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हंसा दीप की कलम से संजीव जायसवाल ‘संजय’ की पुस्तक ‘रॉकी अहमद सिंह’ की समीक्षा

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हंसा दीप की कलम से संजीव जायसवाल ‘संजय’ की पुस्तक 'रॉकी अहमद सिंह' की समीक्षा 3
पुस्तक : रॉकी अहमद सिंह लेखक : संजीव जायसवाल ‘संजय’
प्रकाशक : किताबघर प्रकाशन, नई दिल्ली समीक्षक : हंसादीप, टोरेंटो, कनाडा
संजीव जायसवाल ‘संजय’ का कहानी संग्रह “रॉकी अहमद सिंह” पढ़ना मेरे लिए रोमांचक अनुभव रहा। पुस्तक का यह अनूठा शीर्षक कहानियाँ पढ़ने की ललक बढ़ाता है। पहली कहानी “उसकी रोटी” से लेकर आखिरी कहानी “सूरज की पहली किरण” तक संजीव जी ने पाठकों को बाँधे रखा है। कथ्यों की विभिन्नताओं के साथ ये कहानियाँ भाषायी सौंदर्य से ओतप्रोत हैं।  
“आगे बढ़ने से ज्यादा दूसरे को पीछे ढकेलने की जद्दोजहद” जैसे वाक्य सटीक व्यंग्य के साथ सामाजिक विसंगतियों का पर्दाफाश करते हैं। “उसकी रोटी” कहानी उन बच्चों की पीड़ा को बारीकी से चित्रित करती है जिनके जीवन में गरीबी एक अभिशाप की तरह उनका पीछा करती है। संवेदनाओं में डूबी इस मार्मिक कहानी में रोटी के लिए तरसता, भूख से त्रस्त बच्चा सिवाय रोटी के और कुछ नहीं चाहता, कहानी का यह तेवर कहानी को बेहद प्रभावी बनाता है।
“गुनाह” कहानी आतंकी दुनिया में कदम रखती युवा पीढ़ी के जीवन को उजागर करती है। साथ ही, उन महिलाओं के साहस को भी दर्शाती है जो इनके प्रेम के चंगुल में फँसकर स्वयं को आजाद कराने में सफल हो पाती हैं। उनकी अपनी जिंदगी दाँव पर जरूर लगती है लेकिन साहस भरा उनका एक कदम अपराध की दुनिया से नकाब हटाने में कामयाब होता है।
कथ्य के बदलते ही संजीव जी की भाषा उतनी ही तेजी से बदलती है। यह विशिष्ट शैली इन कहानियों को अपनी जमीन से जोड़ती है। पात्रों के अनुकूल उर्दू व देशज शब्दों का भरपूर प्रयोग है। व्यंजना शक्ति का करारापन कहानियों में जान भर देता है। “रॉकी अहमद सिंह”, किताब की शीर्षकीय कहानी के ओहदे को कायम रखते हुए अपनी संप्रेषणीयता को बरकरार रखती है। “मेरी माँ की कोख को कूड़ेदान की तरह इस्तेमाल किया था” एक नाजायज औलाद की मानसिक यंत्रणा का संवेदनशील चित्रण है, बदले की आग हिंसा को अपने भीतर समेटे सब कुछ भस्म करने को उतारू हो जाती है।
“क्रांति शुरू होती है” ग्रामीण अंचलों में ठाकुरों द्वारा किए जा रहे अत्याचारों एवं शोषण को बखूबी सामने लाती है। यह कटु सत्य है कि गाँव की महिलाएँ समाज के उन ठेकेदारों की बपौती होती हैं। संजीव जी की अभिव्यक्ति शैली बेजोड़ है। एक ओर जहाँ “इज्जत का भारी भरकम बोझ उठाकर कोई कितनी दूर भाग सकता है”, “सैकड़ों द्रोपदियों का तेज” जैसे शाब्दिक प्रयोग हैं वहीं दूसरी ओर अन्याय के खिलाफ आवाज उठाते नारी स्वर भी हैं। उनके नारी पात्र असहाय, बेबस और विवश नहीं बल्कि संघर्षों को चुनौती देते न्याय के खिलाफ आवाज उठाते हैं; फिर चाहे वह “प्रतिशोध” कहानी की नायिका डॉ. मीता हो या फिर “व्हाइट मेलिंग” कहानी की नेहा हो, “गुनाह” कहानी की रजिया हो या फिर “क्रांति शुरू होती है” की दुलारी हो।
बाल मनोविज्ञान मेरे लेखन का पसंदीदा विषय रहा है। इसीलिए “आखिरी सलाम” कहानी में छिपे बालमन से मेरा रूबरू होना स्वाभाविक था। पाँच वर्षीय मोहित के जरिए फौजियों के बच्चों की अन्तर्व्यथा को यह कहानी खूबसूरती से पेश करती है।
संग्रह की सारी कहानियाँ सामाजिक विद्रूपताओं का चित्रण करते हुए रचनाकार के रचना कौशल को निपुणता से प्रस्तुत करती हैं। कथाकार का भाषायी प्रवाह पाठकों को अपने साथ बहा ले जाने की क्षमता रखता है।

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