Friday, June 21, 2024
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सारिका भूषण की लघुकथा – डर

“देखो ! अब मेरे गुलाबजामुन भी तैयार हो गए । जल्दी से बता कि कैसे बने हैं ” राधिका की खुशी का ठिकाना नहीं था ।

” माँ ….अब बस भी करो । मैं अब इतना नहीं खा सकती । कितना खाना बनाओगी …चलो न बातें करना है तुमसे । ” हॉस्टल से छुट्टियों में घर आयी निशा को माँ की थकान नहीं अच्छी लग रही थी ।

” इसलिए इतनी दुबली हो गई है । साल में एक बार तो आती है । पूरी ज़िन्दगी तो यहां सबको खाना ही बनाकर खिलाती रही हूँ । आज इतने दिनों बाद अपनी बेटी के लिए बना रही हूँ । दिल को बहुत  सुकून मिल रहा है । ” बोलते – बोलते राधिका का गला रुंध गया । अब बस आँखें बोल रही थी ।

” अब शुरू हो गई तुम्हारी राम कहानी । जब देखो शिकायत करने को आतुर रहती हो । ज़रा खुश रहने की कोशिश किया करो । ” किचेन के बाहर से ही निशा के पिता का गुस्सा उबल पड़ा ।

” पापा ! आप माँ को ऐसे क्यों बोल रहे हैं । क्या वह अपने मन की बात बोल भी नहीं सकती । इसलिए मुझे माँ की बहुत चिंता लगी रहती है । ” आज पहली बार घर में किसी ने राधिका के लिए दो शब्द बोला था ।

” अच्छा तो बेटी को मेरे खिलाफ भड़काना शुरू हो गया । ” पुरुष अहं को किसी भी नारी की उठी आवाज़ नहीं बर्दाश्त होती है ।

तभी मेज के कोने से टकराकर लड़खड़ाते हुए अशोक ने गुस्से में राधिका की ओर देखा ।

राधिका बिल्कुल शांत खड़ी थी और यह भलीभांति समझ रही थी कि अशोक उसकी आँखों में पहले वाला डर देखना चाह रहा है ।

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