Monday, June 17, 2024
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संदीप तोमर की लघुकथा – ज़ज्ब ख़्वाब

आज सत्तर की उम्र पार कर चुके परास बाबू को अचानक सोशल साइट्स पर एक मित्रता प्रस्ताव आया। गौर से छाया चित्र देखने की कोशिश करने लगे। शक्ल तो नहीं पहचान पाए लेकिन नाम देखकर वो कुछ चौंके। अभिदा इनके साथ कॉलेज में पढ़ती थी। परास बाबू ने कितनी ही बार उसे मन की बात कहनी चाही थी लेकिन वो कॉलेज में उनसे ठीक से बात भी नहीं करती थी।
अभी वे अभिदा की प्रोफाइल देख ही रहे थे कि मैसेज बॉक्स में कुछ डिस्प्ले का नोटिस आया। परास बाबू ने मैसेज बॉक्स खोला, लिखा था– “यू लुक्स हैंडसम टिल टुडे।”
सोचा लिख दें-“तब क्या तेरी आँखें फूट गई थीं, मैं कल भी हैंडसम ही था।”
लेकिन मर्यादा का दायरा वे न तब भूले थे न आज ही भूले हैं। मन मसोसकर लिखा-“अभिदा, तुम चेहरे की झुर्रियों में भी बला की खूबसूरत लग रही हो।”
“अच्छा परास सुनो, मिलें?”
“हाँ, मिल सकते हैं मगर कहाँ?
“मैं द्वारका के सेक्टर 9 के अपार्टमेंट में रहती हूं।”
“अरे मैंने भी तो सेक्टर नौ में ही शिफ्ट किया है।”
दोनो ने मिलने का फिक्स किया, परास फ्लैट नम्बर पूछ दस मिनट में अभिदा के सामने थे। दोनो एक दूसरे की देख भावुक हुए लेकिन संयम और सीमा वो जानते थे।परिवार का हाल जानने के बाद अभिदा ने कहा- “परास अजब संयोग है ना तुम्हारी पत्नी तुम्हें छोड़ गई और मेरे पति के जाने के बाद से बच्चे भी अमेरिका से वापिस नही आये।”
” हाँ अभिदा, अच्छा सुनो, क्या आज मैं कॉलेज टाइम की इच्छा जाहिर करूँ?”
अभिदा ने उनका हाथ अपने हाथ में ले उनकी आंखों में देखा। परास बाबू उन आँखों की भाषा साफ-साफ पढ़ रहे थे।
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