Friday, June 21, 2024
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दिलीप कुमार का व्यंग्य – टू-इन-वन

खिड़की से कई सारे कदमों की आदमरफ़्त और नारों की आवाजें सुनकर मैं घर से बाहर आ गया। गेट खोलकर देखा तो खारे हज़रात अपने कुछ चेले-चपाटों के साथ तख़्तियाँ उठाये नारे लगा रहे थे कि – 
“हम लेकर रहेंगे आज़ादी ”।
मुझे सामने देख कर, कर्मशिशिर खारे महोदय ने हाथ ऊंचा करके तख्ती लहराते हुए अट्टहास किया “आज़ादी” ।
कर्मशिशिर खारे साहब, फिलहाल किसी स्थायी रोजगार में नहीं थे। मगर बहुधंधी आदमी थे। हज़रात ने प्रूफ रीडिंग, सम्पादन, टाइपिंग,रिपोर्टिंग, विज्ञापन एजेंट, सहायक सम्पादक, अखबार पत्रिका का रजिस्ट्रेशन करवा कर उसे निकालने,साहित्यक समारोह आयोजित करने से लेकर; वह सारे ही काम कर डाले थे, जो भी साहित्य के कमाऊ पक्ष से जुड़े थे। उन्होंने म्युनिसिपलटी में अपने सम्बन्धों और साँठ-गाँठ के ज़रिये, मोहल्ले के पार्क के पास एक कमरा भी एलाट करा लिया था। जिस पर  उन्होंने “जन चेतना एवं  जनाधिकार संघर्ष समिति,” का बोर्ड लगा रखा है। ये आयडिया उन्हें एक बार अपने लखनऊ प्रवास से मिला था। जब वह एक सरकारी साहित्यिक आयोजन में भाग लेने लखनऊ गए थे। तब वहीं उन्हें पता लगा कि म्युनिसिपल आफिस से मजदूरों के नाम पर क्रांति, संघर्ष  आदि के लिये किसी बढ़िया कमर्शियल जगह पर दुकान या जमीन एलाट करवाया जा सकता है। शर्त ये है कि, आपके प्रार्थना पत्र में  मजदूरों के नाम की क्रांति और संघर्ष की नेक नियती का उल्लेख हो। 
एक बार जगह या दुकान एलाट हो जाये तो फिर उस जगह पर जो चाहे बेचो, पटरा-बल्ली से लेकर किताब और कोल्डड्रिंक भी। बस शर्त ये है कि दो चार पोस्टर उस जगह पर लेनिन, माओ, चेग्वारा, फिदेल कास्त्रो के लगे हों। इन सबके साथ में कुछ क्रांति के नारे लिखे हों और कुछ क्रांतिकारी साहित्य भी हो। लखनऊ की रोशनाई परमदर्शी नामक कवियत्री ने ऐसी आवंटित दुकान पर तो कमाल ही कर रखा था। शहर के प्रमुख नुक्कड़ पर जो दुकान उन्हें आवंटित हुई थी। उस दुकान-सह-क्रांति कार्यालय में उन्होंने पूजींवाद के विरोध वाले पोस्टरों के सामने बहुराष्ट्रीय कम्पनी का फ्रिज  रखकर अमेरिका का पेप्सी और कोका कोला बेचना शुरू कर दिया था। आफ द रिकार्ड, कवियत्री महोदया बताती हैं कि, क्रांति की बातों से दिमाग को खुराक़ मिल जाया करती है और पेप्सी कोला की बिक्री से पेट भर जाया करता है। लखनऊ में तो कवियत्री के इस विचारों के घालमेल के कारण उन्हें “टू इन वन” भी कहा जाता है। कर्मशिशिर खारे भी लखनऊ में वक्त निकालकर, रोशनाई परमदर्शी से मिले। वह उनसे बहुत प्रभावित हुए।
खारे महोदय ने लखनऊ में उनके  “टू इन वन” माॅडल की बारीकियाँ सीखीं और अपने शहर में लौटते ही उस योजना को सफल करने के लिये दिन रात दौड़ने लगे। लखनऊ जितनी तो सफलता तो उन्हे नहीं मिली पर क्रांति, सुधार, मजदूर एवं नारी उत्थान के लिये, उन्होंने एक कमरा आख़िर अपने एनजीओ के नाम, नगरपालिका से आवंटित करा ही लिया। उन्होंने एक बेहद ज़ोरदार बोर्ड, उस पर लगाया; जिसका नाम रखा, “जन चेतना एवं जनाधिकार समिति।” पेंटर ने जब बोर्ड बनवाने के बाद उनसे पैसे माँगे तो, खारे महोदय ने  पैसे देने से इंकार करते हुए, पेंटर को समझाया  “ये कोई मेरा निजी काम थोड़े न है। ये तो क्रांति के वास्ते है। मजदूरों कामगारों की भलाई की खातिर है। इस जमात में तो तुम जैसे लोग शामिल हैं; तो तुम भी इस क्रांति को आगे बढ़ाने में सहयोग करो। ये तुम्हारा भी तो काम है और अपने काम का कोई पैसा मांगता है क्या। क्रांति है क्रांति।”
उनकी बातें सुनकर पेंटर ने माथा पीट लिया और अपने को कोसते हुए कहा –
“मुझे पहले ही लोगों ने कहा था कि आप की बातें तो बड़ी-बड़ी हैं; मगर मजदूरी नहीं देते किसी की पूरी।”
खारे महोदय ने उसे घूरा और दुकान के अंदर चले गये। 
पेंटर जुबान से क्रांति फ़िल्म का गाना “तुम तुम तरम -तरम” गाता हुआ, मगर मन ही मन, कर्म शिशिर खारे को गालियां देता हुआ चला गया था। उसके बाद कर्म शिशिर खारे ने भी वह कमरा किराए पर एक टेंट वाले को दे दिया। जिसमें टेंट वाले ने अपना गोदाम बना लिया। क्रांति के बैनर-पोस्टर और साहित्य की जगह अब उस कमरे में करछा,भगोना और डोंगा भरा रहता है। उस कमरे पर दिन भर ताला लटका रहता है और कमरे की बाहरी दीवारों पर क्रांति के पोस्टर और बैनर लटकते रहते हैं। बिल्कुल लखनऊ मॉडल की तरह टू-इन-वन सर्विस। 
खारे साहब दिन भर संघर्ष शुल्क के नाम पर रसीदें कटवाते रहते हैं; ये और बात है कि शहर में अब सब उन्हें और उनके संघर्षों को भी जान गए थे। उस पेंटर और उसके जैसे उन तमाम लोगों के मार्फ़त, जिनसे या तो उन्होंने काम करवाया या था या उनसे कोई सामान लिया था और पैसे नहीं दिए थे। शहर में तो शायद ही कोई उनसे, माली इमदाद और लेन-देन करता हो।  फेसबुक पर भी उनके जन चेतना एवं जनाधिकार संघर्ष समिति का पेज निरन्तर अपडेट होता रहता है। जिसमें मजदूरों और कामगारों के जीवन को बदलने के लिये क्रांति की महती आवश्यकता पर बल देते हुए आर्थिक सहयोग की अपील की जाती रहती है। उनकी ऑफलाइन अपीलें तो सब जान चुके थे। सो अनुदान तो शायद उन्हें कोई धेला भर भी न देता था; मगर ऑनलाइन अपीलों में कुछ भूले-भटके लोग आ जाते थे और फ़ेसबुक पेज पर दिए गए उनके नारों से प्रभावित होकर, उनके एनजीओ के खाते में कुछ रकम भेज दिया करते थे। 
 मैंने उन्हें अभिवादन किया तो उन्होंने मुझे ललकारा- 
“आइए-आइए! आप भी हमारा साथ दीजिये। इस संघर्ष में आज़ादी की जंग में हमें आपकी ज़रूरत है। आज हम सरकार की दमनकारी नीतियों के खिलाफ प्रोटेस्ट करने जा रहे हैं । 
“हक़ है हमारा आज़ादी 
हम लेकर रहेंगे आज़ादी ”
उनके नारे समाप्त हुए तो 
मैंने उनसे तनिक सकुचाते हुए पूछ ही लिया –
“कैसी आज़ादी महोदय। देश को आज़ादी  मिले हुए सात दशक से ज्यादा बीत चुके हैं। अब आजाद देश में आप किससे आज़ादी  मांग रहे हैं”?
कविवर ने तमकते हुए कहा-
“तुम्हे ख़तरे नहीं दिखते क्या? अरे! ब्राह्मणवाद से, मनुवाद से,फासीवाद से आज़ादी। साम्प्रदायिकता से आज़ादी। पूंजीवाद से आज़ादी। हर किस्म की मिले आज़ादी। अरे हक़ है हमारा आज़ादी”।
मुझे उनको टोकना पड़ा-
“बस करिए कविवर। एक साथ इतनी ज्यादा आज़ादी की किल्लत क्यों आन पड़ी। देश में कोई पद, क्या किसी की जाति-धर्म देखकर दिया जा रहा है। देश संविधान से नहीं चल रहा है क्या। आप ऐसा क्यों कह रहे हैं?”
“देखो माना कि तुम लिखते-पढ़ते हो। मगर तुम अभी बच्चे हो, अक़्ल और अनुभव से कच्चे हो। तुमको दिखता नहीं क्या कि, यह देश पूंजीपतियों के हाथ मे जा रहा है। इसलिए हम प्रोटेस्ट कर रहें हैं। आप भी आइए, देश में फैल रही तानाशाही का हमारे साथ विरोध कीजिये” उन्होंने उंगलियां नचाते हुए कहा। 
फिर उन्होंने मेरी तरफ उँगली तानते हुए कहा-
“जो तटस्थ हैं समय लिखेगा उनका भी इतिहास।”
उनके इस सीधे वार से मुझे गुस्सा आ गया, पर उनके सीनियर होने का लिहाज़ करते हुए मैंने उन्हें उनका लेखकीय धर्म याद दिलाया,  “विरोध का दामन तो आपने लखनऊ से लौटने के बाद ही थामा है, कुछ बरस पहले ही। आपने तो विरोध की कविताएं हाल ही में लिखना शुरू की हैं। जीवन भर तो आप मीरा और कबीर पर लिखते रहे। जब देश काफ़ी कठिनाई में था, तब आप लोगों को भक्ति सिखा रहे थे। अब देश में भक्ति की बयार बह रही है तो आप प्रोटेस्ट का झंडा बुलंद किये बैठे हैं। ऐसा बदलाव क्यों कविवर।”
“मीरा और कबीर की भक्ति अलग थी। हम तो उसी टाइप का भक्त लोगों को बनाना चाहते हैं। लेकिन आजकल तो लोग अंधभक्त बन रहे हैं। फासिस्ट लोग भगवान का नाम ले रहे हैं। उनको भक्ति का असली मर्म पता ही नहीं, ” उन्होंने मुझे समझाया।
“मीरा भी कृष्ण की भक्ति में लीन होकर दीन-दुनिया भुलाकर हमेशा, “मेरे तो गिरधर गोपाल दूसरो न कोई,” कहा करती थीं। वैसे ही आज के लोग अपने गिरधर गोपाल को खोज रहे हैं, तो इसमें बुरा क्या है?” कविवर से मैनें अपनी जिज्ञासा प्रकट की।
“तो गिरधर गोपाल को मन में रखो ना। भक्ति तो मन से ही होती है; फिर उनके लिये तुम लोग इतना बवाल, मुकदमेबाज़ी क्यों करते हो? इस बार भी कृष्णजी का मुकदमा दायर कर दिया। पहले इतने दिन राम जी का मुकदमा दायर कर रखा था। कितना नुक़सान होता है देश का क्या ये मालूम है तुमको? रिलीजन अफीम होता है, तुमको मालूम है कि नहीं ” उन्होंने आंखे तरेरते हुए मुझसे कहा।
उनकी बात सुनकर थोड़ी हँसी आई मुझे । 
“तो डेमोक्रेसी में धरना-प्रदर्शन और माँग के बाद भी अगर किसी की बात नहीं सुनी जा रही है तो, अदालत का ही रास्ता बचता है ना!  अब अदालत न्याय कर ही देगी तो उसे सबको मानना ही पड़ेगा; चाहे पक्ष में हो या न हो । पसन्द हो या न हो। डेमोक्रेसी में मसले ऐसे ही सुलझाए जाते हैं कविवर; और सुनिए हुज़ूर-ए-आला! जो हज़रात ये फ़रमा गए थे कि, रिलीजन अफीम होता है; वह भी एक रिलीजन को फॉलो करते थे। ये तो वही मिसाल हो गई कि जात-पाँत न मानने वालों की भी एक जात होती है,” उनसे विनम्र स्वर में मैंने कहा।
उन्होंने मुझे हिक़ारत से देखा और झल्लाते हुए कहा –
“तुम पढ़ा-लिखा होकर भी गोबर जैसा बुध्दि रखता है। तुम ही नहीं आजकल के काफी सारे नए लोग भी पढ़ लिखकर अंधभक्त हो गए हैं। क्या फालतू का लेखक है तुम लोग? अरे लेखक का मतलब है सत्ता का विरोध में होना, प्रोटेस्ट करना और हर बात का विरोध करना। लेकिन तुम तो सरकार का तलवे चाटता है। लेखक मतलब विरोध में होना होता है,” यह कहते हुए वह तमतमा उठे।
“तो आपका मतलब लेखक का मतलब विरोधी होना होता है बात चाहे सही हो गलत” मैंने भी अपनी जिज्ञासा फिर उनके सामने रख दी।
“चुप तुम अंधभक्त हो चुका है। फासिस्ट हो गया तुम भी। ग़रीब, मजदूर, किसान का विरोधी हो गया है तुम भी। हम जाता है, हमको गरीबों के हक़ में और पूंजीपतियों के खिलाफ मोर्चा निकालना है।”
यह कहकर वह गुनगुनाते लगे-
“इंकलाब लाना है साथी 
इंकलाब लाना है 
पूंजीपतियों और फासिस्टों 
को अब मार भगाना है।”
यह गाते हुए उनका काफ़िला बढ़ रहा था। मैं उन्हें मजदूरों और क्रांति के नारों से लिखी तख़्तियाँ, एक हाथ से उठाये हुए जाते देख रहा था, दूसरे हाथ में उनका मोबाइल फोन चमक रहा था।
दिलीप कुमार
दिलीप कुमार
संपर्क - jagmagjugnu84@gmail.com
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1 टिप्पणी

  1. आदरणीय दिलीप जी!
    व्यंग्य की हमें ज्यादा समझ नहीं है टिप्पणी लिखने की दृष्टि से।आपको पहले भी पढ़ा है और जहांँ तक हमें याद आ रहा है कि हमने ज्यादा कुछ लिखा नहीं कभी । सिर्फ इसीलिए।
    लेकिन इस बार हमारा लिखना हमको जरूरी इसलिए लगा कि कहीं आप यह ना सोचें की लघु कथा का विमर्श यहां आड़े आ गया। आँट पालने और दुश्मनी रखने में हमें जरा सी भी दिलचस्पी नहीं है।
    यही समझ में आया कि मजदूर के नाम पर किस तरह लोग कमाई की दुकान खोलते हैं।
    बहुत-बहुत शुक्रिया आपका।

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