कोई पूछे कि कि हिदी-साहित्य को फलने-फूलने के लिये क्या चाहिये? तो मैं कहूँगा – साहित्य में प्रगति होने के लिये गुटबंदी होना आवश्यक है। बिना गुटबंदी के साहित्य में निखार नहीं आता। देखिये, तुलसी, सूर, मीरा समकालिन थे, पर आपस में कोई गुटबंदी नहीं। तो वे करते रहे भजन राम और कृष्ण के। क्या मिला? तो अपने राम ने भी सोचा कि कहीं से दो दाने इकठ्ठे करके खिचड़ी बना लें। कैसा  गुट बनाउँ? कोई नेता, मंत्री बुरा मान जाय तो वह मेरी खाल उधेड़ देगा। यह मुझे मंजूर नहीं क्योंकि सच कह पाने की हिम्मत मुझमें है नहीं।
फिर सोचा मैं एक लेखक हूँ। देशभक्त भारतवासी हूँ।  क्यों न साहित्य में ही अपना गुट बनाऊँ। मुझ जैसे लेखक जो एक जैसा सोचते हैं और समस्वार्थी हैं याने एक जैसे स्वार्थ हैं उन सब का मेरे गुट में स्वागत है। हम सभी  भारत की मूल परम्परा से जुड़े हुये हैं और सरकारी अनुदान पाने के भी हक़दार हैं। हमारे गुट में होना कृति के साहित्यिक होने की मूल कसौटी है। अनुदान  और पुरस्कार पाने की दौड़ में व्यस्त होकर भी हम विदेशी लेखकों को अपनी बिरादरी में कैसे शामिल कर सकते हैं? फिर कोई विरोधी भी होना चाहिये जो हमसे बात बात में भड़क जाय। उत्तर-प्रत्युत्तर में हमारी प्रसिद्धी आकाश को छूने लगेगी। ऐसी अच्छी योजना पर भारत के ही साहित्यकार और भारत के पाठक और श्रोता मेरी बात सिद्धांतवश मानने को तैयार नहीं। आजकल भलाई का जमाना नहीं रहा। जिनके स्वार्थ सिद्धि की बात करो वही हमारा विरोध शुरू कर देते है। यह सिद्धांत है क्या बला? 
   
डेड़ चावल की खिचड़ी पकाने वालों की हमारी विचारधारा कुछ इस तरह की होगी कि हमारी याने भारतीय समीक्षा की द्रष्टि में प्रवासी साहित्य कोई साहित्य नहीं है। विदेशी संस्कृति की ऊलजलूल और अन्धी नकल कर देने से कोई लेखन साहित्य नहीं हो जाता। प्राचीन भारत की आदर्श परंपरा पर लकीर का फकीर होने के बदले जो फास्ट फूड के आसपास मंडराती जीवन की समस्याओं से जुड़ा हो उसे  साहित्य कैसे कह सकते हैं? हम उन वीर-बहादुर लोगों में हैं जो मध्ययुगीन कृतियों का पाँच हजारवी  बार पोस्टमार्टम करने के बाद  भी  फिर से चीरफाड़ द्वारा रस निकालते हैं। साहित्य कोई ऐसी वैसी चीज़ नहीं। हमने भी बहुत पढ़ लिया – फँला फँला को ( क्षमा कीजिये! फँला फँला जी, आपकी प्रशंसा में कुछ कहना चाहता हूँ पर ईर्ष्या हो रही है आपसे) और आप जैसे लेखकों को । क्या मिला? वे  यू. के. में रहते हैं और रहते हैं गोरे लोगों के बीच। उन गौरांग महाप्रभुओं के बीच होते हुये भारतीयों की स्थिति और समस्याओं का मनोवैज्ञानिक द्रष्टिकोण रखने से कोई साहित्य नहीं हो जाता। फिर वे कोई मनोविज्ञान के प्रोफेसर तो हैं नहीं। वे जब परदेसी माटी में देसी दिल लेकर कलम चलाते हैं तो वर्णसंकर जाति का साहित्य पैदा कर लेते हैं। इसमें क्या बड़ाई है?  पर जैसा कि मैंने कहा दुख की बात है कि भारत के ही बहुत नामी कवि-लेखक  मेरे विचार को समर्थन नहीं देते। पता नहीं, वे क्यों सत्य की दुम बने फिरते हैं? अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी चला कर सच का साथ देने की हिम्मत उनमें कहाँ से आ गई? उनका कौनसा साहित्यकार भतीजा विदेश में है जो मेरी बात मानने से इंकार करते हैं?  अपने ही परायों सा बर्ताव करने लगें तो फिर किससे उम्मीद रखी जाय?
ऊपर से बुरा हो इंटरनेट का ! कृतियों को प्रकाश में लाने के लिये पॉवर-ब्रोकर या उनसे जुड़े गुरू घंटालों का महत्व कम हो गया। पैसा देकर महँगी पुस्तकें खरीदने की जरूरत नहीं रही। किसी जगह पर हिन्दी पुस्तकों का बुक-स्टाल हो या न हो; वेब-पत्रिकाओं पर अच्छा खासा साहित्य उपलब्ध हो जाता है। अब तो कृतियों पर निर्णय लेने वाला आम पाठक हो गया है।  उसे साहित्य का ज्ञान तो कुछ है नहीं वह क्या खाक अपना निर्णय देगा? । लीजिये,  अनुभूति और अभिव्यक्ति में भारतीय  तो क्या सभी भारतवंशी कवि-साहित्यकार आसानी से मिल जाते हैं। ’कविता-कोष ’, ’भारत-दर्शन’ आदि में अनगिनत कवियों  को पढ़ा जा सकता है। कविता क्या कहानी, उपन्यास, शोध-ग्रंथ सभी में ऐसा ही हाल है।  तो क्या हुआ? दुरूहता और जनजीवन से कटा हुआ वाणी-विलास ही साहित्य का मापदंड है अत: सभी साहित्यिक-पत्रिकाओं में प्रवासी साहित्यकारों को अछूत घोषित कर देना चाहिये। सलमान रशदी कहते हैं कि उनके एक विवादास्पद उपन्यास का मूल स्वर ऐसा है कि भले ही पाश्चात्य संस्कृति के मापदंड से यू. के. में बसे भारतीयों का खूब मखौल उड़ाया जा सकता है। पर उसी देश में जहाँ भारतीय अधिक संख्या में रहते हों; भारतीय मूल्यों से गोरे लोग भी वैसी ही हास्यास्पद स्थिति में आ जाते हैं। और इस आधार पर वे चाहते हैं कि  विदेश में बसे साहित्यकारों को आप भारतीय साहित्यिक कृतियों का मूल्यांकन और समीक्षा करने के लिये दीजिये। कहते हैं कि कचरा और अनाज़ अलग हो जायगा। पर यह तो वैसी ही बात हुई ना कि किसी निखट्टू को जज की कुर्सी पर बिठा दिया जाय!
हम मानते हैं कि दलित या प्रगतिवादी या परंपरावादी –  गुट में शामिल होना आपके साहित्य की पहचान है। पर हमारा गुट सबसे न्यारा। इसमें शामिल हो कर आप साहित्य की नैया पार हो जायेंगे।  ठीक भी है – अब कालिदास के जमाने तो गये।  मेरा मत  अपनी पंक्तियों के माध्यम से कहता हूँ “ऐसी कiवता / जो किसी ख़ेमे में छीना झपटी कर / झंडा उठा ले / राजनीतिक वादों इरादों पर / अपनी तुकबन्दी की छाप छोड़े / और मोदक की थाली की तरह सजाए – / खयाली पुलावों की चाशनी से बने / चुनावी घोषणा पत्र पर कसीदे करे / सफल है वह कविता…”

तो हम सभी जानते हैं कि राजनीति में उलझे बिना साहित्य के  अस्तित्व का अवमूल्यन हो जायगा। पुस्तक में क्या लिखा है यह गौण है। पुस्तक का विमोचन किस मंत्री ने किया है उससे पता चलता है कि पुस्तक कितने पानी में है। तो साहित्य को ऊँचा लाने के लिये सत्ता से साँठ-गाँठ आवश्यक है। लीक पर चले बिना या  न्यस्त स्वार्थों में उलझे बिना आगे बढ़ना असंभव है। यदि भावुकतावश विदेश में पले-बढ़े  साहित्यकार को मान दिया गया  तो भारतीय लेखक स्वयं की  सृजनशीलता के अचूक अवसर गँवा देगा। समझने की बात है कि छोटे मोटे विदेशी लेखक को प्रोत्साहन देने में कोई आपत्ति नहीं पर यदि वह स्वयं के कद का या खुद से ऊँचे कद का होने लगे तो उसे धम से पटक देना चाहिये बल्कि ऐसी सूरत ही नहीं आने देनी चाहिये।
अजीब और निरर्थक सवाल उठने लगे हैं कि  क्या कारण है कि विदेश में बसे भारतीय साहित्यकार जब अँगरेज़ी में लिखते हैं तो पूरी दुनिया में उनके नाम का डंका बजता है पर जब उनके ही भाई-बहन हिन्दी में लिखते हैं तो भारत में भी उन्हें कोई नहीं पूछता। इसलिये कि वे इसके योग्य नहीं। रविन्द्रनाथ टैगोर ने इस बात पर दुख प्रकट किया था कि भले उन्हें नोबेल पुरस्कार जैसा अंतरराष्ट्रीय सम्मान मिला किन्तु उससे पहले उन्हे अपने ही देश में कोई छोटा सा पुरस्कार भी क्यों न मिला? अब यह तो टैगोर से बराबरी करने वाली बात हो गई। हमारा मूड खराब किया तो जाओ, तुम कहना क्या चाहते हो, हम सुनेंगे नहीं और समझेंगे नहीं।   
  विदेश में बस कर लेखक अपने डॉलर के बल पर पुस्तकें छपवा कर क्या साहित्यकार हो जायेंगे? हमारे शास्त्रों में ठीक ही कहा है कि  “समुद्र के पार तो बस पाप है” । तो वहाँ लिखा हुआ लेखन साहित्यिक कैसे हो गया? ’नये आयाम’ का झाँसा हमें मत दो। ’ उड़ान से वंचित ’ होने का डर किसी ओर को दिखलाना, किसी ओर को भरमा लेना। हम बड़े साहित्यकार हैं और गालीगलौज के विशेषज्ञ हैं। हम से कोई मुकाबला नहीं कर पायेगा।

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