Saturday, May 18, 2024
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संजय कुमार अविनाश की लघुकथा – गुरुजनों की सेवा

  • संजय कुमार अविनाश

“सर, महीने की फी क्या है?”
सामने मूविंग चेयर पर बैठे, किसी से मोबाइल पर बात कर रहे व्यक्ति से, रमन ने पूछा।
उन्होंने अंगुली से इशारा करते हुए दो मिनट कहा, अब यह मालूम नहीं कि दो मिनट किसे कहा। हाँ, तत्क्षण बिना फोन काटे, मोबाइल को सामने टेबल पर रखते हुए, उन्होंने कहा, “फी की बात करो ही मत। पटना-भागलपुर में रहकर जितना कमरे का किराया देते हो, उतनी राशि में महीने की पढ़ाई हो जाएगी।” हिलते-डुलते कुर्सीधारी, इस बात को जोर-जोर की आवाज़ में दुहराये जा रहे थे।
रमन की आँखें उनकी जुबान पर टिकी थी, ताकि कान से पहले आँखों में…. उन्हें निहारे जा रहा था। प्रतीक्षा में था कि आखिर महीने की राशि कितनी है।
आखिरकार उनकी आवाज़ निकली, “16 सौ रूपये। इतनी ही राशि में तुम्हें बारहवीं के साथ इंजीनियरिंग तथा मेडिकल, दोनों की तैयारी होगी।”
रमन की आँखें झुक गई, और कान ने धोखा दिया। तत्क्षण रमन बिना कुछ कहे, वहाँ से निकलने लगा।
बैठे महोदय ने कहा, “अरे! क्या हुआ? मेरा उद्देश्य रूपये कमाना नहीं है। उपार्जन उद्देश्य रहता तो, पटना-भागलपुर में ही कोचिंग चलाता। यहाँ आने का उद्देश्य है, वैसे बच्चों को शिक्षा देना, जो बाहर जाकर पढ़ने में असमर्थ है। अपनी मिट्टी से जुड़कर, जमीनी कार्य करना है। वर्षों कोटा में रहकर हजारों बच्चों को इंजीनियर और डॉक्टर बनाया। मेरे शिष्य देश-विदेश में परचम लहरा रहे हैं। इधर के कुछ महीनों से मुझमें बेचैनी आ गई, जब वर्षों से यहाँ के बच्चों का परिणाम सार्थक नहीं देखा। तुम्हारी परेशानी आँखों से पता चल रही है, ललाट पर साफ दिखाई पड़ रही है। खुलकर बोलो। तुम्हारी मदद के लिए ही बैठा हूँ।
उनकी बात सुनकर रमन में ऊर्जा का संचार हुआ। उसकी सोच को शक्ति मिली।
“हाँ, तो अपनी परेशानी बताओ। मैं इस संस्थान का डायरेक्टर हूँ। संकोच की कोई बात नहीं, मुझे किसी से परामर्श की भी जरूरत नहीं पड़ेगी।”
रमन ने हिम्मत के साथ कहा, “सर, मेरे पिताजी, वर्षों पहले गुजर गये। माँ की इच्छा है कि मैं पढ़-लिखकर शिक्षित हो जाऊँ, सरकारी नौकरी तो संभव नहीं, किंतु, शिक्षा जरूरी है।”
“यह तो मेरे संस्थान के लिए गौरव की बात है। ऐसे-ऐसे बच्चों को प्राथमिकता देना ही प्रथम उद्देश्य है।”
पुनः डायरेक्टर महोदय ने फोन को टेबल पर से उठाया और तुरंत वहीं पर रख दिया।
“हाँ, तो ऐसा करो, आधी फी तुम दे देना, और आकर पढ़ाई करो।”
“क्षमा करें सर! मैं महीने की फी देने में असमर्थ हूँ। पिछले सालभर से बगल के इंस्टीट्यूट में पढ़ाई कर रहा था, फी के बदले उस इंस्टीट्यूट की सफाई मेरे जिम्मे थी….लेकिन…” पूरी बात बताने से पहले आव़ाज में भारीपन… वह चुप हो गया।
तत्क्षण डायरेक्टर महोदय मूविंग चेयर को छोड़कर खड़े हो गये और रमन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, “वाह! रमन! वाकई, तुममें पढ़ाई के प्रति ललक है, जज्बा है। यहाँ भी पढ़ो। मेरी शुभकामना साथ है। कल से आ जाओ।”
रमन ने उनका चरण-स्पर्श किया और निकलने लगा। इंस्टीट्यूट से बाहर निकल ही रहा था कि आव़ाज सुनाई पड़ी, और पुनः लौटकर महोदय तक पहुँच गया।
“रमन, मुझे कहना तो नहीं चाहिए। लेकिन शिक्षा को दान-स्वरूप ग्रहण नहीं करना चाहिए। इंस्टीट्यूट में कुल छह शिक्षक हैं। खाना तो एक महिला बना देती है, जिसके बदले उसकी बेटी यहाँ पढ़ती है। सुबह तो नहीं, लेकिन शाम में आ जाओगे, इंस्टीट्यूट की सफाई भी हो जाएगा और बरतन भी……”
डायरेक्टर महोदय को सुनकर, रमन के चेहरे पर मायूसी छा गई। मायूसी को पढ़ते हुए, पुनः उन्होंने कहा, “बेटे, गुरूजनों की सेवा बेकार नहीं जाती।”
संजय कुमार अविनाश
मेदनी चौकी, लखीसराय, बिहार
पिन- 811106
मोबाइल – 9570544102
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