है। यहाँ मर्द पर निर्भर करता है कि आख़िर में वह एक स्त्री से क्या चाहता है।
जानकी मानव तस्कर के चक्कर में फँसकर अमेरिका चली जाती है। उसकी परवरिश में थोड़ी सी खोट रह गयी, जिसकी वजह से मुँबई मायानगरी में वह गलत संगति में फँस जाती है और जिसका नतीजा होता है देह व्यापार की दलदल फँसना। उपन्यास में एक जगह ऐसा भी मोड़ आता है, जब जानकी अमेरिका जाकर जिस्म फ़रोशी की दलदल में फँस जाती है और दूसरी तरफ़ गौतम भी कल्याणी को छोड़कर चला जाता है। लेकिन यहाँ कल्याणी रोती-धोती नहीं है।
वह एक बहादुर भारतीय नारी का किरदार अदा करती हुई विषम परिस्थिति का सामना करती है, जिसके परिणामस्वरूप गौतम भी घर लौट आता है। एक किन्नर रानी को नकली किन्नरों की चंगुल से छुड़ाकर देह व्यापार से निजात दिलाती है। स्त्री जननाँग में परिवर्तित करने के लिए उसका ऑपरेशन भी कराती है।
रानी को अपने पास रखती है। यह पात्र किन्नर पात्र को अपने घर में जगह देकर अपने समाज के लिए एक मिसाल क़ायम करती है। इससे यह साफ़ है कि कल्याणी इस उपन्यास में एक बहादुर महिला पात्र है और वह जाति-पाति, भेदभाव में विश्वास नहीं रखती है, जो अपने जज़्बे से हालत बदलने की कुव्वत रखती है। गौतम भी इस काम में अपनी पत्नी कल्याणी के साथ कंधे से कंधे मिलाकर काम करता है। कल्याणी एक साथ कई पात्रों को जिस्म फ़रोशी की दलदल से बाहर निकालकर, एक सच्ची माँ किरदार अदा करके अपनी दूसरी बुराई पर जीत हासिल कर लेती है।
जानकी की बहन लक्ष्मी को भी देह व्यापार से मुक्ति दिलाती है। रूठने के बाद दोबारा गौतम दोबारा उस समय कल्याणी के पास टीवी चैनल में ख़बर सुनकर अस्पताल वापस लौट आता है, जब मुँबई के रेड लाइट इलाक़े में विडियो बनाने के क्रम में एसिड से कल्याणी पर हमला हो जाता है। इससे एक भारतीय पुरुष के निर्मल हृदय का परिचय होता है। गौतम कल्याणी के प्यार पाने के लिए आख़िर तक कल्याणी के पास टिका रहता है। 
 एकबार फिर से जानकी पात्र का विश्लेषण करने पर पता चलता है कि शुरुआत में जानकी के व्यवहार और मनोस्थिति में सुधार की जाती तो शायद जानकी गलत दोस्तों की संगति में फँसती ही नहीं है। इसके लिए कल्याणी और गौतम का आँतरिक द्वंद भी ज़िम्मेवार है। लेकिन उपन्यास के आख़िर में यह द्वंद टूटता हुआ नज़र आता है। हमें यह भी संदेश मिलता है कि हमें किन्नरों की मदद करनी चाहिए। कल्याणी रानी किन्नर को लल्लन गुरु की चंगुल से निकालकर जिस्म फ़रोशी से निजात दिलाती है, मुँबई लाकर ऑपरेशन कराती है।
अपने घर में एक पारिवारिक सदस्य के रूप में रखती है, एक भारतीय परिवार का सारा लार-प्यार देती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ रानी ही कल्याणी की इकलौती दत्तक पुत्री जानकी को अमेरिका जाकर मानव तस्कर की चंगुल से छुड़ाकर मुँबई वापस लाती है। इससे यह साबित हो जाता है कि एक किन्नर की मदद करने पर, उसे गले से लगाने पर आपको मीठा फल भी मिल सकता है और आप समाज में एक मिसाल क़ायम कर सकते हैं।
उपन्यास- गुलाम मंडी 
लेखक- निर्मला भुराड़िया
प्रकाशक- सामयिक प्रकाशन, दिल्ली 
समीक्षक- राकेश शंकर भारती, यूक्रेन 
पृष्ठ- 240
राकेश शंकर भारती
कहानी, उपन्यास, यात्रा-वृत्तान्त आदि विधाओं पर लेखन। अबतक तीन किताबें प्रकाशित। संपर्क - rsbharti.jnu@gmail.com

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