“नारायण नारायण” नारद ने आते हुए कहा
“वहीं ठहरो सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करो, और तुमने मास्क क्यों नहीं लगाई?”
“प्रभु मास्क लगाकर बिना खाए पिए अधमरे लेटे हो ,रक्त से नहाए हो ,चोटों से क्षतिग्रस्त हो ,आँख में आँसू सूख गए हैं मुझे पास आने दो ।ब्रह्मा जी ने भेजा है।
“क्या करूँ नारद? महीनों हो गए नहाए ,खाए पिए, मास्क लगाकर भक्तों ने बाहर से मंदिर का ताला लगा दिया है।”
“प्रभु मास्क उतारकर कुछ ग्रहण कीजिए जब तक आप नहीं खाएँगे जनता इसी तरह भूख से तड़पती रहेगी “
“जानता हूँ नारद मगर तुम तो जानते हो मैं भक्तों के हिसाब से चलता हूँ ।वे मुझे जैसे रखते हैं रहता हूँ ।जो उनके साथ घटित होता है। मेरे साथ भी होता है ।मगर उन्हें सबक सिखाने का मेरे पास दूसरा उपाय नहीं है।
प्रभु आपके साथ माँ लक्ष्मी भी तो बन्द हैं वे तो अपने भक्तों पर कोई रोक नहीं लगा रही हैं ।उनके भक्त व्यंजन बना खा रहे हैं ।कुछ तो आपके भक्तों की मदद भी कर रहे हैं”
“ममता अंधी होती है नारद उसी की वजह से बच्चे बिगड़ते भी हैं वह बच्चो की गलतियाँ ज्यादा समय याद रख उन्हें कष्ट में नहीं देख पाती ।मुझे नियम से ही उनके अनुरूप ही चलना होगा ।वह चुपके से खाना लेकर निकल जाती है उन्हें दे आती है।”
“वह सबको क्यों नहीं देती प्रभु ?”
नारद वह मेरा आधा अंग है अगर शरीर का आधा हिस्सा निर्जीव पड़ा रहेगा नहीं खायेगा पियेगा तो वह कैसे एक्टिव रहेगा ।वह कोशिश करती है ।तुम तो जानते हो वह धन की देवी है उसके भक्तों के पास पहले से ही धन है।”
मगर आप पालक, संरक्षक हैं प्रभु आपके बच्चे सड़कों पर किस हालत में हैं ये तो आप जानते ही हो आपकी पीड़ा बता रही है उनकी सब चोटें आपको लगी हैं “
“मैं विवश हूँ नारद”
मैं आपको यही बताने आया हूँ ब्रह्ना जी ने कहा है विष्णु से कहो कोई ऐसी जुगत लगाए जिससे मंदिर खुलें ,वे नहाएं, खाए पियें ताकि जनता का पेट भरे और शान्ति हो “बीमारी की वैक्सीन बनवाकर लोगों को रोग मुक्त करें”
“वे सुधरे नहीं हैं नारद”
“वे सुधरेंगे भी नहीं प्रभु उनमें दानवी तत्व मौजूद है बस इतनी चोट काफी है अब उठिए।”
“तुम्हें मालूम है जब तक भक्त खुद न चाहे उठ नहीं सकता, भगवान भक्त के वश में होते हैं नारद “
“ठीक है ,आशीर्वाद दीजिये ,माँ सरस्वती ही इसका उपाय बताएंगी ,उनके पास जाकर मैं ही कुछ करता हूँ”
“जल्दी करो नारद वरना मैं भी न बचूँगा और सहन नहीं होता”
जानता हूँ प्रभु आप भोजन ग्रहण करते हो तो दुनिया की भूख मिट जाती है। द्रोपदी के पात्र से शाक का पत्ता खाने के बाद सबकी भूख मिट गई थी ।
सृष्टि आपका अंश है उसका हर कष्ट चोट आपके शरीर पर भी होती है।चलता हूँ प्रभु नारायण- नारायण “
नारद मंदिर खुलवाने के लिए उपाय पूछने सरस्वती के पास चल दिये। विष्णु दुखी निराश बिस्तर पर लुढ़क गए।

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