Sunday, June 23, 2024
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डॉ. नीना छिब्बड़ की समीक्षा – पंख खोलती डायरी – पंख खोलती डायरी – रिश्तों की महा-जीवन गाथा

  • डॉ.नीना‌ छिब्बर
पंख खोलती डायरी (2023) – उपन्यास, लेखक – सुषमा चौहान “किरण”, प्रकाशक – विधा विहार, दिल्ली। मूल्य – ₹300/-
सुषमा चौहान ‘किरण’ का उपन्यास” “पंख खोलती डायरी” 200 पृष्ठों की महा‌-जीवन गाथा है जहाँ हर रिश्ते की‌ पैनी नजर से हर दृष्टिकोण से चीर फाड़ कर भीतरी सुख -दुख को इस तरह से दर्शाया गया है कि पाठक भौचक रह जाता है।‌ उपन्यास में अनेक पात्र हैं जो अंतरगुर्फित हैं। प्रत्येक पात्र का चरित्र -चित्रण वैयक्तिक, सामाजिक, मानवीय और मनोवैज्ञानिक   रूप से बेबाक हो कर किया गया है। इसी तरह‌ समाज, देश और देश-काल के साथ उठे प्रश्नों का उतर पता लगाने में भी मुख्य और गौण चरित्रों के साथ उपन्यास कहानी दर कहानी‌ बुनता जाता है और पाठक लेखिका के साथ उन सब पात्रों के साथ कभी प्रेम और कभी नफरत की लहरों में बहते जाते हैं।
पंख खोलती डायरी.. डायरी विधा में लिखा गया संभवतः पहला उपन्यास है जहां डायरी अपने भीतर के सुख-दुख को महसूस करती है। इसमें तकरीबन पचास सालों का भूत भविष्य और वर्तमान है। डायरी की पहली तारीख 5/6/57 ओर आखरी 25/6/18 है। डायरी ही सब के चेहरों के नकाब खोलती है और पाठकों को भी आत्मचिंतन करने के लिए विवश कर देती है।
“जो मुझ में अंकित है। हृदय में भरा‌ है, उसे कहूं या ना कहूं?  कहती हूँ तो दुनिया के आगे एक संभ्रांत आदमी के दोगले पन का, संयुक्त परिवार की विभीषिका का पूरा रूप सामने आ जाएगा और नहीं कहती हूँ तो ऐसे अत्याचार निरंतर होते रहेंगे।”
मीना उपन्यास की नायिका… जो सौतेली सास, सौतेली माँ दोनों के  दंश सहती है।‌    ससुराल के नाम पर दंभी ,शक्की और स्व-प्रगति के लिए किसी को भी होम करने को आतुर पति रमेश। जिसे अपनी शिक्षा, उच्च शिक्षा, उच्चतर शिक्षा और नाम के अलावा सब कुछ गौण लगता है।
“मीना की हाड़-तोड़ मेहनत का मेहनताना राम को मिलता है।”
राम की पढ़ाई भी मेरी बैरन है। भविष्य वर्तमान की नींव पर खड़ा होता है। जब वर्तमान ही बर्बाद हो रहा हो तो किस भविष्य के सपने देखूं।”
डायरी ..आज फिर मुझमें तेजाबी आग लगी है, मैं पोर-पोर झुलस रही हूं, पृष्ठ मवाद से भर रहे हैं।”
संयुक्त परिवार में देवर अपनी माँ सम भाभी से बलात्कार करता है पीटता है पर सब शुतुरमुर्ग की तरह हो गये हैं। शिक्षित अहमी पति को मीना ने बताया तो “यह सच नहीं हो सकता ।तुम साथ चलने का बहाना बना रही हो।”
पापा ने कहा” पहल मीना ने ही की होगी ।चेतन तो बालक है क्या समझे।”
मीना के साथ ऐसे निम्नतम हादसे होते रहे और घर में रहने वाले स्त्री-पुरुष धृतराष्ट्र बने रहे।
मीना कम पढ़ी लिखी है और गरीब घर की है इसलिए पति महोदय उसकी और पीहर की मिट्टी पलीद करते रहते हैं। वो जानते हैं कि मीना भीतर से कमजोर है। घर परिवार नहीं छोड़ेगी।
सच है स्त्री को समाज परिवार,बच्चों के नाम पर छला‌ जाता है।‌
सुषमा चौहान ने मीना के दर्द और अंतर पीड़ा को इतनी सच्चाई से उभारा है कि कभी -कभी हम‌ आसपास देखने के लिए मजबूर हो जातें हैं। धिक्कारते हैं खुद‌ को‌ क्योंकि ऐसी घटनाएं कहीं ना कहीं आसपास घटी हैं। घटती थी और रहेंगी यदि पंख नहीं खोलेंगे।
मीना की एक ही सखी है डायरी सुख- दुख, हार- जीत, सपने,अरमान, आकांक्षाएं, डर, कल्पनाएं , अंधकार रोशनी,हर सांस को समझने वाली।‌ संपूर्ण कथानक‌ मीना के  सच्चे-झूठे रिश्तों की छलना के तागों से ऐसे बुना गया है कि वो जहां सुकून के लिए दृष्टि डालती है वहीं डंक मारने के लिए सपोले तैयार खड़े हैं। ससुर, दामाद, ‌बेटियां, बेटा ,बहू ,पोता दौहित्री यानी पीढ़ी बदलती है पर व्यथा‌ नहीं। उसकी बड़ी बेटी निशा जरूर उसके आंतरिक दर्द को समझती है । यदा-कदा पिता के सामने मुखर भी होती‌ है पर दंभी पिता उसे भी अपमानित और लांछित करता है। उपन्यास के स्त्री पात्र निशा, ऊषा, चेतना ,धरा, रश्मि,वसुधा बुआ , गुड़िया, संध्या ,सवेरा,राधिका आदि इन्हीं दंशों को सहते हुए कभी कमजोर और कभी दुनियादारी की चालाकियों में रंग कर चालें चलते हैं। मीना सब की कुचालों का‌ केंद्र बिंदु है। पंख खोलना चाहती है पर अपने बचपन में जो सौतेली माँ से दंश मिले हैं वो अपने बच्चों को नहीं देना चाहती। भारतीय नारी अपने ही मकड़जाल में फसी रहकर खुद को ही लील जाती है।
उपन्यास का दूसरा‌ चेहरा‌ या कथा का दूसरा रूख कहें तो वो पुरुष जो स्वयंसिद्ध हैं। जिनके इशारों पर पृथ्वी , चांद तारे , भाग्य, भूत और वर्तमान नाचते हैं। मीना के पति, मीना के ससुर, देवर चेतन, बेटा विभोर,दामाद कमल‌ और दामाद मानव मुख्य हैं शेष भी कहानी को अर्थपूर्ण प्रवाह देते हैं।
मुख्य पुरुष पात्र “,, रमेश” जो अपने को धर्मनिरपेक्ष और स्वतंत्र विचार धारा के साथ प्रगतिशील साबित करने के लिए नाम के पीछे‌ जाति नहीं “अभय” लगाता है। जिसे मीना राम कहती हैं पर जो व्यवहारिक जीवन में राम‌ की परछाई से भी कोसों दूर है। उसे सिर्फ अपनी शिक्षा, अपनी निरंतर प्रगति और अपने सपनों को साकार‌ करने के‌ अलावा कुछ दिखता नहीं है। सूझता नहीं है।
बाहरी दिखावा, परिवार की झूठी शान‌ और इज्जत ‌बची रहनी चाहिए ।चाहे उसके लिए अपनी ही पत्नी की अस्मिता तार‌ -तार रोज‌ हो‌।” सतीत्व भंग होना या चेतन द्वारा  बलात्कार अभय जी के लिए  उतना महत्वपूर्ण नहीं था। जितना संखिया पीकर परिवार और उसकी इज्जत  पर बट्टा लगाना था। बलात्कार  तो घर की   बात थी और घर में ही सुलझ जाती ।
यह रमेश का एक चेहरा है। आधुनिकता को ओढ़े पुरातनपंथी । बेटे की चाह‌ में चार बेटियों को पैदा करने में संकोच नहीं। रमेश अपनी पत्नी मीना की दर्दीली जलती चिंता की राख पर भोले शंकर की तरह तांडव करते रहे। आगरा, दिल्ली अमेरिका,पेरिस विश्व के सभी सम्मानित विश्वविद्यालयों में शिक्षा देने वाले अपनी ही पत्नी को घर को नौकरानी से बदतर समझते हैं।
“पता नहीं नवीं भी पढ़ी है या बाप ने झूठ बोलकर शादी कर दी। घर का काम कर, बच्चों पाल और जब कहूं तब पेटीकोट उतार”
एक समाजशास्त्री, प्रोफेसर, भावुक कवि, धनाढ्य व्यक्ति की असल सोच। जो अपने ‌अहम् को पोषित करने के लिए अपनी पत्नी को कभी द्रौपदी, कभी ठंडी औरत कभी रंडी कहने में भी संकोच नहीं करता।
“शायद डी.एन.ए. में कुछ शौक विरासत में मिले हैं। महफिलें जमती हैं। कब कहां क्या बोलना है, पता नहीं। मीना का दुख (अनपढ़ पत्नी) का दुख जग जाहिर करते हैं।
रमेश पर-पीड़न विकार से ग्रसित है। जो सुखी क्षणों में भी दूसरों की सुखों में आग लगाकर मुस्काता है।
“सोचो मीना,तुमने कभी कल्पना नहीं की होगी कि एक नवीं पास,गरीब घर की गंवार लड़की दुनिया के सबसे सुंदर शहर में घूमेगी” ।
“मीना तेरी हाय मेरे घर को खा जाएगी।,” ना सिर्फ अपनी पत्नी पर अपनी बेटी निशा को भी वो‌ गाहे-बगाहे आंतरिक चोट पहुंचा कर संतुष्ट होता है।‌
वास्तव में राम‌ एक “वुमनाइजर” होना एक बीमारी है।” जिसमें ‌पद का, कमाई‌‌ का भी होता है। वो‌ पोलमाईजर की श्रेणी में आता है।
राम के लिए कर्म और धन ही सब कुछ है। राम के लिए मीना मात्र एक पंचिंग बैग है। ‌क्योंकि राम के भीतर का‌ दानव बाहर आकर चिंघाड़ता है तो मीना जैसी चुप रहने वाली, सहम जाने वाली बीवी चाहिए।
राम अपने आप को सहृदय कवि, बुद्धिमान प्रोफेसर, प्रगतिशील ,और शाही अंदाज से जीने वाले व्यक्तित्व वाले दिखाते थे और‌ रहते भी उसी ठाठ से ,पर पत्नी के हाथ में दो पैसे उसके स्वतंत्र खर्च के लिए नहीं रख सकते थे।
जिंदगी भर अनेक लड़कियों को अंक-शयिनी बनाया। अपने ही रचित स्वर्ग में अपनी ही इच्छा से किसी को सम्मानित किया और मन आया तो उसी को चारों खाने चित करने में एक बार भी नहीं सोचते थे। चापलूसी, प्रशंसा, आत्मप्रशंसा पसंद थी। अपनी ही पत्नी, बेटी और दौहित्री  को चोर कहने में हिचकिचाहट नहीं करते थे।
“एक धनी अहंकारी अपने ही खून को जलील‌ करने में कितना गिर सकता है”
राम के अवगुण जो उसके व्यक्तित्व को दागदार करते हैं वहीं उसका दूसरा पहलू भी है। जहां वो अपने सौतेले भाई बहनों के लिए कुछ भी कर जाने को तैयार‌ है।  दादा जी की हर बात को सिर‌ माथे लेता था। लक्ष्य को पाने के लिए अपने आप को झोंक देता था।  अपनी विद्वत्ता का डंका चारों ओर बजाया। बस‌ पारिवारिक राजनीति में से निकल ना सका और‌‌अपनी ही गृहस्थी को स्वाहा कर दिया। उसकी इस कमजोरी का फायदा परिवार के चापलूस छोटे बड़े लोगों ने उठाया। वहीं खुद की पत्नी को नारकीय जीवन,‌ बेटियों को भी सही राह पर चला ‌ना सका।‌ अंत में बीमार असहाय राम मुक्त हो गया पर मीना के स्वाभिमान को बचा नहीं सका।
पंख खोलती डायरी… में पुरुष चरित्रों के भी अलग-अलग शेड हैं।
डायरी जो मीना की सखी है। मीना के अनुसार हर लड़की के पास‌ एक डायरी होनी चाहिए।‌
“यह एक मीना का ग़म नहीं है। आधी आबादी का सच है… मुझमें उसके जीवन का हर पल शब्दों के रूप में जिंदा है। वहीं लिखा जाता है जो घटित होता है।”
डायरी… बरसों बाद मीना के पीहर‌ जा रही हूँ। मीना के घर में खुशी हो या परेशानी, हर जगह मेरा साथ जरूरी है।”
” वैसे में निर्जीव हूं। जहां रख दो वहीं पड़ी रहती हूं… पर जब कोई अपनी व्यथा मुझ पर लिखने लगता है तब दर्द से मैं सजीव हो जाती हूं।”
“पिछले दिनों मीना ने बार- बार मुझे अटैची से निकाला, पर बस रोती रही।शब्द रीत गये ‌उसके दिमाग से!”
डायरी ने मीना की पीड़ा, कुछ सुख के क्षण, हिम्मत बटोरने के पर और टूटने को अपने पन्नों पर महसूस किया है। वो बार बार मीना को हिम्मत दिलाती है। पर बस होता कुछ नहीं। ऐसा लगता है डायरी जीवित पात्र हैं जो विश्लेषण की क्षमता, दर्द में भीगने की और खुशी में नाचने ‌की सोच सकती है। यह जीवन की मार्गदर्शक भी है और कमजोरी, आत्महत्या के प्रयास करने पर फटकारती भी है।
डायरी विधा में लिखा उपन्यास मील का पत्थर साबित होगा।  सुषमा चौहान ने कहानियों का गुम्फन ही अति सुन्दर तरीके से नहीं किया वरन् प्रत्येक पात्र एक दूसरे से जुड़ा हुआ लगता है। उपन्यास का तारतम्य कहीं भी टूटता नहीं है।
यह सुषमा जी की लेखनी और साहित्यिक बौद्धिकता का ही कमाल है कि अनेक पात्र होने के बावजूद सब का अपना अलग स्वभाव, चरित्र,मानवीय कमियां और खुबियां दर्शाते हुए उनकी लेखनी पाठकों को बांधने में खरी उतरी है। भाषाई सौंदर्य और जगहों  के वर्णनात्मक चित्रण उच्च स्तरीय है।
डॉ.नीना‌ छिब्बर
जोधपुर
Email: neena.chhibbar@gmail.com
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