शऊर... (लघुकथा) - गीतांजलि चटर्जी 3

  • गीतांजलि चटर्जी

नाश्ता तैयार हुआ या नही? दफ़्तर को देर हो रही”। “जी अभी लाई।
माँ, यूनिफॉर्म प्रेस की? हाँ बेटा, हैंगर में टँगी है।
बहू सब्ज़ी में क्या पूरी नमक की डब्बी उंडेल दी? आक थू! “बाऊजी दूसरी सब्ज़ी बना देती हूँ।”
“अरी ओ बहू!  पूजा का कमरा अभी तक साफ़ क्यों नही हुआ? माँ ने कोई संस्कार नही सिखाया”? ” जी माजी दोबारा साफ़ किये देती हूँ।”
” अरे भई अब आओ भी। उफ़्फ़!! दफ़्तर में बहुत काम था आज। पीठ अकड़ी जा रही”। “जी, मालिश किए देती हूँ अभी”।
“अरे थोड़ी ताक़त लगा के मालिश करो। खाना नही खाया क्या?”
“जी रोटी लेके बैठी ही थी कि आप ने आवाज़ लगाई”। लेकिन वो कह नही पाई।  गले में शब्द, थाली में पड़ी  ठंडी सूखी रोटी की तरह अटक के रह गए।
“सुनो! तुम्हारे कपड़ों से बदबू आती है झूठे बर्तन और हल्दी मसालों की। कितनी गंदी रहती हो। दूसरी औरतों की तरह सजती सँवरती क्यों नही?  माँ बाप ने कोई शऊर सिखाया नही क्या?”
“सिखाया तो सभी कुछ था, मगर ये भी सिखाया था कि पति और सास ससुर को पलट के जवाब न देना कभी”। शब्द फिर अटक गए उसके गले में, थाली में पड़े ठंडी सूखी रोटी की तरह।
माँ बाऊजी टीवी पर महिला दिवस के उपलक्ष में प्रधानमंत्री जी का बधाई संदेश सुन रहे हैं।
ईमेलः rinkuchats1102@gmail.com 

1 टिप्पणी

  1. पुरवाई में जगह पाना, यानि अपने हिस्से के एक मुट्ठी आसमान को पाना है मेरे लिए। धन्यवाद आदरणीय तेजेन्द्र जी एवं पुरवाई टीम।

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