कहा जाता है कि साहित्य एक साधना है ….अब अपने पड़ोस वाली साधना के बारे में सोचने मत बैठ जाना और साधना कट वाली साधना तो बिलकुल नहीं है| ये वो साधना है जो सिद्ध करनी पड़ती थी, मेहनत और लगन के बल पर ..उसमें भी कुछ विधाओं को तो बाकायदा साधना पड़ता था.. शायद यही कारण होगा जो बड़े बड़े साहित्यकार पहाड़ों और सुन्दर प्राकृतिक जगहों पर लेखन के लिए प्रवास करने जाते थे, ठीक उसी प्रकार जिस प्रकार ऋषि मुनि तप करने हिमालय जाते थे| आज समय और सोच दोनों बदल गयी है|
आज का साहित्यकार ….मुनि की तरह भ्रमणशील रहकर साधना करता है| उसकी सोच है कि जिस तरह ठहरा हुआ पानी सड़ जाता उसी प्रकार एक जगह बैठ कर लिखने से नया और प्रयोगवादी साहित्य नहीं रचा जा सकता| और एक बात आजकल किसी के पास इतना वक्त नहीं कि साधने में बर्बाद करें, अब जल्दी से लिख लिखा कर छपवायें और सम्मान प्राप्त करने का जुगत बिठाएं या सिद्धी प्राप्त करने जैसे बे फिजूल काम करें|

