Friday, June 21, 2024
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अशोक गुजराती की लघुकथा – राह

मैं फ़िलवक़्त पचास साल का हूं और अच्छे पद पर हूं. दो छोटे बेटा-बेटी हैं. पढ़ाई में होशियार. उनके भविष्य को लेकर हम आश्वस्त हैं. हम दोनों उनको बहुत चाहते हैं और एक-दूजे को भी. कुल मिलाकर हमारा परिवार प्रेम तथा हर सुविधा से संपन्न कहा जा सकता है.

असल में ये दोनों बच्चे मेरी पहली पत्नी के जाये हैं. यह मेरी दूसरी बीवी है. पहली?… आह! मैं समझ नहीं पाता हूं कि राह मन से तन तक जाती है या तन से मन तक…

क़िस्सा मुख़्तसर इतना ही है कि कालेज के ज़माने से हम दोनों में प्यार था. एक-दूसरे को जानते-बूझते रहे और विवाहबद्ध हो गये. नहीं चल पाया हमारा यह रिश्ता दूर तक. अंत में आपसी समझौते के तहत हम क़ानूनन अलग हो गये. बच्चे मेरे पास ही रहे. यह मेरी पहली पत्नी थी.

अब मैं अकेला था. सेक्स की आदत पड़ गयी थी. एक काॅलगर्ल संपर्क में आयी. हम शारीरिक तौर पर मिलते
रहे. धीरे-धीरे कहीं भीतर से भी जुड़ते रहे. मैंने प्रस्ताव रखा और वह मान गयी. यही मेरी दूसरी पत्नी है.

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